समकालीन जनमत
ख़बर

कामगार महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए नरेगा का प्रभावी क्रियान्वयन ज़रूरी : प्रो. रीतिका खेरा

इलाहाबाद। कैरियर कोचिंग के हॉल संख्या–4 में समकालीन जनमत और जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित मीना राय स्मृति व्याख्यानमाला के दूसरे व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. रीतिका खेरा ने ‘कामगार महिलाएं और महिला आंदोलन’ विषय पर महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत कोरस इलाहाबाद द्वारा गोरख पांडे के गीत की सामूहिक प्रस्तुति से हुई, जिसने पूरे आयोजन को जनपक्षधर सांस्कृतिक स्वर प्रदान किया।

मुख्य वक्ता प्रो. रीतिका खेरा ने अपने संबोधन में कामगार महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सरकारी योजनाओं और पोषण संबंधी प्रश्नों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सरकारी क्षेत्र में महिलाओं के लिए 1961 से मातृत्व अवकाश की व्यवस्था है, जिसे 14 सप्ताह से बढ़ाकर 2013 में 26 सप्ताह कर दिया गया। विभिन्न राज्यों में गर्भवती महिलाओं की स्थिति पर किए गए सर्वेक्षण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्रों के अनुसार परिस्थितियां अलग-अलग हैं और हिमाचल प्रदेश इस संदर्भ में बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।

उन्होंने आंगनवाड़ी सेवाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए बताया कि गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है, हालांकि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में आंगनवाड़ी व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है। बच्चों के समुचित विकास में दीर्घकालिक पोषण की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों की लंबाई (कद) पोषण की स्थिति का महत्वपूर्ण संकेतक है। अंडा, दूध और दाल को उन्होंने बच्चों के संतुलित पोषण के लिए अत्यंत आवश्यक बताया, साथ ही यह भी कहा कि अभी कई राज्यों में विद्यालयों में अंडा उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं है।

शिक्षा के अधिकार कानून और मध्यान्ह भोजन योजना पर बोलते हुए प्रो. खेरा ने कहा कि यह योजना पोषण और शिक्षा—दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है तथा इससे बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार भी मिलता है। हालांकि उन्होंने इस विसंगति की ओर भी ध्यान दिलाया कि भोजन बनाने वाली महिलाओं को उनके श्रम का समुचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता।

खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, मनरेगा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनरेगा ने महिलाओं को घर के पास काम और समान कार्य के लिए समान वेतन का अवसर दिया है। हाल में मनरेगा से जुड़े प्रस्तावित बदलावों और वित्तीय हिस्सेदारी के नए स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि राज्यों के बीच अभी स्पष्टता और भरोसे का अभाव है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं की वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मनरेगा का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन आवश्यक है, साथ ही वृद्ध महिलाओं को सम्मानजनक पेंशन मिलनी चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन के.के. पाण्डेय ने किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्याख्यान की सार्थकता इसी में है कि हम इसका कार्यान्वयन कितना कर पाते हैं।

इस अवसर पर प्रो. अनिता गोपेश, प्रो. संतोष भदौरिया, डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता, प्रो. प्रियम अंकित, प्रो. बसंत त्रिपाठी, सुधांशु मालवीय, प्रियदर्शन मालवीय, अशोक सिद्धार्थ, ऋचा निगम, डॉ. जनार्दन, डॉ. अमितेश कुमार, डॉ. रश्मि, डॉ. प्रेमशंकर, जफर बख़्त, विवेक सत्यांशू, प्रतिमा सिंह, डॉ. अंकित पाठक, प्रकर्ष मालवीय, अंशु मालवीय, रामजी राय, डॉ. अंशुमान कुशवाहा, संध्या नवोदिता, सुप्रिया पाठक, विवेक सुल्तानवी, प्रदीप्त प्रीत, प्रदीप पार्थिव, स्वाति, शशांक, भानु, मनीष, साक्षी, नेहा, शशि, अभिषेक, आर्यन सहित शहर के अनेक बुद्धिजीवी और नागरिक उपस्थित रहे। व्याख्यान के अंत में वक्ताओं और श्रोताओं ने कामगार महिलाओं के प्रश्नों पर गंभीर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया।

रिपोर्ट – प्रदीप पार्थिव, शशिभूषण 

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion