भाषा का सवाल मानव सभ्यता के इतिहास में हमेशा अहम रहा है। एक तो भाषा में ही कोई संस्कृति ज्यादा स्थायित्व पाती है, दूसरे मानव समुदाय उसी के मार्फत दुनिया के सामने पेश होता है। इसीलिए भाषा सिर्फ आपसी संवाद तक सीमित न होकर सभ्यताओं के विकास में और सत्ता संघर्ष में एक उपकरण में बदल जाती है।
पूरी दुनिया में वर्चस्व की राजनीति में भाषा को बतौर हथियार बरता गया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में और उसके बाद अमेरिकी अगुवाई के नव साम्राज्यवाद के अंतर्गत भाषा की राजनीति मुख्य रही। प्रायः वर्चस्व की राजनीति, नस्ली श्रेष्ठता की राजनीति में भाषा को मानव समाज या समुदायों में विभाजन, अलगाव आदि के लिए इस्तेमाल किया गया।
भारत में भी यह ब्रिटिश शासन के अंतर्गत खूब हुआ और अभी भी साम्प्रदायिक हिन्दूवादी राजनीति के केन्द्र में भाषा के साथ वही विभाजनकारी बर्ताव है।
अंग्रेजी शासन के पहले भारत के भूगोल के भीतर भाषाओं के बीच सहयोग, साझापन, लेन-देन ही मुख्य था। राजसत्ता की भाषा का असर बस इतना होता था, कि राजदरबार के कवि-लेखक राजभाषा के शब्दों का प्रयोग लोक या जनभाषा में बढ़ा देते थे, लेकिन कभी भाषा को सीमित या दूसरी भाषा के विरोध में नहीं खड़ा किया गया। ब्रिटिश शासन के अधीन यह हुआ, कि भाषागत आधार पर नीतियां बनायी गयीं।
हिन्दी और उर्दू को लेकर यही हुआ। एक ही भाषा के दो रूपों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया। साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले संगठनों और दलों ने इसमें ब्रिटिश मंशा के अनुकूल योग दिया।
ब्रिटिश शासन के दौर में भी अनेक हिन्दी के विद्वानों और लेखकों ने इस विभाजन को स्वीकार नहीं किया। इसी क्रम में बाबूराम सक्सेना की एक पुस्तक उस दौरान आयी ‘दक्खिनी हिन्दी’ नाम से।
इसका प्रथम संस्करण हिन्दुस्तानी एकेडेमी से 1952 ई. में छपा। इसमें बाबूराम सक्सेना के व्याख्यान हैं। इसका पहला व्याख्यान 18 मार्च सन् 1945 ई. को पढ़ा गया था। इसका प्रकाशकीय धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है। प्रकाशकीय की तारीख 16 दिसम्बर 1951 ई. है। इस पुस्तक का दूसरा संस्करण 2012 ई. में छपा। इसका प्रकाशकीय बृजेश चन्द्र ने लिखा है, जो उस समय हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव थे। इसकी तिथि 23 मार्च 2012 की है। इस पुस्तक के सन्दर्भ में प्रकाशकीय वक्तव्यों का खास महत्व है। प्रस्तावना में लेखक ने व्याख्यान और पुस्तक के लिए धीरेन्द्र वर्मा को प्रेरक माना है। यह पुस्तक धीरेन्द्र वर्मा को समर्पित भी है।
धीरेन्द्र वर्मा ने अकादमिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी को स्थापित किया। धीरेन्द्र वर्मा ने हिन्दी का पाठ्यक्रम तैयार करवाया, साथ ही उन्होंने शोध, अध्ययन और अध्यापन के लिए हिन्दी के विद्वानों को जगह-जगह से बुलवाया। धीरेन्द्र वर्मा ने ऐतिहासिकता और वस्तुनिष्ठता के साथ हिन्दी भाषा और साहित्य पर काम करवाये। उनका योगदान बहुत बड़ा है। साथ ही, उसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि उनका काम औपनिवेशिक समझ और भारतीयता की एकांगी अवधारणा के छल से मुक्त है। उनकी प्रेरणा से बनी इस पुस्तक को पढ़ कर इसे आसानी से जाना-समझा जा सकता है। सबसे पहले धीरेन्द्र वर्मा के प्रकाशकीय वक्तव्य को देखा जाय-
“हिन्दी भाषा का विकास और उसमें साहित्य-रचना का कार्य केवल उत्तरी भारत में नहीं हुआ है। दक्षिणी भारत की मुसलमानी रियासतों, उनके शासकों एवं उनके दरबार के तथा अन्य साहित्यिकों का भी इसमें महत्वपूर्ण हाथ है। मुसलमान फ़कीरों, सैनिकों और राज्य संस्थापकों के द्वारा साहित्यिक हिन्दी दक्षिण भारत में पहुंची थी और पंद्रहवीं शताब्दी तक उसमें उच्चकोटि का साहित्य निर्मित होने लगा था।”
1951 के बाद 2012 में दूसरे संस्करण के प्रकाशकीय वक्तव्य में बृजेश चन्द्र लिखते हैं,
“हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में दक्षिण भारत की मुसलमानी रियासतों, उनकी छत्रछाया में पलने वाले दरबारियों और उस क्षेत्र में सक्रिय अन्य साहित्यानुरागियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।”
यह तो हुआ हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में दक्षिण भारत के मध्यकालीन मुसलमान शासकों और मुसलमान लेखकों, कवियों की भूमिका और योगदान को स्वीकार करना। लेकिन इस योगदान पर ब्रिटिश काल में काम भी मुसलमान विद्वानों ने किया। प्रस्तावना में बाबूराम सक्सेना लिखते हैं,
“दक्खिनी के अध्ययन के लिए मो. नसीरुद्दीन हाशिमी की पुस्तक दकिन में उर्दू परिचय पाने के लिए बहुत अच्छी है। डाॅ. सैयद मुहीउद्दीन क़ादिरी ‘ज़ोर’ के उर्दू शहपारे, तज़किरह उर्दू मखतूतात और हिन्दुस्तानी लिस्सानियात बड़े काम के ग्रन्थ हैं। मौलवी डाॅ. अब्दुलहक दक्खिनी की प्रशंसनीय और अथक सेवा की है।…स्थानीय विद्वानों में से डाॅ. अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी ने मुझे आवश्यक परामर्श देकर कृतज्ञ किया है। मित्रवर डाॅ. मुहम्मद हफ़ीज़ सैयद ने न केवल अपने सुख-सहेला के द्वारा बल्कि अन्य प्रकाशित और हस्तलिखित पुस्तकों को प्रदान कर मुझे इन व्याख्यानों को तैयार करने में बड़ी मदद की।”
इस पुस्तक से यह सब बातें इसलिए कि 2014 के बाद हिन्दूवादी सत्ता ने विभाजन और नफरत के अपने राजनीतिक एजेण्डे के तहत भाषा को भी हथियार बनाया और हिन्दी को हिन्दुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में स्थापित करने का सुनियोजित अभियान लिया।
हालांकि औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के विभाजनकारी एजेण्डे को तब भी आरएसएस ने अपनाया था, लेकिन 2014 के बाद सत्ता पर पूरा नियंत्रण पाने के बाद उसने सांस्थानिक रूप से इसे अमली जामा पहनाना शुरू किया। लेकिन आजादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्र निर्माण की जो प्रक्रिया थी, उसमें लोकतांत्रिक, सेकुलर और समाजवादी तत्व अपनी सीमाओं के बावजूद प्रभावी रहे। उसी का नतीजा है कि ज्ञान के क्षेत्र में वस्तुनिष्ठता और ऐतिहासिकता को तरजीह दी गयी।
प्रायः विद्वानों ने आरएसएस की मनगढ़ंत, तथ्यहीन, मिथ्या धारणाओं पर आधारित धार्मिक राष्ट्र की संकल्पना को अस्वीकार किया। राष्ट्र, भाषा और संस्कृति के निर्माण में सभी धर्मों, समुदायों और वर्गों के योगदान को स्वीकार किया गया।
यह माना गया कि बहुलता और साझापन ही असल भारतीयता है। यह औपनिवेशिक विभाजनकारी, खण्डित और एकांगी भारतीयता की अवधारणा का प्रत्याख्यान भी था।
1930 का दशक जैसे ही औपनिवेशिक दासता विरोधी संघर्ष के नये क्षेत्रों और विचारों के द्वार खोलता है, वैसे ही ज्ञान के क्षेत्र में औपनिवेशिक स्थापनाएं और धारणाएँ चुनौती पाने लगती हैं। शिक्षा और संस्कृति के दायरे में यह चुनौती विस्तार पाती है।
यह पुस्तक इसी प्रक्रिया की देन है। यह पुस्तक तथ्यों, प्रमाणों, विवेचनों और विश्लेषणों से इस बात को खण्डित करती है, कि दक्खिनी हिन्दी या बाद में विकसित उर्दू विदेशी मुसलमानों द्वारा लायी गयी। यह पुस्तक स्थापित करती है, कि दक्खिनी हिन्दी और बाद की उर्दू देशी भाषा से जन्मी है और हिन्दी का ही एक रूप है। शुरू में ही वे लिखते हैं,
“जिस भाषा का विवेचन करने हम खड़े हुए हैं, उसके तीन नाम मिले हैं- हिन्दवी, हिन्दी और दक्खिनी। आरम्भ में ही इतना बता देना ज़रूरी है कि संस्कृत-निष्ठ शैली से यह भाषा कई बातों में अलग है।”
इसके पहले वे लिखते हैं कि फारसी लिपि में लिखी गयी उर्दू और देवनागरी की खड़ी बोली को हिन्दी की एक शाखा हिन्दुस्तानी के दो साहित्यिक रूप मानते हैं। लेकिन ‘आजकल हिन्दी शब्द को अधिकतर संस्कृत शब्दावली पर निर्भर एक विशेष शैली के लिए ही काम में लाया जाता है।’
पहली बात वे कहते हैं, कि उर्दू और खड़ी बोली हिन्दी की ही शाखा के दो साहित्यिक रूप हैं। दूसरी बात कहते हैं, कि जो हिन्दी, हिन्दवी या दक्खिनी हिन्दी है, वह संस्कृत-निष्ठ शैली से कई बातों में अलग है। फिर वे कहते हैं कि आजकल हिन्दी शब्द को अधिकतर संस्कृत शब्दावली पर निर्भर एक विशेष शैली के लिए ही काम में लाया जाता है। दरअसल औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त भाषाविदों ने इस बात को स्थापित किया, कि हिन्दी संस्कृत से निकली भाषा है। आज भी यही पढ़ाया जाता है। हिन्दी को संस्कृत शब्दावली से भरना और उसे ही शुद्ध हिन्दी या तत्सम पढ़ाया जाना इसी का नतीजा था। इसकी चपेट में हिन्दी के कई लेखक भी आये। जबकि बाद के भाषाविदों ने अपने वस्तुपरक और ऐतिहासिक अध्ययन में यह दिखाया कि हिन्दी संस्कृत से निकली भाषा नहीं है।
इस पुस्तक में भी लेखक ने यह संकेत किया है। वे कहते हैं, कि शब्दावली से कोई भाषा तय नहीं होती, वह अपने व्याकरण और क्रियाओं से तय होती है। हिन्दी का व्याकरण लिखने वाले किशोरी दास बाजपेयी ने भी यही स्थापित किया, कि हिन्दी संस्कृत से विकसित भाषा नहीं है।
दरअसल अरबी-फारसी शब्दावली के भरने से न तो उर्दू विदेशी भाषा है, और न ही संस्कृत शब्दावली के जोर से हिन्दी उससे निकली भाषा है। डाॅ. बाबूराम सक्सेना इस पुस्तक में कहते हैं, कि खड़ी बोली, दक्खिनी हिन्दी और उर्दू तीनों ही शौरसेनी प्राकृत से विकसित हुई है। वे यह भी कहते हैं, कि
‘यह गलत धारणा है, कि उर्दू हिन्दुओं और मुसलमानों के मेलजोल से निकली हुई ज़बान है।’ वे आगे कहते हैं कि
“मुसलमानों की आमद-रफ़्त व मेलजोल से भारतीय भाषाओं पर केवल एक असर हुआ और वह यह कि इनमें अरबी, फ़ारसी और तुर्की आदि विदेशी भाषाओं के कुछ शब्द आ गये, किसी में कम, किसी में कुछ ज़्यादा।”
अर्थात शब्दों से भाषा का स्थान और विकास तय नहीं होता। आगे वे स्पष्ट करते हैं, कि
“भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। उसका एक ढाँचा होता है, जो उसकी ध्वनियों और व्याकरण से बनता है। वही भाषा का देहपंजर है। उस देहपंजर में बहुत से शब्द मूलरूप से चिपके होते हैं और इन शब्दों का उस पंजर से समवाय सम्बन्ध रहता है। ये शब्द उसके दैनिक व्यवहार के हैं और उन्हें उस भाषा के बोलने वाले रोज़ काम में लाते हैं। इन शब्दों में भाषा के सर्वनाम, गिनतियाँ, खाने पीने, आने जाने, उठने बैठने, सोने आदि सर्वसाधारण क्रियाओं का बोध कराने वाले शब्द और रोज़मर्रा के इश्तेमाल की चीज़ों के नाम आते हैं।”
इस आधार पर हिन्दी या दक्खिनी हिन्दी और उर्दू का सम्बन्ध शौरसेनी प्राकृत और अपभ्रंश से है। आगे वे कहते हैं, कि
“वह भाषा जिसके हिन्दवी, हिन्दी, हिन्दुस्तानी और उर्दू ये कई नाम प्रचलित हैं, संस्थान की दृष्टि से शौरसेनी प्राकृत और अपभ्रंश की आत्मजा है। जिस भाषा को भाषाविज्ञानियों ने पश्चिमी हिन्दी की हिन्दुस्तानी शाखा कहा है, वही इसकी मूल है।… यह इस देश में, मुसलमानों के दिल्ली जीतने से पहले से मौजूद थी, विजेता उसे अपने साथ नहीं लाए। वे लाए थे फ़ारसी और तुर्की जिनके थोड़े बहुत शब्द इसमें भर गये, बस!”
इस बात को वे आगे भाषा तथा शैली और साहित्य शीर्षक अध्याय में तमाम प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष प्रदान करते हैं। ध्वनि, व्यंजन, लिंग, सर्वनाम, परसर्ग आदि के माध्यम से दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं को उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के द्वारा सामने रखा है।
इसमें वे एक दिलचस्प बात बताते हैं कि हिन्दी ने दूसरी भाषा के बहुत से शब्दों को अपनी ध्वनि में ढालकर अपना लिया है। अर्थात उन शब्दों का लिंग, वचन आदि हिन्दी के व्याकरण से निर्धारित होता है। वे कहते हैं कि इन शब्दों को शुद्ध करके प्रयोग करने या मूल भाषा के अनुसार बोलने, लिखने की बजाय उसके हिन्दी रूप को ही व्यवहार में लाना चाहिए।
इसके बाद शैली और साहित्य अध्याय में शब्दावली, लिपि, तद्भव, तत्सम, क्रिया शब्द, व्याकरण रूप, परम्परा निर्वाह आदि के आधार पर दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं को उद्धृत किया है। इसमें वे दिखाते हैं, कि खड़ी बोली की अधिकांश विशेषताओं के साथ हिन्दी की पूरबी बोलियों की भी खासियत दक्खिनी हिन्दी लिए हुए है।
साहित्य के अन्तर्गत गद्य और पद्य का विवेचन किया गया है। परिशेष में दक्खिनी हिन्दी के साहित्य के नमूने दिये गये हैं। पुस्तक में अनुक्रमणिका भी दी गयी है। अकादमिक महत्व के साथ दक्खिनी हिन्दी पर यह एक ऐतिहासिक महत्व का भी काम है।
देवनागरी लिपि में सम्भवतः यह विरल काम है। यह पुस्तक आज के विभाजनकारी हिन्दूवादी राजनीति के दौर में ज्यादा प्रासंगिक हो उठी है। भाषा सम्बन्धी उसके फैलाये झूठ-फरेब को बेनकाब करने के लिए यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से छपी इस पुस्तक का मूल्य एक सौ तीस रूपये मात्र है।

