ज्ञानरंजन कथाकार होकर भी पारंपरिक अर्थों में कथाकार नहीं रहे।उन्होंने सत्तर के दशक में अपनी चरम ख्याति के दौर में अपने कहानीकार को रोक दिया, विश्राम दिया और पूरी तरह से ‘पहल’ के सम्पादन के साथ-साथ मौजूदा साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण को बदलने में जुट गए। ज्ञान जी दो टूक थे। उन्हें जो काम करना है, उसके लिए फिर उसे पूरा करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते थे. ‘इस महादेश के वैज्ञानिक विकास’ के लिए गोया स्टीम रेल इंजन में कोयले की तरह उन्होंने खुद को पूरी तरह ‘पहल’ में झोंक दिया. ज्ञान जी का व्यक्तित्व किन्तु-परन्तु के ढुलमुलपने वाला बिलकुल नहीं था. उनके निर्णयों में त्वरा होती थी. अपने साक्षात्कारों में वह कहते भी हैं–मैं हमेशा फोर्थ गियर में रहता हूँ।
उनके 90 वर्षीय सतत सक्रिय कर्मठ और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध जीवन के कई आयाम है। इलाहाबाद में बीता उनका किशोर और युवा जीवन, यहाँ दोस्तों के साथ बिताया गया लगभग विद्रोही और बोहेमियन जीवन, यहीं उनका कथाकार बनना, सुनयना जी से प्रेम फिर विवाह ,नौकरी की खातिर इलाहाबाद से जबलपुर आना, और फिर जबलपुर को एक सांस्कृतिक केंद्र बना देना।
जबलपुर आना उनके लिए कई अर्थों में बहुत निर्णायक सिद्ध हुआ। यहाँ परसाई जी थे। प्रगतिशील लेखक संघ मध्यप्रदेश के केन्द्रीय व्यक्तित्व। ज्ञान जी इस बात को स्वीकारते हैं कि परसाई जी से मिलने के बाद ,उनके सानिध्य में उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया। इसके बावजूद उनके व्यक्तित्व में आजीवन एक अपनी ही किस्म की अराजकता रही। यह अराजकता किसी ‘ हिरोइज्म ’ मार्के की नहीं थी जिसमें केवल वही केंद्र में होता है.बल्कि मार्क्सवाद और उसके लक्ष्यों के प्रति जो बेहद गहरी प्रतिबद्धता रखते हुए विकसित की। यह कहें कि उनकी अराजकता सकारात्मक और गहरे समाज सापेक्ष थी.एक साक्षात्कार में वह कहते हैं—‘ एक छात्र के रूप में,अध्यापक के रूप में,संगठक के रूप में मैंने कठोर नैतिकताओं के साथ काम किया पर अराजकता मेरी आत्मिक शक्ति थी.वह प्रतिरोध को जीवित रखती है.अराजकता मेरे व्यक्तित्व और सृजनात्मक क्रियाकलापों का नमक है। ’
इसके बावजूद ‘ पहल ’ जैसी पत्रिका को अपने सीमित संसाधनों से पांच दशक तक निकालते रह सकना,उसे देश के कोने-कोने के प्रबुद्ध और विचारवान पाठकों की अनिवार्य पत्रिका बना देना, यह उनकी रचनात्मकता का बड़ा आयाम है। देश के सहित्यिक उन्नयन में ‘पहल’ का बड़ा योगदान है. जबलपुर परसाई के साथ-साथ ज्ञानरंजन और ‘पहल’ का पर्याय बना तो इससे उनका महत्व समझा जा सकता है।
ज्ञान जी के भीतर अपने समय, समाज को लेकर एक भीषण और विस्फोटक बेचैनी थी। उनकी कहानियाँ हिंदी कथा साहित्य में एक नयी लकीर खींचती हैं। ये परंपरागत रूप से चली आती यथार्थवादी कहानियों से अपने कथावस्तु और शिल्प से बहुत भिन्न हैं। उनकी कहानियों को मोटे तौर पर तत्कालीन समाज, व्यवस्था, और सड़ी-गली रुढियों, यथास्थितिवादिता के खिलाफ क्षुब्ध युवा बौद्धिक की असहमति और विरोध है। उनकी पीढ़ी को साठोत्तरी कथा पीढ़ी के तौर पर याद किया जाता है, जिसमें ज्ञान जी के साथ काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, रविन्द्र कालिया, मार्कंडेय प्रमुख हैं। ये अपने समय को पहले से कहीं ज्यादा सूक्ष्मता से देख रहे थे। उस दौर में आते नैतिक और मूल्यगत बदलाव, भ्रष्ट्राचार उनकी कहानियों में बहुत प्रबलता से प्रकट होते हैं.। ज्ञान जी की ‘ घंटा ’, ‘ फेंस के इधर और उधर ’, ’ बहिर्गमन ’, ’ हास्यरस ’ , ’ अनुभव’ ,’सम्बन्ध’ जैसी बेहद चर्चित कहानियाँ अपने समय की जटिलताओं को,उसके अंतर्विरोधों को बेहद निर्ममता से दिखाती हैं।
ज्ञान जी की अधिकाँश कहानियाँ आत्मपरक शैली में हैं जो तत्कालीन संशलिष्ट यथार्थ को सीधे और गहरे उतारती हैं। इनके पाठ का आस्वाद परंपरागत कहानियों से बिलकुल भिन्न हैं। ये पाठक को किसी मार्मिक दृश्य, या आनंद में विभोर नहीं करतीं, बल्कि इसके उलट उनके भीतर गहरी बेचैनी और उद्वेलन भर देती हैं. यह अक्सर कहा गया है, उनकी कहानियाँ पाठक की चेतना को झिंझोड़ती हैं, परेशान करती हैं. ये कहानियाँ अपनी समग्रता में उस पूरे छल, आडम्बर और नैतिक क्षरण को पूरी शक्ति से दिखाती हैं जो मध्यवर्ग में बड़ी तेजी से पसर रहा था। इस अर्थ में उनकी कहानियाँ मुझे मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय की कहानियों की कोटि की लगती हैं जो न केवल, कथा-वस्तु,शिल्प की पारंपरिक, प्रचलित शैली से बिलकुल भिन्न हैं बल्कि अपने समग्र प्रभाव में पूर्ववर्ती कथाकारों से अलग हैं।
इसे रेखांकित करते हुए आलोचक विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी लिखते हैं—‘ जीवन के प्रति ज्ञानरंजन की दृष्टि बड़ी तीखी और आलोचनात्मक है। वे अत्यंत क्रूर होकर मानवीय संबंधों की छानबीन करते हैं और व्यक्ति के भीतर छिपे सही चोर को पकड लेते हैं। वे उस जड़ता को तोड़ना चाहती है जो परिवर्तन की प्रक्रिया में अवरोध बनती है.’ *1
वहीँ हमारे समय के विशिष्ट और बेहद संजीदा कथाकार योगेन्द्र आहूजा लिखते हैं—‘ ये कहानियाँ आज भी उसी तरह विचलित और परेशान करती है जिस तरह पहली बार प्रकाशित होने पर किया था। आज भी वे भीतर कोई न कोई मंथन,बहस या संवाद शुरू करती हैं और उनके सवालों, ख्यालों और आग्रहों में से कुछ आपकी जीवन दृष्टि का हिस्सा बनकर हमेशा साथ रहता है. अभी तक वे ठंडी,निर्जीव,निरावेग और ‘कालातीत’ नहीं हुईं। यह इनकी सबसे बड़ी ताकत है। ’*2
यूं देखा जाय तो ज्ञान जी कहानियों में ही अपना जीवन जीते रहे. उनका अनूठा गद्य उनकी आवारगी और अपार सहचरी से,और एक आवेग, उच्च तापमान, हस्तक्षेपकारी चेतना और चले आते रुढियों को ध्वस्त करने की गहन और सतत विचारशीलता से उपजा है।
उनकी ‘कहानी कला ’ के विषय में शोधार्थी,आलोचक या समीक्षक निरंतर लिखते रहे हैं. मुझमे इतनी सलाहियत नहीं है कि ज्ञान जी के इतने फैले और विविध आयामों पर चर्चा कर सकूं। मैंने ज्ञान जी को ‘ मास्टर ’ माना है तो उनके गद्य के कारण। हिंदी में कोई दूसरा नहीं है जिनके गद्य में इतना चुम्बकीय आकर्षण और जादू हो जो पहली पंक्ति से आपको बाँध ले। वे बेहद सचेत कलमकार थे, बावजूद अपने आंवागर्द जीवन शैली के. इस जीवन शैली से ही उन्होंने अपनी ऐसी अचूक भाषा अर्जित की। उनके भीतर अपने समाज की बेहतरी के लिए—जाहिर है मार्क्सवादी वैचारिकता की ठोस ज़मीन आधारित– निरंतर चलने वाला संघर्ष था,बेचैनी थी। कबीर,निराला, मुक्तिबोध,रघुवीर सहाय की तरह वे उन लिजेंड की परंपरा में आते हैं जिनके लिए सब कुछ खुला और दूसरों के लिए है,जो कबीर की एक पंक्ति लेकर कहें तो ‘दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे’.
उनके गद्य का योगदान कहानी से किसी तरह उन्नीस नहीं है, बल्कि बीस ही है। अपने समय को जितनी व्यापकता में, जितनी सूक्ष्मता में, उसकी तमाम जटिलताओं और अंतर्विरोधों को जिस देशज ठेठपना के साथ वे देख और दर्ज कर रहे थे, वह उन्हें एक जागरण के प्रवक्ता का दर्जा देता है. उल्लेखनीय है कि उन्होंने दैनिक भास्कर के लिए लिखे कॉलम में भी अपना यही तेवर बनाए रखा. उनके लेखों, संस्मरणों और साक्षात्कारों की किताब ’ कबाड़खाना ’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यहाँ जिस सूक्ष्मता ,दग्धता और पैनेपन के साथ हमारे विकृत, बर्बर, शातिर, क्रूर,और हिंसक होते समय के साथ-साथ समझौतापरस्ती या कि नतमस्तक होते बौद्धिकता को लेकर तीक्ष्ण व्यंग्य और तंज है. मुक्तिबोध सच्चे प्रेम के साथ जिस गहरी और सच्ची घृणा की बात करते थे, ज्ञान जी उसके साक्षात् उदाहरण थे. उनकी असहमति तीखी और गर्वीली हुआ करती थी.उनका एक लेख ‘ समय, समाज और कहानी ’ अत्यंत मूल्यवान और अविस्मरणीय है, जिसमें वे दर्ज कर रहे हैं—
“ देश के सर्वोत्तम दिमाग़ और रचनात्मक प्रतिभाएं किसी भी राजनीतिक या सांस्कृतिक समर में घुसने के लिए तैयार नहीं है.उनकी विचारधारा चाहे कुछ भी हो,उनके पास एक खुश और चमकीली जीवन पद्धति है और बाज़ार की सभी भव्य चीजें देर-सवेर उनमें घर कर गई हैं। इस प्रकार विचार भी एक शानदार जीवन-शैली के बीच पालतू बिल्ली की तरह बैठा है। उनका मस्तिष्क पिंड सीधी-सीधी तर्कपूर्ण जीवन व्यावहारिकताओं में बदल रहा है। ”
“ यथार्थ ठोस नहीं, वह हर दिन बदल रहा है. वह ज्यादा अप्रत्यक्ष,अमूर्त और सूक्ष्मता में कैद होने के साथ,उतना ही जटिल लुका-छिपा है.उसमें गहरी और समरस मिलावट हो गयी है. उसका फोटोग्राफ आसानी से बन नहीं सकता। उसमें परदेस आ गए हैं और दीर्घकालिक संधियाँ। उनमें विश्व प्रसिद्ध वित्तीय संस्थान आ गए हैं। उनमें कूट,अप्रतिम प्रभावशाली और फुर्ती से भरे हुए दलाल आ गए हैं। उन्हें दलाल शब्द देना भी झूठ और हिम्मत का काम लगता है…मुहावरा इसी समाज से मिलेगा जिस समाज में पाश और सफ़दर की हत्या हुई और हर दिन सर्वाधिक हिंसा,मृत्यु जिस समाज में हो रही है.हमारा समय हमको बताता है कि अहिंसक मुखौटा सबसे ज्यादा हिंसक है। ”
“आज नए रचनाकारों के सामने भी एक नया आइसबर्ग और अंडरवर्ल्ड है.अब यह और विशाल,अधिक जटिल तथा भयानक हो गया है.इसमें प्रवेश करने के लिए सदिच्छा,उच्च ताप.बेचैनी,मुठभेड़ का साहस और दृष्टि की ज़रुरत है.यह संसार आपको बार-बार टुकड़े फेंकेगा,इसकी मार से अपने को बचाते हुए,आपको तलघर में जाना होगा। इसके लिए जन आकांक्षा और लुचपन और भरपूर साहस की दरकार होगी.एक जल्लाद और संखिया भाषा बनानी होगी। ”
इसी तरह उनका एक उद्धरण उनकी किताब ‘ उपस्थिति का अर्थ ’ से —
“ हमारी इस शताब्दी में विचार पहले ही चला गया.अधिकतर लोग भरे-पूरे हैं.बस इतना ही हो सका कि हम कुछ अधिक वाचाल और लिक्खाड़ बन गये. हम संतुलित और सुसंस्कृत बन गए. व्यक्तित्व को अड़ा देने और पलीता लगा देने की कोशिश, हमारी वज्रपात जैसी कूटनीति, हमारी शैली, हमारी हिंसा, समय के घनघोर बदलाव को देखने वाली हमारी पैनी नज़र, हमारी आक्रामकता, हमारे कार्यों से वापस हो गयी. यह हमारा बूढ़ापन है.अभी हिंसा शब्द का मैंने जानबूझ कर प्रयोजन्युक्त प्रयोग किया है। जब संसार में युद्ध, पलायन, विकास, धर्म-जाति, भूख की भीषणतम हिंसा जारी है , हमने अपनी सृजनात्मक हिंसा को त्याग दिया है। *3
ये कुछ उद्धरण उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह खोल देते हैं। इसके लिए आगे कोई विशेषण अपनी तरफ से जोड़ना नासमझी ही होगी।
ज्ञानरंजन का परिसर बेहद विशाल था. खासकर ‘ पहल ’ सम्पादक की हैसियत से उन्होंने खुद को ज्यों हवा में बिखेर दिया. सुदूर उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण के कोनों तक। यहाँ तक देश-विदेश में अपने सूत्र और सम्बन्ध रखे। ‘ पहल ’ की पारी हिंदी जगत में अविस्मरणीय है। उस दौर में पत्रिका उनके लिए जैसे बौद्धिक जन-जागरण का एक मुहिम था। उसके अंक आज हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। उसके सारे विशेषांक मील का पत्थर सिद्ध हुए हैं। पहल का सा ख्यात कहानी अंक किसी और पत्रिका से संभव नहीं हो सका. चीनी साहित्य विशेषांक, वाल्टर बेंजामिन अंक, इतिहास अंक, नामवर सिंह अंक जैसे बेहद चर्चित विशेषांक के साथ-साथ पहल पुस्तिकाओं को भी अपार स्वीकृति मिली। ’ पहल ’ को इमरजेंसी के विरोध के कारण संकटों का सामना करना पड़ा। ’पहल’ से ही पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश को हिंदी पाठकों ने जाना। आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल। राजेश जोशी जैसे कवि ख्यातिलब्ध हुए। कवि और कहानीकारों का दीर्घ और गंभीर मूल्यांकन ‘ पहल ’ की सतत योजना का हिस्सा था।
ज्ञान जी के जाने कितनों से गहरे आत्मीय सम्बन्ध थे। खासकर नौजवानों से उनकी गहरी दोस्तियाँ थीं। हमारी पीढ़ी के कवियों ने कथाकार ज्ञान जी के संपर्क में आने से अपना रचनात्मक विकास किया। एक तरह से कुछ पीढ़ियों को उन्होंने साहित्य से गहरे जोड़ा। उनमें मैं भी शामिल हूँ। उनका स्नेह सदैव बना रहा। मेरी कई कहानियों को उन्होंने लौटाया। इसके बावजूद उनके भीतर मेरे प्रति आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई। उनसे एक संकोच से मिलता था। वे छोटे कस्बों से आनेवाले लेखकों को स्थानीयता की साजिशाना चमक और पकड़ से बाहर आने को कहते थे। कहते थे, मासूमियत रचना के लिए अछि बात है लेकिन यह तुम्हारी सीमा बन जाए इसलिए इसको तोड़ना ज़रूरी है।
मुझे 2010 में बाँदा के ‘ प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान ’ के लिए चयनित किया गया। आयोजक मयंक खरे जी ने मुझसे पूछा कि पुरस्कार किनके हाथों लेना चाहेंगे। मैंने बिना एक पल गंवाए कहा था—ज्ञान जी से. मयंक जी ने उनसे बात की। मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, जब जब ज्ञान जी ने बतौर मुख्य अतिथि इस कार्यक्रम में आने की सहमति दी। और यह मेरे लिए ख़ुशी का दुर्लभ अवसर था कि एक तो प्रेमचंद की स्मृति में दिया जाने वाला कथा सम्मान, दूसरा ज्ञानरंजन जी जैसे विलक्षण कथाकार के हाथों से मिलना। उस क्षण की अनुभूति बहुत गहरी है। अभिभूत कर देने वाली जब मैं उनके द्वारा सम्मानित हुआ।
मेरे लिए यह ख़ुशी तब चौगुना बढ़ गयी जब पाया ज्ञान जी और मुझे एक ही कमरे में रुकने की व्यवस्था की गयी। मुझे इस बात पर बेइंतहा ख़ुशी और आश्चर्य हुआ था,जब मेरी ट्रेन रात के दस बजे बांदा स्टेशन पहुंची थी,तो उस कड़ाके की सर्दीली, कुहरीली रात में मुझे लेने मयंक जी के साथ ज्ञान जी मौजूद थे–पूरी बाँह का एक धूसर स्वेटर पहने,अपनी कृष मगर चुस्त काया में, बावजूद अपनी चौहत्तर वर्ष की अवस्था के और चली आती अस्वस्थता के. बाँदा स्टेशन की उस रात का ट्यूब लाइट के नीले उजाले में वह दृश्य हमेश-हमेशा के लिए मेरी आँखों में, हृदय में दर्ज हो गया, जिसकी चमक आज भी वैसी ही है।
और उनके साथ बिताए वे दो दिन भी मेरी स्मृतियों का अटूट हिस्सा हैं जिसमें वे देर रात तक देश, समाज,संस्कृति और साहित्य को लेकर वे बात कर रहे हैं, अपनी चिंता जता रहे हैं…अपनी लोहे जैसी खनकदार, साफ़ आवाज़ में गहरी उत्तेजना— उनकी स्वाभाविक लय यही थी—के साथ,और गहरे सरोकार, लगाव के साथ। और आप आप पाते हैं, ज्ञान जी आप से संवाद करते हुए दरअसल खुद से भी संवाद कर रहे हैं।
- जैसे अमरुद की खुशबू’ सेतु प्रकाशन पृष्ठ 95
- ‘ टूटते तारों तले,नवारुण प्रकाशन,पृष्ठ 94
( कैलाश बनवासी जाने माने कथाकार हैं। सपर्क- 41, मुखर्जी नगर, सिकोला भाठा,दुर्ग (छत्तीसगढ़) ,फोन-9827993920 )

