समकालीन जनमत
स्मृति

रतन थियम को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

महान भारतीय नाटककार, निर्देशक, डिज़ाइनर, संगीतकार, चित्रकार, अभिनेता और लेखक रतन थियम के निधन पर जन संस्कृति मंच हार्दिक श्रद्धांजलि देता है। उनके निधन से भारत ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय रंगमंच जगत पर भी अपनी प्रभावशाली छाप छोड़ी थी।

अपनी विशिष्ट नाट्य कला के कारण वे सुजुकी, ब्रुक और ग्रोटोव्स्की जैसी रंगमंच जगत की महान हस्तियों के समकक्ष माने जाते हैं। उनके नाटक विषयगत अन्वेषण के कारण तो जाने ही जाते हैं, अनूठे कलात्मक सौंदर्य के साथ-साथ स्पष्ट वैचारिक संकेत भी उनकी नाट्यकला की खासियत है।

उनके नाटकों में एक साथ जल की गहराई, भूमि का ताप और आकाश मे घुमड़ते बादलों को देखा और महसूसा जा सकता था, एकदम सिनेमा की तरह। उनके नाटक में संगीत और नृत्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, जो दर्शकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाते थे।

रतन थियम का जन्म 1948 में एक कलाकार परिवार में हुआ था। उनके पिता गुरु थियम तरुणकुमार, मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य के सबसे सम्मानित गुरुओं में से एक थे और उनकी माँ बिलासिनी देवी, एक प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। रतन थियम बहुमुखी प्रतिभा संपन्न सांस्कृतिक व्यक्ति थे। उन्होंने कुछ समय तक चित्रकला का अध्ययन किया। छह उपन्यासों की रचना की। 22 साल की उम्र में ही उनका पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ। उन्होंने कविताएँ और समीक्षाएँ भी लिखीं। समीक्षाएँ लिखने के अतिरिक्त वे नाटक भी पढ़ने लगे। पेशेवर प्रशिक्षण के लिए 1971 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया और इसी क्रम में एक कुशल अभिनेता और निर्देशक के रूप में उनका विकास हुआ।

1976 में जब वे मणिपुर लौटे तो कोरस रिपेर्टरी थियेटर ( सीआरटी ) की स्थापना की। अस्सी के दशक के आरंभ में दो वर्ष के लिए एनएसडी के निदेशक भी रहे।  रतन थियम दृश्यात्मक सौंदर्य, संगीत, प्रकाश और वेशभूषा के अद्भुत मेल से रंगमंच पर जो जादू-सा रचते थे, वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। ‘उरुभंगम’, ‘कर्णभारम’, ‘चक्रव्यूह’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ उनके कुछ प्रमुख नाटक हैं, जिन्होंने नाट्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘मैकबेथ’, ‘उत्तर प्रियदर्शी’ और ‘अंधा युग’ का भी निर्देशन किया, जो देश-दुनिया में प्रदर्शित और प्रशंसित हुए।

उन्होंने अपने नाटकों में उन्होंने प्राचीन भारतीय कथाओं और पात्रों के माध्यम से वर्तमान की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर प्रकाश डाला। उनके कुछ महत्त्वपूर्ण नाटक महाभारत के प्रसंगों पर आधारित हैं। रतन थियम ‘थिएटर ऑफ़ रूट्स’ आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकारी नाटककार थे। दरअसल रतन थियम और उनके कई समकालीन नाटककार भारतीय रंगमंच को नाट्य प्रस्तुति के पश्चिमी तरीकों से मुक्त करके स्वदेशी नाट्य रूप के विकास की आवश्यकता महसूस कर रहे थे।

रतन थियम ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘‘रंगमंच स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक लक्ष्य उपनिवेशवाद की समाप्ति को प्राप्त करने के लिए सबसे प्रभावी विमर्शों में से एक हो सकता था।’’ रतन थियम का मानना था कि ‘‘ रंगमंच एक सतत प्रक्रिया है; यह एक प्रयोगशाला है जहाँ हम रंगमंच से जुड़े व्यक्ति, कला के विभिन्न आयामों की खोज करते रहते हैं, जो निश्चित रूप से, समय के साथ विकसित होते रहते हैं।…यह ठहरे हुए पानी की तरह नहीं हो सकता ; इसे हमेशा ताज़ा और बहता रहना चाहिए।’’

उनका कहना था कि रंगमंच से रंगमंच से जुड़ी विचार प्रक्रिया को हमेशा जीवंत और गतिशील बनाए रखने की ज़रूरत है। वे मानते थे कि रंगमंच स्वभाव से ही निरंतर प्रयोग का माध्यम है। उनकी नाट्य कला पारंपरिक मणिपुरी नृत्य मार्शल आर्ट (थांग ता), संगीत और अनुष्ठानिक घटकों के सशक्त संयोजन के कारण विशिष्ट हैं। वे अक्सर एक मनोरम और भावनात्मक रूप से गहन वातावरण बनाने के लिए सावधानीपूर्वक डिज़ाइन किए गए हाव-भाव, विस्तृत वेशभूषा और प्रतीकात्मक सेटिंग्स का उपयोग करते थे।

रतन थियम के नाटक अन्याय, हिंसा और युद्ध का विरोध करते हैं। उनके नाटकों में युद्ध, उसकी विभीषिका और महिलाओं की स्थिति को खास तौर पर फोकस किया जाता रहा है। ‘किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ नाटक इसकी बानगी है।

हाल में मणिपुर में हो रही हिंसा के दौरान जब राज्यपाल अनुसुइया उइके की अध्यक्षता वाली शांति समिति का सदस्य बनने का प्रस्ताव आया, तो उसे उन्होंने मंजूर नहीं किया। वे केंद्र सरकार के रवैये से क्षुब्ध थे। उन्होंने कहा था- ‘‘इतनी हिंसा हो रही है और हमें अभी तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से एक शब्द भी सुनने को नहीं मिला है… हमें राजनीतिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक शक्ति की आवश्यकता है। आज भी इतने लोग मर रहे हैं। जब तक केंद्र सरकार हस्तक्षेप नहीं करती, स्थिति भयावह बनी रहेगी। मैंने ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं देखी।’’

रतन थियम ने देश-दुनिया में बेमिसाल नाट्य प्रस्तुतियां कीं। ग्रीस, पेरिस, मास्को, न्यूयार्क समेत दुनिया के कई नगरों में उन्होंने अपनी नाट्य प्रस्तुतियां कीं। रतन थियम अपने नाटकों में विजुअल इफेक्ट्स के जबर्दस्त उपयोग के लिए जाने जाते हैं। उनकी नाट्य प्रस्तुतियों मे शाब्दिक भाषा का न होना बाधक नहीं बनता, बल्कि दृश्य ही भाषा का रूप ले लेता है . नाटकों में तकनीक के आगमन पर उनका कहना था कि रचनात्मकता के साथ तकनीकी आगमन हो सकता है; लेकिन साथ ही, मेरा मानना है, एक संतुलन होना चाहिए; हमें तकनीक और मानवीय गुणों के बीच संतुलन बनाने के लिए काम करने की आवश्यकता है। कला को समझने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कला, विशेष रूप से रंगमंच और मानव द्वारा प्रदर्शन के बारे में है। इसे तकनीक द्वारा ढका नहीं जा सकता।

उनके नाटकों में मणिपुरी संस्कृति का गहरा प्रभाव है, पर उनका मानना था कि उसमें जो चेतना है, वह केवल मणिपुर की बात नहीं है, बल्कि पूरी मानव जाति के बारे में है। यह उथल-पुथल हर जगह, इस दुनिया के किसी भी हिस्से में है, जो वास्तव में हिंसक है।उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और अकादमी द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। रतन थियम को उनकी विशिष्ट भारतीय नाट्य शैली तथा परंपरागत कथाओं को आधार बनाकर आधुनिक संदर्भों और प्रश्नों से जोड़ कर प्रस्तुत करने के लिए हमेशा याद रखा जाएगा।

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion