इलाहाबाद। भारत की प्रथम महिला शिक्षिका फ़ातिमा शेख़ के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर 8 जनवरी को कोरस इलाहाबाद द्वारा आयोजित घर गोष्ठी में “अंधेरे से उजाले तक : सावित्री बाई फुले और फ़ातिमा शेख़ ” विषय पर विस्तृत चर्चा की गई। इस घर गोष्ठी में फिल्म “फुले” दिखाई गई। फिल्म पर केंद्रित परिचर्चा में डॉ जनार्दन और डॉ अंकित पाठक ने अपनी बात रखी।
डॉ अंकित पाठक ने कहा कि यदि हम अपने समय को देखे तो इस समय ऐसी फ़िल्में आ रही है जिसमें केवल सत्तापक्ष को दिखाया जा रहा है। इसे वर्चस्ववादी सिनेमा कहते हैं, जिसमें से जनता के प्रश्न और सिनेमा की सार्थकता दोनों गायब है। सार्थक विषय सिनेमा से गायब हो चुके हैं। ऐसे में यह फ़िल्म पर्दे पर हस्तक्षेप करती है। दलित विषयों को लेकर जो नायक रहें हैं, जिन्होंने आंदोलन किये हैं। उनके गरिमामय जीवन को लेकर भी फ़िल्में हिंदी सिनेमा से गायब हैं। अछूत कन्या से लेकर अब तक बहुत गिनी चुनी फ़िल्में हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में प्रतिवर्ष एक हजार फ़िल्में बनती हैं लेकिन इन फिल्मों में जाति के प्रश्न, सामाजिक आंदोलन, आदि गायब हैं। जबकि अन्य भाषाओं की फिल्मों में ये सारे प्रश्न उठाये जाते हैं, वे दिखाई पड़ते हैं। अगर हिंदी सिनेमा में ये सब दिखता है तो बॉक्स ऑफिस का एक अर्थशास्त्र होता है, जो कि इस तरह से मिल नहीं पाता है। जैसे 2014 के आसपास एक फ़िल्म आई थी “चौरंगा ” यह विकास रंजन मिश्रा द्वारा निर्देशित है। जातिगत उत्पीड़न और ग्रामीण भारत की कठोर सच्चाई पर आधारित एक हिंदी फिल्म है, जो एक दलित लड़के की कहानी बताती है। जिसे एक प्रेम पत्र लिखने के लिए मार दिया जाता है। इसी प्रकार हम देखें तो फ़िल्म इक्कीस” (Ikkis) जो कि 1971 के युद्ध पर आधारित है। इस प्रकार की फिल्मों को सिनेमा घरों में जगह नहीं मिलती है जो कि समाज के मुद्दे को दिखाती है । ऐसी फिल्मों को जगह मिल रही है (छावां और धुरंधर) जो समाज में हिंसा, नफरत और एक विशेष धर्म के प्रति भेद करना सिखाती है। वहीं फुले और इक्कीस जैसी फिल्में समाज में समानता, अधिकार, शिक्षा व प्रेम जैसे विषयों से दर्शकों को जोड़ती हैं। सिनेमा में भी समाज की सच्चाई होनी चाहिए न कि सत्तापक्ष का गुणगान। इक्कीस और फुले जैसी फिल्में सिनेमा की सार्थकता को प्रदर्शित करती है। ऐसी फिल्मों को सिनेमाघरों में जगह मिलना चाहिए और संगठनों को जगह- जगह प्रदर्शित करना चाहिए।

इसी क्रम में डॉ जनार्दन अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि मुक्ताबाई साल्वे का जो लेख था मराठी में उसका अनुवाद अंग्रेजी में तो हुआ, लेकिन 2022 तक हिंदी में उपलब्ध नहीं था।सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा राव फुले का जीवन बहुत ही संघर्षमय था। उनके जीवन को देखें तो कोहिनूर फिल्म का एक गीत याद आता है- ” जमीन पर आज है दो सितारों का मिलन”।
सावित्री बाई का जीवनकाल देखें तो(1831- 1897) मात्र 66 साल में उन्होंने बहुत बदलाव किए। यह सामान्य मनुष्य की क्षमता से बाहर है। इस फ़िल्म में यह तो नहीं दिखाया गया है कि उन्होंने कई रचनाएं लिखी और भाषण दिए हैं। इन्होंने सगुणा बाई पर भी कविताएं लिखी हैं। जो अब प्रकाश में आ चुकी हैं। इनका मानना था कि बोला हुआ लोग भूल जाते हैं लिखा हुआ याद रखते हैं। वहीं उनकी दोस्त फातिमा शेख जिनका जीवनकाल (1831-1900 ) रहा। इनका जन्म आगरा में हुआ था। फ़ातिमा एक जुलाहा परिवार की बेटी थीं। रोजगार और सांप्रदायिक हिंसा के चलते ये लोग नाये गाँव चले गए। इस फ़िल्म में ठीक से शोध नहीं हो पाया है। फ़िल्म में सेंथियां फरार और उनके अंग्रेज दोस्तों को नही दिखाया गया है। इन्हीं दोस्तों में से बरकत नाम का एक लड़का फातिमा के जीवन में आता है। फ़ातिमा बरकत से शादी कर के फिर आगरा चली आती हैं।

डिजिटल मिडिया पर फुले पर केंद्रित जो फिल्में उपलब्ध हैं उनमें फुले दम्पति को ज्योतिराव फुले के हवाले से देखा गया है। अगर ये फ़िल्में सावित्री बाई फुले पर भी केंद्रित होती तो उतनी ही सार्थक होती जितनी की हैं। ये कथाएं कमजोर नहीं होती। किंतु फिल्म निर्माताओं ने कही न कही पुरुषसत्ता को ध्यान में रख कर फिल्म को बनाया है। जिसे ज्योतिबा फुले भी मानने से इंकार करते हैं, जैसे जब उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई तो उसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं। उन्हें वीरांगना कहते हैं। यह ज्योतिबा को पता हैं लेकिन समाज उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। सावित्री बाई फुले के हवाले से कथा लेखन होना चाहिए जिसमें सेंथियां फरार एक महत्वपूर्ण किरदार होंगीं क्योंकि यहाँ सिर्फ शिक्षिका बनने की एक सूचना है पूरी यात्रा नहीं हैं। यदि फिल्म में फातिमा शेख, सावित्री बाई फुले और सेंथियां फरार को और जगह दी जाती तो यह कथा और कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होती।
उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म में एक पात्र बिल्कुल छूट गया है। ज्योतिराव फुले के जीवन में जिनका विशेष रूप से योगदान है वो है उनकी बुआ सगुणाबाई क्षीरसागर जो विधवा थीं। संजीव के उपन्यास “ज्योति कलश” में इन्हें केंद्र में रखा गया है। इनका किरदार फ़िल्मकार ने क्यों हटा दिया ये समझ के परे है। ये अंग्रेजी सरकार में काम करती थीं। फुले जब एक वर्ष के हुए तभी इनकी मां की मृत्यु हो गई। इनका पालन पोषण इनकी बुआ द्वारा ही हुआ। जब ये 13 वर्ष के थे और सावित्री बाई 9 वर्ष की तभी दोनों का विवाह हो गया। इनकी पढ़ाई बंद हो गई तो बुआ, बेग साहब और मिहिर पादरी द्वारा गोविन्दराव को समझाने के बाद इनके पिता ने दोबारा पढ़ाई शुरू करवाई । वहीं इनकी मित्रता फातिमा शेख के भाई से होती है।
इनका भी एक ही सपना था- समाज मे बराबरी का दर्जा। इन्होंने अपनी जमीने बेच के 20 स्कूल खोले। फुले दंपति ने जो सपना देखा था उसे पूरा किया। समाधान तक पहुंचे। उनका सपना था जातिवाद से मुक्ति,अंधविश्वासों से मुक्ति, असमानता से मुक्ति ( लैंगिंग असमानता और आर्थिक असमानता)। लैंगिक असमानता यानी जो समाज की आधी आबादी है उसके लिए शिक्षा की जो पैरवी की गई वो यही दम्पति थे। इन्हें के बाद पहले भारत में महिला विश्विद्यालय एसएनडीटी की स्थापना हुई । यह एशिया का पहला महिला विश्वविद्यालय है। यह उनके सपनों का परिणाम था।

जातिवाद से मुक्ति के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना 1873 ईस्वी में की गई। इसकी प्रस्तावना महत्वपूर्ण है। इसे पढ़ा जाना चाहिए। यह प्रस्तावना मार्टिन लूथर किंग के “आई हैव ए ड्रीम” और 1957 में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञायों को जोड़कर देखिए तो इसमें एक विराट पुरुष की तस्वीर नजर आएगी। इन सपनों में ईश्वर और बिचौलियों के लिए कोई जगह नहीं थी।
फ़िल्म में यह नही दिखाया गया है जब ज्योतिराव फुले और सावित्री बाई फुले की मृत्यु हो गई। उनके बाद उनके बेटे यशवंत को न ही दलित समाज स्वीकार करता है न ही उच्च वर्ग स्वीकारता है। यशवंत को बहिष्कार और बेरोजगारी का सामान करना पड़ता है। 13 जनवरी 1906 को यशवंत की मृत्यु हो जाती है। उनकी पत्नी चंद्रभागा और बेटी सोनी पेट भरने के लिए उनकी सारी किताबें दस्तावेज बेंच देती हैं। यहाँ तक कि वह ऐतिहासिक घर भी 100 रुपए में बेच देती है। इस तरह से जो चीजें हमारे सामने आई हैं वो आर्काइब से आई हैं। दस्तावेज हमें नहीं मिले सारी विरासत गुम हो गई। वो जिन समस्यायों से लड़ते रहे वे सभी समस्याएँ आज भी हमारे सामने आती रहती हैं। इस तरह महाराष्ट्र में कुछ अच्छी चीजें सामने आई। जिसमें इनके बाद नवजागरण के मराठी प्रबोधन में पढ़ी लिखी महिलाएं सामने आई। जिसमे आनंदी बाई गोपाल जोशी, प. रामबाई, रक्माबाई ( पहली बार महिला तलाक को लेकर बात की) ताराबाई शिंदे ( स्त्री पुरुष तुलना),काशीबाई, इत्यादि थीं। इसमें सावित्री बाई फुले का योगदान महत्वपूर्ण है। ये सारी चीजें सामने नही आई होती यदि नेहरू डिस्कवरी ऑफ इंडिया नहीं लिखे होते। हमें फुले के बारे में जानकारी न मिलती।
गोष्ठी का समापन ” कौन रंगरेजवा रंगे मोर चुनरी ” गीत से हुआ जिसे समता राय ,रुनझुन और महुआ ने गाया।
कार्यक्रम के अंत में पहल पत्रिका के संपादक और महत्वपूर्ण कहानीकार ज्ञान रंजन जी की स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरूप दो मिनट का मौन रखा गया।
गोष्ठी का सफल संचालन प्रतिमा रानी ने किया। गोष्ठी में प्रेम शंकर, कवि रूपम मिश्र, चंदा, पूजा, वत्सला, ज्योति , वसुंधरा, कंचन आकांक्षा, रचना, वर्तिका, चारुलेख, अंबिका, शिवांगी, साक्षी, शशांक, कवि, भानु, गोविंद निषाद, हीरालाल, यश , शुभम आदि शोधार्थी उपस्थित रहे।

