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पुस्तक

ललन चतुर्वेदी के कविता संग्रह ‘आवाज़ घर’ की पुस्तक समीक्षा

 अष्टभुजा शुक्ल


ललन चतुर्वेदी छोटी – छोटी कविताओं के ऐसे प्रौढ़ कवि हैं जो घोषित तौर पर ‘ बड़ी कविताएँ ‘ नहीं लिख सकते। कारण यह कि उनकी कविता की अवधारणा में ही बहुत मामूली-मामूली चीज़ें हैं।उनका कवि अपने परितः पसरे हुए जीवन से ही इतना ऊभचूभ और हलकान है कि कविता में दूर की कौड़ी लाने के उद्यम में बहुत उछलकूद नहीं कर सकता।बावजूद इसके इस कवि-प्रौढ़ोक्ति के प्रक्षेप दूरगामी और उनकी मारक-क्षमता अचूक है।दुःख, करुणा, कल्पना,परम्परा, भाषा और उसकी ध्वनियों से झंकृत होने वाली ललन की कविताओं में अपने समय में मचा हुआ जीवन का महाभारत साफ़ साफ़ सुनाई देता है और इस महाभारत में विदुर जैसे सत्यान्वेषी के कवि-वचन।

ललन चतुर्वेदी की कविताएँ वस्तुतः जीवनानुभव के जीवनानुवाद की चुनौती हैं। वे एक शोक-व्यग्र कवि की प्रार्थनामय अनुष्टुप हैं।मुक्त छंद की छलछंद मुक्ति हैं। एक ऐसे कवि की निर्मिति और जीवन-वृत्तांत हैं जिसने अपना प्रोफाइल इतना खुल्लमखुल्ला सार्वजनिक कर दिया है कि किसी रहस्य की कोई गुंजाइश ही नहीं।बस आमंत्रण है तो कवि-वचनों के अनुवाद की और यह आमंत्रण कोई बीड़ा नहीं बल्कि कविता के मर्म तक पहुँच पाने की चुनौती है।

ललन चतुर्वेदी अपनी दुःख-पगी काव्यध्वनियों के बीच निर्भीक कथन वाले कवि हैं। लोकतंत्र के अमृतकाल काल में, चुनाव प्रशिक्षण शिविर से मिले एक स्त्री-कर्मी की परेशानियों का अनुभव कवि अपनी संवेदनेन्द्रियों से जिस सूक्ष्मता के साथ पकड़ता है उससे समाज और सत्ता के चरित्र का मुलम्मा छूट जाता है। इसी क्रम में, ‘सत्ता सुंदरी’ नामक कविता को पढ़ा जा सकता है जो ऊपरी तौर पर तो निराला जी की कविता , ‘सन्ध्या सुंदरी ‘की तर्ज पर सुनाई देती है लेकिन इस-उस कविता के फर्क को पाठक माइनूटली देख सकते हैं।

इस तरह ललन चतुर्वेदी अपनी प्रगतिगामी काव्य परंपरा का लिहाज करते हुए जहाँ कवि के कार्यभार को अपने ‘पूर्वजों का ऋण चुकाना’ समझते हैं वहीं दूसरी ओर परंपरा से एक तरह की सचेत बाइनरी भी रचना जानते हैं।अपनी काव्य परंपरा के प्रति ललन चतुर्वेदी की यह गहन संसक्ति तब बिल्कुल प्रत्यक्ष हो जाती है जब ‘भूख’ पर केन्द्रित उनकी कविताओं में महाभारत के “कष्टातिकष्टतरं क्षुधा” का प्रसंग, प्रसंगवश आ ही जाता है। यह कुरुक्षेत्र में सब कुछ तहस-नहस हो जाने के बाद का वह कारुणिक प्रसंग है जब आँखों पर पट्टी बाँधे गांधारी भूख से बेहाल अपने ही पुत्र दुर्योधन की लाश पर चढ़कर बेर तोड़ने की कोशिश करती है।

हमारे समय के शांति-पर्व के रहस्य का भेदन करतीं ललन की कविताएँ सत्ता के सर्वोच्च माले पर बनी-ठनी बैठी प्रवृत्ति को “नीचे उतरो” कहने के लिए नीचे से ही कभी-कभी चीख भी सकती हैं।बावजूद इसके ललन चतुर्वेदी का कवि-स्वभाव बहुत शालीन और उद्विग्न है। इसी उद्विग्नता की परिणति है कि मनुष्यता के दुःख की जितनी अनंत गाथाएँ हैं उनकी प्रणति और करुण-कथा सुन पाने और कविता की उन पाण्डुलिपियों को समझ पाने के लिए एक संवेदनशील कवि की दृष्टि में ईश्वर को सर्वाधिक अनुवादकों की आवश्यकता की प्रतीति कराने लगती हैं।

फिलहाल बड़े बड़े कवियों और कविताओं के बीच अपनी विनम्रता के नाते भी दूर से दिखने वाले कवि ललन चतुर्वेदी का प्रस्तुत संग्रह ‘आवाज़ घर’ पाठकों के सम्मुख है, जिसमें आवाज घर नाम की कोई कविता नहीं है। इसी से समझा जा सकता है कि कवि उसी मंच के सम्मुख पाठकों और श्रोताओं से मुखाभिमुख है जिसके नेपथ्य में मनुष्यता की व्यथा की अनंत ध्वनियों के शब्दों का बीजगोदाम कसमसा रहा है। आशा है कि पाठक इस संग्रहः की उन उच्चार्य -अनुच्चार्य ध्वनियों को कान लगाकर सुन पाएँगें।

 

पुस्तक: आवाज़ घर (काव्य संग्रह)

कवि: ललन चतुर्वेदी

प्रकाशन: लिटिल बर्ड पब्लिकेशन

मूल्य: 225 रुपये (पेपरबैक)

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