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मोदी सरकार की विदेश नीति का ढोल क्यों फटा

जयप्रकाश नारायण 

पहलगाम में आतंकियों द्वारा पर्यटकों की हत्या और उसके बाद भारत का पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर टारगेटेड हमले के बीच विश्व राजनीति में अचानक गुणात्मक परिवर्तन हो गया। पहलगाम की घटना के बाद पूरी दुनिया में भारत के पक्ष में जो सहानुभूति का माहौल बना गया था, वह हमले के बाद बदल गया।

हमले के बाद 7 तारीख को अचानक वैश्विक जनमत की सूई  180 डिग्री उल्टी दिशा में घूम गई। आतंकवाद से पीड़ित देश की हमारी छवि अचानक हमलावर देश  में बदल गई। जिसने पाकिस्तान के पक्ष में वैश्विक माहौल बनाने में मदद की। इस बात पर गहन विचार करने की जरूरत है कि इस कठिन समय में भारत दुनिया में अकेला क्यों पड़ गया है।

भारत ने 59 सांसदों का  दल ढाई दर्जन से ज्यादा देशों में इस बात के लिए भेजा है कि वे भारत का पक्ष विदेशों में रखकर भारत के पक्ष में जनमत तैयार करेंगे। इससे स्पष्ट है कि दुनिया में भारत का पक्ष कमजोर हुआ  है। ध्यान देने की बात है कि  मोदी-शाह की जोड़ी ने पिछले 11 वर्षों से विपक्ष की आवाज को अनसुना ही नहीं, बल्कि  दबाने का काम करती रही है। तो फिर आज उन्हें विपक्ष की जरूरत क्यों पड़ गई? प्रत्येक  दलों से  प्रतिनिधिमंडल में चयन पर भी मोदी और शाह की जोड़ी अपने विभाजनकारी नजरिए से मुक्त नहीं हो पायी। इसलिए इन शिष्टमंडलों में अधिकांश विपक्षी सांसदों की अपने दल में कोई साख नहीं है।

भारत की विदेश नीति

भारत में राजनीतिक दलों में आंतरिक‌ सवालों पर चाहे जितने भी मतभेद रहे हों। लेकिन विदेश नीति पर एक आम सहमति रही है। भारत की विदेश नीति में स्वतंत्रता आंदोलन के समय से लेकर आजादी के बाद तक ‌एक निरंतरता  रही है । भारत के विदेश नीति की आधारशिला राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही रखी  गई थी ।कांग्रेस अधिवेशनों में समय-समय पर विदेशों में होने वाली घटनाओं पर प्रस्ताव पास किए जाते रहे थे । उसकी दिशा उत्पीड़ित राष्ट्रों और आजादी के लिए संघर्षरत जनगण के पक्ष में  मजबूती से खड़ा होने की थी। चाहे चीन पर जापान का आक्रमण रहा हो या 1930 के दशक में यूरोप में  फासीवाद के उभार का सवाल।  भारत ने ऐसे कठिन सवालों पर उत्पीड़ित लोगों का पक्ष लिया था। इसके दो उदाहरण दिए जा सकते हैं।

एक – कांग्रेस अध्यक्ष के बतौर पं. नेहरू यूरोप के दौरे पर गए थे। लंदन से लौटते समय उनका विमान इटली में रोम‌ हवाई अड्डे पर कुछ देर के लिए रुका । इस बात की खबर लगने पर मुसोलनी ने अपना दूत भेज कर नेहरू से मिलने की इच्छा जाहिर की। लेकिन नेहरू ने मुसोलनी से मिलने से इनकार कर दिया था।

दूसरा- जापान ने चीन पर हमला कर उसके बहुत बड़े भाग पर कब्जा कर लिया। तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चले प्रतिरोध युद्ध के दौरान घायलों की सेवा के लिए नेहरू के निर्देश पर डॉक्टर कोटनिश के नेतृत्व में  एक मेडिकल टीम  चीन भेजी गई थी। यह दो उदाहरण आजादी के लिए संघर्षरत तत्कालीन कांग्रेस की विदेश नीति की बुनियादी दिशा को प्रकट करने के लिए काफी है।

आजादी के बाद विदेश नीति

कांग्रेस सरकार बनने के तत्काल बाद 1949 में चीनी  कम्युनिस्ट पार्टी  के नेतृत्व में क्रांति संपन्न हो गई।  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन को पीछे छोड़कर साम्राज्यवादी दुनिया का नेता बन गया था। जो चीनी क्रांति का कट्टर विरोधी था और चांग काई सेक सरकार( जो ताइवान तक सीमित हो चुकी थी और अमेरिकी सैन्य शक्ति के बल पर टिकी थी।) का अमेरिका  समर्थन कर रहा था। उसने दुनिया भर में कोशिश की कि जनवादी चीन को वैश्विक मान्यता न मिले। लेकिन भारत  अमेरिकी दबाव को नकारते हुए  पहला देश बना, जिसने जनवादी चीन को मान्यता दी। यही नहीं  कोरियाई क्रांति को रोकने के लिए अमेरिका  कूद पड़ा। लेकिन इस युद्ध में भारत ने कोरियाई जनता का पक्ष लिया था।

शीतयुद्ध काल में भारत की विदेश नीति

शीत युद्ध के समय अमेरिकी और सोवियत ब्लॉक के बीच  में तीखी प्रतिद्वंद्विता चल रही थी । उस समय नव स्वतंत्र हुए देशों पर भारी दबाव था कि वे अमेरिका के नेतृत्व में बने खेमे का सदस्य बने। अधिकांश नये-नये आजाद हुए देश अमेरिकी खेमे में चले गए, लेकिन नेहरू के नेतृत्व में भारत सरकार ने किसी भी गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया। भारत का दक्षिणपंथी खेमा भी अमेरिकी ब्लॉक में जाने का पक्षधर था। लेकिन आंतरिक और बाह्य दबाव के बाद भी भारत अमेरिकी खेमे में नहीं गया। चीन के साथ दो पक्षीय वार्ता के दौरान पंडित नेहरू ने पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। जिसके पांच वसूल निम्नलिखित हैं।

एक- एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना दो -एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।  तीन-गैर आक्रामकता। चार- समानता और परस्पर विश्वास । पांच -शांतिपूर्ण सह अस्तित्व।

1954 में पंडित नेहरू द्वारा चीन के समक्ष प्रतिपादित किया गया  पंचशील सिद्धांत पांच गाइड लाइन थी, जिसको 1955 में 18 से 24 अप्रैल तक इंडोनेशिया के बांडुंग में हुए गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन (स्थापना सम्मेलन) ने आगे बढ़ाया। 1961 में यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में  गुटनिरपेक्ष देशों के प्रथम सम्मेलन में पंचशील के सिद्धांत को स्वीकार किया गया।

भारत की विदेश नीति की निरंतरता

आजादी के लिए चले संघर्ष के दौरान और उसके बाद ‌पंडित नेहरू की सरकार के ‌समय से ही भारत की विदेश नीति में एक निरंतरता और स्थिरता रही है। पंचशील के सिद्धांत पर अमल करते हुए भारत 1990 तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता बना रहा। लेकिन सोवियत ब्लॉक के विघटन के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता खत्म हो  गई और अधिकांश तटस्थ  और विकासशील देशों में राष्ट्रवादी नेतृत्व और सरकारों का पतन हो गया। अमेरिकी ब्लॉक की राजनीतिक  विजय ने विश्व में शक्ति संतुलन को पलट दिया। अधिकांश देश अमेरिकी  नीतियों पर चलने के लिए मजबूर कर दिए गए। फिर भी भारत में आने वाली विभिन्न सरकारें विदेश नीति के सवाल पर मूलतः तटस्थता के सिद्धांतों पर अमल  करती रही ।

हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ‌ की विदेशनीति

आजादी के संघर्ष के दौरान और उसके बाद आजाद भारत की विदेश नीति को लेकर दक्षिणपंथी ताकतों का झुकाव अमेरिकी या विश्व साम्राज्यवादी देशों के पक्ष में रही  है। चूंकि आजादी की लड़ाई के दौरान आरएसएस साम्राज्यवाद परस्त बनी रही, इसलिए आजादी के बाद उसके राजनीतिक संगठनों की विदेश नीति भी नवसाम्राज्यवाद के सामने आत्मसमर्पण की रही। इसलिए वे कांग्रेस सरकार की विदेश नीति का विरोध करते रहे थे। इसके दो प्रमाण उपलब्ध हैं। एक-  अमेरिका ने साम्यवादी क्रांतियों को रोकने के लिए सैनिक गुटों का निर्माण  शुरू किया। जैसे नाटो, सीटो, सेंटो आदि। तो आरएसएस, हिंदू महासभा आजादी के बाद बनी जनसंघ और कांग्रेस के अंदर मौजूद दक्षिणपंथी खेमे ने अमेरिका के साथ गठजोड़ की वकालत की। जनसंघ ने तो अपने स्थापना सम्मेलन से इसराइल को मान्यता देने का  समर्थन किया था। दूसरा, कांग्रेस  का दक्षिणपंथी खेमा जिसमें स्वतंत्र पार्टी,  राजगोपालाचारी, कृपलानी और कांग्रेस के अंदर के सिंडिकेटगुट और जनसंघ शुरूआत से ही अमेरिकी विश्व रणनीति का अंग बनने के पक्षधर थे और अमेरिका के साथ  गठजोड़ में शामिल होने कि लिए दबाव बना रहे‌ थे।

चीन भारत सीमा विवाद विवाद के बाद यह दबाव बहुत बढ़ गया था। लेकिन आजाद भारत ने अपनी तटस्थ भूमिका बनाए रखने की आत्म शक्ति का प्रदर्शन किया था। जिससे अमेरिकी खेमे के लोग कामयाब नहीं हुए।

जब भारत आजादी के लिए लड़ रहा था और दुनिया में चल रहे मुक्ति संघर्षों का समर्थन कर रहा था, तो हिंदुत्ववादी या तो अंग्रेजों के साथ थे या  फासीवाद और नाजीवाद को नीतिगत समर्थन दे रहे थे। ये ताकतें अपने इतिहास के किसी भी कालखंड में प्रगतिशील, लोकतांत्रिक शक्तियों और उत्पीड़ित जनगण के साथ  नहीं खड़ी हुईं। इसलिये इनके विदेश नीति में  उत्पीड़क राष्ट्रों व वर्गों के पक्ष में खड़े रहने की निरंतरता दिखाई देती है।

यह भांडा 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद फूट गया। जब पूर्व जनसंघ के नेता और भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेई और  सिंडिकेट कांग्रेस  के नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री मुरार जी भाई देसाई ने इजरायली-अमेरिकी धुरी के पक्ष में भारत की विदेश नीति को बदलने का प्रयास किया। हिंदुत्ववादी हमेशा अमेरिका के साथ रहे।

संघ-नीत भाजपा सरकार की विदेश नीति के तीन निर्णायक संगठक तत्व हैं।

एक- साम्राज्यवादी अमेरिका ( अमेरिकी लाबी) की नीतियों का समर्थन । यानी साम्राज्यवादी ताकतों के समक्ष समर्पण।

दो – साम्यवाद‌ और आधुनिकता के बुनियादी तत्व, प्रगतिशील, धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक मूल्य और साम्राज्यवाद विरोधी  सरकारों का विरोध।

तीन -हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना के तहत भारत के अंदर मुसलमान-इस्लाम विरोध, लेकिन इस्लामी राजशाहियों का पक्षपोषण।

2002 के गुजरात नरसंहार के बाद  हिंदुत्ववादियों ने कॉर्पोरेट के साथ गठजोड़ कायम किया। यह एक गुणात्मक परिवर्तन था।
इस बुनियादी दृष्टिकोण के कारण आजादी के बाद से चल रही भारत की विदेश नीति का परित्याग किया गया।

इस  पैमाने पर मोदी सरकार की विदेश नीति का मूल्यांकन करने से वर्तमान स्थितियों का सही आकलन किया जा सकता है।

संघ-भाजपा की मोदी सरकार चार खंभों पर टिकी हुई है।

एक – कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़।

दो-‌ प्रोपोगंडा और झूठे, मनगढ़ंत  आख्यान।

तीन – नफरत और मजहबी टकराव( वर्ण विभाजित हिंदू समाज से वैचारिक उर्जा ग्रहण करना)।

चार- अवैज्ञानिकता, अतार्किकता धर्मांधता व अतीत का महिमामंडन ।

वर्तमान पूंजी केंद्रित सभ्यता के बुनियादी नियमों की उपेक्षा करते हुए अतीत के पिछड़े जीवन मूल्य और आदर्श के द्वारा पिछड़े समाज को सम्मोहित कर लेना आसान  है। आंतरिक तौर पर धर्म-जाति में विभाजित जटिल भारतीय समाज में ‘फूट डालो कब्जा करो’ की नीति सफल  हो सकती है। मिथकीय प्रतीकों को तकनीक और पूंजी से जोड़कर पिछड़े समाज को सम्मोहित किया जा सकता है और सत्ता पर जन विरोधी ताकतों के सहयोग से कब्जा भी किया जा सकता है।

लेकिन, हिंदुत्व की वैचारिक दृष्टि के लिए आधुनिक साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी  के नेतृत्व में चल रही सभ्यता के अंतर विरोधों को समझना और उसके आधार पर जन पक्षधर और तटस्थ नीतियों का प्रतिपादन करना संभव नहीं है। इसलिए विश्व शासक वर्गों के बीच चलने वाले तीखे और सूक्ष्म वर्गीय घात-प्रतिघात को पिछड़े हिंदुत्ववादी पैमाने पर खड़ा होकर विश्लेषित कर पाना कभी भी संभव नहीं होगा। जो आज स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

मोदी सरकार का विश्व जनमत से अलगाव

‘आपरेशन सिंदूर’ के बाद जिस तरह से मोदी सरकार विश्व बिरादरी में अलगाव में चली गई, यह वस्तुत: संघ-भाजपा की दक्षिणपंथी हिन्दूत्ववादी सोच का स्वाभाविक परिणाम है।

पिछले 11 वर्षों से कॉरपोरेट पूंजी और गोदी मीडिया के अपवित्र गठबंधन के सहयोग से ऐसा हवाई नेरैटिव रचा गया था कि मोदी दुनिया के महानतम नेताओं में से एक हैं। इस हवा महल के हवाई सपनों में जीते हुए प्रधानमंत्री मोदी स्वयं जनसभा में कहते घूम रहे थे कि अब  भारत की बात दुनिया सुनती है। कई बार तो ऐसा हुआ कि मोदी भक्त और कारपोरेट मीडिया   वैश्विक यथार्थ से बाहर जाकर  मोदी को विश्व में संकट मोचक के रूप में पेश करने लगा। हमें याद है कि रूस यूक्रेन युद्ध के समय किस तरह के झूठी खबरें और झूठे वीडियो आईटी सेल के चाटुकारों ने जारी किया था।” पापा मोदी जी ने वार रुकवा दी” जैसा एक वीडियो भी था।

पूंजीवाद, वर्तमान दुनिया की धूर्ततम व्यवस्था

पूंजीवादी सभ्यता बहुत ही यथार्थवादी है। उसके प्रतिनिधि देश पूंजी (यानी मनुष्य के श्रम की लूट से पैदा हुई) की कोख से पैदा हुए अंतर विरोधों की जटिलता को बखूबी समझते हैं। इसलिए पिछले पौने दो सौ वर्षों में पूंजीवाद की जड़ों से उठने वाले विराट  झंझावातों को पार करते हुए  आज तक  कायम है । पूंजीवाद ने जब भी अपने आंतरिक संकट के कारण पैदा होने वाली समाजवादी क्रांतियों से पार पाने के लिए दक्षिणपंथी अनुदार व नस्लवादी  फासीवादी व्यवस्था को आगे किया तो  उसके अस्तित्व के लिए ही संकट खड़ा हो गया। इसलिए  उसे बार-बार उदारवाद के चोले में वापस लौटना पड़ता है। अपने ही द्वारा पैदा किए गए संकट को हल करने के लिए वैश्विक नियामक  संस्थाओं को खड़ा करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

हिंदुत्ववाद की सीमा

लेकिन भारत के हिंदुत्ववादी  पूंजीवादी सभ्यता के यथार्थ को  समझने में अक्षम है। इसलिए वह अपनी आंतरिक नीति के आईने में ही विश्व साम्राज्यवाद और वैश्विक शक्तियों के संबंधों को देखते और समझते हैं। भारत में हिंदू राष्ट्रवादियों के जीवित रहने के लिए भारत के अंदर मुसलमान और भारतीय उपमहाद्वीप में  पाकिस्तान का होना  दो  स्थाई तत्व हैं । इसलिए वे वैश्विक शक्ति संतुलन को साधने के लिए  भी इसी दृष्टि का प्रयोग करने की भूल करते हैं।

दूसरी तरफ वे साम्राज्यवादी खेमा के साथ जुड़ने  के लिए पाखंड, लफ्फाजी और सतही तरीके इस्तेमाल करते हैं। जैसे भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा गुजरात में ‘नमस्ते ट्रंप’ नामक इवेंट का आयोजन । अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में जाकर हाऊडी मोदी के लिए प्रायोजित भीड़ जुटाकर मोदी मोदी करना।  विचारधारा गत बौनेपन को छिपाने के लिए ओबामा, ट्रंप जैसे राष्ट्रपतियों के साथ गले लिपटना आदि। जिसे अपनी महान सफलता के बतौर पेश कर भारत में पिछड़े हिंदुत्ववादी सामाजिक आधार को संतुष्ट किया जा सके।

हिंदू राष्ट्रवाद का खोखलापन

सही बात तो यह है कि आरएसएस मार्का राष्ट्रवाद की सीमा यहीं तक जाती है। या तो साम्राज्यवादी शक्तियों के समक्ष आत्म समर्पण  या राष्ट्रभक्ति का प्रहसन। संघ के राष्ट्रप्रेम की सीमा देश के अंदर धार्मिक अल्पसंख्यकों, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के विरोध और देश की सीमा के बाहर आमतौर पर पड़ोसी देशों और खासकर पाकिस्तान के विरोध तक जाती है।

इनकी दृष्टि इसके पार जाकर विश्व साम्राज्यवाद की सीमा को छू भी नहीं सकती। इसलिए भारतीय राष्ट्र-राज्य  पर साम्राज्यवाद के दबाव का प्रतिरोध कर पाने की क्षमता  इनके अंदर कतई नहीं है।

यही कारण है कि पीड़ित फिलिस्तीनियों के पक्ष में खड़े होने की जगह ये यहूदी नस्लवादी इसराइल के साथ खड़े हो जाते हैं। यहां तक कि इजरायली नस्लवाद आज उनके लिए मार्गदर्शक और प्रेरणाश्रोत  बन गया है।

हिंदुत्व राष्ट्रवादी इजराइल के नस्लीय सफाए की नीति पर देश में अमल करने की कोशिश करते हैं। इसका स्वाभाविक परिणाम है कि अरब जगत से लेकर अनेक छोटे-मझोले देश भारत के विरोध में चले गए हैं।

अमेरिकी स्वर्ग की लालच

लंबे समय से दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी ताकतों की सर्वोच्च ख्वाहिश रही है, अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों को विकसित करना।  भारत का बिकाऊ मीडिया  देश में  यह दिखाने का प्रयास करता है कि अमेरिकी नागरिक मोदी के नेतृत्व से अभिभूत है। वह उन्हें बहुत प्यार करते हैं। जबकि अमेरिकी मीडिया, जनतांत्रिक नागरिक, मानवाधिकार संगठन और नस्लवाद  विरोधी संस्थाएं लगातार मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करती रही हैं।

विदेश यात्रा का प्रेम

मोदी ने सैकड़ों बार विदेश यात्राएं की और वे लगभग डेढ़ सौ देशों की शाही यात्राओं पर गए। लेकिन आज संकट के समय उसके परिणाम जीरो दिखाई दे रहे हैं। मोदी और उनकी सरकार बताने के लिए तैयार नहीं है कि इन यात्राओं से भारत को दुनिया में कौन सा समर्थन और सम्मान मिला है।

मोदी की विदेश यात्राओं की कवायद की सच्चाई तो यह है कि पाकिस्तान, भारत को दोगुना से ज्यादा मतों से पराजित कर आतंकवाद विरोधी समिति में उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल करता है।

करिश्माई मोदी की ढोल की पोल

भारत में जी-20 के परंपरागत आयोजन को मोदी की व्यक्तिगत सफलता में बदल दिया गया। इसे मोदी नेतृत्व की वैश्विक स्वीकृति के रूप में पेश किया गया। मोदी के ताम-झाम और भव्य यात्राओं पर अरबों रुपए खर्च कर दिए गए। लेकिन आज 11 वर्ष बाद आपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि में जी-7  की मीटिंग में भारत को आमंत्रित तक नहीं किया गया है।  पाखंड तो पाखंड ही होता है। उसे एक दिन नंगा होना ही पड़ता है। अंततः  ढोल की पोल खुल ही गई।

एक ही झटके में मोदी के मित्र  ट्रंप ने मोदी के वैश्विक नेता की नकली छवि को तार-तार कर दिया। जब उन्होंने मोदी के सामने ही भारत को अपमानित करते हुए जैसे को तैसा  टैरिफ लगाने की धमकी दे डाली। यही नहीं अब ट्रंप मोदी को अपमानित करने का कोई मौका जाया नहीं होने दे रहे हैं। भारत अकेला ऐसा देश है जो अपने प्रवासी मजदूरों  के सम्मान इज्जत की रक्षा नहीं कर सका ।

देश की संप्रभुता को चुनौती

पहलगाम में आतंकी हमले के जवाब में जब भारत में ऑपरेशंन सिंदूर के द्वारा आतंकी ठिकानों पर हमला किया तो चार दिन बाद ट्रंप ने घोषणा कर दी कि उन्होंने युद्ध रुकवा दिया है। भारत-पाकिस्तान के ऐलान के पहले ही ट्रंप ने घोषणा कर यह बता दिया कि ट्रंप की निगाह में मोदी के भारत की क्या हैसियत है? यह सिर्फ किसी मित्र देश द्वारा कराया गया समझौता भर नहीं है। यह भारत की संप्रभुता  का उल्लंघन भी है।अभी तक कई बार ट्रंप  एक ही बात दोहरा चुके हैं लेकिन  रैलियों में लंबी-लंबी फेंकने वाले नरेंद्र मोदी  एक बार भी ट्रंप के दावे पर एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे हैं।

भारत के अलगाव का कारण

अगर दुनिया में कोई देश भारत के साथ इस कठिन घड़ी में नहीं खड़ा है तो इसके कारण हमें संघ मार्का राष्ट्रवाद के अंदर ही खोजना होगा। जो  छोटे पड़ोसी देशों को  धौंस धमकी देता है और बड़ी ताकतों के समक्ष समर्पण कर देता है। आपको याद होगा मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद जब नेपाल की यात्रा पर गए थे। तो लगता था जैसे वह किसी  संरक्षित राज्य के भ्रमण पर आए हों । उस समय नेपाली राष्ट्रवाद को जो चोट पहुंची थी  उससे भारत-नेपाल संबध बुरी तरह से प्रभावित हुए।

संघ और मोदी के अखंड भारत का अलाप मे हमारे पड़ोसी देश  सशंकित हो गये हैं, जिस कारण से भूटान, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश तक भारत से दूर होते गए हैं। ये देश भी ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत के साथ नहीं आये। जो हमारे अपने सहोदर लोग हैं। इनके साथ हमारे सामाजिक सांस्कृतिक ही नहीं रक्त संबंध जुड़े हुए हैं। लेकिन संघ की विस्तारवादी और अंध्रराष्ट्रवादी चिल्ल-पों ने भारत को भारतीय उपमहाद्वीप  में अकेले छोड़ दिया है।

आखरी बात, मोदी बार-बार अपनी सभाओं में कहते हैं कि यह पुराना भारत नहीं है। भारत तेजी से बदल रहा है। यह मोदी का भारत है। जो घुसकर मारता है। मोदी बदला लेना जानता है। घुसकर मारने की ताकत रखता है। आप सोच सकते हैं दुनिया में किसी देश का राष्ट्र प्रमुख इस तरह के बातें कर सकता है।

मोदी के दम्भ भरे भाषणों से भारत की एक हमलावर राष्ट्र की छवि बनती है। सार्वजनिक मंचों से ऐसा प्रलाप करना  आंतरिक राजनीति में लाभकारी हो सकता है। इससे वोट बटोर कर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है। पराजित उच्च वर्णीय मध्य वर्ग के आहत मन को संतुष्ट किया जा सकता है। लेकिन आज की विश्व राजनीति में यह उलट परिणाम देगा। जो पाकिस्तान के साथ टकराव में अब दिखाई देने लगा है।

11 वर्ष के मोदी राज में जिस तरह से देश के अंदर अल्पसंख्यकों, दलितों, लोकतांत्रिक ताकतों पर हमले हुए हैं, जिसे आज के  डिजिटल दुनिया में क्या छुपाया जा सकता है?
इसका परिणाम है कि आज संघ परिवार बौद्धिक दरिद्रता से जूझ रही है।

मोदी सरकार में  दूरदर्शी राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और भारत के भविष्य के बारे में ठोस विजन रखने वाला एक भी व्यक्तित्व नहीं मिलेगा ।

विश्व बैंक और विदेशी विश्वविद्यालय से कुछ उधार लोग लाए गए लेकिन वह संघ के हिंदुत्व फ्रेम में समाहित नहीं हो सके और उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए संघी विचारक उन्हें गालियां देते हैं। संघ की संस्थाओं पर नियंत्रण की हवस के कारण विशेषज्ञों को अपमानित होकर संस्थाओं से बाहर जाना पड़ा है। जिस कारण आज भारत विशेषज्ञों के संकट से जूझ रहा है।

एक भी ऐसे निडर सलाहकार नहीं हैं जो सरकार की गलत नीतियों पर उचित सलाह दे सकें। जिस कारण भारत वैश्विक बिरादरी से बहिष्कृत होता चला गया ।
अब हम वैश्विक मंच पर अकेले पड़ गए हैं। इसकी  भारी कीमत भारत को चुकानी होगी। इसका एक ही विकल्प है कि संघनीत भाजपा सरकार से देश जितनी जल्दी छुटकारा पा ले उतना ही भारत के भविष्य के लिए अच्छा होगा। क्योंकि मोदी अब देश पर बोझ बन चुके हैं।


‌  हमें इस आलोक में भारत के अकेलेपन को देखना होगा । हिंदुत्व के पास आधुनिक विश्व के किसी सवाल के समाधान की दृष्टि और सामर्थ्य नहीं है। हिंदुत्व की राजनीति ने भारत की विदेश नीति को  अंधेरी गली में ले जाकर फंसा दिया है। उससे बाहर निकालने के लिए इस देश को आने वाले समय में कठिन संघर्ष करना होगा। तभी जाकर वैश्विक मंच पर भारत की खोई हुई प्रतिष्ठा की पुनर्वापसी हो सकेगी।

 

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

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