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जनमत

‘ पत्रकारिता अपराध नहीं है ’

फहद शाह

( ‘ द कश्मीर वाला ’  के प्रधान संपादक फहद शाह की यह आपबीती 5 अक्टूबर को प्रकाशित हुई है। समकालीन जनमत के लिए हिन्दी अनुवाद इन्द्रेश मैखुरी ने किया है ) 

 

30 सितंबर 2020 को मैं अपने फोटो पत्रकार सहकर्मी भट बुरहान के साथ न्यू यॉर्क स्थित प्रकाशन बिज़नेस इनसाइडर के लिए एक असाइनमेंट करने के लिए अपने वाहन से लुधियाना(पंजाब) गया. हमारा असाइनमेंट था, किसानों के विरोध प्रदर्शन को कवर करना. लुधियाना में हम होटल में रहे और इस स्टोरी के लिए पंजाब के मोगा, बरनाला और खन्ना गांव गए, जहां किसान प्रदर्शन कर रहे थे. हमने प्रदर्शन स्थलों से सोशल मीडिया में फोटो भी पोस्ट किए.

03 अक्टूबर को पंजाब में अपना काम पूरा करके दोपहर में लुधियाना से अपने व्यक्तिगत वाहन से हम श्रीनगर के लिए निकल पड़े.गाड़ी मैं खुद चला रहा था. हम आधी रात को जम्मू पहुंचे और अगली सुबह अपने घर-श्रीनगर- के लिए निकालने से पहले जम्मू में एक होटल में रुके. 04 अक्टूबर को हमने सुबह 10 बजे फिर अपनी यात्रा शुरू कर दी.

जम्मू- श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बार-बार जाम लग रहा था क्यूंकि जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग की हालत काफी खराब है और शाम को करीब साढ़े पांच बजे हम जवाहर टनल पर पहुंचे. जैसे ही हमने सुरंग पार की, हमने देखा कि पुलिस और अर्द्धसैनिक बल, हर आते हुए वाहन को रोक रहे थे.

जैसे ही हमारी कार पर उनकी नजर गयी, उन्होंने मुझे कार किनारे लगाने को कहा. “ कमांडो ” लिखी हुई काली टी शर्ट पहने हुए सरकारी बल के एक कार्मिक ने हमें अपने पहचान पत्र दिखाने को कहा. जैसे ही “ कमांडो ” ने मेरा नाम देखा, वह थोड़ी दूर खड़े अपने अफसर के पास गया.  मेरे पहचान पत्र की ओर इशारा करते हुए अपने अफसर से मैंने उसे कहते हुए सुना, “ सर यही आदमी है.”  पलक झपकते ही असॉल्ट राइफलों से लैस दर्जन भर पुलिस कर्मियों ने हमें घेर लिया. हमें कार से उतरने को कहा गया.

वरिष्ठ अफसर ने हमारे फोन मांग लिए. अफसर ने मुझ से मेरा फोन अनलॉक करने को कहा, जो मैंने कर दिया. अफसर ने अपने फोन से जानकारी के लिए कुछ नंबर डायल किए. मेरे सहकर्मी को फोन अनलॉक करने को नहीं कहा गया पर हम दोनों को ही इंतजार करने को कहा गया. हम पंजाब से यहां तक की लंबी यात्रा से थक कर चूर थे और हैरत में थे कि क्या गड़बड़झाला है और हमारे से साथ ऐसा सलूक क्यूं किया जा रहा.

मैंने थोड़ा साहस बटोरते हुए वरिष्ठ अफसर से हमें सड़क पर बंधक बनाए जाने का कारण पूछा. उन्होंने मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. वो फोन पर किसी से बात करते रहे,संभवतः उनका कोई वरिष्ठ अफसर रहा होगा. आधे घंटे बाद वरिष्ठ अफसर ने हमें, हमारी कार में बैठने को कहा. हमने वैसा ही किया. पुलिसकर्मी अब भी हमें घेरे हुए थे. कुछ देर बाद अफसर ने हमें कार से नीचे उतरने को कहा.वरिष्ठ अफसर ने फिर एक पुलिस वाले से पुलिस ट्रक लाने और हमें पुलिस स्टेशन ले जाने को कहा. हमने ट्रक में बैठने से इंकार कर दिया. इस पर एक पुलिस वाला उत्तेजित हो गया.

“ मैं तुम्हें कुत्ते की तरह घसीटूंगा हरामजादे. हमारे साथ सहयोग करो वरना मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि हम क्या कर सकते हैं,” पुलिस वाले ने मुझसे कहा. मैंने वरिष्ठ अफसर से कहा कि हम अपराधी नहीं हैं, न हमने कोई कानून तोड़ा है, हम पुलिस ट्रक में नहीं बैठेंगे. अफसर फिर कुछ दूर गया और किसी को फोन किया, संभवतः अपने उच्च अधिकारी को. वापस लौट कर अफसर ने पुलिस वाले से हमारी कार चलाने को कहा. एक पुलिस कर्मी ने स्टेयरिंग संभाल लिया.  मुझे बगल की सीट पर बैठा दिया गया और मेरा साथी दो पुलिस वालों के बीच में पीछे की सीट पर बैठा दिया गया. हम भयभीत थे क्यूंकि कोई नहीं जानता था कि हमारे साथ क्या हो रहा है. मैं सोचने लगा कि यदि हम कहीं मार दिए जायें तो किसी को पता तक नहीं चलेगा.

 

Journalism is not a crime

हमें चिंतित देख कर वरिष्ठ अफसर ने कहा, “चिंता मत करो मैं पीछे-पीछे आ रहा हूँ.” हमें अहसास हुआ कि यह चेकपॉइंट केवल हमारे लिए बनाया गया था क्यूंकि जैसे ही हमारी कार चलना शुरू हुई, सारे पुलिसकर्मी हमारे पीछे आने के लिए अपने वाहनों में सवार हो गए.

हम क़ाज़ीगुंड पुलिस स्टेशन पहुंचे और मुझे एक पुलिस कर्मी के साथ जाने को कहा गया, जिसने मेरी कार की तलाशी ली, मुझे सामान खोलने को कहा और हर चीज की अच्छे से तलाशी ली. पुलिस स्टेशन में हमें लगभग 45 मिनट तक कोतवाल के कार्यालय में इंतजार करवाया गया. कोतवाल मौजूद नहीं था.

कोतवाल के आने के बाद पूछताछ शुरू हुई. कोतवाल ने हमारी उम्र, परिवार, हम किस स्कूल में पढ़े, हमने पत्रकार के तौर पर कब से काम करना शुरू किया और हमारा काम कहाँ-कहाँ प्रकाशित हुआ आदि सवाल पूछे. उन्होंने पानी व चाय पिलाई और कहा कि हमसे बात करने एक वरिष्ठ अफसर आ रहे हैं. मैंने उनसे हमें बंदी बनाए जाने और पूछताछ किए जाने का कारण जानना चाहा. उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता. मैंने आग्रह किया कि हमें अपने परिवार वालों को फोन करने दें- जो इस समय हमारे बारे में नहीं जानते कि हम कहाँ हैं – ताकि  घर पहुँचने में हमको होने वाली देरी के कारण वे परेशान न हों. कोतवाल ने अनुमति देने से इंकार कर दिया और वरिष्ठ अफसर के आने तक इंतजार करने को कहा.

रात में करीब आठ बजे, पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) मोहम्मद शफी कोतवाली में आए और अन्य लोगों से कमरे से बाहर जाने को कहा. यही डीएसपी था जो सुरंग के चेकपॉइंट से कोतवाल और वरिष्ठ अफसर के साथ हमको कोतवाली लाया था. अब डीएसपी ने सवाल पूछने शुरू किए. हमारी उम्र, शिक्षा, परिवार आदि संबंधी सवाल डीएसपी ने भी दोहराए. डीएसपी ने पंजाब की यात्रा के संबंध में भी हम से सवाल पूछे. हमने हर सवाल का जवाब दिया.

फिर डीएसपी ने सवाल किया कि क्या हम बिना किसी योग्यता के पत्रकार बन गए हैं,   जिसका आशय यह था कि हम पत्रकार होने की योग्यता नहीं रखते. पुलिस अफसरों ने ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा, जिससे हमें बंदी बनाए जाने का कारण समझ में आ सके.

डीएसपी ने फिर पूछा कि कश्मीर के हालात के बारे में अब तक हमने क्या रिपोर्टिंग की है. उन्होंने विशेष तौर पर कुलगाम में हुई दमहाल- हांजीपुरा गोलीबारी का उल्लेख किया, जिसे हमने यानि- द कश्मीर वाला- ने मई 2020 में प्रकाशित किया था. मैंने कहा कि हमने वही छापा जो घटित हुआ था और यदि पुलिस को हमारी रिपोर्ट से कोई दिक्कत होती तो वो खंडन जारी करते. पर डीएसपी ने इस मसले पर आगे बात नहीं की.

हमने सोचा था कि हमें बंदी बनाए जाने की बात किसी को नहीं पता होगी. पर किसी तरह श्रीनगर में कुछ पत्रकार मित्रों को पता चला गया. संभवतः कोतवाली के किसी पुलिस कर्मी ने किसी को हमें बंदी बनाए जाने की बात बताई होगी. तुरंत ही हमसे पूछताछ करने वाले अफसरों को हमारे चिंतित मित्रों और सहकर्मियों के फोन आने शुरू हो गए.  उन में से किसी को भान नहीं था कि फोन पर बात कर रहे अफसर ही हमसे पूछताछ कर रहे हैं. हमने डीएसपी को पत्रकारों को बंदी बनाने की बात से इंकार करते हुए सुना. “नहीं हमने सुरंग से किसी को नहीं उठाया है, फिर भी मैं देख लेता हूँ” डीएसपी  हमारे सामने बैठ कर ही फोन करने वालों को जवाब दे रहा था.

पुलिस अधिकारियों ने हमारे कैमरों में मौजूद वीडियो और तस्वीरों को देखा और उनके बारे में सवाल किया. ये पंजाब के किसानों के प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो थे. कुछ समय बाद,दूसरे अफसर जो सुरंग पर हमारा इंतजार कर रहा था और जिसकी नेम प्लेट जैकेट से ढकी हुई थी, से  डीएसपी ने पूछा कि वो हम दोनों में से किससे सवाल पूछना चाहता है. युवा अफसर ने मेरा नाम लिया. थका देने वाली पूछताछ के बाद हमें कमरे से बाहर ले जाया गया और डीएसपी ने किसी से फोन पर बात की.

कुछ समय बाद हमें कमरे में फिर बुलाया गया और सवालों का सिलसिला फिर शुरू हो गया. इस बार डीएसपी ने कहा कि “राष्ट्रीय सुरक्षा” को  ध्यान में रखते हुए पत्रकारों को कुछ “आत्म संयम” बरतना चाहिए और “सावधानी” से रिपोर्टिंग करनी चाहिए. मैंने कहा कि हम तथ्यों के अलावा और किसी चीज की रिपोर्टिंग नहीं करते. एक गोलीबारी की घटना और उसके बाद श्रीनगर के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए डीएसपी ने कहा कि हमारी रिपोर्टिंग दिक्क्त तलब है. मैंने कहा कि श्रीनगर के उस घटनाक्रम के बाद पुलिस ने मुझे तलब किया था और हमने तब भी यही कहा था कि हमारा काम तथ्यों पर आधारित है.

रात में लगभग सवा नौ बज चुके थे जब डीएसपी ने हमारे फोन और पहचान पत्र लाने को कहा. कोतवाल ने एक बयान लिखा है जिसमें कहा गया था कि मेरी कार फोन और अन्य सामान बिना किसी नुक्सान के वापस कर दिये गए हैं. कोतवाल ने हम दोनों को उस पर दस्तखत करने को कहा और हमने कर दिये.  उन्होंने हमें एक पंजिका पर भी दस्तखत करने को कहा. फिर डीएसपी ने मुझसे पूछा कि क़ाज़ीगुंड में कोई है जो मुझे जानता है ताकि वे हमें उसके हवाले कर सकें. लेकिन हम तो क़ाज़ीगुंड में किसी को नहीं जानते थे. डीएसपी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वो हमें तभी छोड़ेंगे जब क़ाज़ीगुंड का कोई व्यक्ति लिखित में हमारी ज़िम्मेदारी लेगा. इस समय तक भी हमारे परिवार हमें बंदी बनाए जाने से अंजान थे. मैंने डीएसपी से कहा कि यदि वो मुझे एक दोस्त को फोन करने दें तो हमारी ज़िम्मेदारी लेने वाले स्थानीय व्यक्ति का इंतजाम हो सकता है.

अंततः रात के साढ़े नौ बजे मैंने एक दोस्त को फोन किया जो क़ाज़ीगुंड में किसी को जानता था. स्थानीय व्यक्ति को हमारे रिहाई फॉर्म पर दस्तखत करने को कहा गया और हमसे भी दस्तखत करवाए गए. इसके बाद डीएसपी ने कहा, “हमने सिर्फ तुम्हारी मदद की है, अब इसका तमाशा मत बनाना. यह हमारी ड्यूटी है.”

हम रात के दस बजे कोतवाली से निकले. घर वापस लौटते समय हम बहुत चिंतित थे.  अपनी रिहाई के बाद से मैंने अपनी अवैध गिरफ्तारी और अपने साथ हुए बर्ताव के कारण तलाशने की कोशिश की. हमारे साथ ऐसा बर्ताव किया गया जैसे कि हमने कोई बेहद जघन्य अपराध किया हो. परंतु मुझे अभी तक इसका कारण ज्ञात नहीं हो सका है.

हमें अवैध रूप से बंदी बनाया गया और हम समझते हैं कि पत्रकारों को इसी तरह निरंतर उत्पीड़ित किया जाता है, पुलिस स्टेशन तलब किया जाता है, अपराधियों की तरह बर्ताव किया जाता है और धमकाया जाता है और यह सब इसलिए कि हम रिपोर्टिंग में तथ्य सामने लाते हैं.  यह निरंतर उत्पीड़न में मेरे मानसिक स्वास्थ्य की बलि ले रहा है और द कश्मीर वाला के हमारे काम को प्रभावित कर रहा है.

हमने कोई कानून नहीं तोड़ा. हमने कोई अपराध नहीं किया. पत्रकारिता अपराध नहीं है.  हमें इस तरह से क्यूं धमकाया और उत्पीड़ित किया जा रहा है ? मैं अपने सहकर्मियों और अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हूँ.

 

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