इलाहाबाद, जन संस्कृति मंच ने एक अप्रैल को घरेलू गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी का विषय कविता पाठ एवं परिचर्चा था, जिसमें कविता पाठ के लिए पाँच युवा कवियों पूजा, शिवांगी, केतन, शिवम और प्रज्ज्वल ने अपनी कविताओं का पाठ किया। काव्य पाठ के बाद इन कविताओं पर परिचर्चा हुई ।
परिचर्चा में बसंत त्रिपाठी, कविता कादंबरी, अवंतिका शुक्ल, प्रियदर्शन मालवीय, रूपम मिश्र , कवि एव अन्य लोग शामिल हुए । कविताओं पर बात रखते हुए कवि ने कहा कि मैं मुख्य रूप से शिवांगी और पूजा की कविताओं पर अपनी बात रखूँगा।
शिवांगी की कविताएं पितृसत्ता की जड़ों पर चोट करती हैं। उनकी कविताएं छोटी हैं लेकिन उसकी धार तेज है। उनकी कविता ‘बेटियाँ’ पितृसत्ता के उस रूप को दिखाती है जो अपने ससुराल में बंदी बनकर रह जाती हैं। वे कहती हैं …
” बेटियाँ
अंतिम संस्कार के दिन आ पाती हैं
अपने ससुराल से लौटकर
बस अंतिम प्रणाम कर पाती हैं
और माँ के साथ बैठकर रो पाती हैं”
आप की कविताओं में उस मध्यवर्गीय परिवार की बेटियाँ हैं जिनके पास अपने घर की खबर लेने के लिए स्मार्ट फोन है लेकिन दलित परिवार की बेटियों के पास फोन तक नहीं है जिससे वे अपने माइके की खबर ले सकें वे तो खूटे से बंधे जानवर की तरह हैं ।
आपने सच कहा है ‘स्त्रियाँ खाली प्लाट नहीं होती हैं’। वर्तमान फासीवादी सरकार में ऐसे बाबाओं का जन्म हो गया है जो पितृसत्ता की सोच को बहुत बारीक तरीके से लोगों के दिमाग में भर रहे हैं ।
स्त्रियों के लिए मंगल सूत्र है, घूंघट है, सिंदूर है, उनकी शादी की पहचान के लिए ब्राह्मणवादी विवाह व्यवस्था में लेकिन पुरुष शादीशुदा है इसकी पहचान के लिए कुछ भी नहीं।
आपकी कविता ‘यतीम बच्चे’ बहुत मार्मिक है जो लड़कियों के साथ बचपन में हो रहे शोषण यौन हिंसा को दर्शाती है, जो यतीम होने के डर से अपने साथ हुए अन्याय को किसी से कह नहीं पाती हैं लेकिन जब वो बड़ी होकर अपनी बात कहती हैं तो रमणिका गुप्ता जैसी लेखिका का जन्म होता है, जिनकी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित होती है और स्त्री विमर्श को एक नया आयाम देती है ।
आपकी कविता ‘अफसोस’ पढ़कर झूठा सच उपन्यास की तारा और बन्ति की याद आ जाती है। तारा को उसके ससुराल वाले दंगे में जला घोषित कर के अंतिम संस्कार कर देते है तो बन्ति सब कुछ सहते हुए दिल्ली पहुचती है उसका परिवार उसे अपनाने ये इन्कार कर देता है तो वह जान दे देती है विभाजन के समय की त्रासदी अब भी बनी हुई है।
पूजा की कविताएं गहराई से सोचने पर मजबूर करती हैं , उनकी कविताओ में गाँव की दलित स्त्री का जीवन ,स्थिति ,संघर्ष और व्यक्तिगत पहचान बहुत संवेदन शील तरीके से आता है। हर कविता अपनी विशेषता में अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है जो समाज की विसंगतियों शोषण और स्त्री की उपेक्षा को उजागर करती हैं ।
‘स्थगित आत्महत्याएं’ कविता लोगों की निराशा को दर्शाती है। स्थगित आत्महताएं एक प्रतीक है जो संघर्षों के साथ जीने के कारण अंतहीन दुख और घुटन में बदलते हैं यहाँ निराशा के बावजूद जीवन की निरन्तरता के संकेत मिलते हैं जो एक नई सोच को उजागर करता है।
‘श्रृंगारदान’ कविता अतीत को याद करने की कविता है जिसमें नाॅस्टेलजिया का प्रभाव नजर आता है । स्त्री प्रेम को कैसे अलग ढंग से अनुभव करती है प्रेम उसके लिए सिर्फ संबंध बनाने का विषय नहीं है यह आपकी प्रेम कविता में उभर कर आता है कि प्रेम कैसे एक दलित स्त्री के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है । उनके संघर्षों से जुड़ा हुआ है । यह कविता संवाद रूप में लिखी गई है …
“जब तुम लिखोगे
सोने चांदी की बेड़ियों से सजी धजी दुल्हन
मै आजादी लिखूँगी।”
यह एक अलग ढंग की कविता है जो प्रेम में सवाल पूछती है ।
‘चिंता’ नामक कविता पुरखे पेड़ से घर समाज भूख रोटी स्वयं के अस्तित्व की पहचान से पृथ्वी तक की चिंता की यात्रा है जिसमें यह साफ नजर आता है की लोग सस्टेनेबल डेब्लपमेंट गोल और मिलिनियम डेब्लपमेंट गोल में अशिक्षा और भुखमरी पर वैश्विक स्तर पर नीतियाँ तो बनती हैं लेकिन लागू नहीं होती हैं ।
“प्रेमिकाएं धरती की संतप्त आत्माएं हैं”कविता बहुत मारक है जो पुरुष की हर उपलब्धि पर सवाल उठाती है कि उसके पीछे खड़ी स्त्री का अस्तित्व कहाँ है?
दोनों की कविताओं को पढ़कर समकालीन जनमत अंक मार्च (राज समाज और स्त्री प्रतिपक्ष )की पंक्तियाँ याद आ जाती है ‘स्त्रीद्वेषी दमनकारी ताकतों का फैलाया जा रहा अंधेरा गाढ़ होता जा रहा है । स्त्रियों पर उनका हमला पहले से था लेकिन सत्ता में आने पर वह हमला दुरदान्त होता जा रहा है ’आप दोनों ने शोषण के इस रूप को पहचान कर अपनी कविताओं में उकेरा है ।
केतन की कविताओं में मुझे ‘कवि नहीं होना चाहता’ कविता बहुत पसंद आई है । यह एक गहरी आत्मकथ्य और काव्यात्मक संघर्ष का दस्तावेज है जिसमे कवि अपनी सृजनात्मकता और व्यक्तिगत असमर्थता के बीच द्वंद महसूस करता है वह कवि नहीं होना चाहता कविता होना चाहता है जिसमे वह अपने विचार अपनी जिंदगी और भाषाई ध्वनियों के बीच यात्रा करना चाहता है । वह कविता में अपनी बेचैनी दर्ज करना चाहता है ।
प्रज्ज्वल की ‘जरत्कारु’ कविता एक लंबी कविता है जिसमे महाभारत के प्रसंगों और नागवंश की पीड़ा को स्त्री संवेदना के रूप में व्यक्त किया गया है । यह कविता जरत्कारु और मनसा के संवादों के माध्यम से अन्याय ,प्रतिरोध और अस्तित्व के संघर्षों की गहन पड़ताल करती है ।
सभी की कविताओं में स्त्री शोषण (वह आज किस रूप में हमारे सामने है ) अतीत वर्तमान हताशा प्रेम आत्महत्या या कहें मृत्यु की कविताएं हैं । जो अपने समय को पहचानने की यात्रा करती हैं ।
अगली कड़ी में कविता कादंबरी अपनी बात रखते हुए कहती हैं प्रज्जवल चतुर्वेदी की कविताओं की बात करें तो ‘जरत्कारु’ सीरीज की कविताएं मुझे बहुत प्रभावशाली लगीं क्योंकि इसमें मिथकों का सामाजिक न्याय और अस्मितवादी विमर्शों की दृष्टि से बेहद जरूरी पुनर्पाठ किया गया है। जो एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है, पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देने का।
जरत्करु एक ऋषि हुए जिन्होंने विवाह न करने का निर्णय लिया था लेकिन उनके पूर्वजों की मुक्ति की कामना से उन्होंने नागवंश की कन्या मनसा देवी से विवाह किया जिनका नाम भी जर्टकरु था। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ आस्तिक जिसने नागवंश को विनाश से बचाया।
स्त्री की अस्मिता, मातृत्व, जाति, और पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के संघर्ष को कई स्तरों पर प्रस्तुत करती है।इस कविता मे नाग सभी शोषित वंचित समूहों का प्रतीक है। ग्रामशी के सांस्कृतिक वर्चस्व: अपने हित मे इतिहास, परंपराओं, मिथकों और विश्वासों को गढ़कर और उन्हे प्रचारित और नॉर्मलाइज़ करके भी असमानताओं को सामान्य बना दिया जाता है।
ब्राह्मणवादी आख्यानों ने नागों की छवि हिंसक, शापित, छली और अंधकार मे रहने वालों की गढ़ी: इंटरनलिजेशन ऑफ़ इन्फेयोरिटी एंड लेगीतिमाइजेशन ऑफ़ वॉइलेंस
एथ्निक क्लीनिंसिंग को ईश्वरीए प्रतिशोध कहकर उचित ठहराया और तक्षक जो स्वयं एक नाग था नागों के विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया गया। इसे पढ़ते हुए मुझे बाघ
और सुगना मुंडा की बेटी कविता याद आ रही थी।
पूजा की कविता ‘स्थगित आत्महत्याएं’ सामाजिक राजनीतिक यथार्थ से जूझते हुए अस्तित्व के संघर्ष, अस्वीकृति, अवसाद, और आत्मस्वीकृति के बीच के द्वंद्व को गहराई से उजागर करती हुई उम्मीद पर पहुँचती कविता है। यह उम्मीद कोई रोमांटिक उम्मीद नहीं है बल्कि सामाजिक राजनीतिक यथार्थ से जूझते हुए, बेहतर होते हुए पनपी उम्मीद है इसलिए बड़ी है।
सपनों का नमक की तरह गलना, सपनों का टूटना की जगह नमक की जगह गलना कितना सटीक बिम्ब है, क्योंकि जीवन के यथार्थ से लड़ते हुए सपने धीरे धीरे क्षरित होते हैं एकदम नमक के जैसे, और उस गलने में एक चिपचिपापन होता है, जिसे छूकर उँगलियाँ सहज नहीं रह पाती।
अपनी चुप्पियों मे चीखना फ्रायड जिसे एग्जिस्टेंयल पेन कहते हैं वह है यह जो गहरे अवसाद की तरफ और अंततः आत्महत्या की तरफ धकेलता है ।
मार्टिन सेलिगमैन (Martin Seligman) ने इस सिद्धांत को विकसित किया, जिसमें बताया गया कि जब कोई व्यक्ति बार-बार अस्वीकृति, विफलता, और नियंत्रणहीन परिस्थितियों का सामना करता है, तो वह असहाय महसूस करने लगता है और संघर्ष करना छोड़ देता है।
‘श्रृंगारदान’ पितृसत्ता की कुव्यवस्था में स्त्रियों के स्वप्न, इच्छाएं और आकांक्षाएं अधूरे रहने को अभिशप्त हैं। स्वप्न, इच्छाएं, और आकांक्षाएं जिससे जीवन सुन्दर है अंत में ओखली जातें मे वह भी कुचल जाता है। ‘प्रेम’ यह कविता सामाजिक वर्ग संघर्ष, आर्थिक असमानता और पितृसत्तात्मक शोषण को उजागर करती है। इसमें प्रेम को एक विशेषाधिकार (Privilege) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, प्रेम और रोमांस जैसी भावनाएँ एक वर्ग विशेष की विलासिता बन जाती हैं, जबकि निम्न वर्ग के लोगों के लिए जीवन संघर्ष का पर्याय बना रहता है। यहाँ भूख और प्रेम का द्वंद्व दिखता है—प्रेम केवल तब संभव है जब बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो चुकी हों- “जब तुम लिखोगे प्रेम, मैं रोटी लिखूंगी”—
यह स्पष्ट रूप से बताता है कि प्रेम उन लोगों के लिए एक विलासिता है, जिनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो चुकी हैं। श्रमिक वर्ग की स्त्री के लिए प्रेम रोटी की कीमत पर नहीं लिखा जा सकता।
यह सौंदर्य के बाजारू, मध्यवर्गीय दृष्टिकोण का खंडन करता है और स्त्री को एक संघर्षशील, विचारशील और वर्ग-सचेतन अस्तित्व के रूप में स्थापित करता है।
मध्यवर्गीय साहित्य में प्रेम, विवाह, और घरेलू जीवन को एक आदर्श स्थिति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन ये कविताएँ उस आदर्श की पोल खोलते हुए शोषण, असमानता, और जीवन के क्रूर यथार्थ को सामने रखती हैं।
ये कविताएँ एक नया साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र गढ़ती हैं, जिसमें श्रम और संघर्ष ही कला के सबसे महत्वपूर्ण तत्व बन जाते हैं।
“घुन खाए गेहूं फटकती दादी,
उसकुन से डेकची की कालिख छुड़ाती माँ
रोगदार खटिया पर लेटा बेरोज़गार भाई”
इन पंक्तियों में एक काव्यात्मक शक्ति है, जो जीवन की वास्तविकता को एक नए सौंदर्य में ढालती है।
यह नया सौंदर्य वास्तविकता की निर्ममता को स्वीकारता है और उसे साहित्य में उचित स्थान देता है।
लेकिन यहाँ कविता का नायक कोई अमीर प्रेमी या संवेदनशील कवि नहीं, बल्कि एक श्रमिक स्त्री, एक बूढ़ा पिता, एक बेरोज़गार भाई और भूख से लड़ता परिवार है।
यह एक वर्ग-सचेतन (Class-Conscious) और जनवादी (People-Oriented) साहित्य की ओर संकेत करता है।
व्यक्तिगत दुःख से सामाजिक पीड़ा की ओर परिवर्तन, कोहराम मचाती आदमकद भूख—यह एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की पीड़ा है।
मेरी चिंता में समूची पृथ्वी है—यह कवि का व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि सामूहिक दुःख है, जो उसे व्यक्तिगत जीवन के सुख से दूर रखता है।
ये कविताएँ मध्यवर्गीय सौंदर्यशास्त्र को खारिज कर एक नया, संघर्षशील और वर्ग-सचेतन साहित्य गढ़ती हैं।
इनमें सौंदर्य, प्रेम, और व्यक्तिगत संवेदनाओं की जगह श्रम, भूख, और अस्तित्वगत संकट को प्रमुखता दी गई है।
यह एक जनपक्षीय सौंदर्यशास्त्र (People-Oriented Aesthetics) की रचना करती है, जिसमें कविता का उद्देश्य केवल भावनात्मक तृप्ति नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता को उजागर करना और उसे बदलने की दिशा में चेतना उत्पन्न करना है।
मुझे चमकीले सुख रास नहीं आते—यह कथन मध्यवर्गीय सौंदर्यशास्त्र का अंतिम खंडन और श्रमशील जीवन की नई काव्यात्मक स्वीकृति है।
‘प्रेमिकाएं धरती की संतप्त आत्माएं हैं’ :यह कविता फेमिनिस्ट लेंस से पारंपरिक पुरुष-केंद्रित प्रेम की आलोचना करती है।
‘राह’ : सत्ता हमेशा एक सुनिश्चित, व्यवस्थित और नियंत्रित जीवन को ही वैध मानती है, जबकि कवयित्री खुद को विचलनों का समुच्चय कहकर इस व्यवस्था को चुनौती देती हैं।विचलन परिवर्तन और साहस की मांग करते हैं जबकि सामान्य जीवन यथास्थितिवादी होता है।
जो सामान्य है, उसे ध्वस्त करो –
यह पंक्ति सीधे सत्ता द्वारा तय किए गए नियमों और समाज में व्याप्त यथास्थिति पर सवाल उठाती है।
कविता का स्वर प्रतिरोधी है—मैं जहां पहुंचती हूं, भटक कर पहुंचती हूं—सत्ता की दिखाई सीधी, नियंत्रित, और अनुशासित राह को अस्वीकार कर अपनी स्वतंत्र राह तलाशती हैं।
अंत में, मुझे घोसला नहीं चाहिए, चाहिए हवाओं का वार—यह सत्ता की स्थिरता के खिलाफ एक क्रांतिकारी घोषणा है। सत्ता व्यक्ति को सुरक्षा और स्थायित्व के नाम पर वश में रखना चाहती है, लेकिन यह कविता कहती है कि असहमति, अस्थिरता, और टकराव ही असली स्वतंत्रता की पहचान है।
गलत आदर्श सत्ता, पूंजी और समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की चुप्पी और पाखंड को उजागर करती है, जो जनता के संघर्षों से कटे हुए हैं। चमार कविता वर्गीय दमन को गहराई से दिखाती है, जहाँ एक श्रमिक सभ्यता के केंद्र में होते हुए भी हाशिए पर धकेला जाता है—वह समाज के लिए जूते बनाता है, लेकिन खुद नंगे पैर रहने को मजबूर है।
Invisiblisation: कवियित्री जब अपनी स्मृतियों में झांकती है, तो उसे विराट शून्य (विशाल रिक्तता) दिखाई देती है, जो इतिहास के मिटने को दर्शाता है। महान उपलब्धि हीनता यह दिखाती है कि हाशिए पर रहे समुदायों के योगदान को मुख्यधारा की कथाओं से गायब कर दिया जाता है।
इस तरह से उनके योगदान अदृश्य हो जाते हैं, और शक्तिशाली संरचनाएं उन आवाजों को महत्व देती हैं, जो पहले से ही स्थापित हैं।
शिवम चौबे की कविता ‘सपने’: सत्ता और संसाधनों की असमान वितरण के कारण समाज के विभिन्न वर्गों के सपने और आकांक्षाएँ अलग-अलग होती हैं। सपने जो देखे जाते हैँ और जो आते हैं।
‘आत्महत्या’ कविता: केवल व्यक्तिगत दुख नहीं कहती, बल्कि यह समाजिक असफलताओं, सिस्टेमिक उत्पीड़न और राजनीतिक उपेक्षा को उजागर करने वाला एक राजनीतिक कदम बन जाती है।
‘फरवरी’: अपने मध्यवर्गीय मूल्यों का आत्मावलोकन करती कविता है।
केतन की कविताएं पूंजीवादी शोषण, बाज़रिकरण, निजीकरण शहरीकरण के प्रभाव किस तरह से हमें अपनी स्वतंत्रता, स्वायत्तता और जीवन से बेदखल कर रहे हैं। ‘कवि नहीं होना चाहता’: आत्मसंघर्ष और आत्ममुल्यांकन से उपजी कविता है।
‘आत्महत्या’: सामाजिक, राजनीतिक घटना की तरह न कि व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक समस्या।
सांस्कृतिक वर्चस्व, अदृशयिकरण की राजनीति उद्घाटित करती कविताएं हैं।
रूपम जी अपनी बात रखते हुए कहती हैं कि समय की सबसे बड़ी पीड़ा सांप्रदायिकता सभी की कविताओ में से गायब थी । यह दुख की बात है । कविताएं मनुष्य के दुख से जुड़ी होती हैं ।
प्रियदर्शन जी अपनी बात जोड़ते हुए कहते हैं यह सच बात है कविताओं में अपने समय की पहचान होनी चाहिए जो उन्हें अपनी पुरानी पीढ़ी से सीखना चाहिए कि कविताओं में आलोचना कैसे की जाती है ।
प्रेमशंकर जी ने कहा कि ऐसा नहीं है इस पीढ़ी ने अच्छी कविताएं नहीं लिखी हैं। सांप्रदायिकता पर भी इनकी कविताएं हैँ। यहाँ पढ़ी नहीं गई हैं ।
प्रियदर्शन जी ने कहा कि ‘खाली प्लाट’ कविता शिवांगी की हमारे समय का भयावह सत्य है । शिवम की रिक्शे वाली और सपने कविता अच्छी है इसे आत्महत्या कविता से जोड़कर देखा जा सकता है । कविता में आए सेनेट्री पैड को लेकर आज भी हमारे घरों में पिछड़ापन है ।
चर्चा की अगली कड़ी में अवन्तिका जी कहती हैं कि प्रज्ज्वल की पीले रंग वाली कविता काफी इंप्रेसिव है । पीले रंग से प्रकृति और कल्चर का जुड़ाव है । आपके कविताओं की पंक्तियाँ भी प्रभावित करती हैं । पूजा की कविताओं में कास्ट और जेंडर एक साथ आते हैं ।
इनकी कविताओं से सोसाइटी के सिस्टम को ठीक ढंग से समझ सकते हैं । पुरखों का जिक्र तो होता है लेकिन इन कविताओं में आई पुरखिनों के संघर्षों को भी जाना जा सकता है जो मुझे नया प्रयोग लगा ।
आपकी कविताएं विलोम क्रिएट करती हैं , इनमें बाइनरी के कान्सेप्ट को समझने की जरूरत है ।
प्रेम कविता में अपने अधिकार की बात की गई है। ‘नमक’ कविता सुंदरता का सेट मापदंड है । जो शोषण का रास्ता भी है ,। शिवांगी और शिवम की कविताओं में यह है कि एक इंसान के रूप में खुद को कैसे समझा जाए । केतन की कविता कवि नहीं होना चाहता हूँ बदलाव की अवधारणा की कविता है ।
सभी कविताएं अपने समय के मायने में कंप्लीट हैं । दुनियाँ में इतना संघर्ष है लेकिन जवाब सुंदर है ये जनप्रतिरोध की कविताएं हैं ।
बसंत सर अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि इलाहाबाद में युवा कवियों की बहुत बड़ी पौध है ऐसा अन्य किसी शहर में नहीं है । यह हमारे शहर की सार्थकता है । बात कवियों की करें तो पूजा , शिवांगी और शिवम की कविताएं पहले मुठभेड़ की कविताएं है जो उनकी कविताओं में सीधे आती हैं और सुनते हुए भी यही महसूस होता है ।
शिवांगी की कविता में देह का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप है । अपनी स्त्री की अपूर्णता को समझती हैं । लेकिन जानने का संकट उतना नहीं है जितना पहचान का ।
पूजा की कविताएं बहुत स्पष्ट हैं । जहां स्त्री होना ही संकट है । इसके साथ और भी भयावह परेशानियाँ हैं । ‘गलत आदर्श’ कविता में उनके आदर्श दलित चिंतक तुलसिराम भी नहीं हैं जबकि पूजा भी उसी समाज से हैं ऐसे इसलिए है कि तुलसीराम ने एक स्त्री को छोड़ दिया और जब वे वहाँ से गए तो मुर्दहिया की तरफ लौट कर नहीं आए ।
सिंगारदान कविता नास्टेलजिक नहीं है । दलित स्त्रियों के जीवन में तकलीफ ही है जहां सिर्फ दुख ही है वहाँ नास्टेलजिया नहीं हो सकता । शिवम की कविता ‘आत्महत्या’ मरने की इच्छा को समझना है ।
‘लेबर चौराहा’ डिटेल की कविता है । कविता स्पष्ट हो जाती है लेकिन इसमें बहुत सतहें हैं । केतन की ‘चरवाहे’ क्रम की कविताएं बहुत बेहतरीन हैं ।
संसद के सामने ग्वाला कविता में गाय प्रधानमंत्री के पोस्टर पर गोबर कर देती पूजा प्रधानमंत्री को अपना आदर्श नहीं मानती हैं प्रज्जवल की कविता में भगवे में पीला रंग कहीं न कहीं सांप्रदायिकता का प्रतीक है। ‘कवि नहीं होना चाहता हूँ’ कविता में कुछ दोष है जिससे बचने की कोशिश करनी चाहिए जैसे गर्भवती महिला जैसा होता है कवि का चेहरा वाला हिस्सा ।
प्रज्ज्वल अपनी कविताओं मे और जीवन में भी जैसा है उसे लताड़ने बेचैनी है और पाठ के भीतर पाठ करते हैं , और इसके भीतर कई वैरिएसन है जो सेन्सटीव है और फिर उससे इनका घात प्रतिघात है । स्वयं का अस्वीकार और उसमे भी विविध रूप जिसमें स्पेस है और जिससे इनकी कविताएं लंबी और अधूरी रह जाती हैं असल और अस्वीकार के बीच टकराहट है ।
इस गोष्ठी में केके पांडे ,लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता , अनीता , रानी ,शिवानी , सीमा भारती , मनीष कुमार , सचिन गुप्ता, धरम चंद , साक्षी , भानु , आदित्य पांडे , अनूप सिंह , गोबिन्द निषाद , शशांक और अंकुल वर्मा आदि विद्वतजन उपस्थित रहे । गोष्ठी का संचालन साथी विवेक ने किया ।
रपट
कवि