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स्मिता सिन्हा के कविता संग्रह ‘रूंधे कंठ की अभ्यर्थना’ की पुस्तक समीक्षा

जावेद आलम ख़ान


छलकती पीड़ा को रोककर बेआवाज़ प्रार्थना है ‘रूंधे कंठ की अभ्यर्थना’। स्मिता सिन्हा का यह संग्रह अपने नाम को सार्थक करता है।
इस संग्रह से गुजरना भावों के निरंतर प्रवाह का दृष्टा होना है। किताब के पन्नों पर विभिन्न भाव आपकी आँखों के ठीक नीचे अठखेलियाँ कर रहे होते हैं।
उनकी कविताओं में यथार्थ सपने हैं, अपनी चाँदनी में पिघलते चाँद सी प्रतीक्षारत प्रेमिका के सूक्ष्म चित्र हैं, जागरूक स्त्री का शिकायती तेवर है, कामकाज वाली घरेलू स्त्री के समझौते के संकेत हैं, प्रेम के सहज आकर्षण में बंधकर प्रेमियों के धोखे से काठ हुई नायिकाएँ हैं। अपनों के द्वारा यौन हिंसा की शिकार हुई अनगिनत अनाम लड़कियों की आवाज़ें हैं जिनका बचपन, खिलंदड़पन, चंचलता छिन गई। वे मासूम सपने हैं जिन पर कालिख पोत दी गई। प्रत्येक कविता एकाधिक बार पढ़े जाने की मांग करती है। पढ़ने के बाद भी इनका असर देर तक बना रहता है।

इन कविताओं में तीखी व्यंजना है। भटकन कविता गहन भावबोध की कविता है। मनुष्यता का ऐसा सहज संकेत कम कविताओं में मिलता है। स्मिता कहती हैं कि जैव विविधता नष्ट करने वाले शिकारियों को भी पेड़ लगाकर जंगल बढ़ाने की ज़रूरत है। यहाँ बड़ी शालीनता से लेखिका पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा सांकेतिक रूप में उठाती हैं।
बेशक अधिकांश कविताएँ स्त्री विमर्श की हैं लेकिन लाउड नहीं हैं।लेखिका उन स्त्रियों की आवाज़ बनती है जो मुख्य कर्ता होकर भी ख़ुद को नींव का पत्थर बनाए रखना चाहती हैं।
मैं चाहती हूँ
कोई तो लिखे उन स्त्रियों पर
जिनका सिर है कि पत्थर हुआ जाता है
मैं चाहती हूँ
कोई तो लिखे उन स्त्रियों पर
जो अपनी ही प्रार्थनाओं में अक्सर
खुद को सबसे पीछे छिपा आती हैं।

कितनी सहजता से कवि आलंबन का महत्व कविता में यह कहकर बता जाती है कि “तुम्हारा होना जरूरी है /कि मैं अकेले नहीं रच सकती/प्रेम कविताएं।” यह वह प्रेमिका जो अपने हिस्से के प्रेम और सम्मान के लिए पूरा शिकायत पत्र रखती है।अनकही पीड़ा को कविता का माध्यम बनाती है लेकिन स्वीकार भी करती है कि प्रिय के बिना यह कविताएं भी संभव नहीं।

एक स्त्री की उपस्थिति महज घर में नहीं होती उस घर से जुड़े जीवन के प्रत्येक कार्य व्यापार में होती है। इन कार्य व्यापारों में उलझकर वह अपनी पहचान ही भूल जाती है। यहाँ तक कि उसकी नींद भी अपनी नहीं होती। ‘अनुपस्थिति’ कविता में स्मिता इस ओर संकेत करके स्त्री की सहज इच्छा को प्रकट करती हैं कि इन सबसे बेख़बर होकर अपनी नींद में सोती रहे।

यह कविताएँ स्त्री विमर्श को बेहद शालीनता से रखती हैं। इनका प्रतिरोध पुरुष प्रतिगामी नहीं है। चीख पुकार, नारेबाज़ी से इतर आम स्त्री की जीवनचर्या को सामने रखकर असमानताओं को स्पष्ट करती हैं जिनकी ओर अमूमन ध्यान नहीं जाता।

स्मिता जब कहती हैं ‘ कि मैं नहीं चाहती /कोई भी एक वजह/जिससे रुक जाए/तुम्हारी आंखों में बहता ख्वाब/टूट जाए/तुम्हारे हिस्से की नींद।’

तब वे यह भी कहना चाहती हैं कि एक स्त्री की नींद भी उतनी ही ज़रूरी है। कहन का यह ढंग शानदार है।

एक छत के नीचे एक साथ रहने वालों का आपस में बात न करना कितना कष्टकर हो सकता है विशेष रूप से एक गृहिणी के लिए इसका संकेत स्मिता ‘बेख़याली का आलाप’ कविता में देती हैं। यह ‘एकांत में शोर’ और ‘भीड़ में चुप्पी’ जैसी स्थिति होती है जहाँ सारे प्रश्नोत्तर ख़ुद में ही होते हैं।
‘तरेरती हुई आँखें’ महत्वपूर्ण कविता है। स्त्री का शोषण केवल पुरुष नहीं करते स्त्रियाँ भी करती हैं। वे स्त्रियाँ जो स्वयं भी शोषित रहीं हैं।यह व्यापक विमर्श की कविता है। शोषण का चक्र ऐसा ही है। यह समाज की कंडीशनिंग है या मनुष्य का मूल स्वभाव कि दुनिया के हर हिस्से में चाहे जाति के नाम पर, अल्पसंख्यक के नाम पर या लिंग और नस्ल के नाम पर शोषण झेलने वाले स्थिति बदलने पर शोषक के रूप में बदल जाते हैं। चेतन स्त्री का एक दुख यह भी है – ‘ अब संभव नहीं कि/औरतें लिखें खुद के ही विरुद्ध/कि यहां वे ही शोषक हैं/शोषित भी वे ….’

स्त्रियों के दुख पर ईश्वर को बेबस देखती हैं स्मिता। उनकी अधूरी प्रार्थनाओं पर मौन रह जाता है ईश्वर। दरअसल सामाजिक विषमता हमेशा से ही धर्म और ईश्वर की आड़ में छिपती रही हैं।
इस संग्रह के पूर्वार्ध में घरेलू स्त्री के मनोभावों को अभिव्यक्ति मिली है वहीं उत्तरार्ध में स्त्री अस्मिता के विविध पक्षों, शोषण के अलग अलग तरीकों के साथ विभिन्न अस्मितावाद विमर्शों को उठाया गया है। यहाँ रोहित वेमुला के साथ हुई ज़्यादती का प्रतिकार है, युद्धों का शिकार हुई दुनिया भर की स्त्रियों की रक्तरंजित छवियाँ हैं, घड़े का पानी भर पीने से शिकार हुआ दलित बच्चा है और हैं देश के अल्पसंख्यक जिनकी ज़िन्दगी की कोई कीमत नहीं।

इस संग्रह में स्त्री की तमाम शिकायतें, समझौते, दुश्वारियाँ, कुर्बानियाँ हैं बावजूद इसके उम्मीद का दामन स्मिता कभी नहीं छोड़तीं। उनकी कविताओं में कहीं पर भी पलायनवादी स्त्री का चित्रण नहीं है। वे विदा को दुनिया का सबसे उदास शब्द मानती है। वह सभी स्थितियों से टकराने के लिए कहीं संघर्षरत है, कहीं ख़ुद को तैयार कर रही है और कहीं परिवार चलाने के लिए बदलाव की कोशिश भी कर रही है।
यह स्त्री मुखर है लेकिन सलीकेदार है। उसके शब्द किसी को क्रोधित नहीं करते, स्थितियों पर विचार करने के लिए विवश करते हैं।
पेड़, पहाड़, बसंत, झरने, नदी, सागर आदि प्रकृति के विभिन्न उपादान इन कविताओं के आवश्यक तत्व हैं। प्रकृति ने इन कविताओं को गहराई दी है। उन्होंने छूटते हुए क्षणों, राख से उठते स्वरों, भीतर के दुखों और अवचेतन के भय को मूर्त रूप प्रदान किया है।

स्मिता के पास अलग अलग स्थितियों के लिए समृद्ध भाषा है।उनके शब्दकोश में तत्सम, देशज,उर्दू और कुछ बांग्ला शब्द भी हैं। यह उनकी सफलता है कि शब्दों का प्रयोग उन्होंने सावधानी से किया है। इन कविताओं में प्रवाह है, कुछ अनूठे और ताज़े बिंब हैं, कहीं फंतासी भी है।

शैली पर छायावाद का असर है। प्रकृति चित्रण, व्यक्तिवाद आदि छायावादी प्रवृत्तियाँ स्मिता में भी दिखाई देती हैं लेकिन स्मिता की कविताएँ अपने समकालीन संदर्भों से जुड़ी हुई हैं।

 

पुस्तक : रूंधे कंठ की अभ्यर्थना
कवयित्री: स्मिता सिन्हा 
प्रकाशक:  सेतु प्रकाशन
मूल्य 250

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