समकालीन जनमत
पुस्तक

विपिन शर्मा की लप्रेक ‘तुम जिंदगी का नमक हो’ की पुस्तक समीक्षा

कल्पना पन्त


मामला इश्क का , राजनीति पार्टीशन की
पर हमारा अमृतसर अभी नहीं आया..

तुम जिंदगी का नमक हो 2023 में पुस्तकनामा से प्रकाशित हो गयी थी और तभी मैंने पढ़ कर संवेदनात्मक और शैलीगत दृष्टि से स्वयं को अत्यंत समृद्ध महसूस किया . तब से निरंतर नौकरी की व्यस्तताओं के चलते एक अजनबी सी राह पर चलती रही और मन में भी एक स्पॉटलाइट सी बार -बार चमकती रहती इस पुस्तक पर लिखना है पर इच्छा, क्रिया, और ज्ञान [कामायनी] का सामंजस्य नहीं हो पाया आज वह स्पॉटलाइट रंच मात्र भी कम नहीं हुई , और तीव्र प्रकाश होता चला गया—– समीक्षा लिखी जानी प्रारंभ हो गयी.
पर लिख कर भी ‘मोरनी का दु:ख कौन कम कर सकता है। चाँद भी कहीं चला जाता है, तारे भी कहीं दूर डूब जाते हैं। मगर नहीं जाती तो बिछुड़ों की यादें।’’—-

यह संग्रह वस्तुतः ‘गल्प और जीवन के क़िस्से’ का ऐसा अंतरंग कोलाज है, जो व्यक्तिगत अनुभूतियों से आरंभ होकर, व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में गहरे अर्थ ग्रहण करता है। यहाँ जीवन के विविध परतों को अनुभूति का महीन दुशाला उढ़ाकर एक आत्मीय स्पर्श के साथ प्रस्तुत किया गया है, रचना के केंद्र में स्मृति है — नितांत निजी होकर भी सामूहिक चेतना का स्पंदन करती हुई। एक स्थायी भाव-तरंग जिसमें बिछुड़े प्रेमी, खोई मित्रताएँ, हारी आशाएँ, ढही आकांक्षाएँ और उदास पहाड़ सभी सम्मिलित हैं। इसी प्रकार ‘हमें नहीं जाना पलटन में’ कथा केवल एक गाँव की किशोरी का बचपन बचा लेने का आख्यान नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय टिप्पणी है, जिसमें बालविवाह, स्त्री की इच्छा और स्वतंत्रता के प्रथम बीज अंकुरित होते हैं। रचनाओं में प्रेम की निश्छलता है, वियोग की कसक है, बचपन की मासूमियत है, सामाजिक विस्थापन की पीड़ा है और बदलते समय की व्यथा-कथा भी।लेखन का सबसे बड़ा गुण है—सजीवता और आत्मीयता।

कथाएँ मानो जीवन के अपने-अपने छोटे द्वीप हैं, जिनमें स्मृतियों का जल-प्रवाह निनाद करता है। कहीं प्रेम टूटने के बाद भी सुगंध बनकर जीवित रहता है (‘प्यार कस्तूरी होगा’), प्रेम का तीखा मारक कचोट अमृतसर की गलियों में घूमते हुए, तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज की चाह होती। आज भी मैं अच्छे से जानती हूँ ,शिव कुमार बटालवी। उस जादुई शायर की तलब में तुमने किताबों की सारी दुकाने खोज मारी थी, और पढ़ना क्या था तुम्हें ‘इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत ,गुम है’ क्या था उस शायर में जिसके कुछ लफ्जों के साथ तुम घंटों बिता सकते थे। {इक कुड़ी, शिवकुमार बटालवी और अमृतसर स्ट्रीट} कहीं पीछे छूट जाता प्यार – तुम तो अपनी जिंदगी में रच बस गये। मैं सड़क की लैंप पोस्ट बन कर बस खड़ी रह गयी। कहीं आवाजों के जंगल का अकेलापन वह तकलीफ में है और बेहद अकेला भी। हर रोज वक्त के कुछ हिस्से वह इस इंतजार में गुजारता है शायद उसका फोन आ जाए{आवाजों के जंगल में वह निपट अकेला है}

कहीं भीड़ में खोने की पीड़ा (‘आधा पाकिस्तानी’) एक सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न को जन्म देती है। दुनिया और सबसे ताकतवर बनते चले जाने का अतिरेक और अन्य देशों का दमन, शोषण उत्पीडन कहीं आधी आबादी की छिनती आजादी -एक अफगानी गीत है ‘जितना नशा पोस्त में नहीं, उतना तेरी ‘आँखों में है’ मगर अब आँखों का दीदार असंभव है, उन्होंने नकाब पहनने का फतवा जो जारी कर दिया है। {अंकल सैम तुम्हारी कार गुजारियाँ} रंजीत कोई डिप्लोमेट तो नहीं थी, मगर इतना अवश्य जानती थीं, रूसी, ईरानी, अमेरिकी, पाकिस्तानियों ने मिलकर उसका देश उजाड़ दिया।{ जैसे ही वह काबुल में घुसे वह बंदर बन गए} साथ ही, ‘आधा पाकिस्तानी’ और ‘कहाँ गए वो लोग’ जैसी रचनाएँ आधुनिक भारत के विस्थापन और पहचान के संकट को उजागर करती हैं .आधा पाकिस्तानी प्रसंग में एक सरहद पार के भूगोल ने किस तरह तीन पीढ़ियों के जीवन को बदल दिया, इसका अत्यंत करुण चित्रण मिलता है। — जहाँ सरहदें न केवल भौगोलिक, बल्कि दिलों के बीच भी खिंचती जाती हैं। आज जब पहलगाम में निरीह लोगों पर गोलियां बरसाकर दिलों में नफरतों को पुख्ता करने की साजिश गढ़ दी गयी है तो सोचिये अमन पर कितनी गहरी सेंध लगी है दिलों पर पहरें हैं और जुबाने खामोश हैं. बोल केवल वे ही रहे हैं जो नफरत फैलाने को पटकथा लिखते हैं। “रेडक्लिफ़ की खींची लकीर ने न केवल भूगोल बदला, बल्कि जीवन के अर्थ भी।”

वस्तुतः एक ऐसी रचना-संरचना है, जो जीवन के बहुविध स्वादों को सहेजते हुए प्रेम, वियोग, अस्मिता, विस्थापन, संघर्ष और स्मृति की अनगिनत परतों को अद्भुत आत्मीयता के साथ उघाड़ती है। यह कृति केवल एक स्मृति-प्रवाह नहीं, बल्कि आधुनिक अस्तित्व की जटिलताओं का एक गहन साहित्यिक आख्यान है।

संग्रह का भाव-संकेत कभी-कभी आधुनिक बोध और अतीत की स्मृति के बीच झूलता हुआ प्रतीत होता है। जैसे ‘पैराडाइज़ कहीं खो गय’, ‘ग्लोबल वार्मिंग की तरह बढ़ता स्ट्रेस’, ‘कॉन्डोम, व्हिस्की और आज़ादी का समय’— ये प्रसंग आधुनिक सभ्यता के विघटनशील यथार्थ को भी बड़े सूक्ष्म ढंग से चित्रित करते हैं। लेखक ने जीवन के साधारण प्रतीत होने वाले प्रसंगों में जो असाधारण सौंदर्य खोजा है, वही इस रचना को विशिष्ट बनाता है। जैसे ‘हिमाचली मोरनी’ की लोककथा में छुपी विरह व्यथा हो या ‘कलकत्ता जाने से इंकार करती दुल्हन’ की सरल विद्रोहिणी – हर प्रसंग में जीवन अपनी सहज, किन्तु मार्मिक लय में बहता है।”पैराडाइज़ कहीं खो गया” प्रसंग में जब लेखक शिलांग के बरसते सन्नाटे में खो जाता है, तो वह केवल किसी एक व्यक्ति का गुम होना नहीं, बल्कि आधुनिकता में जकड़ी संवेदनशील आत्मा का भटकना है। कृतियों में प्रेम एक स्थायी सुर है, किन्तु वह अक्सर अपूर्णता और बिछोह की धुन में बजता है।

‘जंगल, इश्क़ और आज़ादी’ तथा ‘तुम्हारे जाने के बाद’ जैसी रचनाएँ बताती हैं कि प्रेम कभी-कभी स्वीकृति से अधिक स्मृति का सौगात बन कर रह जाता है।

इसी तरह ‘कहाँ गए वो लोग’ में ओम पुरी का उल्लेख करते हुए विस्मृत हो रही सांस्कृतिक स्मृतियों पर चिंता प्रकट की गई है।रचनाएँ प्रश्न करती हैं —क्या वैश्विक बाज़ारवाद की चकाचौंध में व्यक्ति अपनी जड़ों से कटता जा रहा है?, क्या विस्थापन अब केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आंतरिक भी हो चला है?

भाषा संवेदनात्मक सौष्ठव से संपन्न है। उसका प्रवाह सहज है, परंतु जब-तब उसमें गहन काव्यमयता उभर आती है। उदाहरणतः—
“जैसे धरती बारिश को अपने भीतर सब्ज कर लेती है, वैसे ही मैं तुम्हें अपने भीतर समेट लेना चाहती हूँ।” यहाँ बिंब-सृजन की क्षमता अत्यंत प्रभावशाली है।

लेखक ने पारंपरिक कथा-संरचना से हटकर आंतरिक एकालाप और स्मृतियों की फाँकों को कथा-विन्यास का आधार बनाया है। यहाँ कथानक कोई एक रेखीय प्रगति नहीं करता, अपितु क्षणों, स्मृतियों, और मनःस्थितियों के टुकड़ों से एक जीवंत कोलाज रचा गया है।

संवेदनात्मक गहराई के साथ-साथ रचनाओं में दार्शनिक प्रश्नाकुलता भी विद्यमान है, विशेषकर ‘पहाड़ पूछता है अपने रंग के बाबत’, ‘जैसे अलभोर ने रचा उजाला’ जैसी रचनाओं में, जहाँ रचनाकार प्रकृति और जीवन के अस्तित्वगत मर्म तक पहुँचने का प्रयास करती है। साथ ही मानो कोई पुरानी सहेली जीवन के पन्नों से बात कर रही हो, में आत्मीय संवाद शैली, प्रेम केवल मिलन नहीं, स्मृति और स्वीकृति का भी नाम है में प्रेम को पुनर्परिभाषित किया गया है ,भूमंडलीकरण, विस्थापन, एकाकीपन की नई विडंबनाएँबी समसामयिक यथार्थ का चित्रण करती हैं ,यहाँ पहाड़, नदी, जंगल, धूप — सब जीवित पात्र की भाँति उपस्थित हैं।

कई स्थलों पर रचनाकार ने आंतरिक एकालाप (Stream of Consciousness) शैली का अत्यंत सटीक प्रयोग किया है, जिससे पात्रों के मर्म और द्वंद्व बिना आडंबर के प्रकट होते हैं। उदाहरण के लिए, “डॉन्ट वरी, तुम्हें अकेले रहने की आदत हो जाएगी” में एक प्रेम की क्षय प्रक्रिया को जिस सहज, अव्यक्त करुणा के साथ रेखांकित किया गया है, वह अद्वितीय है।

हालाँकि संकलन में स्मृति और भावुकता का प्रवाह अत्यंत स्वाभाविक है, कुछ स्थलों पर भावावेश इतना घनीभूत हो जाता है कि विचार की स्पष्टता धुँधली पड़ने लगती है। साथ ही, शिल्प की अत्यधिक बिखरी हुई शैली कुछ पाठकों के लिए प्रारंभ में चुनौतीपूर्ण हो सकती है, यद्यपि यह बिखराव स्वयं जीवन की बिखरी हुई अनुभूतियों का प्रतिबिंब है।

इस संकलन की भाषा संवेदनशील और संयत है — एक ऐसी भाषा जो सीधे हृदय को संबोधित करती है। संवाद और विवरणों में काव्यमयता की सहज उपस्थिति है, किन्तु वह कहीं भी शाब्दिक चमत्कार के बोझ तले नहीं आती।
उदाहरणार्थ, “जब तुम नहीं हो, तो मेरे भीतर का सन्नाटा भी मुझ पर हावी हो जाता है” — यह वाक्य मात्र एक भाव नहीं, अस्तित्वगत अकेलेपन की सघन अभिव्यक्ति है।

रचना में हिन्दी के साथ उर्दू और अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग भी देखा जा सकता है, जो आधुनिक जीवन की मिश्रित सांस्कृतिक बनावट को अत्यंत स्वाभाविक ढंग से चित्रित करता है। इस संकलन का शिल्प पारंपरिक रेखीय कथा-संरचना को अस्वीकार कर, स्मृति-आवर्तन और भाव-क्षणों की विखंडित श्रृंखला के रूप में सामने आता है। यहाँ कोई निश्चित प्रारंभ या अंत नहीं है, वरन् प्रत्येक कथा एक स्नैपशॉट है — एक क्षण विशेष की अनुभूति का सजीव चित्र

इसके बावजूद, यह संग्रह समकालीन हिन्दी गद्य को न केवल एक नई आत्मीयता प्रदान करता है, अपितु जीवन के गहरे अनुभवों को सौंदर्यबोध और सहानुभूति के साथ अंकित करता है।मेरी नजर में यह एक ऐसी कृति है जो स्मृति, प्रेम, वियोग और समय के बहुआयामी अनुभवों को सजीवता और संवेग के साथ रचती है। यह संग्रह हिन्दी साहित्य में उन दुर्लभ कृतियों में सम्मिलित किया जा सकता है जो मनुष्य के भीतर पलती चुप्पियों, आकांक्षाओं और असफलताओं को अत्यंत स्वाभाविक एवं आत्मीय स्वरूप में अभिव्यक्त करती हैं।

यह रचना निःसंदेह आज के समय में एक गहन, प्रामाणिक और कलात्मक उपस्थिति है।

 

पुस्तक: तुम ज़िन्दगी का नमक हो (लप्रेक)

प्रकाशक: पुस्तकनामा

मूल्य: रुपये 108 (पेपरबैक)


 

समीक्षक प्रोफेसर कल्पना पंत
अध्ययन- नैनीताल
अध्यापन- वनस्थली विद्यापीठ राजस्थान में प्रवक्ता हिन्दी के पद पर एक वर्ष कार्य तदनन्तर लोक सेवा आयोग राजस्थान से चयनित होकर राजकीय महाविद्यालय धौलपुर तथा राजकीय कला महाविद्यालय अलवर में तीन वर्ष और 1999 में लोकसेवा आयोग उ० प्र० द्वारा चयन के उपरान्त बागेश्वर एवं गोपेश्वर के रा० म० में रा० स्ना० म० ऋषिकेश में अध्यापन कर चुकी हैं वर्त्तमान में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय (टिहरी गढ़वाल) पी एल एम एस ऋषिकेश परिसर में हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैंI
प्रशासन- इसके पूर्व, वे राजकीय महाविद्यालय, थत्यूड़ (टिहरी गढ़वाल) की प्राचार्य रह चुकी हैं।

वर्तमान में और विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र की निदेशक एवं मातृभाषा प्रकोष्ठ तथा सह पाठ्यक्रम की समन्वयक के रूप में कार्य कर रही हैं। साथ ही वे विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की उपाध्यक्ष भी हैं I

राष्ट्रीय स्तर पर वे भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) में यू.जी.सी. मास्टर ट्रेनर हैं। लेखन- डॉ. पंत की साहित्यिक और शोध संबंधी रुचि उल्लेखनीय रही है। उन्होंने ‘कुमाऊँ के ग्राम नाम – आधार, संरचना एवं भौगोलिक वितरण’ (शोध एवं विमर्श हेतु प्रसिद्ध) तथा ‘मिट्टी का दुःख’ (कविता संग्रह) जैसी चर्चित पुस्तकें लिखी हैं। इसके अलावा, विभिन्न महत्वपूर्ण शोध जर्नलों, साझा संग्रहों, पत्र-पत्रिकाओं, वेबसाइट्स और ब्लॉग्स में नियमित रूप से उनके शोधपत्र अनुवाद एवं रचनाएँ कविताएँ, लेख, समीक्षाएँ, यात्रवृतांत एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक व शोध उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘निराला स्मृति सम्मान’ और ‘साउथ एशिया वीमेन अचीवर्स अवार्ड ‘2023 इत्यादि से सम्मानित किया जा चुका है। वे साहित्य और विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए ‘दृष्टि’ और ‘मन बंजारा’ नामक ब्लॉग्स के साथ-साथ ‘साहित्य यात्रा’ यूट्यूब चैनल का भी संचालन करती हैं। वे कविता कारवां ऋषिकेश की संस्थापक भी हैं। उनकी दो पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन हैं।

सम्पर्क: 8279798510
ईमेल: kalpanapnt@gmail.com

 

 

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