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सिसकता लेह

लद्दाख को राज्य का दर्ज़ा देने और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग के फलस्वरूप उपजी हिंसा और पुलिसिया बर्बरता के बाद लेह में जो कुछ इस समय हो रहा है ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। 24 सितंबर को हुई चार मौतों के पश्चात इन्हीं मांगों के गिर्द इस संघीय राज्य में विरोध-प्रदर्शन और भी तीखा हो गया है। पाकिस्तान और चीन की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे इस महत्वपूर्ण रणनीतिक-क्षेत्र से द हिन्दू के संवाददाता पीरज़ादा आशिक की रिपोर्ट।

लेह, लद्दाख के स्काइत्सैक्स में 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शहीद स्मारक पार्क तीन ओर से पेड़ों से घिरा हुआ है। पार्क में स्थित चबूतरा नीले, लाल और पीले रंग के कपड़े की झंडियों से सजा हुआ है- झंडियाँ, जो फिज़ाओं में बौद्ध प्रार्थनाओं की गूंज की अनुभूति देती  हैं: “ॐ मणि पद्मेहम”।

यह शहीद स्मारक पार्क उन तीन लद्दाखियों को समर्पित है जो 27 अगस्त 1989 को लेह के पोलो मैदान में सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में उस समय शहीद हो गए थे जब उस क्षेत्र को अनुसूचित जन-जाति बहुल एवं केंद्र-शासित प्रदेश घोषित किए जाने की मांग को लेकर वहाँ प्रदर्शन हो रहे थे। चारों ओर से पाँच हज़ार मीटर ऊंची पहाड़ियों से घिरे हुए और कुछ दूर पर बर्फबारी की मार झेलते हुए इस पार्क में असंख्य महिलाएं एक-एक और दो-दो करके प्रवेश कर रही थीं, कुछ धीमी आवाज़ में फुसफुसाती हुई, कुछ कदमों की आहट को भी जज़्ब करती हुई।

यह वही जगह है जहां बीते 10 सितंबर को 59 साला सोनम वांगचुक तीन हफ्ते की भूख-हड़ताल पर बैठे थे। वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980 के अंतर्गत बंदी वांगचुक को 24 सितंबर को, लेह के लिए असामान्य हिंसा, जिसमें चार जानें चली गईं थीं और 90 लोग घायल हो गए थे, के कारण अपनी भूख-हड़ताल समाप्त कर देनी पड़ी थी। वे लोग लद्दाख को राज्य का दर्ज़ा देने और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर सड़कों पर आ गए थे। (भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में आदिवासी-बहुल क्षेत्रों के लिए विशेष प्राविधानों की व्यवस्था की गई है।) इस हिंसा में पार्क के बाहर खड़ी लगभग 80 कारें क्षतिग्रस्त हो गई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार दर्जनों लोग अभी भी पुलिस-हिरासत में हैं।

इस क्षेत्र में भड़की हिंसा और उसके फलस्वरूप इस शहर पर आरोपित कर्फ़्यू के एक हफ्ते बाद एक गैर-सरकारी संगठन की सदस्य 30 साला डोलमा फुनसुख इस स्मारक पार्क में आई हुई हैं। चूंकि इस समय लेह में कर्फ़्यू में आठ घंटे की ढील दी गई है इसलिए वह प्रदर्शन-स्थल से अपना सामान समेटना चाहती हैं।

“मैं यह देखने के लिए आई हूँ कि भूख-हड़ताल के दौरान जो गद्दे और तकिये लेकर मैं यहाँ आई थी, क्या वे अभी भी महफ़ूज़ हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि किसी ने उन्हें चुराया नहीं होगा। लेह में सबकुछ अपनी जगह सुरक्षित रहता है“ अपनी बेटी के साथ आई हुई फुनसुख कहती हैं। उस जगह को खाली करने के क्रम में प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रयुक्त कुर्सियाँ ट्रकों पर लादी जा रही हैं, एक जगह गद्दों का ढेर बनाया गया है। वे दोनों उसी ढेर में अपने सामान ढूंढती हैं। अब वहाँ वांगचुक की अनुपस्थिति का मतलब ही है कि प्रदर्शन की राजनीति कुछ दिनों के लिए ठहर जाएगी।

फुनसुख बताती हैं, “24 सितंबर का वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकती। लाठियों के हमले से कोई नहीं बचा- बूढ़े, महिलाएं, बच्चे कोई नहीं। आँसू-गैस के गोले दागे गए। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा कुछ लद्दाख में भी हो सकता है। सुरक्षा-दस्ते पार्क में घुस आए थे, मैं बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा कर भागी।“

लेह की हिंसा के एक हफ्ते से ज्यादा बीत चुके हैं। किसी समय राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत के न्यूनतम अपराध-दरों वाले संघीय-क्षेत्रों में शुमार इस जगह के लोग अभी भी अविश्वास और सदमे के सागर में ऊभ-चूभ हो रहे हैं। यहाँ अधिकांश लोग यही समझ रहे हैं कि युवा लद्दाख की मूल्यांकन पद्धति में परिवर्तन के लिए बेचैन हो रहे थे।

ज़िंदा याददाश्त

स्मारक पार्क से ठीक 1 किमी दूर विशिष्ट नक्काशीदार खिड़कियों वाला धूसर रंग का सचिवालय खड़ा है जिस पर विगत हिंसा के चिन्ह साफ दिखाई देते हैं। 1995 में गठित लद्दाख ऑटोनोमस हिल डेवेलपमेंट काउंसिल की बैठकें यहीं होती हैं। लेह-मनाली राजमार्ग की ओर खुलनेवाली अधिकांश खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं। जमीन पर काँच के टुकड़े बिखरे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सचिवालय के बाहर की इसी जगह पर अधिकांश मौतें हुई हैं और अधिकांश लोग घायल भी हुए हैं। अगले 1.5 किमी पर ताज़े-पीले रंग में पुती परंतु जगह-जगह से कालिख में लिपटी भाजपा मुख्यालय की इमारत है। तोड़-फोड़ से प्रभावित इस इमारत पर टंगा पार्टी का विशाल-ध्वज भस्मीभूत हो चुका है। इस इमारत की सुरक्षा में तैनात सिपाही बताते हैं कि सुरक्षा-प्रबंध और भी तगड़ा कर दिया है, इतना तगड़ा कि कोई अजनबी अब इसके आस-पास फटक भी नहीं सकता।

उस हिंसा के बाद, जिसमें चार मौतें हो गईं थीं और 90 घायल हो गए थे, लेह के सोनम नूरबू स्मारक अस्पताल के चारों ओर अप्रत्याशित दृश्य उभर आए। नाम न छापे जाने की शर्त पर अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया कि, “मेरी 24 साल की नौकरी में पहली बार मैं लेह में आग्नेयास्त्रों से घायल लोगों की सेवा कर रहा था। इससे पहले इस अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल 2010 के बादल फटने की घटना के बाद पैदा हुआ था जिसमें 255 स्थानीय लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे।“

स्वतंत्र-रूप से वहाँ के हालात मीडिया से साझा करने के लिए कोई भी डॉक्टर अधिकृत नहीं है। उसी डॉक्टर ने आगे बताया कि कैसे नेत्र-रोग विभाग, पैथोलोजी जैसे विभागों के डॉक्टर भी, जिनका दुर्घटना या आपातकालीन सेवा के क्षेत्र से कोई वास्ता नहीं है, घायलों को अस्पताल की विभिन्न इकाइयों तक पहुंचा रहे थे।

नाम न छापे जाने की शर्त पर एक दूसरे वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया कि, “हमने उन चार लोगों में जान डालने की भरसक कोशिश की थी, पर उनकी तो पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। हमें 46 लोगों को खून चढ़ाना पड़ा। रक्त-दान के लिए लोग पूरे लेह से आए थे।“ हालांकि कई डॉक्टरों ने यह भी बताया कि लगभग 20 लोगों को गोलियां और छर्रे लगे थे।

अभी भी कम से कम 11 लोग अस्पताल में हैं जिनमें से सात पुलिस हिरासत से यहाँ लाये गए हैं। पुलिस के एक अफसर ने बताया कि अधिकांश घायलों को शीघ्र ही छोड़ दिया जायेगा, “अलग-अलग जत्थों में”।

एलीज़र जोलड़न मेमोरियल कॉलेज, लेह का बुरी तरह से हिला हुआ कॉमर्स का एक 18 वर्षीय विद्यार्थी बताता है कि, “जिस समय प्रदर्शन भड़का उस समय मैं अपने कॉलेज के बाहर था, कि कोई गरम चीज आकर मेरे पाँव में लगी। मैं जमीन पर गिर पड़ा।“ उसे विशेष चिकित्सा के लिए श्रीनगर अस्पताल में भेज दिया गया है क्योंकि उसके माता-पिता को लगा कि कोई गोली या छर्रा अभी भी उसके पैर में फंसा हुआ है। लेह में घायल हुए अधिकांश लोग 20-30 वर्ष आयु-वर्ग के थे।

मुख्य मांगें

इस बयान ने, कि वांगचुक के प्रदर्शन में कोई विदेशी हाथ था, उनका पाकिस्तान से कोई संबंध था और उनके फंड का दुरुपयोग किया गया है, गुस्से से उबलते लद्दाखियों के लिए आग में घी का काम किया। लोग इस बात पर भी सवाल उठा रहे हैं कि सारे लद्दाखियों को राष्ट्र-विरोधी कैसे कहा जा सकता है।

पुलिस की गोलियों से लेह हिंसा में मृत पूर्व-सैनिक और उस दिन के प्रदर्शनकारी सेवाङ्ग थार्चिन के संबंधी जानू टुंडुप बताते हैं कि “वह एक अवकाशप्राप्त सिपाही थे। वह हमें 1999 के कारगिल युद्ध में टोलोलिंग पहाड़ियों और द्रास सैक्टर में घुस आपे पाकिस्तानियों के हाथों से उस क्षेत्र को छुड़ा लेने की भारतीय सेना की बहादुरी के किस्से सुनाया करते थे। उस युद्ध में वह खुद लड़े थे और उन्होंने अपने दो बेटों को सैनिक स्कूल में इसीलिए भर्ती करवाया था कि वे भी सेना में जाकर देश की सेवा करें। उनके पिता भी फौजी थे। थार्चिन के सीने में बहुत नजदीक से दो गोलियाँ दागी गई थीं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पहले उन्हें पीटा गया था और उसके बाद उन्हें गोलियों का निशाना बनाया गया।“

इस समय भी उनका परिवार लेह शहर से 125 किमी दूर खलसी तहसील के स्कुर बूचान गाँव में उनका अंतिम संस्कार कर रहा है। इन प्रदर्शनों में मारे गए लोगों को यहाँ के लोग “शहीद” का दर्जा दे रहे हैं और महात्मा गांधी जयंती पर विभिन्न मठों में उनके लिए विशेष प्रार्थनाएँ आयोजित की गईं।

24 सितंबर की हिंसा ने लोगों के दिलो-दिमाग़ पर गहरा निशान छोड़ा है। स्थानीय इंफ्लुएंसर्स पर सुरक्षा-बलों के हमले ने कई व्लोग्स को खामोश कर दिया है। नाम न छापे जाने की शर्त पर एलएबी के एक युवा सदस्य का कहना है कि “एक रैप कलाकार को गुपचुप धमकी दी गई कि या तो वह इन प्रदर्शनों के वीडियो बनाना बंद कर दे या फिर इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। इस प्रकार की धमकियाँ भी मिली हैं कि जिनका भी नाम प्राथमिकी में आ जाएगा उन्हें कभी सरकारी नौकरी नहीं मिल सकेगी। सरकारी कर्मचारियों को अपने विचार ऑनलाइन पोस्ट करने के विरुद्ध चेतावनी दी गई है। युवाओं को हिरासत में लेकर उन्हें पूछ-ताछ के बाद छोड़ा जा रहा है। यह तो दमन है।“

पिछले चार साल से एलएबी और केडीए और लद्दाख के लेह और कारगिल क्षेत्रों के धार्मिक समूहों की अगुवाई में यहाँ की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे हैं। उनका चार-सूत्रीय एजेंडा है: इस क्षेत्र को राज्य का दर्जा दिया जाना, छठी अनुसूची में शामिल किया जाना, लोक-सभा में एक अतिरिक्त सीट मुहैया करवाना और सरकारी नियुक्तियों के लिए एक अलग लोक-सेवा आयोग का गठन करना। यह संदेश समाज के प्रत्येक स्तर, खासतौर पर बेरोजगार युवाओं, तक पहुँच चुका है।

एलएबी संगठन-समिति के संयोजक 42 वर्षीय गेलेक फूंचोक का कहना है कि गृह-मंत्रालय की शर्तों पर सहमति बन गई थी। “हमने यह पहले ही तय कर लिया था कि गृह-मंत्रालय से की जानेवाली वार्ता के चक्र में वांगचुक का नाम शामिल नहीं किया जाएगा। हम मसलों का शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं। जिस दिन हिंसा हुई उस दिन हमारे कार्यकर्ता सड़कों पर तोड़-फोड़ न करने की अपील कर रहे थे। इसके बाद मौतें हुईं और फिर स्थानीय युवाओं पर पुलिसिया दमन शुरू हो गया। अधिकतर गोलियां कमर से ऊपर चलायी गई थीं।“ फूंचोक बताते हैं। उन्हें भय है कि वार्ताओं को पटरी से उतारने के लिए केंद्र सरकार वांगचुक की गिरफ्तारी और युवाओं के खिलाफ दाखिल किए गए मुकदमों को हथियारों की तरह इस्तेमाल कर सकती है।

लद्दाख और केंद्र सरकार के बीच मतभेदों को भुलाकर किसी सहमति तक पहुँचने की दिशा में अबतक कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, पर बेनतीजा रही हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के शोध-छात्र रहे डॉ0 मुत्तसिफ़ लद्दाखी का कहना है कि, “केंद्र की वादाखिलाफी और टाल-मटोल की नीतियों ने नाराज लद्दाखियों के प्रदर्शन की आग में घी का काम किया। 2019 के बाद, पूर्व के जम्मू एवं कश्मीर राज्य से काटकर, बनाए गए लद्दाख के केंद्र-शासित प्रदेश को बाहर से आए हुए नौकरशाहों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया। उनकी इस क्षेत्र के बारे में समझ बहुत ही सतही है और स्थानीय संवेदनाओं के प्रति उनकी जानकारी शून्य है।“

लद्दाखी की 50 वर्षीय माँ, नसरीन मरियम 24 सितंबर को वांगचुक के अनशन-स्थल पर थीं। वहाँ के युवा मस्तिष्क को झकझोर देने वाले मुद्दों- नौकरशाहीकरण की अति और स्थानीय संविदा-कर्मचारियों से निर्धारित अवधि के ऊपर काम लेना- पर बहुत खुलकर बात करते हैं। वह कहते हैं कि, “पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में रोजगार देने वाली कोई एजेंसी नहीं है जिसके चलते बहुत से युवा अब समुचित रोजगार के लायक बचे ही नहीं। दिल्ली के मैदानों की उद्योग-नीति ज्यों की त्यों लद्दाख के ऊंचे-नीचे पहाड़ों पर भी आरोपित (कॉपी-पेस्ट) कर दी गई है, जो स्थानीय ज्ञान और जरूरतों से एकदम मेल नहीं खाती।“

उनकी चिंता यह है कि लद्दाख भी हिमाचल-प्रदेश के लाहुल और स्पीति के ढर्रे पर जा रहा है, जहां बौद्धों की आबादी घट रही है। वह आगे कहते हैं कि, “लद्दाख की कुल आबादी 3.5 लाख है। इस औद्योगीकरण से जनसांख्यिकी में परिवर्तन लाज़मी है। यही वजह है कि हम अपनी भूमि और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण से संबन्धित छठी अनुसूची के अधिकारों की मांग कर रहे हैं।“ बाहर से आए हुए कोरपोरेशन्स स्थानीय पर्यावरण के प्रति एकदम गैर-जिम्मेदाराना तरीके से 13 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के दोहन के लिए हमारी ज़मीनें छीन लेंगे, यह भी हमारी चिंता का कारण है। लद्दाखियों को इस बात पर भी हंसी आती है कि उनके प्रदर्शन में चीनी कोना ढूंढा जा रहा है। वह अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “इसका कोई चीनी कोना है ही नहीं। वे ऐसा क्यों करेंगे? हम राष्ट्रवादी हैं और इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।“

उथल-पुथल के फंदे में फंसे लेह की पर्यटन पर आश्रित अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हो रही है। पिछले कुछ दशकों में लेह में स्थानीय लोगों ने 317 होटलों, 691 अतिथि-गृहों, 1055 होमेस्टे और 105 कैंपों के निर्माण में निवेश किया है। आल लद्दाख गेस्ट-हाउस असोशिएशन की सदस्य एवं एक होटल की मालकिन रिजिन वांगमों लाचिक का कहना है कि, “कश्मीर के पहलगाम हमले के फलस्वरूप पर्यटकों की संख्या में 50% की गिरावट आ गई थी। लेह की हालिया हिंसा ने पर्यटन-उद्योग के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी है। इन निवेशों के लिए जिन्होंने कर्ज़ लिए थे वे उनकी भरपाई के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।“ उन्हें भय है कि इस साल लेह में पर्यटकों की आमद सबसे कम रहेगी। लेह में 2023 में पर्यटकों की संख्या 5.25 लाख और 2024 में 3.75 लाख रही थी।

लाचिक बताती हैं, “हमने पर्यटन का वह मोडेल जमीन से उठाया है जिसमें कार्पोरेशन के बनिस्बत समाज को और अनियंत्रित विकास के बनिस्बत निरंतरता को तरजीह दी जाती है। लोगों को लेह के पर्वतों को केवल जमीन का एक टुकड़ा मानना छोड़ देना चाहिए। जो लोग वहाँ सौर-ऊर्जा संयंत्र लगाना चाहते हैं उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि चांगथांग का पठार अपने आप में एक सम्पूर्ण परितंत्र (इकोसिस्टम) है।

वह आगे कहती हैं कि कियांग या तिब्बत के जंगली गधे यहाँ की हरीतिमा के मेरुदंड हैं, जब वे घास चरते हैं तो अपने मल के साथ हरीतिमा को दूर-दूर तक फैला देते हैं। “यह पठार खुशनुमा पशमीना बकरियों का घर है, जो इस हरीतिमा को चरती हैं। इस क्षेत्र में दुर्लभ पक्षी आते हैं। हम बिजलीघरों के लिए परितंत्र से छेड़-छाड़ नहीं कर सकते।“

राजनीतिक पहलू

चूंकि लद्दाख में इस समय कोई विधायिका नहीं है, इसलिए हिंसा की ताज़ा घटनाओं के तार चुनावों द्वारा गठित होने वाली एकमात्र संस्था- लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपपमेंट काउंसिल, लेह- के आनेवाले चुनावों से भी जोड़े जा सकते हैं क्योंकि सड़क, बिजली, पानी आदि का नियमन इसी संस्था के हाथों में होता है। लोअर लेह से काँग्रेस पार्षद त्सेरिंग नामगेल कहते हैं, “हमें डर है कि संभवतः ये चुनाव समय से न हो सकें क्योंकि अन्यथा की स्थिति में अब तक उसका नोटिफ़िकेशन जारी हो जाना चाहिए था। मौजूदा हालात काउंसिल में भाजपा के लिए मुफीद नहीं दिखलाई देते इसलिए वे इस चुनाव को टाले जाने को ही तरजीह देना चाहेंगे।“ उनका कहना है कि उनकी पार्टी राज्य का दर्जा दिये जाने और छठी अनुसूची को लागू किए जाने के अलावा यह भी सुनिश्चित करेगी कि वांगचुक की अविलंब रिहाई हो जाय, उनके खिलाफ योजित सारे मामले वापस लिए जाएँ, जिन लोगों ने अपने  प्रियजन खो दिये हैं उन्हें समुचित मुआवजा मिले। ये सभी हमारी पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा हैं। कुल 26 सीटों के लिए काउंसिल के पिछले चुनाव अक्तूबर 2020 में हुए थे जिसमें भाजपा को 15 और काँग्रेस को 9 सीटें मिली थीं।

2 अक्तूबर को दर्जनों स्थानीय लोग उन 26 कार्यकर्ताओं के स्वागत के लिए लेह के केंद्रीय कारागार गए थे जिन्हें 10 दिनों की हिरासत के बाद रिहा किया जाना था। एलएबी के अनुसार 24 सितंबर की हिंसा के बाद लगभग 56 लोग गिरफ्तार किए गए थे। इन 26 रिहा किए गए लोगों में 40 वर्षीय थिले दोरजी भी शामिल थे जिन पर हत्या के प्रयास और दंगा भड़काने के आरोप थे। उनको खाता (आदर और सम्मान का प्रतीक एक दुपट्टा) पहनाया गया था। वह कहते हैं कि, “लद्दाख का भविष्य दांव पर है, ऐसे में कोई भी जेल मुझे मेरे निश्चय से डिगा नहीं सकती। हिंसा गलत थी परंतु हमलोग अपना शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी रखेंगे। हमें भारतीय होने पर गर्व है, लेकिन हमारे क्षेत्र का परितंत्र भंगुर है और हमारी पूरी आबादी खतरे में है।“

‘द हिन्दू’ दिनांक 06.10.2025 से साभार                           अनुवाद: दिनेश अस्थाना

 

 

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