हेमन्त करकरे और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर

जेरे बहस

हेमंत करकरे ( 12 दिसंबर 1954-27 नवंबर 2008) 1982 बैच के आईपीएस अधिकारी थे जो बाद में मुंबई के आतंक विरोधी दस्ते के प्रमुख रहे थे। 26 नवंबर 2018 को मुंबई में हुए श्रेणीबद्ध धमाकों और गोलीबारी का सामना करते हुए शहीद हुए। मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र (भारत का सर्वोच्च शांति काल सैन्य अलंकरण) से सम्मानित किया गया जो परम वीर चक्र, संयुक्त राज्य अमेरिका के शांति काल ‘मेडल आफ आवर’ और ब्रिटिश ‘जॉर्ज क्रास’ के समान है।

पंजाब और महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस एस विर्क ने अभी अपने एक लेख ‘ रेस्ट इन पीस, हेमंत’ (इंडियन एक्सप्रेस, 23 अप्रैल 2019) में हेमंत करकरे के साथ उस दौर की अपनी बातचीत का जिक्र किया है। मालेगांव ब्लास्ट कांड की हेमंत करकरे ने जांच की थी जिसमें उन्होंने हिंदू संगठन को शामिल पाया था। करकरे पर इनके खिलाफ कार्रवाई न करने का दबाव था क्योंकि ये ‘राष्ट्रवादी शक्तियां’ हैं। इस विस्फोट में जो मोटर साइकिल इस्तेमाल की गई थी वह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर थी। उन्हें और भारतीय सेना के एक अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को भी गिरफ्तार किया गया था। विर्क ने बताया है कि किस प्रकार करकरे उन हिंदूवादी संगठनों और उनसे जुड़े लोगों की भी सघन खोज कर रहे थे जिसने मुंबई को 2007-08 में आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध प्रत्याक्रमण को लेकर अपनी गतिविधियां बढ़ाई थी। महाराष्ट्र में 2008 में आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थी। हेमंत करकरे ने देश के लिए अपने प्राण गवाएं।

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर (2 फरवरी 1970) का जीवन मध्यप्रदेश के भिंड इलाके से जुड़ा रहा है। उनके पिता आर एस एस के स्वयंसेवक थे। बचपन से ही प्रज्ञा ठाकुर का झुकाव आर एस एस के प्रति रहा है। आर एस एस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की वे सक्रिय सदस्य थी और उनका संबंध विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गा वाहिनी से भी रहा है। 2002 में उन्होंने ‘जय वंदेमातरम जन कल्याण समिति’ का गठन किया और स्वामी अवधेशानंद से प्रभावित होकर सन्यास लिया। स्वामी अवधेशानंद राजनीति में सक्रिय थे। साध्वी भी राजनीति से प्रेरित हुई। मालेगांव विस्फोट के पहले अल्प चर्चित थी। इस धमाके के बाद वे बहुचर्चित हूुईं। सुर्खियों में आईं। मालेगांव बम धमाकों में 7 लोग मारे गए थे और सौ के लगभग लोग घायल हुए थे।

बम धमाके की आरोप में साध्वी गिरफ्तार हुई। उनसे जुड़े मामले की हेमंत करकरे ने जांच की थी और उन्हें दोषी पाया था। प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव बम कांड की मुख्य अभियुक्त हैं। करकरे ने प्रज्ञा और उनके सहयोगियों को आतंकी हमले की साजिश रचने के लिए गिरफ्तार किया था। करकरे पर मुस्लिम समर्थक होने का आरोप लगाया गया जबकि वे स्वयं ऊंची जाति के हिंदू थे , महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण थे। प्रज्ञा ठाकुर ने उस समय धमाके में हुए कम नुकसान पर दुख प्रकट किया था। वह जमानत पर हैं।

अभी प्रयागराज कुंभ के दौरान उन्हें ‘ भारत भक्ति अखाड़ा ’ का आचार्य महामंडलेश्वर घोषित किया गया और अब उन्हें ‘ आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी पूर्ण चेतन आनंद गिरी ’ के नाम से जाना जाता है।
हेमंत करकरे की मृत्यु के बाद इस हमले की जांच महाराष्ट्र आतंक विरोधी दस्ते से राष्ट्रीय जांच एजेंसी – एन आई ए ने अपने हाथ में ले ली। अदालत ने प्रज्ञा ठाकुर पर लगे मकोका को बाद में हटा लिया और उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम – यूएपीए के तहत मामला चलाया गया।

एनआईए ने अपनी पुरानी जांच समाप्त की। साध्वी को क्लीन चिट दी। 2014 के बाद जांच दूसरी पटरी पर आ गई। अदालत ने क्लीन चिट नामंजूर कर मुकदमा चलाने की बात कही। आतंकवाद के नाम पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर मुकदमा चल रहा है। वे आरोपी नंबर एक है। आर एस एस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या (29 दिसंबर 2007) में भी उनका नाम शामिल रहा है। मालेगांव धमाके के बाद यूपीए की सरकार ने इसे ‘ भगवा आतंकवाद ’ कहा। इसकी आलोचना करने वालों में कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह प्रमुख रहे हैं जिनके खिलाफ प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा ने अपना प्रत्याशी घोषित किया। भाजपा की सदस्यता लेने के कुछ घंटे बाद ही यह घोषणा की गई। 1989 से अब तक भोपाल संसदीय सीट से केवल भाजपा ही विजई रही है।

अब कुछ भी पर्दे के पीछे नहीं है। सब कुछ सामने है। सारे पात्र मंच पर एक साथ मौजूद हैं। भाजपा प्रत्याशी बनने के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने हेमंत करकरे को राष्ट्रद्रोही कहा। उनके संबंध में तिरस्कारणीय और घृणित बयान दिए। यह बताया कि करकरे ने उन्हें गलत ढंग से फंसाया था। उन्हें ‘सूतक’ लग गई। उन्होंने करकरे को मरने का श्राप दिया था और उनकी मृत्यु श्राप के कारण हुई। जिस दिन उन्हें मारा गया उस दिन सूतक का अंत हो गया।

एक इंटरव्यू में साध्वी ने यह कहा कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वस्त करने वालों में थी और उन्हें इस बात का गर्व है। चारों ओर से बुरी तरह गिरने के बाद प्रज्ञा ठाकुर ने हेमंत करकरे के खिलाफ दिया गया अपना बयान वापस लिया। 8 पूर्व महानिदेशक ने ही नहीं सेवारत अनेक पुलिस अधिकारियों ने प्रज्ञा ठाकुर के बयान की निंदा की है। उनके बचाव में सब एक साथ आ खड़े हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक। भाजपा की सदस्यता लेते समय प्रज्ञा ठाकुर के समर्थन में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए गए। शिवराज सिंह चौहान ने दार्शनिक अंदाज में कहा कि सन्यासी के जीवन का मंत्र ‘आत्मा का मोक्ष और जगत का हित’ है। क्या राजनीति से चुनाव और संसदीय चुनाव से आत्मा के मोक्ष और जगत के हित का रिश्ता बनता है ? क्या आर एस एस ही आत्मा है और भाजपा जगत है ?

‘सनातन धर्म’ और ‘भगवा’ का ‘आत्मा’ और ‘जगत’ से कोई संबंध है ? दक्षिणपंथी हिंदू संगठन का संसार क्या है और उसका संबंध किस आत्मा से है ? पूणे में ‘अभिनव भारत’ की स्थापना 2006 में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित ने सावरकर द्वारा 1904 में स्थापित ‘अभिनव भारत सोसायटी’ को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की थी। यह अलग बात है कि सावरकर ने 1952 में अपनी संस्था विघटित कर दी।

क्या ‘हिंदू आतंकवाद’ कांग्रेस की खोज है ? क्या इस पद-निर्मिति के ठोस कारण नहीं है ? क्या सनातन संस्था और हिंदू जनजागृति अतिवादी हिंदू संगठन नहीं है ? क्या हिंदू आतंकवाद की बात करने वाले क्या सचमुच जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है 5000 वर्ष पुरानी शांतिपूर्ण सभ्यता को आतंकवादी कह रहे हैं ? अगर संघ और भाजपा की मानें तो कोई हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता। संविधान में राष्ट्र जिस रूप में परिभाषित है, संघ और उसके अनुषांगिक संगठन राष्ट्र को उस रूप में परिभाषित नहीं करते। भाजपा और संघ की राष्ट्रभक्ति बहुसंख्यक हिंदू राष्ट्र की है। धार्मिक हिंदू एवं सांप्रदायिक हिंदू और राजनीतिक हिंदू में अंतर है। संघ और भाजपा का हिंदू हिंदुत्व है। करकरे के राष्ट्रप्रेम और साध्वी के राष्ट्रप्रेम में अंतर है। करकरे ने राष्ट्र प्रेम के कारण अपनी आहुति दी। प्रज्ञा ठाकुर अपने राष्ट्र प्रेम के कारण चुनाव लड़ रही है। प्रश्न पुलिस अधिकारी की कर्तव्यनिष्ठा, राष्ट्र प्रेम और इमानदारी का है।

भाजपा ने प्रज्ञा ठाकुर के बयान को उनकी व्यक्तिगत राय बताया। बयान पर उसका तर्क था कि शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के कारण संभवत उन्होंने करकरे के संबंध में ऐसा कहा। प्रज्ञा ठाकुर की भोपाल से चुनाव लड़ने के निर्णय और बाद में पार्टी द्वारा उनके बयान का खंडन न करने के पीछे के संबंध को समझने की जरूरत है। इसके पीछे आर एस एस का हिंदुत्व वाला स्पष्ट संदेश है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं प्रज्ञा ठाकुर के समर्थक हैं। भाजपा की सदस्यता 17 अप्रैल को प्रज्ञा ठाकुर ने ग्रहण की। उसके 2 सप्ताह पहले 1 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने वर्धा में अपने भाषण में समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट कांड में चार अभियुक्तों को लेकर लोकप्रिय अंदाज में उन्होंने श्रोताओं से सवाल किया कि क्या आप हिंदू आतंक पद सुनकर अपने को आहत महसूस नहीं करते ? क्या हजारों वर्ष के इतिहास में हिंदू आतंकी कोई घटना है ? ब्रिटिश इतिहासकारों ने क्या हिंदुओं द्वारा की गई ऐसी किसी घटना की बात कही है ? 5000 वर्ष की हमारी संस्कृति को कलंकित करने की कोशिश किसने की ? उन्होंने एक टीवी चैनल को 5000 वर्ष की शांतिपूर्ण सभ्यता को आतंकवादी कहने वालों के विरूद्ध साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को एक ‘प्रतीक’ कहां। प्रधानमंत्री एक साथ प्राचीन भारतीय इतिहास और भारतीय संस्कृति की जो बात कहते हैं वह संघ की हिंदू परिभाषा के अनुसार हिंदू इतिहास और हिंदू संस्कृति है।

मानिनी चटर्जी ने अपने लेख ‘बैरिंग सैफरन फैंग्स’ टेलीग्राफ 22 अप्रैल 2019 में प्रधानमंत्री को यह बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में समकालीन वास्तविकता और ऐतिहासिक सत्यता नहीं है। सारा मानव इतिहास घटनाओं से भरा पड़ा है। हिंदू भी अपवाद नहीं है। अमानवीय और असामान जाति व्यवस्था आखिर है क्या ? बौद्ध धर्म को अपने जन्म स्थल से किसने खदेड़ा ? क्रांतिकारियों ने जब ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी तो ब्रिटिशों ने उन्हें आतंकवादी कहा। क्या वे हिंदू नहीं थे ? महात्मा गांधी की हत्या जिस नाथूराम गोडसे ने की वह क्या हिंदू नहीं था ? जिस तर्क और साक्ष्य से मुस्लिम आतंकवाद कहा जाता है उसी तर्क और साक्ष्य से ‘हिंदू आतंकवाद’ कहना हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी होना कैसे है ? यूपीए की सरकार में ही नहीं भाजपा की सरकार में भी हिंदुओं को आतंकी पाया गया है ।

2017 में अजमेर ब्लास्ट में जयपुर में स्पेशल कोर्ट में तीन पूर्व संघ प्रचारकों को जो हिंदू थे दोषसिद्ध माना गया। सनातन संस्था और हिंदू जनजागृति से जुड़े लगभग एक दर्जन व्यक्ति पर दायर चार्जशीट में आतंकी गिरोह कहां गया जो हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हैं।
सबके राग समान हैं। ध्वनि भेद तक नहीं है। वस्तुतः धर्म संप्रदायिक होने के बाद अपने पूर्व रूप में स्थित नहीं रहता। ‘ओम शांति शांति’ का मंत्र पाठ करने वाले अब कम अशांति नहीं फैलाते। यह कहना गलत है कि हिंदुओं ने कभी हिंसा नहीं की। वास्तव और सत्य से जिनमें आंख मिलाने का साहस नहीं है वही झूठ की सृष्टि कर उसे प्रचारित प्रसारित कर एक भ्रम और धुंध की भी सृष्टि करते हैं। गांधी शांति के सबसे बड़े पुजारी थे। उनकी हत्या करने वाले को हम आप क्या कहेंगे। राष्ट्र से मतलब करकरे को था, प्रज्ञा ठाकुर का मतलब हिंदू राष्ट्र से है। भारत अभी तक हिंदू राष्ट्र नहीं बना है। उसे हिंदू राष्ट्र बनाने में सभी हिंदुत्ववादी शक्तियां जी जान से लगी हुई है।

प्रज्ञा ठाकुर कांग्रेसी और वामपंथियों को विधर्मी कहती है। अखंड भारत का संकल्प लेकर उसकी जय बोलतीे हैं। करकरे ने देश के लिए अपनी बलि दी। उनके देश और हिंदुत्ववादियों के देश में अंतर है। गेल ओम्बेट ने ‘दलित एवं डेमोक्रेटिक रिव्योलूशन डॉ आंबेडकर एंड दलित मूवमेंट इन कॉलोनियल इंडिया (1994) में 19 वीं सदी में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं को हिंदुत्व से जोड़े जाने का उल्लेख किया है। इसी समय हिंदू धार्मिक प्रतीक गढ़े गए थे। इरादा साफ था। संघ अपने एजेंडे पर कायम है। वह कभी टस से मस नहीं होगा। प्रज्ञा ठाकुर, प्रधानमंत्री और भाजपा का मन मस्तिष्क यहीं से जुड़ा है जिसे ये सबके मन मस्तिष्क में रोप देना चाहते हैं। भोपाल का चुनाव इस दृष्टि से सबसे अहम है। प्रश्न दिग्विजय सिंह और प्रज्ञा ठाकुर का नहीं है। यहां या तो ‘ हिन्दुत्व ‘ की जीत होगी या उसकी हार।

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