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जुवि शर्मा की ‘अबोली की डायरी’ की पुस्तक समीक्षा

गति उपाध्याय


‘अबोली की डायरी’ लेखिका ‘जुवि शर्मा’ की पहली किताब है। पहली किताब का अर्थ ‘कथेतर साहित्य’ में इनकी ‘पहली किताब’ से है। इसके पहले इनके दो काव्य संग्रह आ चुके हैं इस डायरी को पढ़ते हुए ही समझा कि अबोली ने बोलना सीखने से पहले लिखना सीखा है, लिखे भी क्या जिसके पास दुखों का पारावार हो, और उसे कहने का साहस भी न हो, कहे भी तो उसकी वेध्यता न हो,वो कविता के सिवाय क्या लिख सकती थी। फिर उसी अबोली ने तय किया कि अपने पीड़ाओं का विसर्जन करेगी,अपने संत्रास को वैध्य बनाएगी,उसी वैधता का क्रमिक प्रतिफल है ये किताब। जिसके परिचय में प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉक्टर विनय कुमार ने लिखा है-“पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मैंने रचनाकार से पूछा- ‘यह डायरी-शिल्प में उपन्यास है या डायरी ?’ उत्तर मिला- ‘डायरी।’ और मैं सिहर गया। मानव-मन के अँधेरों में झाँकते तीन दशक से भी अधिक हो गये, फिर भी मैं सिहर गया।”

हर लिखे की एक कीमत होती है चुकायी चाहे जैसी जाय, फिर लिखा अगर आत्मकथ्य या डायरी है तो कीमतें लम्बे समय तक चुकायी जाती हैं क्योंकि डायरी लिखी नहीं जाती बस किसी निश्चित समय पर मामूली रद्दोबदल के साथ फेयर की जाती है। कुछ दृश्य विस्तार पाठकों के समझने की अनुकूलता के लिए डाल दिए जाते हैं। स्थान, घटनाएँ, तारीख़ें और मन पर लगे ज़ख़्म जो कभी नहीं सूखते। फेयर करने के दौरान उन्हें खुरच कर पपड़ी छुड़ाई जाती है कभी कभी वहाँ ज़ख्म सूख चुके होते हैं तो कभी उन सूखते ज़ख़्मों से लहू भी रिसने लगता है। डायरी फेयर करने की प्रक्रिया इतनी देर से होती है कि पाठक के तौर पर हमें लगने लगता है लेखक के लिए ये पीड़ारहित प्रक्रिया रही होगी पर छोटे बच्चों को देखते हैं ना, जहाँ राई भर भी चोट लगी हो और उसे सहलाने के लिए भी हाथ रखो तो वे कराह उठते हैं क्योंकि वो चोट देह से ज़्यादा मन पर लगी होती है।
अबोली अकेली या पहली औरत नहीं है जिसने अपने मन पर हजारों टन का पत्थर रख कर ये साहस जुटाया है। पहले भी इस पीड़ा को सामने लाने वाले आत्मकथात्मक उपन्यास या आत्मकथाएं आती रही हैं। पाकिस्तान की लेखिका फहमीना दुर्रानी का उपन्यास द फ्यूडल लॉर्ड (मेरे आका )या इराक़ की नादिया मुराद की आत्मकथा द लास्ट गर्ल भी यही कहानी कहती हैं।नादिया ने बताया कि कैसे इस्लामिक स्टेट के लोगों द्वारा पकड़कर उसे यौन दास बना लिया गया था।(एक जीवित शरीर पर अत्याचार की हद पार यातनाएं जिनको पढ़ पाना भी बड़ा धैर्य और साहस मांगता है) किसी तरह से वे उनके चंगुल से निकल पायी थी। इस आत्मकथा के लिए नादिया को 2018 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। ये दो उदाहरण हैं। इस तरह की और भी किताबें होंगी। संकुचित और मिली जानकारी के अनुसार हिन्दी साहित्य में डायरी लिखने वाली अबोली यानी जुवि शर्मा पहली महिला लेखिका होंगी।

एक तरफ ‘अबोली की डायरी’ बेहद उदास कर देने वाली किताब है इसमें घटी हर घटना दुर्घटना है यक़ीन ही नहीं होता कि किसी ने इतना सहा होगा। सुनते आये हैं कि अपराध सहना भी अपराध है। ऐसी अपराधी अबोली ने पूरे जीवन सहने की क़ीमत, चुप रहने की क़ीमत चुकायी हो शायद । लेखिका जुवि शर्मा के अदम्य साहस का परिचय है ‘अबोली की डायरी’। इसे लिख कर उन्होंने ख़ुद को उऋण किया हो जैसे। दूसरी ओर ये सारी अबोलियों के लिए भी हिम्मत का सामान है। बहुत ज़्यादा बोलने के लिए बदनाम औरतों के लिए भी क्या ही विडंबना है कि हर औरत को दुख सुनाने के लिए एक जोड़ी कान नहीं होते,सर रखने के लिए कंधा नहीं होता।

पूरी ईमानदारी से जीवन के तमाम सत्यों, दुर्घटनाओं, पीड़ाओं, प्रेम और प्रतीक्षाओं को लिखकर विसर्जित और तिरोहित किया गया है मालूम होता है मानो ये डायरी नहीं गंगा हो जैसे,
इस दस्तावेज़ी डायरी में जो कुछ भी दर्ज़ है उसमें पचास-साठ प्रतिशत भोगने के लिए हर स्त्री अभिशप्त है पर जिसने सौ प्रतिशत भुगता हो उसका क्या? लेखिका पहले कहीं लिखती हैं – “साधारण शरीर से असाधारण दुख भोगना ही मोक्ष है।”

क्या ऐसा डेमोग्राफिक चेंज के चलते हुआ होगा या कि सभी की आँखों का पानी, इंसानियत की नमी रेत में मिल गई होगी? मध्य प्रदेश के बीहड़ों और राजस्थान की रेतों में क्या महिलाएँ आज भी फ़िल्मों सरीखा ही जीवन जी रही हैं?
ये जानते हुए भी किताब हर्फ़-दर-हर्फ़ सही है, मैं किसी नोट का इंतज़ार करती रही आगे-पीछे पलट कर देखती रही कि कहीं ये लिखा हो कि फलां फलां पात्र काल्पनिक हैं या के ये पात्र थे ही नहीं। असल में दिल कई बार कहता रहा कि ‘अबोली’ के सगे रिश्तों में कोई तो सौतेला हो जाता माँ, बाप, दीदी या सास-ससुर कोई एक भी जिससे हमें कुछ उम्मीद होती। सबसे ज़्यादा दुनिया देखने वालों का दम्भ भरने वालों ने भी क्या ही देखा होगा जितना इस स्त्री ने घर की चहारदीवारी में देखा है।

स्तब्ध हूँ कि जो माता बच्चों की परवरिश, गलत-सही, हित-अहित भी नहीं जानती, तय नहीं कर पाती, उसी माँ को अपने बच्चों की शादी की तय करने की ज़िम्मेदारी कैसे मिल जाती है?अबोली की माँ पोषण और सुरक्षा प्रदाता तो रही ही नहीं बल्कि उसके शोषण से भी मुँह फेरने वाली विकृत मानसिकता वाली माँ है। कहीं तो माँ को लिखते हुए प्रेमचंद के बेटे और उन्हीं के जीवनीकार(कलम का सिपाही में) अमृत राय लिखते हैं-
“ज़िन्दगी की वह उम्र जब इनसान को मुहब्बत की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, बचपन है। उस वक़्त पौधे को तरी मिल जाए तो ज़िन्दगी भर के लिए उसकी जड़ें मज़बूत हो जाती हैं। उस वक़्त खुराक न पाकर उसकी ज़िन्दगी खुश्क हो जाती है मेरी माँ का उसी जमाने में देहान्त हुआ और तब से मेरी रूह को खुराक नहीं मिली। वही भूख मेरी ज़िन्दगी है।”
शायद वही भूख अबोली की है, पर विडंबना ये है कि हर बार माँ की मृत्यु भौतिक हो ज़रूरी नहीं कभी कभी बच्चों के लिए माँ की ममता ही मर जाती है।

डायरी की सुखद बात ये है कि लेखिका अपने चेतन को बचाए रखती है अपने हृदय में प्रेम को जिलाए रखती है अपनी कविताओं को मरने नहीं देती कविताएँ साहित्य को ज़िंदा रखती है और यही साहित्य एक रोज़ सबको बचा ले जाता है।फिर भी किताब किसी गुड नोट पर नहीं खत्म होती, लगता है बहुत कुछ और भी है जो किसी और डायरी में आएगा जिसका एक सुखद अंत होगा,कभी लेखिका अमिता नीरव कहती हैं कि -” हमने बचपन से ही सुना है कि राम ने रावण को मारा, कौरव मारे गएं, ऐसे ही सारे खलचरित्र हार जाते हैं मगर हमारी चेतना को उस दिन सबसे अधिक आघात लगता है जब होरी बिना कर्ज चुकाये ही मर जाता है, सुधा बिना चंदर से मिले मर जाती है। “एकदम यही आघात किताब की समाप्ति पर मुझे भी लगता है।

अमूमन वो स्त्रियाँ जो सुंदरता के मानकों के विरूप होती हैं सारी उम्र कुंठित रहती हैं सोचती हैं काश! वे सुन्दर होतीं। पर अबोली के साथ ‘रूप रोए भाग्य खाये’ वाली कहावत चरितार्थ होती है, नहीं जानती रूपसियों को हमारे समाज में ‘अभागी’ कहे जाने का चलन क्यों हैं? जो भी हो पर अबोली भी वही ‘अभागी रूपसी’ है जो सिर्फ़ प्रेम और सम्मान चाहती रही और वही नहीं मिला। अनिंद्य सुंदरियाँ क्या सिर्फ़ भिक्षा में प्रेम मांगने के लिए रची गई हैं?
डायरी में दर्द है, असफल आत्महत्या की तरकीबें, कुछ घोर निराशा के पल जिन्हें लेखिका ने साहित्य के उपकरण की तरह इस्तेमाल किया है।
अबोली की डायरी में उजास है, जिजीविषा है, पोषण एवं सुरक्षा के लिए अपने छौनों के लिए विशेष आग्रह है, माँओं का हौसला है।
ये डायरी बताती है निमज्जन के बाद कुछ पीड़ाओं का विसर्जन होना चाहिए ज़ख़्मों की चीर-फाड़ करने का अधिकार किसी मनोवैज्ञानिक को नहीं होना चाहिए। शुरू-से शुरू करके मनोचिकित्सा हर बार रोगी को हराने और थकाने वाली पुरानी, अत्यधिक महंगी और असफल विधि है जो पीड़ाओं को बढ़ाती है मनोचिकित्सक का पहला फ़र्ज़ – सबसे पहले वर्तमान के लक्षण,डर, भय,शंकाओं, आदतों के बारे में जांच-पड़ताल करके रोगी को विश्वास में लेना चाहिए।

देह और आत्मा ना किसी के छूने से मलिन होती थी और ना होगी,पर समाज ने संस्कारों में बंधी स्त्री को आत्मा में सिर्फ़ एक को उतरने का अधिकार दिया हुआ जानते हुए भी कि गंगा और काशी में असंख्य पापी उतरकर पवित्र हो जाते हैं पर कुछ ऐसे बहरूपिए भी हैं जो इनके नामराशि भर होने से लोगों से प्रेम का स्वांग रचते हैं जो बेचैनी के दिनों में किसी के मोक्ष को नहीं, बंधन को बढ़ाते हैं, बेकली को बढ़ाते हैं –

“याद रहेगा वह दौरे-हयात हमको
क्या ख़ूब तरसे हैं ज़िंदगी में एक शख़्स के लिए”

डायरी पढ़ते हुए मेरे मुंह से बरबस निकलता है कि अगर ये डायरी अर्धांश भी सत्य है तो काशी तुम शतायु होना, तुम दीर्घायु होना, भटकना अपने मोक्ष के लिए तुम्हें मुक्ति ना मिले।

अबोली के प्रेम को पढ़ते हुए ये पंक्तियाँ याद आती हैं –
“मैंने जितना भी प्रेम इस जीवन में सहेजा है वो समस्त प्रेम तुम्हारे लिए ही था, मेरी आशाओं के तुम अंतिम छोर थे और तुम्हारे पश्चात मुझमें प्रेम हृदय की अनंत कंदराओं में कहीं खो जायेगा…।” और ऐसा ही होगा अबोली तुम मुक्त होगी।

व्योमेश के प्रति आभार, जिसने कभी सराहा हो, सुझाया हो, पढ़ना सिखाया हो, कलम पकड़ायी बस एक ‘ना’ न सुन सकने के लिए उसके प्रति मन मैला नहीं किया जा सकता उनके भी अपने संघर्ष होंगे, पर तुम भी एक पुरुष ही निकले अंततः, व्योमेश तुम समझे नहीं जो हाँ से शुरू नहीं होते वो ना से ख़त्म भी नहीं होते।

घटनाओं को लेशमात्र भी साहित्यिक संवर्धित नहीं किया गया है सब जस-का-तस बहुत कम शब्दों में उतार दिया गया है। क्योंकि लेखिका पढ़ती मन भर और लिखती कण भर है तो 224 पेज की डायरी जिसमें 1992 से 2021 तक की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन है, दर्ज कर ली गई है। घटनाएँ भावचित्रात्मक तरीके से लिखी गई है। संभवतः यही मितव्ययिता ही इसकी लोकप्रियता का हेतु बने। सेतु प्रकाशन से आयी इस किताब का मूल्य 325/-रुपए अमेजॉन पर भी उपलब्ध है.भविष्य में अबोली की 2021 के आगे की डायरी लाने की शुभकामनाओं के साथ

 

पुस्तक: अबोली की डायरी 

प्रकाशक: सेतु प्रकाशन

मूल्य: रुपये 276 (पेपरबैक)

 


 

समीक्षक गति उपाध्याय
जन्म 21 सितम्बर, लालडिग्गी, मीरजापुर (उत्तर प्रदेश)

वर्तमान कार्य: बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापन

हिंदी कविता, लेख और समीक्षाओं का प्रतिष्ठित पत्रिकाओं व पोर्टलों पर प्रकाशन।

आमंत्रित सहभागिता:
Poesia 21 (रूस) द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय काव्य समारोह में हिंदी के 10 चयनित कवियों में चयनित। इसके अतिरिक्त मेरा रंग, कला मंथन, कृत्या इंटरनेशनल पोएट्री मूवमेंट, दस्तक संवाद, युवा सृजन संवाद जैसे मंचों पर काव्य पाठ और विमर्श।

प्रकाशित साझा काव्य संग्रह:

1. प्रारम्भ (युग की नई आवाज़) – सम्पादक: विशाल अंधारे, राहुल बोयाल
2. शतरंग – सम्पादक: मुकेश कुमार सिन्हा

सम्मान:
अमर उजाला अपराजिता सम्मान

सम्पर्क:
ई मेल upadhyaygati8418@gmail.com

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