दरभंगा। सुप्रसिद्ध इंकलाबी कवि गोपाल सिंह नेपाली की जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में 11 अगस्त को विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार की अध्यक्षता में ‘ गोपाल सिंह नेपाली की रचनाओं में राष्ट्रीय भावना ’ विषयक संगोष्ठी हुई।
कार्यकम में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के अमर शहीद खुदीराम बोस तथा उत्पीड़ित जनता की आवाज दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि दी गई।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.उमेश कुमार ने कहा कि नेपाली जी पर बात करने का अर्थ है, क्रांति, संस्कृति और प्रकृति के गहरे निहितार्थों से रूबरू होना। उनके रचना संसार में इन तीनों तत्वों का सम्मिश्रण है। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने भी हिमालय पर कविता लिखी और नेपाली जी ने भी ‘हिमालय ने पुकारा है’ शीर्षक से कविता लिखी। यह जानकार सुखद आश्चर्य होगा कि बॉर्डर पर जब भारत–चीन युद्ध के समय हमारे सैनिक लड़ते थे तो उस दौर में नेपाली जी की कविताओं का पाठ किया जाता था। यह जन संपृक्ति तथा राष्ट्रीय भावना का गहरा सरोकार उन्हें वास्तविक अर्थों में राष्ट्रकवि बनाता है। मेरा मानना है कि राष्ट्रकवि का दर्जा नेपाली जी को भी मिलना चाहिए। वे इसके पूरे हकदार हैं।
उन्होंने कहा कि आज परिस्थितियां अनुकूल हैं तो हमारा यह दायित्व बनता है कि नेपाली पर नए सिरे से हम विचार करें। विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में आने वाले नए–पुराने सभी शोधार्थियों से कहूंगा कि वे उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आलेख लिखें ; उसे पुस्तकाकार रूप में हम प्रकाशित करवाएंगे।
विभागीय सह–प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि आज नेपाली जी की जयंती है तो स्वाधीनता आंदोलन के अमर शहीद खुदीराम बोस जी का शहादत दिवस भी है। इस मौके पर उन्हें हम विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गीतों के राजकुमार, जनसंघर्षों के अमर गायक के रूप में नेपाली जी की पहचान है। नेपाली जी के हृदय में शहीद–ए–आज़म भगत सिंह बसते हैं। उनकी आंखों में भगत सिंह के ख़्वाब बसते थे। नेपाली जी के प्रथम शिक्षक और राजनीतिक गुरु महावीर सिंह वीरन थे, जो भगत सिंह के सहयोद्धा थे। इसलिए यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप क्या था। उनकी राष्ट्रीय चेतना का यही स्रोत था। शुरू से अंत तक उन्होंने इंकलाबी मिजाज की कविताएं लिखीं। उनकी तमाम रचनाएं राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं। आम अवाम की वास्तविक मुक्ति के लिए वे जीवनपर्यंत समर्पित रहे।
डॉ सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि जब 1927 में बाबासाहब आंबेडकर जातिगत व लैंगिक असमानता के क्रूर ग्रन्थ मनुस्मृति का दहन कर रहे थे, नेपाली उससे कदमताल करते हुए उसी मिजाज की कविताएं लिख रहे थे ; जिनमें सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असमानता पर करारा प्रहार देखने को मिलता है। उनकी राष्ट्रीय चेतना में कहीं भी धार्मिक कट्टरता, बहुसंख्यकवाद व संकीर्ण राष्ट्रोन्माद देखने को नहीं मिलता। वे भगत सिंह की भांति साम्यवादी व्यवस्था के कायल थे। उनका वास्तविक धन स्वाधीन कलम था।उन्होंने कभी सत्ता के गलियारों में जाना पसंद नहीं किया। सत्ता के गलियारों में मंडराने वाले कवियों पर ही व्यंग्य करते हुए उन्होंने लिखा था: ‘ तुझ-सा लहरों में बह लेता/तो मैं भी सत्ता गह लेता/ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता । ’
वरिष्ठ प्राचार्य प्रो.विजय कुमार ने कहा कि दो तरह के कवि होते हैं। पहले स्वांतः सुखाय की दृष्टि से लिखने वाले दूसरे जनोन्मुख। नेपाली जी के यहां दोनों ही काव्य प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं। बहुत सारे स्वांतः सुखाय की दृष्टि से लिखने वाले रचनाकार भी प्रगतिवाद के प्रभाव में जनोन्मुख लेखन की ओर अग्रसर हुए। नेपाली जी को उसी कड़ी में देखना चाहिए। यद्यपि वे छायवादोत्तर कवि हैं किन्तु उनका सौंदर्यबोध छायावादी है। यहां दिनकर से उनकी तुलना की जा सकती है। दिनकर साहित्य जगत में छाए रहे। उनकी तुलना में नेपाली जी की जरूर उपेक्षा हुई है। लेकिन यह भी कहना असंगत नहीं होगा कि दोनों का सौंदर्यबोध मिलता–जुलता है। आज भाषा विवाद के दौर में नेपाली जी के भाषा– चिंतन पर भी विचार करना चाहिए। वे हिन्दी के प्रबल समर्थक थे लेकिन यह भी मनाते थे कि यदि हिन्दी यहां की भाषा है तो उसे स्वयं पनपने दो। आने वाले नए शोधार्थियों से यह अपेक्षा है कि वे नेपाली जी पर नई दृष्टि से शोध करें और नेपाली जी के साहित्यिक अवदान को रोशनी में लाएं। यह इसलिए भी जरूरी है कि नेपाली जी पहले की अपेक्षा आज ज्यादा प्रासंगिक हैं।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बेबी कुमारी तथा धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी मलय नीरव ने किया।
मौके पर वरीय शोधार्थी दुर्गानंद ठाकुर, समीर, रोहित कुमार, अमित कुमार, नबी हुसैन, रूबी कुमारी, अंशु कुमारी, सरिता कुमारी, पुष्पा कुमारी, बबीता कुमारी व स्नातकोत्तर छात्र धीरज कुमार आदि ने भी अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम में शोधार्थी तथा स्नातकोत्तर छात्र–छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

