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देसवा

आदिवासी स्कूल वाया बाईपास

( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की 11 वीं क़िस्त )

28 नवम्बर 2011। दिन रविवार। नेपाल जाने वाली सोनौली बाइपास सड़क के ठीक पूरब महराजगंज जिले के नौतनवां के कुंसेरवा में स्थित आदिवासी स्कूल में जब हम स्कूल पहुंचे तो स्कूल के आंगन में आधा दर्जन बच्चे वालीबाल खेल रहे थे। एक तरफ आठ-दस बच्चे अखबार पढ़ रहे थे। एक कमरे में पांच-छह छोटे बच्चे कैरम खेल रहे थे। रसोई घर में आलू-गोभी की सब्जी चूल्हे पर रखी जा चुकी थी और आटा साना जा रहा था।

करीब 16 वर्ष पहले 1995 में इस स्कूल (अनुसूचित जनजाति आश्रम प़द्धति विद्यालय) की नींव पड़ी थी। इसके पहले यह नौतनवां में किराए के मकान मे चलता था। महराजगंज जनपद में आदिवासी समुदाय यानि थारू समुदाय के करीब एक दर्जन गांव रतनपुर ब्लाक में है। इसी समुदाय के बच्चों की शिक्षा के लिए यह विशेष आवासीय विद्यालय बनाया गया। वर्ष 97 में विद्यालय की बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई लेकिन कभी यहां एक दर्जन से अधिक बच्चे नहीं रहे जबकि यहां कक्षा पांच से आठ तक के 105 बच्चों की शिक्षा का इंतजाम था। कई बार तो यह पूरी तरह से बंद रहा।

वर्ष 2006 से 2009 तक यह विद्यालय बंद रहा। एक सत्र शून्य भी घोषित करना पड़ा क्योंकि यहाँ कोई बच्चा पढ़ने नहीं आया।

इस विद्यालय के संचालन का दायित्व निभाने वाले समाज कल्याण विभाग का यही कहना था कि महराजगंज के थारू समुदाय के लोग अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजते क्योंकि क्योंकि वे सम्पन्न है और अपने बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिला रहे हैं।

शासनादेश है कि इन विद्यालयों में जनजातीय समुदाय के अलावा सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय के बच्चों को भी रखा जा सकता है लेकिन इसके लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया। विद्यालय के स्टाफ का भी समय-समय पर तबादला कर दूसरे जगह भेज दिया जाता। एक बार तो कई वर्ष तक एक बाबू ही यहां का काम देखता रहा।

स्कूल के हालात यही बने रहते लेकिन नवम्बर-2011 के एक पखवारे पहले एक समीक्षा बैठक में इसके बारे में मुख्य विकास अधिकारी सीडीओ सौम्या अग्रवाल को पता चला। उन्होंने पाया कि स्कूल में बच्चे ही नहीं हैं जबकि प्रभारी अधीक्षक, एक सहायक अध्यापक, दो परिचारक यहां तैनात हैं। उन्होंने इस विद्यालय में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए लेकिन सफलता नहीं मिली।

तब उन्होंने मुसहर समुदाय के बीच काम रही स्वैच्छिक संस्था मानव सेवा संस्थान की सहायता ली। संस्थान के कार्यकर्ता चन्द्रशेखर ने मुसहर समुदाय के 15 बच्चों का यहां एडमिशन करा दिया। यह बच्चे कक्षा पांच के बाद पढ़ाई छोड़ चुके थे।

हमारे स्कूल आने के एक हप्ते पहले ही सभी बच्चे यहां आए थे। बच्चे जब यहां आए तो विद्यालय की व्यवस्था ऐसी नहीं थी कि वह इन्हें ज्यादा दिन तक रोक सके। विद्यालय परिसर झाड़-झंखार से भरा था। एकदम पास में विद्युत सब स्टेशन होने के बावजूद विद्यालय में बिजली का कनेक्शन नहीं था। शौचालय व पेयजल की स्थिति बुरी थी।

 

सीडीओ सौम्या अग्रवाल ने डीएम की मदद से अधिकारियों की पूरी फौज को स्कूल की व्यवस्था ठीक कराने में लगा दिया। दो दिन में बिजली का कनेक्शन लगा और वायरिंग भी हो गई। एक नया इंडिया मार्का हैंडपम्प लग गया। पूरे परिसर की सफाई हुई। बच्चों में ड्रेस बांटे गए गए। उन्हें खेल सामग्री व अन्य जरूरी सामान दिए। सीडीओ एक पखावरे के भीतर निरीक्षण के लिए खुद दो बार यहां आईं। इसका नतीजा अब देखने को मिल रहा था। लखीमपुर जिले के थारू समुदाय के 18 और मुसहर समुदाय के 15 बच्चे यहां पढ़ाई कर रहे थे।

हमारी यहां सिसवा क्षेत्र के सबया गांव के मनोज, पप्पू, बसंत, बबलू, सतीश से मुलाकात हुई। गुल्ली डंडा, कबड्डी खेलने वाले इन बच्चों का दिल यहां वालीबाल पर आया हुआ था। मनोज को हेड से किक करने में बहुत मजा आ रहा था। यह पूछने पर कि घर की याद आती है वह बोला-‘ रात के सुतले समय माई क याद आवेला। स्कूल आवत समय बाबूजी कहन कि भाग के मति अईह। ‘

मनोज बड़े होकर पुलिस अफसर बनना चाहता है तो पप्पू महान व्यक्ति। यह पूछे जाने पर कि महान व्यक्ति कौन हैं तो वह महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, भगत सिंह का नाम गिनाता है।

सतीश, बसंत, बबलू अभी सोच-विचार कर रहे हैं कि बड़े होकर उन्हें क्या बनना है।

सीडीओ सौम्या अग्रवाल ने हमसे कहा था कि हमारी कोशिश विद्यालय में बच्चों की संख्या 105 तक करने की है। इसके लिए हम पूरा इंतजाम कर रहे हैं। हम वनटांगिया समुदाय के बच्चों को भी इस विद्यालय में लाने का प्रयास कर रहे हैं। महराजगंज जिले के दो अधीक्षक दूसरे जिलों में तैनात हैं जिन्हें वापस बुलाया जाएगा। तब इस विद्यालय को अधीक्षक भी मिल जाएगा। विद्यालय की बाउन्ड्रीवाल बनेगी। बरगदवा में एक छात्रावास है जिसकी व्यवस्था ठीक की जाएगी।

कुछ दिन बाद सीडीओ सौम्या अग्रवाल का टान्सफर हो गया। पता चला कि विद्यालय एक बार फिर बंद हो गया है। यहां आए बच्चे वापस चले गए।

नौ वर्ष बाद

आठ अक्टूबर 2020 को सोनौली बाईपास से गुजरते हुए याद आया कि यहां एक आदिवासी स्कूल था जिसमें मैं नौ वर्ष पहले आया था। तब बाईपास से ही स्कूल दिखाई दे दिया था। अब नहीं दिख रहा है। तमाम भवन बन गए हैं। जो जमीन खाली दिख रही है उस पर प्लाटिंग का बोर्ड लगा है। भैंस चरा रहे एक किशोर को देख रुक जाता हूँ। उससे स्कूल के बारे में पूछता हूँ। उसके चेहरे पर असमंजस के भाव दिखते हैं। किशोर के साथ एक बुजुर्ग भी हैं। मैं उनसे आदिवासी स्कूल के बारे में पूछता हूँ तो वे कहते हैं कि आप आगे चले आये हैं। पीछे जाइये और पूरब जाने वाली गली में मुड़ जाइये।

स्कूल पहुंच कर देखता हूँ कि अब वहां एक बड़ा गेट लग चुका है। अब स्कूल में जाने का रास्ता अब पीछे से होकर जाता है। सामने एक बिल्डिंग बनती हुई दिख रही हैं। ईंट ढो रहे एक मजदूर से पूछता हूँ कि क्या यही आदिवासी स्कूल है ? वह कुछ बोलता नहीं। हाथ से इशारे कर देता है कि बाएं चले जाइये। बाएं जाने पर देखता हूँ कि एक बाइक खड़ी है। वहां एक बुजुर्ग से पूछता हूँ तो वह दाएं जाने का इशारा कर देते हैं। दाएं आफिस टाइप एक कमरा दिखता हैं जहाँ स्कूल के अधीक्षक बैठे हुए कुछ लिख रहे हैं। उनके ठीक पीछे दीवार पर एक तरफ गांधी तो दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर की तस्वीर टंगी है।

अधीक्षक से अपना परिचय देते हुए बताता हूँ कि नौ वर्ष पहले इस स्कूल में आया था। आज इधर से गुजरते हुए फिर देखने आ गया। वह हैरत से देखते हुए बैठने का इशारा करते हैं।

राम समुझ यादव पांच वर्ष से यहां अधीक्षक हैं। उनके साथ यहां पर 7 लोग तैनात हैं । दो परिचारक हैं जिनका आवास कैम्पस में ही है। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के लिए आवास नहीं है। वे नौतनवां में किराए के कमरे में रहते हैं। वरिष्ठ सहायक के पद पर तैनात महिला लखनऊ में निदेशालय से सम्बद्ध हैं । वे वहीं ड्यूटी करती हैं। वेतन यहां से बनता है।

दो वर्ष से अब स्कूल की नई बिल्डिंग बन रही है। इसके बाद यहां पर इंटर तक कि पढ़ाई हो सकेगी। इसके बाद यहां पर बच्चों की क्षमता 105 से 405 तक पहुंच जाएगी। अभी यहां पर आठवीं तक पढ़ाई होती है। नई बिल्डिंग को अब तक तैयार हो जाना चाहिए था लेकिन अभी तैयार होकर कब स्कूल प्रशासन को मिलेगा पता नहीं ।

पुरानी बिल्डिंग की रंगाई -पुताई हो गयी है। बिजली के लिए सौर ऊर्जा के पैनल लगाए गए हैं। एक दीवार पर सौर ऊर्जा के लिए 18.97 लाख रुपये खर्च होना लिखा हुआ है।

स्कूल में कोई बच्चा नहीं है। कोरोना के कारण स्कूल बंद है। सभी बच्चे घर पर हैं। राम समुझ यादव बताते हैं कि ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। यह कहते हुए उनके चेहरे पर हल्की मुस्कराहट तैर जाती है।

इस वर्ष 80 बच्चे थे।ये सभी बच्चे लखीमपुर, बहराइच और बलिया के थे। महराजगंज जिले के सिर्फ 12 बच्चे थे जिसमें सभी गोंड समुदाय के थे जिन्हें पहले इस जिले के लिए आदिवासी का दर्जा मिला था। महराजगंज जिले में अब गोंड जाति को आदिवासी का दर्जा समाप्त कर दिया गया है।

श्री यादव पांच महीने बाद रिटायर होने वाले हैं। किंचित गर्व के साथ कहते हैं कि जबसे मैं यहाँ पर हूं स्कूल बंद नहीं हुआ। आदिवासी बहुल लखीमपुर, बहराइच आदि जिलों में जाकर अभिभावकों से मिला और उनसे अनुरोध कर बच्चों का एडमिशन कराया। यह मैंने इसलिए नहीं किया कि यहां बच्चों का एडमिशन नहीं होता तो तनख्वाह नहीं मिलती। स्कूल चलता या बंद रहता मुझे तनख्वाह मिलती रहती। ये मैंने अपने लिए किया। वह स्कूल क्या जहां बच्चे न हो।

वह इस सवाल का जवाब नहीं देते कि जब इस जिले में आदिवासी समुदाय कि संख्या कम है तो यहां ये स्कूल क्यों बनवाया गया। लखीमपुर से ही बच्चों को यहां लाकर पढ़ाना था तो इससे बेहतर होता कि वहीं ये स्कूल बनवा दिया जाता। वे कहते हैं कि यह सरकार की पॉलिसी है। इस पर वह कुछ नहीं कह सकते।

नब्बे के दशक में इस तरह के 10 आदिवासी स्कूल प्रदेश में बनाये गए। लखीमपुर खीरी में चार, बलरामपुर में दो, बहराइच में दो और बिजनौर जिले में एक स्कूल बना। सीबीएसई पाठ्यक्रम वाले इन स्कूलों में बच्चों की शिक्षा पूरी तरह निःशुल्क है। हॉस्टल में रहने और भोजन भी निःशुल्क है। आदिवासी बहुल जिलों में स्थापित स्कूलों को बच्चों के संकट से नहीं जूझना पड़ा जिस तरह इस स्कूल को जूझना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश में एक दर्जन अनुसूचित जन जातियां हैं जिनकी आबादी प्रदेश की आबादी का 0.6  फीसदी है।

प्रदेश में थारू, बोक्सा, भोटिया, राजी, जौनसारी, गोंड, धूरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड ( जिला महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोेरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र में), खरवार, खैरवार (जिला देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और सोनभद में ), सहरिया (जिला ललितपुर ), पहड़िया (जिला सोनभद्रं), बैगा (जिला सोनभद्र में), पंखा, पनिका, (सोनभद्र और मिर्जापुर जिले में), अगरिया (सोनभद्र जिले में), पतरी (सोनभद्र जिले में ), चेरो (सोनभद्र और वाराासी जिले में) और भुइया, भुईयां (सोनभद्र जिले में ) अनुसूचित जन जाति में आते हैं।

स्कूल से लौटते हुए मुझे याद आया कि प्रवेश द्वार पर स्कूल की शिलान्यास पट्टिका के साथ एक वाक्य लिखा हुआ दिखा था- ‘ विद्यालय ईंट और गारे से बनी सिर्फ एक इमारत नहीं है। विद्यालय एक गतिशील सामुदायिक केन्द्र है जो चारो ओर जीवन और शक्ति का संचार करता है। ’

यह वाक्य मेरे दिमाग में हमेशा के लिए अटक गया। जिस भी स्कूल में जाता हूँ यह याद आता है। मैं वापस स्कूल के प्रवेश द्वार पर गया इसे एक बार फिर पढ़ने के लिए लेकिन वह कहीं नहीं दिखा। मैंने स्कूल का पूरा एक चक्कर लगाया लेकिन वह कहीं नहीं दिखा। अलबत्ता शिलान्यास का शिलापट्ट अपने वजूद के साथ मौजूद था।

रास्ते में बरगदवा कस्बे में आदिवासी हॉस्टल देखने चला गया। वर्षों से बंद इस हॉस्टल की भी रंगाई-पुताई हो चुकी है लेकिन अभी भी यहां कोई स्टाफ तैनात नहीं है। हॉस्टल गेट पर बड़ा सा ताला लगा हुआ था।

शाम होने लगी थी। हॉस्टल के बाहर खाली मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।

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