जन संस्कृति मंच, आज़मगढ़ इकाई, ‘लेखक के घर चलो’ अभियान के अंतर्गत आज़मगढ़ के साहित्य जगत में प्रतिष्ठित जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ के घर पहुंची।
23 जुलाई को आयोजित इस कार्यक्रम में कल्पनाथ यादव, हरिश्चंद्र यादव, यमुना प्रजापति, जयप्रकाश नारायण और दुर्गा सिंह शामिल हुए। कुन्द जी को इस अवसर पर शाॅल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
1949 ई. में जन्में कुन्द जी से उनके लेखन, जीवन, नौकरी आदि को लेकर सवाल किये गये, जिस पर उन्होंने खुलकर बातचीत की। कुन्द जी ने बताया, कि वे बनिया परिवार से आते हैं। उनके परिवार का खांडसारी, गुड़ आदि का बड़ा व्यापार था, लेकिन समय के साथ यह व्यापार खत्म हो गया।
उन्होंने बताया कि बड़ी दिक्कतों से उन्होंने एम.ए हिन्दी की शिक्षा पायी। शहर के डीएवी काॅलेज से पढ़ाई के दौरान कन्हैया सिंह और श्री राम वर्मा जैसे अध्यापकों से सम्पर्क हुआ। इनके प्रोत्साहन से हिन्दी से एम.ए के लिए प्रवेश लिया। खर्च निकालने के लिए ट्यूशन करता था।
एम.ए के दौरान ही इनके अध्यापकों ने इन्हें ‘देवल’ अखबार के सम्पादन के लिए कहा, जिसे उन्होंने मान लिया।

साहित्य से जुड़ाव के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि साहित्य का विद्यार्थी था, तो रुचि तो थी ही, फिर अध्यापक भी ऐसे मिल गये।
1960 में ‘आज’ अखबार के साहित्य विशेषांक में कविता छपी और उसके लिए पांच रूपये मिले। उस समय कविता के लिए पांच, लेख के लिए दस और कहानी के लिए पन्द्रह रूपये मिलते थे। बाद में वे आज, नवजीवन, और लोकवार्ता में लेख लिखने लगे।
उन्होंने बताया कि आज से एक टीम अलग होकर लोकवार्ता में आ गयी, तो लोकवार्ता के लिए लिखने लगा। बाद में पत्रिकाओं में भी लेख छपने लगे। आजकल में लेख छपने लगे।
नौकरी के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि आपूर्ति विभाग में उनकी नौकरी लगी और शहर में ही तो उनके लिए अच्छा रहा। बीच में गोरखपुर तबादला हुआ, लेकिन फिर आज़मगढ़ लौट आये। यहीं से सेवानिवृत्त हुए।

उन्होंने पुस्तकों पर बात करते हुए बताया कि 1997 ई. में उनकी पुस्तक ‘विदेशी विद्वानों का हिन्दी प्रेम’ छपी। इसका खूब स्वागत हुआ। इससे प्रेरित होकर ‘विदेशी विद्वानों का संस्कृत प्रेम’ तथा ‘विदेशी विद्वानों की दृष्टि में हिन्दी के रचनाकार’ पुस्तक पर काम किया। यह तीनों पुस्तकें सराही गयी।
यह पूछने पर कि यह पुस्तकें तो अकादमिक महत्व की हैं और काफी श्रमसाध्य हैं, कैसे सामग्री जुटाई गयी, तो इस पर उन्होंने कहा, कि व्यक्तिगत स्तर पर लेखकों, विद्वानों ने इसमें मदद की, लेकिन विश्वविद्यालयों से कोई मदद नहीं मिली।
फिर उन्होंने आगे बताया कि राहुल सांकृत्यायन पर उन्होंने पुस्तक लिखी, ‘राहुल सांकृत्यायन: जिसे सीमाएं रोक नहीं सकीं’, जिस पर उत्तर प्रदेश के साहित्य संस्थान से उन्हें पचहत्तर हजार रूपये मिले। उन्होंने बताया कि आजादी के आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का इतिहास लिखवाया जा रहा था, जिसमें मुझसे आज़मगढ़ जिले का इतिहास लिखवाया गया। उन्होंने पाण्डुलिपि दिखाते हुए कहा, कि आज तक सरकार की तरफ से कुछ जवाब नहीं आया प्रकाशन को लेकर।
इसी तरह उन्होंने हिन्दी के रचनाकारों पर अपनी पुस्तक की पाण्डुलिपि दिखाई जो अप्रकाशित है। इसमें भारतेन्दु युग से लेकर अब तक के रचनाकारों पर सूचनात्मक लेख हैं।
गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ जीवन और साहित्य, हरिऔध के काव्यगुरू बाबा सुमेर सिंह साहबजादा पर भी कुन्द जी की पुस्तक है। विविध सन्दर्भों में आज़मगढ़, अनुरंजिता, बिरही बिसराम उनकी अन्य पुस्तकें हैं।
इसके अलावा कुन्द जी का एक कविता संग्रह ‘सूरज का रूप’, एक कहानी संग्रह ‘सच के करीब’, एक बाल नाटक ‘सप्तमुक्ता’ भी प्रकाशित है। कुन्द जी की लाइब्रेरी बहुत समृद्ध है। बहुत से लोगों ने इस लाइब्रेरी के सहयोग से पुस्तकें लिखी हैं। आज़मगढ़ में किसी को भी कोई पुस्तक, कोई साहित्यिक सामग्री की खोज हो, तो लोग तुरन्त बोलते हैं, कुन्द जी के यहाँ मिल जायेगी। कुन्द जी स्वयं में एक लाइब्रेरी हैं।
लेखक संगठनों के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, कि बौद्धिक विमर्श का काम तो वामपंथी लेखक संगठन ही करते हैं। बाकी अन्य संस्थाएं भी हैं सक्रिय, लेकिन बौद्धिक विमर्श का कार्य वे नहीं करतीं।
फिर उन्होंने बताया, कि वे किसी लेखक संगठन से नहीं जुड़े, लेकिन जितना सम्मान उनका वामपंथी संगठनों ने किया, उतना किसी ने नहीं किया। इस पूरी बातचीत के दौरान वे खूब उत्साहित रहे।

