‘आओ कोई ख्वाब बुने’ के रचनाकार कवि, कथाकार और संस्कृतिकर्मी अरविंद कुमार नहीं रहे। 15 नवंबर को गुरुग्राम में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह काफी दिनों से किडनी की बीमारी से ग्रस्त थे। अस्वस्थता के बावजूद उनमें जीवन के प्रति प्रत्याशा कम नहीं हुई थी। उनमें जीने और जूझने की अकूत क्षमता थी। जिंदगी के अंतिम दिनों तक साहित्य से उनका जुड़ाव बना था। इन दिनों वे अपने नए कविता संग्रह की तैयारी कर रहे थे।
अरविंद कुमार पेशे से चिकित्सा भौतिकविद और विकिरण सुरक्षा विशेषज्ञ थे। उन्होंने गोरखपुर के हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल के वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट के पद पर कार्य किया। बाद में मेरठ मेडिकल कॉलेज में आ गए। कुछ साल पहले वहां से सेवानिवृत हुए। गोरखपुर से उन्होंने साहित्यिक व सामाजिक जीवन की शुरुआत की। 80 के दशक में यहां के जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में उनकी उल्लेखनीय भूमिका को साथी याद करते हैं।
इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर जिस तरह कुठाराघात हुआ था, उससे लोकतंत्र की आकांक्षा काफी प्रबल हुई थी। यह क्रांतिकारी जनवाद के उभार और पुनर्गठन का दौर था। इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) जैसा संगठन अस्तित्व में आया। अरविंद कुमार का इस संगठन और गोरखपुर के रामगढ़ ताल विस्थापना के खिलाफ चले आंदोलन से सक्रिय जुड़ाव था। उन्होंने जीता कौर के साथ मिलकर इस आंदोलन में काम किया। उनकी वैचारिकी तथा सांस्कृतिक व्यक्तित्व की निर्मिति में इसकी भूमिका थी।
अरविंद कुमार के जन सांस्कृतिक आंदोलन के निर्माण और गठन में भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता है। उनकी पहल से गोरखपुर में ‘लहर’ सांस्कृतिक संस्था का गठन हुआ। नाटक लिखना तथा नुक्कड़ों तथा जन संकुल क्षेत्र में प्रदर्शन करना उनके सांस्कृतिक क्रियाकलाप का अनिवार्य हिस्सा था। उस दौर में उनका लिखा नाटक ‘बोल री मछली कितना पानी’ काफी चर्चित हुआ था। इस नाटक को लेकर 1983 में वे इलाहाबाद में हुए ‘सांस्कृतिक आंदोलन की दिशा’ सेमिनार में शामिल हुए थे। अरविंद कुमार की पहल पर गोरखपुर में 1986 में नुक्कड़ नाट्य समारोह का आयोजन हुआ जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार व दिल्ली से नाटक टीमें तथा लेखक-कलाकार शामिल हुए थे।
अरविंद कुमार जन संस्कृति मंच के निर्माण की प्रक्रिया में शामिल थे। ‘लहर’ जसम के स्थापना सम्मेलन की आयोजन समिति की एक घटक संस्था थी। वे स्वयं मंच की पहली राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। उनकी पहल पर गोरखपुर में जसम का दूसरा राज्य सम्मेलन संपन्न हुआ। वह प्रदेश इकाई के सचिव मंडल के सदस्य के रूप में कार्य किया।
गोरखपुर से मेरठ जाने के बाद उनकी वैसी सक्रियता नहीं बन पाई। फिर भी मंच के साथ उनका जुड़ाव बना था । अपनी शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद 2015 में दिल्ली में हुए मंच के 15 वे राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल हुए थे। जसम उनकी सांस्कृतिक चिंता और चिंतन का हमेशा हिस्सा था।
अरविंद कुमार ने नाटक के साथ कहानी और कविताएं भी लिखीं । उनका पहला कहानी संग्रह है ‘रात के खिलाफ’। बाद में ‘कांजी हाउस एवं अन्य कहानियां’ शीर्षक से उनका दूसरा कहानी संग्रह आया। इसमें कुल 21 कहानियां संकलित हैं। अपनी कहानियों के द्वारा अरविंद कुमार इस सच्चाई को सामने लाते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में व्यावसायिक रुझान और फिर राजनीतिक दांव-पेंच दिनों-दिन गहराता गया है। सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ा है। आज आम आदमी के जीवन में संकट बहुत बढ़ गया है। परंतु इसके बरक्स जनवादी संघर्ष और आवाज भी निरंतर सुनाई देती रहती है। ये सारी बातें इनकी कहानियों की विषय वस्तु है। इनकी कहानियां हमारे समाज के सामाजिक-राजनीतिक तंत्र को उद्घाटित करती हैं।
गोरखपुर से मेरठ आने के उपरांत अरविंद कुमार के सृजनात्मक काम में व्यवधान आया। यह समझा भी जा सकता है। एक जगह से दूसरी जगह व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगा। उसके बाद एक नए अरविंद कुमार से हमारी मुलाकात हुई । यह है एक व्यंग्य लेखक का रूप। इस दौर में उन्होंने ढेर सारी व्यंग्य रचनाएं लिखीं जो जनसंदेश टाइम्स, जनवाणी आदि अखबारों में लगातार छपीं। उनकी व्यंग्य रचनाओं का संकलन ‘राजनीतिक किराना स्टोर’ के नाम से आया। इसमें वे सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और विद्रूपता पर चोट करते हैं।
अरविन्द कुमार ने कविताएं भी लिखी हैं। उनकी कविताओं का पहला संग्रह है ‘आओ कोई ख्वाब बुने’ में 50 कविताएं संकलित हैं जो उनके सरोकार और काव्य व्यक्तित्व को सामने ले आती हैं। वे जो जैसा है, उसे वैसा स्वीकार करने को तैयार नहीं। वे समाज और व्यवस्था को लेकर सवाल जवाब की मुद्रा में उपस्थित होते हैं। धूमिल की तरह सवाल करते हैं यह तीसरा कौन है ? यह शहर बेजुबान क्यों है? अगर आम आदमी की जिन्दगी दुख, कष्ट व अंधेरे के बादलों से घिरी है तो कब होगी सुबह ? सूरज कब निकलेगा ? और कब खत्म होगा बदलियों का मौसम ? अरविन्द कुमार की समझ है कि इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं। इन सवालों के अन्दर ही है जवाब। कहते है ‘सवालों का रेशा रेशा उघाड़ दो/जवाब साफ-साफ दिखलाई पड़ेगा।’ इनकी खासियत है कि वे प्रतिकूल व कठिन स्थितियों में भी रास्ता बनाते हैं और जीवन बेहतर व सुन्दर होगा, इसकी उम्मीद नहीं छोड़ते।
अरविंद कुमार की सृजनात्मकता का एक अन्य रूप हमें लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला। जब लोग घरों में बंद थे, सामाजिक गतिविधियां ठप्प थीं, उन दिनों उन्होंने यूट्यूब चैनल पर रचना-विचार से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के दर्जनों लोगों के साथ संवाद किया। वह एक दस्तावेज है। उनका स्वास्थ्य गिर रहा था। फिर भी संघर्ष और सृजन जारी था। वे अपने दूसरे कविता संग्रह की तैयारी में लगे थे। इस दौरान निजी जीवन के कष्ट और अनुभव को कविता में अभिव्यक्त किया। उनकी हर संभव कोशिश अपने सपने को जिलाए रखने की थी। ‘जांच रिपोर्ट’ कविता में वे कहते हैं:
‘ जांच रिपोर्ट देख कर
डॉक्टर ने कहा
और सब तो ठीक है
पर तुम्हारे खून में लौह तत्व की भारी कमी है
मैंने कहा कि जानता हूँ
डॉक्टर ने पूछा कि वह कैसे
और इससे पहले कि मैं कुछ बोलूं
वह खुद ही बोल पड़ा
अच्छा अच्छा
तुमको कमजोरी सी लगती होगी इसलिए तो
मैंने कहा नहीं डॉक्टर
कमजोर तो मैं ज़रा भी नहीं हूँ
बस चाह कर भी खुद को
एक भाला नहीं बना पा रहा
न बरछा, न तीर, न तलवार, न नेजा
बस मुट्ठियां भींच कर
या महज़ बुदबुदा कर
या गालियां देकर
या हवा में पत्थर उछाल कर
अपने आप को दिलासा दे रहा हूँ
कि मैं अभी तक जिंदा हूँ
मेरे सपने अभी तक मरे नहीं हैं ‘
ऐसे ही थे हमारे प्रिय साथी अरविन्द कुमार। उनका जाना जन सांस्कृतिक आंदोलन का बड़ा नुक़सान है। दुःख की इस घड़ी में हम सभी उनके परिवार के साथ हैं। इस आघात से उबरने की शक्ति मिले। जन संस्कृति मंच अपने साथी को याद करता है और आदर के साथ क्रांतिकारी सलाम पेश करता है।
(जन संस्कृति मंच की ओर से उपाध्यक्ष कौशल किशोर द्वारा जारी )

