समकालीन जनमत
पुस्तक

‘काँस के फूलों ने कहा, जोहार !’: देशज सौंदर्य और स्त्री चेतना के विविध स्वर

डॉ. जिन्दर सिंह मुंडा


‘काँस के फूलों ने कहा, जोहार !’ डॉ प्रज्ञा गुप्ता का पहला काव्य- संग्रह है । सद्य: प्रकाशित इस काव्य- संग्रह में कुल 81 कविताएँ संकलित हैं जिसमें 76 हिंदी एवं 5 नागपुरी की कविताएँ हैं ।

‘काँस के फूलों ने कहा, जोहार!’ कविता- संग्रह देशज सौंदर्य और स्त्री चेतना के विविध स्वरों का बेजोड़ उदाहरण है। धरती पर काँस के श्वेत पुष्प आने का सूचक है-वर्षा ऋतु की विदाई अर्थात् परिवर्तन की आहट। इस बदलाव के विविध स्वर हैं, जिनको जोहार है। मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंध और गौरवबोध का प्रतीक है जोहार, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता बोध कराने वाला ‘जोहार’ शब्द एक पारंपरिक अभिवादन है जो सर्वमंगल मांगल्ये को चरितार्थ करता है।

प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में एक ओर देशज सौंदर्य के बहाने मनुष्यता, परिवार, समाज, पशु -पक्षी ,लोक एवं प्रकृति के विविध आयामों का व्यापक चित्रण है वही स्त्री चेतना एवं सौंदर्य के विविध स्वर भी बेहद संवेदनशीलता के साथ मौजूद हैं। स्त्री और प्रकृति की सहज स्वाभाविक विशेषता है- सहनशीलता, सृजनशीलता और लचीलापन। प्रज्ञा की कविताओं में रचनात्मकता और सौंदर्य का अनूठा मिश्रण है। सूरज के स्वागत के लिए उनके यहाँ काँस के फूल सजे हुए हैं-
“कांस के फूलों ने
सूरज को जोहार कहा
आसमान को चरका बनाने के लिए
सूरज के स्वागत में
वे धन खेतों के मेड़ पर
सड़क के किनारे
खूब रीझ लहराते हुए”।(कांस के फूलों ने..)

प्रकृति चित्रण के बहाने उनकी कविताएँ संपूर्ण लोक का परिभ्रमण करती हैं। षड्ऋतु वर्णन के जरिए सावन, भादो ,कार्तिक, फाल्गुन माह की प्राकृतिक छवियाँ उनकी कविताओं में जीवंत होकर आते हैं। कृषक विमर्श के आईने में भादो, कार्तिक और फागुन की कविताएँ उल्लेखनीय हैं। भादो कविता में-

“किसान ने
धन खेतों के
मेड़ खोले
और बारिश को जोहार किया।“
कार्तिक कविता में
“धान के पौधों ने
किसान को शुक्रिया कहा
उन्हें हर बरस
नोगजाने के लिए”
फाल्गुन में किसान-
“गेहूँ की पकी अधपकी बालियां- संग
उमंग और उछाह से सराबोर
मेड़ पर खड़ा किसान”।

इन तीनों कविताओं में मनुष्य (किसान) और प्रकृति (फसल) का अनोन्याश्रय संबंध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के पूरक हैं। किसान और प्रकृति का अंत: संबंध अत्यंत गहरा, परस्पर आदान-प्रदान, सह अस्तित्व और समभाव का है। कवयित्री का जीवन- संसार कृषक जीवन से जुड़ा है। अतः उनकी स्मृतियों में खेत, खलिहान, बैल, पगडंडी, नदियाँ, अनाज, पशु- पक्षियाँ आदि सभी शामिल हैं। इनकी कविताएँ लोक की आस्था- अनास्था, वेदना और संवेदनाओं को संजोकर समूह गान के रूप में प्रस्तुत हैं।

पर्यावरणीय संरक्षण एवं प्राकृतिक हरीतिमा की दृष्टि से भी प्रज्ञा की कविताओं की जड़ें जमीन से जुड़ी हैं। ‘पर्यावरण’ कविता के जरिए कवयित्री उन स्मृतियों में खो जाती है जहाँ जीवन की हरियाली अपने ऊर्वर और नवीनीकरण के रूप में जुड़ी थी। आज का वर्तमान क्या होगा ?यह बड़ा सवाल है न सिर्फ कवयित्री के लिए वरन् संपूर्ण मानव और प्राणिमात्र के लिए। यह समय पर्यावरण संकट का है। ‘पर्यावरण’ कविता हमें उस संकट का आभास कराती हैं जिस दंश को संपूर्ण विश्व झेल रहा है –
“मेरी स्मृतियों में है
कुछ फुर्सत के क्षण
उसमें बड़ा सा आंगन
आंगन में गैय्या
दूध पीता बछड़ा
नीम का बड़ा सा पेड़
पेड़ की छाँव
छाँव में कित-कित खेलते हम
सोचती हूँ मेरे बच्चों की
स्मृतियों में क्या होगा?

यह बड़ा प्रश्न है जो दिनों-दिन गहराता जा रहा है।
इस संग्रह में अधिकांश कविताएँ स्त्री पक्ष को मजबूती के साथ आकार देती हैं ,परंतु ये संपूर्ण मानवता की भी उद्घोषक हैं ।समय, समाज और संस्कृति के संदर्भ में आज का मनुष्य कहाँ तक गिर चुका है ? इसका कोई मापक नहीं है , गिरने का क्रम अब भी जारी है। समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, यदि इसकी सही पहचान न हो तो यह बेहद खतरनाक होता है ।कविता ‘यह कौन सा समय है

‘हमें सोचने को विवश करती है –
“यह कौन सा समय है ?
कि अब कौवा कौवा नहीं रहा /
न ही गिद्ध गिद्ध
जबकि मनुष्य को मनुष्य होना
बाकी था अभी”।

आज का भौतिकवादी मनुष्य तीनों लोक पर विजय प्राप्त कर चुका है । विज्ञान के बल पर उसने हर तकनीकी पहलुओं पर विजय पायी है लेकिन मानवता पर संकट कायम है।

मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसने सब कुछ पाकर स्वयं को खो दिया है। ऐसे में अपने दौर के किसी शायर ने खूब कहा है- आदमी को मय्यसर नहीं इंसां होना।“ प्रज्ञा की कविताएँ इसी इंसां होने की बात करती है। हमारी विरासत भारत के महानगरों में नहीं बल्कि सुदूर गाँव में ,अपनी मौलिकता में अक्षुण्ण है। महानगरीय सभ्यता के बरअक्स ग्रामीण जीवन की सरलता, सहजता, निष्कपटता, सहजीविता, सामुदायिकता आदि भारतीय संस्कृति के मूलाधार हैं।

प्रज्ञा की कई कविताएँ अपने मूल जीवन की तलाश में हैं ।भारत माता ग्रामवासिनी जो पंत की प्रमुख कविता है। जिसमें ग्रामीण जीवन की सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू है । वहाँ से अब तक देश के गाँव बदलावों के कई दौर से गुजरे हैं। शहरीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में गाँव उजड़ रहे हैं और नगरों का निर्माण हो रहा है। कवयित्री गाँव का स्मरण करती है जहाँ बूढ़े बरगद की छाँव थी-
“तब घर की चहारदीवारी
सीमेंट और ईंट की मजबूती से
नहीं बनीं थी
बल्कि पुटुस की झाड़ी से
भाईचारे की तार से जुड़ी थी
आजाद की अम्मा
पूरे गाँव की दर्जी फूफी थी
यह वह गाँव तो नहीं
जो तुम्हारा है”।(ये वो गाँव तो नहीं)

सचमुच इस कविता में एक टीस है ,एक आत्मिक पीड़ा का एहसास कराती है कविता जिसका जन्म ग्राम्य संस्कृति के क्षरण से हुआ है। अब वह गाँव नहीं रहा, न वहाँ रहने वाले लोग ।जहाँ ईद की सैवईयां और दीवाली की मिठाईयां साथ-साथ खाया करते थे। धार्मिक ,सामाजिक एवं सांस्कृतिक समभाव अब पारिभाषिक शब्द मात्र बनकर रह गये हैं। कवयित्री के रचना- संसार में जीवन की व्यापकता सर्वत्र है। परिवार ,समाज एवं राष्ट्र उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भी हैं। मनुष्य के जीवन में परिवार का विशेष महत्व है ।

भारतीय समाज के निर्माण में परिवार के सभी सदस्यों की सहभागिता स्वयं सिद्ध है। उनकी कविताओं में पारिवारिक रिश्तों के रंग बेहद सुन्दर सहज चित्रित हैं। जीवन की सहजता एवं संवेदनात्मक गहराई इन कविताओं का वैशिष्ट्य है। इनकी कविताओं में परिवार के तमाम रिश्ते -नाते हैं यथा -माँ, पिता, आजी, भाई -बहन, बेटा -बेटी, भौजी, सखियाँ, संगी, दादा, सहिया आदि से भरा-पूरा संसार है। परिवार की मूल संरचना माता-पिता पर टिकी होती है। हमारे जीवन में इनका महत्व अनमोल है। हमारे जीवन के तमाम संस्कार और अनुशासन माता-पिता के कर्मों का फल होता है। यह एक सतत प्रक्रिया की ओर अग्रसर होने का सूचक भी होता है। कवयित्री की दो कविताएँ माँ और पिता इस संदर्भ में वरेण्य है । खासकर ‘माँ’ कविता हमें ब्रह्मांड से जोड़ती है –
ब्रह्मांड से हमें
जोड़ती
आकाश -गंगा सी
हमारी माँ
हमारे लिए ही
संजोती रहीं
अमृत की एक-एक बूंद
उन्हीं की आत्मा की
उजास
भरती रही हममें
दूधिया इंजोर।“
पिता –
“माँ से है पिता का
जीवन व्यवस्थित
और पिता है तो
घर है अनुशासित।“

हमारे जीवन में माता-पिता के बाद भाई -बहनों का विशेष प्रभाव और सहयोग रहता है, लेकिन कब तक?कवयित्री का जीवन इससे अलग नहीं है। प्रज्ञा के शब्दों में भाई कविता-
“ वे कब तक हमारे साथ होते
एक दिन हमें अलग होना था
राह में अकेले आगे बढ़ते देख
हाथ हिलाकर उन्होंने
हमें कभी विदा नहीं किया
उनकी अधूरी रुलाई की हूक
अब तक हमारा पीछा कर रही है।“
बहनें कविता में –
“जीवन की अनवरत यात्रा में
बहनें नदी -सी मिली
जब तक हम ओझल न हुए
वे हाथ हिलाते रहीं।“

इन दोनों कविताओं में जीवन का अधूरापन है। जीवन के सफर में एक निश्चित दूरी तक ही साथ चलने का सुख है और आगे का सफर रिश्तों की गहरी गांठ और विश्वास की महीन डोर पर ही टिका है। कवयित्री को इसका पूरा अनुभव है और इसी पूंजी के सहारे वह अपनी परंपरा का निर्वहन कर रही हैं । एक ओर कवयित्री माँ पर कविताएँ लिख रही हैं ;वहीं दूसरी ओर वह खुद माँ है ।अतः बेटी पर भी उनकी कविताएँ हैं-
“मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूं
छह बरस की मेरी बेटी कहती है
कि क से कबूतर नहीं कल्पना होता है
वह कहती है त से तरबूज नहीं तमीज होता है
ब से बकरी नहीं बहादुर होता है
म से मछली नहीं मजबूत होता है
सोचती हूँ मैं कि
अपनी ढलती उम्र तक पहुंचते- पहुंचते
क्या मेरी बेटी को ये ककहरा याद रहेगा?”

ये प्रश्न समीचीन और सार्वभौमिक है। एक ओर कवयित्री के लिए माँ ब्राह्मांड से जोड़ने वाली है; वहीं दूसरी ओर बेटी दोस्त है, जिससे वह ककहरा सीख रही है। ककहरा कोई पारंपरिक पाठ्यक्रम के शब्दाक्षर नहीं है वरन यह वास्तविक जीवन के वो अकाट्य सत्य हैं जो आज के परिप्रेक्ष्य में बेहद महत्वपूर्ण है। कवयित्री के लिए परिवार के सभी सदस्य अहम हैं। वर्तमान में बेटी और भूत की आजी दोनों ही उनके लिए जीवन -सौंदर्य को विकसित करती हैं। ‘आजी ‘ पर उनकी कविता द्रष्टव्य है-“
जाने कौन देस होंगी
हमारी आजी
पूरना लुगा से
लेंदरा बैठाती
गेंदरा कांथती
कहीं संजोती होगी चेंथरा”।

पुरातन से नवीनतम की यात्रा में उनकी कविताएँ बारंबार संजोने ,सहेजने एवं तराशने की चेष्टा में लगातार संघर्ष करती हैं ।इस अनवरत संघर्ष- यात्रा में उनकी सहयोगी बड़की भौजी और सखियाँ भी शामिल हैं । ‘बड़की भौजी’ कविता के ज़रिए उनका काव्य सौंदर्य निखरा है
“जब हँसती थी बड़की भौजी
चारों तरफ खिल जाते थे जटंगी के फूल
गीत गाती थी
जब बड़की भौजी
हवा और चंचल हो उठती
भैया के जाने के बाद
मुरझा गई है
कंदरी के फूल जैसी”।

‘बड़की भौजी’ कविता जीवन की उस सच्चाई का यथार्थ- बोध कराती है ,जो हमारे जीवन के लिए सबक और सबब दोनों हैं।
मैं होना चाहती हूँ कविता में स्त्री जिजीविषा इस रूप में उभरती है
“मैं होना चाहती हूं
अनंत यात्रा रत पाँव
नीम की ठंडी छाँव
जाड़े की गुनगुनी धूप
अमराई में कोयल की कूक”।

इन पंक्तियों में कवयित्री प्रकृति की तरह स्त्रीत्व के उन बिंदुओं को रेखांकित करने का प्रयास करती हैं जिसमें त्याग ,समर्पण और परोपकार का भाव छिपा है । प्रज्ञा की कविताओं में मौजूद स्त्री के कई रूप सामने आते हैं। ये स्त्रियाँ जीवन से जद्दोजहद कर रहीं हैं। उनके कुछ सपने हैं और उसमें पूरा लोक व्याप्त है। ‘लड़की की आंखों में’ कविता के कुछ अंश-
“लड़की की आंखों में सपना
कि जैसे खिलती हुई कली
कलाबाजी दिखाती हुई चिड़ियाँ
आकाश की ऊंचाई में
लहलहाती नीम की डाली
लड़की की आँखों में
बहुत कुछ!
आँखों में पानी
पानी में तिनका
तिनके में बसी एक दुनिया।“

हमारी जठर सामाजिक संरचना और पितृसत्ता से जड़ित तमाम हथकंड़ों को प्रज्ञा की कविताएँ तोड़ना चाहती हैं। उनकी कविताएँ स्वतंत्रता , स्वच्छंदता से अपनी एक अलग दुनिया बसाना चाहती हैं। सामाजिक संरचना ,लैंगिक भेदभाव के मध्य समय और समाज के दो पाटों में पिस रही स्त्री को भी उनकी कविताएँ बखूबी पहचानती हैं।अपनी अस्मिता को लेकर संघर्ष करती उनकी कविताएँ समय को लेकर काफी गंभीर हैं। ‘समय के साथ दौड़ती स्त्री’ कविता में स्त्री अस्मिता पर बहस करती ये पंक्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण है –
“सुबह के समय
उसके नसीब में नहीं है अखबार
उसके हिस्से में है- दाल, रोटी सब्जी
समय पर करना तैयार
और आधी नींद में
अपने समय के साथ दौड़ती है स्त्री”।

लैंगिक भेदभाव और पुरुष सत्ता के खिलाफ ये पंक्तियाँ बेहद ही संवेदनशील तरीके से उस व्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करती हैं। उनकी कविताएँ आगे चलकर और मजबूती के साथ अपनी बात बेबाकी से रखती हैं । ये उनकी सृजनात्मक अनुभव के साथ समृद्ध होती रहती हैं।

प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ एक तरफ लोक का आस्वाद चखाती हैं तो दूसरी तरफ स्त्री चेतना एवं स्त्री अस्मिता के विविध स्वरों को अपनी जिजीविषा के साथ प्रकट करती हैं। स्त्री चेतना के ये विविध स्वर जीवन की यथार्थता ,संयोग- वियोग, सम -विषम ,सुंदर -कुरूप , खट्टे- मीठे, आरोह -अवरोह, क्लिष्ट -भदेस एवं भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों परिस्थितियों में अपनी रचनाधर्मिता के साथ उपस्थित हैं ।

स्त्री लेखन का वर्तमान संदर्भ स्त्री अनुभव, स्त्री संवेदना, स्त्री अस्मिता एवं स्त्री दृष्टि, स्त्री रचनाशीलता के लिए महत्वपूर्ण बिंदु हैं ।एक कवयित्री के रूप में प्रज्ञा ने स्त्री स्वर के नए प्रतिमानों को गढ़ने के साथ स्त्री अस्मिता के विविध आयामों को भी छुआ है। प्रज्ञा की कविताएँ उस स्त्री का प्रतिरूप हैं जिसकी अभिलाषा अनंत नहीं, बल्कि छोटी सी है। वह स्त्री अनंत जिजीविषा से भरी हैं और बार-बार अपने जीवन- संघर्षों में अपनी जीवटता का प्रमाण भी देती है:
मन करता है
सहजन का पेड़ हो जाऊं
कोई धड़ से भी काट दे
तो फिर से उग आये कोंपलें”।( जिजीविषा)

स्त्री और प्रकृति के ये रूप सृजनात्मकता की गहरी और अविभाज्य अवधारणा है। इसी अवधारणा में जीवन की प्रतिकूलताओं के मध्य सृजन और पोषण निहित है। कवयित्री के शब्दों में उसकी अभिलाषा बस इतनी सी है कि वह अपनी शीतलता से जीवन में व्याप्त आग को राग में परिवर्तित कर सके ।

प्रज्ञा की कविताएँ स्त्री चेतना के स्वर को मजबूती प्रदान करती हैं। स्त्री -जीवन संघर्ष की उपज है, जो अनवरत स्त्री मुक्ति की राह तलाशते हुए पुरुष सत्ता के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती है। वह बेफिक्र होकर कहती है-
“मैं कोई कोहड़ा का फूल नहीं
कि तुम्हारे टेमाने से
गल जाऊंगी
मैं धरती की बेटी चहती ही रहूंगी”। (धरती की बेटी)

इसी कड़ी में आगे चलकर ‘सलीका’ एक महत्वपूर्ण कविता है जो पितृसत्ता के खिलाफ एक चुनौती के रूप में उपस्थित हैं।भारतीय पितृ सत्ता के हवाले से मातृ सत्ता का माखौल उड़ाना संस्कार बन चुका है । प्रस्तुत पंक्तियां स्त्री- पुरुष के दांपत्य जीवन एवं लिंग- भेद की दृष्टि से भी जोरदार बहस करती हैं-
“वे ताउम्र खाना पकाती रहीं
लेकिन नमक डालने का सलीका
उन्हें उम्र भर नहीं आया।“ (सलीका)

सलीका वह व्यंग्य है जिसका स्त्रियाँ जीवन पर्यन्त सामना करती हैं।
प्रज्ञा की प्रेम संबंधी कविताएँ भी अद्भुत हैं ।वे प्रेम में भी संघर्ष की बात करते हैं और वही संघर्षपूर्ण जीवन प्रेम को सही रूप में परिभाषित करता है ।उनके यहाँ प्रेम की अभिव्यक्ति इस रूप में निकलती है।
प्रेम से बंध कर
प्रेम में घुट कर
प्रेम से छूटकर
प्रेम में लुटकर
जीवन नहीं जिया तो क्या जिया?” (जीवन)।

उनकी कविताओं में सौंदर्य- चेतना के कई रंग उभरते हैं। प्रेम और सौंदर्य की कविताएँ उनके यहाँ बिल्कुल अलहदा रूप में हैं ।वे कविताओं में सौंदर्यमान के लिए पारंपरिक फैशन अथवा कृत्रिमता का प्रयोग नहीं करती, बल्कि उनकी कविताएँ एक अलग भावभूमि का निर्माण करती हैं। उनकी कविताओं में नैसर्गिक सौंदर्य का ऐसा भाव- संसार है- जहाँ शुद्धता है कृत्रिमता नहीं, अपनापन है अजनबीपन नहीं, जो प्रकृति की स्वच्छंद वातावरण में रचा- बसा है। प्रज्ञा की कविताओं में प्रेम और सौंदर्य की नई-नई अभिव्यक्तियाँ आई हैं या कहें इनका आँगन उन प्राकृतिक उपमानों से गमक उठा है। इन कविताओं में कवयित्री की गहन सौंदर्य -चेतना के दर्शन होते हैं।जब वो कहती हैं-
“नहीं होना मुझे गुलाब
मुझे तो थेथइर का फूल होना है”।

स्त्री चेतना के विविध स्वरों में उनकी कविताएँ विशेष रूप से कारूणिक चेतना का संचार करती हैं। खासकर आज की परिस्थितियों में स्त्रियाँ खबर बनकर कभी दीवारों पर तो कभी अखबारों की सुर्खियां बनती हैं; यह आज के समय की बड़ी विडंबना है –
“स्त्री की लाश पर
रोज एक खबर है
भय का कुहासा घना होता जाता है
भय का समंदर
जब दहाड़ें मारता है
कितनी मुश्किल से छिपाता है
एक पिता
आटो से कॉलेज भेजते हुए
बेटी को(रोज एक खबर)

कवयित्री ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया है वे महज़ संवेदना लोक का पता ही नहीं देती, बल्कि ये शब्द सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी मौजूद हैं । गंवई संस्कृति ,माटी की गंध, पेड़- पौधे , नदियाँ झरने, पहाड़, पर्वत, पशु -पक्षी एवं लोक जीवन का भरा -पूरा संसार उनकी कविताओं में आत्मा के रूप में विराजमान हैं । मिथकों ,जनश्रुतियों, लोक परंपराओं एवं लोक कथाओं के सवाल ये टूल्स की तरह नहीं हैं बल्कि ये उनकी काव्य- पक्षधरता की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं । अंचल की गंध अपने में समेटे मानव और मानवेत्तर प्राणियों के मूल्य एवं संवेदनाओं का चित्रण करती इनकी कविताएँ सहृदय पाठकों को अपने साथ जोड़ लेती हैं । मांय, माटी एवं मनुष्य की सर्वव्यापकता इस काव्य- संग्रह का मूल ध्येय है। इस संग्रह में अंतिम चार कविताएँ लोक भाषा नागपुरी में अंकित हैं जो इनकी लोकभाषा /मातृभाषा को उद्घाटित करती हैं। उनकी कविताओं में प्रेम और प्रकृति का अद्भुत मिश्रण है।

ये कविताएँ स्पंदित करती हैं और संवेदना से भी भर देती हैं । प्रस्तुत कविताएँ मानवीय संवेदनाओं से परिपूरित हैं और इसी बहाने स्त्री संवेदना और अस्मिता के प्रश्नों से भी गुजरते हैं। इनका एक भरा -पूरा संसार है जिसमें प्रेम की सर्व व्यापकता है। लड़की की आंखों में ,मैं होना चाहती हूँ ,ताक, याद, मनमीत ,प्रेम करती हुई लड़की ,दांपत्य ,जीवन आदि कविताएँ स्त्री संवेदना की नई भाव भूमि तैयार करती हैं जिससे विचार और सौंदर्य का दृश्य उभरता है। उनके यहाँ प्रेम करती हुई लड़की खूब पढ़ना चाहती है, वह नहीं चाहती कि उसकी शादी के लिए वर ढूंढते पिता की पीठ झुक जाए ।वह लड़की सृजनशीलता में विश्वास रखती है और उसके लिए सृजन ही प्रेम है-
बच्चों से प्रेम करते हुए लड़की
बना रही है अपनी माँ की तरह
सुंदर गोल-गोल रोटियाँ
बच्चों के प्रेम में
रोटी बनाती हुई लड़की
रच रही है एक सुंदर कविता
जिसमें जाति ,धर्म से परे है
गेहूँ का आस्वाद।“

भाषा एवं शिल्प की दृष्टि से प्रज्ञा की कविताओं की अपनी एक अलग दुनिया है। हिंदी की पारंपरिक भाषा के बरअक्स उनकी अपनी कमाई हुई भाषा है। अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में निज भाषा के रूप में नागपुरी लोक भाषा की उपस्थिति उनके शब्द भंडार को समृद्ध करते हैं। उनकी कविताओं में अभिव्यक्त देशज शब्दों की भरमारता एवं गीतों की सजीवता भाव और अभिव्यक्ति दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं ।इसे काव्य -भाषा को मजबूती मिलती है। दुआर,लुझरी , टिकुली ,नइहर,आसरा, ननकी ,आयो ,रीझ, मिसना ,टेमाने ,इंजोर ,टांड़, चाउर, सोंटी, फुनगी, दोईन कादो आदि नागपुरिया शब्दों की उपस्थित इनके लोकभाषायी प्रेम और लोकसौंदर्य को सशक्त और नवीनता प्रदान करते हैं। विशेष कर गीतों के माध्यम से –
“आए गेलैं भादो
अंगना में कादो
भाई रीझ लागे”। (करम के गीत)।
या
“ बाबा मोर बहुते हड़बड़ाल” ।(नदियाँ धरती की बेटियाँ हैं)।
“केकर लगिन आयो गे
रोदना लगाय”। (विस्थापन)।
एतइ सुंदर काँचा रतन
काया रे गुइयां”।(आजी)।
“ एहे मन गंगा /एहे मन जमुना” ।(स्पर्श)।

आदि गीतों की परंपरा निज भाषायी प्रेम और देशज संस्कृति की अनूठी मिसाल है। बिंबात्मकता की दृष्टि से उनकी कविताएँ इंद्रियबोध और लोक संवेदना को नए आकार में गढ़ती हैं ।हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ सिंह की बिम्ब परंपरा को आगे बढ़ाने में उनकी कविताएँ एक कड़ी का काम करती हैं। उनकी काव्य- भाषा प्रमुखत: बिम्बात्मक हैं। इनके काव्यों में बिम्ब प्रकृति के विविध रूपों में चित्रित हैं। इन्होंने अपनी कविताओं में प्राकृतिक सौंदर्य के बहाने दृश्य, नाद ,गंध, स्पर्श आदि बिम्बों का सफल प्रयोग भावपूर्ण ढंग से किया है। इनके बिम्बों की अर्थगर्भा इतनी व्यापक है कि उसमें पूरा लोक संसार समाया हुआ है ।

समकालीन जीवन संदर्भ में जो उपनिवेशवाद और जादुई यथार्थ की अपनी दुनिया है ;प्रज्ञा की कविताएँ उससे कोसों दूर हैं ।उनके काव्य -संसार में ये बिम्ब नगरीय सभ्यता से दूर गाँव की मिट्टी की गंध को समेटे, खेत- खलिहान ,वृक्ष ,लताएँ फूल ,पहाड़ , वनस्पतियाँ आदि प्राकृतिक सौंदर्य के रूप में महकते हैं। स्त्री सौंदर्य और संवेदना को मूर्त और गहराई प्रदान करने में इनके बिम्ब उभर कर सामने आते हैं। ‘बड़की भौजी’ कविता में बिम्ब की प्रकृति इस रूप में है –
“जब हंसती थी बड़की भौजी
चारों तरफ खिल जाते थे
जटंगी के फूल
जब चलती थी बड़की भौजी
लचकती थी
कचनार की डाली
भैया के जाने के बाद
मुरझा गई है
कंदरी के फूल जैसी”।

इस कविता में जटंगी के फूल, कचनार की डाली और कंदरी फूल का सौंदर्य- विधान उच्चतम मानकता के चरम बिंदु को छूता है। स्मृति की दो कविताओं में भी बिम्बों का सहज एवं चमत्कारिक प्रयोग कविता को सटीक एवं सजीवता प्रदान करती है ।
“स्मृति उतरती है
जैसे बारात के साथ
नई नवेली दुल्हन
स्मृति बजती है
जैसे अनाज ओसाते हुए
सूप का संगीत
स्मृति गमकती है
जैसे वन प्रांतर में सखुआ के फूल”।( स्मृति -एक)।

इस कविता में कवयित्री लोक बिम्ब के सहारे एक साथ दृश्य बिम्ब (दुल्हन), नाद बिम्ब (सूप), गंध बिम्ब (फूलों) आदि बिम्बों की अपनी अलग दुनिया रचती है; जहां मौलिकता है ,रचनात्मक है ,संस्कार है परंपराएं हैं और लोक जीवन की उत्कट अभिलाषा भी है ।स्त्री विमर्श के हवाले से उनकी कविताएँ अपनी अस्मिता को लेकर मुखर हैं। “मैं कोई कोहड़ा का फूल नहीं, कोरोया के फूल ,मैं होना चाहती हूँ ,याद आदि कई कविताओं में बिम्बों की अलग दुनिया है । ये कवयित्री की अपनी कमाई हुई काव्य -भाषा है जिसे उन्होंने अपने अनुभव, परिवेश ,प्रकृति, लोक -व्यवहार ,परंपरा और अपनी श्रम साधना से प्राप्त की है।

प्रस्तुत काव्य- संग्रह भारत की गौरवशाली परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने एवं लोक जीवन एवं संस्कृति के महत्व की दृष्टि को भी उजागर करती है ।समग्रता में यह काव्य- संग्रह प्रकृति, मनुष्य और संवेदना के बहाने एक ऐसे लोक संसार का निर्माण करती है जहां मानव और मानवता सबसे बढ़कर है। मानवता की असली पहचान है स्त्री अस्मिता ,स्त्री संवेदना ,स्त्री दृष्टि ,स्त्री स्वच्छंदता ,स्त्री भाषा और स्त्रीवाद ।स्त्री सर्जक होती हैं अतः सृजनात्मक उनके सरोकार में होती है ।

इस कविता- संग्रह की अधिकांश कविताएँ अपने वजूद को तलाशती रहती हैं तथा बेहिचक और बेबाकी से संवाद करती हैं ।प्रस्तुत कविताएँ चिल्लाकर या शोर मचाकर /वाचाल होकर अपनी उपस्थिति का आह्वान नहीं करती और न ही गमगीन भावुक होकर अथवा रो-रोकर, भावुकता से अपना परिचय देती हैं। बल्कि ये कविताएँ मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन, प्रकृति- मनुष्य, लोक -आलोक के माध्यम से स्त्री विमर्श को ऐसे लोक संसार की ओर ले जाती हैं जहाँ सच्चाई है, ईमानदारी है और रिश्तों की अपनी एक अलग दुनिया है। जिसके आँगन में प्रकृति रची-बसी है।

 

 

काव्य-संग्रह: “काँस के फूलों ने कहा जोहार!”

कवयित्री: प्रज्ञा गुप्ता
प्रथम संस्करण -2025
बोधि प्रकाशन ,जयपुर
मूल्य- 249/-


डाॅ. जिन्दर सिंह मुंडा ,
रचात्मक गतिविधियां-
प्रकाशित पुस्तकें-
1. हिंदी और मुंडारी भाषा के व्याकरण का तुलनात्मक विवेचन
2. भाषाई अस्मिता और आलोचना
प्रकाशित आलेख
1. भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता द्वारा प्रकाशित बहुप्रतीक्षित ‘ हिंदी साहित्य ज्ञानकोश’में आलेख प्रकाशित।
2. विभिन्न हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।
3. विभिन्न पुस्तकों में संपादित लेख प्रकाशित।
4. राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी।
5. आकाश वाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका।
6. राष्ट्रीय एवं स्थानीय दैनिक पत्र- पत्रिकाओं में लेखन जारी।
शोध परियोजना-
1. यू.जी. सी. प्रदत्त लघु शोध- परियोजना कार्य पूर्ण।
2. यू. जी. सी. प्रदत्त वृहद शोध- परियोजना” झारखंड के भाषा परिवारों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन ” विषय पर कार्य पूर्ण।
सम्प्रति:- अध्यक्ष ,स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड) में सेवारत।
संपर्क:-मो-9939166388, ई -मेल-mundajindarsingh@gmail.com.

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