कोरोना महामारी, लाॅक डाउन और रोजी-रोटी का महासंकट

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चारों ओर कोरोना का शोर हैं. बच्चा-बच्चा अब इस शब्द से जो मात्र शब्द नहीं एक महामारी है, परिचित हो चुका है। कोरोना एक वायरस है – विषाणु। बैक्टीरिया और वायरस में अंतर है। वायरस अतिसूक्ष्म जीव है। ये कोशिका के बाहर मृत रहते हैं पर कोशिका में प्रवेश के बाद इनका जीवन चक्र प्रारंभ होने लगता है। जीवित कोशिका के बाहर हजारों वर्ष तक यह सुसुप्त अवस्था में रहता है पर जीवित कोशिका प्राप्त होने के बाद पुनः जीवित होता है। वायरस का आकार जीवाणु अर्थात बैक्टीरिया से छोटा है जिसे इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखा जा सकता है।

वायरस की कई श्रेणियां हैं। कोरोना वायरस विषाणु वर्गीकरण में ग्रुप 4 के अंतर्गत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसका नाम कोविड-19 रखा है।

चीन के हुबेई प्रांत के वुहान लैब में वैज्ञानिकों ने इबोला, निपाह, साॅर्स एवं अन्य घातक वायरसों पर रिसर्च करते हुए एक अजीब वायरस की नोटिस ली जिसे पहले कभी नहीं देखा गया था। इस वायरस में वैज्ञानिकों ने सॉर्स वायरस की समानता देखी, जिसने 2002-2003 में चीन में महामारी ला दी थी। उस समय भी चीन ने इस वायरस को छुपाया था। दिसंबर 2019 के पहले सप्ताह में बुखार से पीड़ित कई लोगों के सैंपल वुहान न्यू इंस्टीच्यूट ऑफ़ बायोलॉजी नेशनल बायोसेफ्टी लैब’ में भेजे गए जहां वैज्ञानिकों ने इसमें ‘जानलेवा ग्लोबल खतरे का संकेत’ पाया। ड

डॉ ली वेनलिवंग ने 7 वायरस केसों को साॅर्स की तरह देखा। वह पहले डॉक्टर थे जिन्होंने पहली बार दुनिया को इस वायरस से सावधान रहने को कहा। 30 दिसंबर 2019 को ली ने एक चैट ग्रुप में अपने साथी डॉक्टरों को इस वायरस के खतरे के बारे में बताया था और यह चेतावनी दी थी कि इससे बचने के लिए वे खास तरह के कपड़े पहने। उन पर अफवाह फैलाने का आरोप लगा। उन्हें पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो में हाजिर होना पड़ा, जहां उन्हें एक पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। इस पत्र में वे दोषी सिद्ध किए गए, जिसने सामाजिक व्यवस्था को भंग और अस्त-व्यस्त किया था। पुलिस ने पहले उनके संदेश को गलत टिप्पणी करने से मना किया था। 10 जनवरी 2020 को ली को खांसी हुई, अगले दिन बुखार आया और 2 दिन बाद अस्पताल में भर्ती हुए। 12 जनवरी से अस्पताल में रहे। 30 जनवरी को जांच से यह पता चला कि उन्हें कोरोना वायरस है। एक मरीज के संपर्क में आने के बाद वे इस वायरस की चपेट में आ गए थे।

उन्होंने अस्पताल से वीडियो पोस्ट कर लोगों को चेतावनी दी थी। ‘साउथ मॉर्निंग चाइना पोस्ट’ के अनुसार चीन के हुबेई प्रांत में 55 वर्षीय एक व्यक्ति को कोविड-19 का पहला व्यक्ति माना गया है जिसका केस 17 नवंबर 2019 को आया था। चीन में दिसंबर 15 तक ऐसे मरीजों की संख्या 27 थी। 7 फरवरी तक यह संख्या कहीं अधिक बढ़ गई। डाॅ ली की कोरोना वायरस से मृत्यु 7 फरवरी की रात लगभग 2 बजकर 58 मिनट पर हुई। डाॅ ली युवा थे। उनकी उम्र मात्र 34 वर्षा थी। उनके पिता ली शुइंग ने बीबीसी को कहा है कि उनका बेटा ‘वंडरफुल’ था – ‘उसने जो कहा, क्या वह आज सच नहीं हुआ?’ डाॅ ली की पत्नी जून में मां बनने वाली है।

चीन ने काफी समय तक कोरोना वायरस को दुनिया से छिपाया। डॉक्टर ली ने पीड़ितों को पृथक यानी आइसोलेशन वार्ड में रखकर इलाज करना आरंभ किया था। कोरोना वायरस की खबर धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलने लगी और चीन ने स्वीकारा कि वह इस महामारी की चपेट में आ चुका है। भारत में 30 जनवरी को कोरोना वायरस का पहला केस आया। सरकार आंखें मूंदी रही। 12 फरवरी को राहुल गांधी ने चेतावनी दी थी, पर इस बार भी उन्हें ‘पप्पू’ ही समझा गया। सरकार काफी समय तक उदासीन और निष्क्रिय बनी रही। भारत में इस वायरस के शिकार पांच थे जो बढ़कर 430 हो गए। प्रधानमंत्री मोदी के सक्रिय हुए बिना सरकार सक्रिय नहीं रहती। 24 मार्च की रात के 8 बजे नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस से मुक्त होने के लिए 21 दिनों के राष्ट्रव्यापी लाॅकडाउन की घोषणा की। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का भी यही एकमात्र विकल्प है।

इसके पहले प्रधानमंत्री ने एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू लगाया था और तालियां, थालियां, घंटा बजाकर कोरोना से जंग के योद्धाओं की हौसला अफजाई करने को कहा था। सबने इसे सर माथे लिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही नहीं बाबा रामदेव ने भी घंटा बजाया। पूरा देश करतल-ध्वनि और थाली-ध्वनि के साथ घंट-निनाद से गूंज उठा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, रक्षा मंत्री सब ने डॉक्टरो, नर्सो , चिकित्साकर्मियों के प्रति आभार प्रकट किया। अमिताभ बच्चन भी शामिल रहे। सबने जान जोखिम में डालकर जीवन देने वालों को सलाम किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां हीराबेन ने भी जनता कर्फ्यू के दौरान आवश्यक सेवाओं में लगे लोगों का थाली बजाकर उत्साहवर्धन किया। एक सप्ताह के भीतर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को दो बार संबोधित किया। 19 मार्च और 24 मार्च को। उन्होंने रात 12 बजे से पूरे देश में लाॅक डाउन होने की घोषणा की। कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए उन्होंने एक मात्र विकल्प सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंस बताया। ‘इसके अलावा कोई तरीका नहीं है। इसे फैलने से रोकना है। इसके संक्रमण चक्र को तोड़ना है’। सामाजिक दूरी ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।’

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद पूरा देश लाॅकडाउन है। कोरोना का संक्रमण तोड़ने के लिए इसे एक मात्र विकल्प माना गया है। ‘अगर हम 21 दिन नहीं संभले तो परिवार और देश 21 वर्ष पीछे चला जाएगा। परिवार तबाह हो जाएगा।’ प्रधानमंत्री ने लाॅकडाउन को गंभीरता से लेने की बात कही है। ‘सबके जीवन को बचाना इस समय हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।’ इस लाॅकडाउन को उन्होंने एक प्रकार का कर्फ्यू कहा है। ‘जनता कर्फ्यू से ज्यादा सख्त’। कोरोना वायरस का शिकार व्यक्ति एक हफ्ते में सैकड़ों लोगों को संक्रमित कर सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रव्यापी लाॅक डाउन से अमेरिका के बर्बाद होने की बात कही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अमेरिका को कोरोना के नए केंद्र के रूप में देख रहा है। वहां अब तक कोरोना वायरस से संक्रमण के 55000 मामले आए हैं और 775 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। कोरोना अब वैश्विक महामारी है। अंटार्कटिका को छोड़कर यह सभी महादेशों में फैल चुका है। एक मरीज से शुरू होकर एक लाख मरीज तक जाने में इस महामारी को जहां 3 महीने लगे, वहां मात्र 11 दिनों में यह दो लाख लोगों में संक्रमित हुआ और 4 दिनों में तीन लाख लोगों में। यह तीव्र रफ्तार घबराने को काफी है।

भारत घनी आबादी वाला देश है और चिकित्सा सुविधाएं बहुत कम है। निजी अस्पताल सहित यहां केवल एक लाख आईसीयू बेड है जबकि भारत की आबादी एक अरब 37 करोड़ है। भारत में अब तक इसकी जांच 7-8 हजार हुई है। दक्षिण कोरिया में प्रतिदिन 15-16 हजार लोगों की जांच होती है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक देश में करोना के मरीजों की संख्या 649 है और इससे 13 मौतें हो चुकी हैं।

वार्षिक बजट में स्वास्थ्य और स्वास्थ्य-शोध यान हेल्थ रिसर्च पर दी जाने वाली राशि घटती गई है। प्रधानमंत्री ने बार-बार हाथ जोड़कर देशवासियों से प्रार्थना की कि वे सामाजिक दूरी बनाए रखें और अपने-अपने घरों में बंद रहें। घर के बाहर की लक्ष्मण रेखा ना लांघें। उन्होंने अंधविश्वास से बचने की बात कही पर एक न्यूज चैनल में यह बताया जा रहा है कि वेदों में कोरोना की भविष्यवाणी दस हजार साल पहले ही की गई थी। ‘नारद संहिता’ के एक श्लोक में ‘महारोग’ शब्द से इसे जोड़ा जा रहा है और यह प्रचारित किया जा रहा है कि नारद संहिता सहित कई पुराणों में इसका जिक्र है कि यह पूरब से अर्थात चीन से आएगा। कोरोना वायरस के फैलने के बाद 12 वर्ष पहले की सिल्विया ब्राउने की पुस्तक ‘एंड ऑफ़ डेज’, 2008 और डीन कूटम की 1981 के उपन्यास ‘द आइज आऑफ़ डार्कनेस’ की भी चर्चा हो रही है, जिसमें इस या ऐसे वायरस, महारोग का जिक्र है। इन सब से समस्याओं का हल नहीं होता। व्यावहारिक धरातल पर निदान ढूंढने पड़ते हैं।

कोरोना वायरस से बचने की क्या उपाय है ? नागरिक दूरी और लाॅक डाउन का चिकित्सा से, जांच से कोई संबंध नहीं है। यह सावधानी और सतर्कता है। क्या यह सब के लिए संभव है? मोदी शैली में अचानक निर्णय प्रमुख है। जनता पहले से तैयार नहीं रहती और व्यवस्था भी पहले से तत्पर नहीं रहती। भारत में 30 जनवरी को इससे जुड़ा केस मिला। सरकार डेढ़ महीने से अधिक लगभग निष्क्रिय रही। जिस समय राहुल गांधी चेतावनी दे रहे थे, स्वास्थ्य मंत्री ने किसी प्रकार के खतरे की ना होने की बात कही थी। 5 मार्च को स्वास्थ्य मंत्री ने डरने जैसी कोई बात नहीं कही थी। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों , नर्सों आदि के बारे में सोचने को कहा जो इस महामारी से बचने के लिए दिन रात काम कर रहे हैं। डाक्टरों को मकान मालिक मकान छोड़ने को कह रहा है। एम्स के डॉक्टरों के पास पर्याप्त मात्रा में ‘मास्क ’ तक नहीं है।

प्रधानमंत्री ने सामाजिक दूरी बनाए रखने की बात कही। कैबिनेट की बैठक में सब एक मीटर की दूरी पर थे। दूसरी ओर मोदी के लाॅक डाउन की घोषणा के बाद यूपी के मुख्यमंत्री अयोध्या पहुंचे और रामलला को गोद में उठाकर अस्थाई मंदिर में ला बिठाया। उनके साथ 20 लोग उपस्थित थे। क्या केवल नागरिकों से ही सभी अपेक्षाएं की जानी चाहिए? अंधविश्वास बढ़ रहा है, बढ़ाया जा रहा है। नवरात्र प्रारंभ हो चुका है। फिर कोरोना को हराकर भारत को विश्व चैंपियन बनने से कौन रोक सकता है? नरेंद्र मोदी के निर्देशों का पालन उनके मुख्यमंत्री ही नहीं कर रहे हैं।

लाॅक डाउन की घोषणा के पहले और उसके बाद भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया है कि आवश्यक सामानों की आपूर्ति कैसे की जाएगी? रोज कमाकर खाने वाला मजदूर 21 दिन अपने और अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे करेगा ? यातायात के सभी साधन ठप है और दिल्ली से 100-200 किलोमीटर अपना सामान ढोते हुए अपने बच्चों को गोद में लिए हुए लोग पैदल अपने अपने घर जा रहे हैं। सरकार जनता से सक्रियता की अपेक्षा करती है। जनता भी उससे उसकी सक्रियता की अपेक्षा करती है। ‘जो जहां है, वही रहें, वही रहें’ कहना ठीक है, शायद सही भी, पर आवश्यक सामग्री सबके पास कैसे पहुंचेगी? लॉक डाउन में विमान सेवा, रेल सेवा, बस सेवा सब बंद है। एक ओर भर-भर झूला सामान खरीदने वाले हैं, दूसरी ओर सामान न खरीद पाने वालों की संख्या करोड़ों में है। प्रधानमंत्री ने मात्र 15000 करोड रुपए की घोषणा की है। केरल के मुख्यमंत्री ने अपने यहां 20 हजार करोड़ की घोषणा की है।

माना यह जा रहा है कि अगले पांच-छह महीने में 5-6 लाख करोड़ की दरकार होगी। आर्थिक सहयोग का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न है। एफसीआई के गोदामों में गेहूं और चावल की कमी नहीं है। सरकार घर-घर राशन पहुंचाने में अक्षम है। स्वहित, समाज हित, राष्ट्र हित, विश्व हित के लिए लॉक डाउन जरूरी है पर इससे उत्पन्न मुख्यतः आर्थिक समस्या है और आवश्यक सामग्री की सहज उपलब्धता है। हाथ लगातार धोना कोरोना वायरस से बचने के लिए जरूरी है। जरूरी यह भी है कि हम बिन खाए-पिए जीवन से ही हाथ न धो बैठे। दूसरी ओर भारत में सबकी जांच के संबंध में सरकार के पास ना कोई योजना है, न इच्छाशक्ति। सब कुछ राम भरोसे है। प्रधानमंत्री ने सबसे अपील की। देश लॉक डाउन में है। पर सरकार अपील से नहीं, अपने कार्यों से, नियमों से चलती है।

कोरोना जानलेवा बीमारी नहीं है। 80 प्रतिशत को इसका पता नहीं चलता। 5 प्रतिशत आईसीयू में जाते हैं। अधिकतम 4 प्रतिशत की इस बीमारी से मृत्यु होती है। लाॅक डाउन से अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। नोटबंदी से क्या बड़ा सिद्ध होगा देश बंदी या घर बंदी ? अभी रोजी-रोटी के महासंकट का सवाल है। गरीब मजदूर-किसान, दुकानदार, दिहाड़ीदार, निर्माण मजदूर सबका जीवन कैसे चलेगा?

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