शांतम निधि
15 अगस्त की सुबह, स्वतंत्रता दिवस पर, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों — आइसा, बापसा, बीएएसएफ, एनएसयूआई और एससीएस — ने मिलकर मार्च निकाला। हमारी मांग साफ थी, नारा सीधा था : लोकतंत्र बचाओ। एक ऐसे देश में जहाँ अब यह खुलकर सामने आ चुका है कि चुनाव धांधली से जीते जाते हैं, यह कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं था — यह जिम्मेदार नागरिकों का कर्तव्य था।
स्वतंत्रता दिवस झंडा लहराने और खोखले भाषण सुनने का दिन नहीं है। यह दिन है यह पूछने का कि हमने अपनी आज़ादी के साथ क्या किया ? क्या हमारे पास सिर्फ़ “ स्वतंत्र सरकार ” है या स्वतंत्र नागरिक भी हैं ? यही वह बुनियादी सवाल है जो हर उस समाज को पूछना चाहिए जो खुद को स्वतंत्र कहता है।
हमारा गेट नंबर 4, लखनऊ विश्वविद्यालय से हज़रतगंज चौराहे तक मार्च करना चाहते थे लेकिन राज्य की मंशा कुछ और थी। परिवर्तन चौक पर पुलिस ने हमें बलपूर्वक रोक दिया। हसनगंज थाने के एसएचओ इस दमन के सबसे आक्रामक चेहरे के रूप में सामने आए। उनके शब्द कोई गलती नहीं थे — वे आज के भारतीय राज्य की असली जुबान थे। उग्र, शत्रुतापूर्ण और युवाओं के सवाल पूछने से भरी नफरत के साथ उन्होंने खुलेआम धमकी दी कि छात्र कार्यकर्ताओं को फर्जी मुकदमों में फंसाकर उनके करियर बर्बाद कर देंगे।
उनका व्यवहार वैसा ही था जैसा एक पितृसत्तात्मक घर में पिता करता है — देखभाल के नाम पर नियंत्रण। यही तो फासीवाद है। यह पितृसत्ता जैसी व्यवस्थाओं को वैधता और ताक़त देता है और इसे लागू करने का काम करते हैं राज्य के अतिपौरुषीय सिपाही। संदेश साफ था : आदेश मानो। सवाल मत पूछो। और अगर पूछोगे, तो सज़ा पाओगे।
जाति का सच भी इस पूरे घटनाक्रम में मौजूद था। मार्च में मौजूद आंबेडकरवादी कार्यकर्ता वही सवाल पूछ रहे थे जो भारतीय गणराज्य से भी पुराना है: क्या हम इस तथाकथित स्वतंत्र देश में सच में आज़ाद हैं ? यह डॉ. आंबेडकर के गांधी से कहे उन शब्दों की गूंज थी: मेरे पास कोई मातृभूमि नहीं है। भारत में आज़ादी और लोकतंत्र अब भी क्रमबद्ध है — ऊँची जातियों के पास इसके विशेषाधिकार हैं, दलित-बहुजन अब भी इसके टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं।
एसएचओ का सबसे खुलासा करने वाला पल तब आया जब उन्होंने चिल्लाकर कहा कि वे हमें देशद्रोह में फंसा देंगे — क्योंकि हमने स्वतंत्रता दिवस पर भारत की स्वतंत्रता पर सवाल उठाया। इससे बेहतर हमारे तर्क का सबूत क्या होगा ? अगर आज़ादी के दिन राज्य से सवाल पूछना अपराध है, तो यह अब स्वतंत्र देश नहीं है। यह एक कब्ज़ा किया हुआ देश है — जिसे विदेशी हुक्मरानों ने नहीं बल्कि अपनी ही पुलिस, नेता और पूँजीपति चला रहे हैं।
बिना असहमति की आज़ादी के स्वतंत्रता एक झूठ है। बिना सवाल पूछने के अधिकार के लोकतंत्र सिर्फ़ भेष बदलकर खड़ी तानाशाही है। 15 अगस्त 2025 को भारतीय राज्य ने साफ कर दिया: वे हमें लोकतंत्र बचाने नहीं देंगे, क्योंकि लोकतंत्र पहले ही खत्म हो चुका है।

