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कीर्तिगान : भीड़ हत्या का दस्तावेज़ी यथार्थ

जितेन्द्र विसारिया


यह कहा जाता है कि भीड़ का कोई मस्तिष्क नहीं होता, किंतु जब भीड़ किसी विचार या विचारधारा से संचालित होती है, तब यह हत्यारे में तब्दील हो जाती है। यह भीड़ किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित हो सकती है और एक पूरे के पूरे समूह द्वारा भी।

यूँ भीड़ का होना बुरा नहीं है, क्योंकि एक अच्छे विचार के साथ संगठित भीड़ ने दुनिया में, कई बड़े परिवर्तन और क्रांतियों को अंजाम दिया है। किंतु यही भीड़ जब एक बुरे विचार के साथ संगठित होती है, तब यह न्याय और क्रांति के लिए नहीं, बल्कि अपने विरोधी पक्ष को, सचेत रूप से समाप्त करने में काम आती है। उन्हें चुन-चुनकर समाप्त करने में काम आती है।

उस पर यह विचार यदि धार्मिक उन्मादयुक्त हुआ, तब उस भीड़ की क्रूरता और भी नृशंस व बर्बर हो जाती है। उस स्थिति में भीड़ द्वारा किसी क्रूरतम घटना को दिया गया अंजाम, उनकी नज़र में धर्मरक्षा और पुण्यकाम है। पृथ्वी से विधर्म और विधर्मियों को समाप्त करने का, अत्यंत पवित्र कार्य। यह एक ऐसा पवित्र कार्य? है, जो बिना संकोच किया जाता है। किया जा रहा है।

मॉब लिंचिंग (भीड़ हत्या) आज के समय का एक ऐसा पद है, जिसका नाम सुनते ही हमारी रूह काँप जाती है। उस पर यदि आप अल्पसंख्यक और दलित हैं, तब आपके लिये यह पद बेहद घातक है। आप इसे सुनकर सहम जाते हैं कि धार्मिक उन्माद में डूबी कोई भीड़, कहीं अपना अगला निशाना उसे ही ना बना दे।

क्या पता कोई हत्यारी भीड़ ना जाने कब उनके घर में घुस आए या राह चलते उन्हें घेर ले। मार दे इकट्ठी होकर यह आरोप लगाते-“तुम नीच और विधर्मी! हमारे पवित्र पशु का माँस खाते हो या उनका खाल-माँस काढ़ने के लिए, ख़रीदकर ले जा रहे हो? तुम्हें इस पवित्र देश में ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं।” तब आपको उस भीड़ के हाथ; अपने को बे मौत मरता छोड़ने के अतिरिक्त, कहीं कोई चारा नहीं बचता।

हिन्दी में ‘परिंदगी है कि नाकामयाब’ जैसी प्रसिद्ध कहानी से चर्चा में आये; कथाकार-उपन्यासकार चंदन पाण्डेय यह दूसरा उपन्यास ‘कीर्तिगान’, ‘भीड़ हत्या’ पर लिखा एक हैरतनाक उपन्यास है।

उपन्यास क्या है हमारे समय का एक ख़ौफ़नाक सच है, जिसे इसी काल में देश के विभिन्न हिस्सों के दलित-अल्पसंख्यकों ने अपने ऊपर सहा है। झेला है अपनी देह को भीड़ द्वारा घायल और लहू-लुहान होने अथवा अपनी जान से हाथ धोने तक।

इस आरोप में वे बेहोश होने तक पीटे गये। मरने तक मारे गये अथवा ज़िंदा फाँसी पर लटकाये जाते रहे हैं। उन्मादी भीड़ का यह नंगा नाच, इस देश में अब भी बदस्तूर जारी है। जिसके विरुद्ध कहीं कोई बड़ी कार्रवाही होती नज़र नहीं आती। एक के बाद एक, रोज़ नित नये ऐसे केस हमारी आँखों के सामने घट रहे हैं, या टीवी-अख़बार अथवा सोशल मीडिया पर गाहे-ब-बग़ाहे देखने-सुनने को मिल रहे हैं, जिन पर सिबाय अफ़सोस के हम कुछ भी करने में असमर्थ हैं।

‘कीर्तिगान’ उपन्यास में चन्दन ने बड़ी बारीक़ी से, इस संवेदना को पकड़ा है। बहुत मज़बूती से उसके मर्म को छुआ है। जो आपको समस्या की तह तक लेता है, जिसके चलते रोज़-बरोज़ इन हत्याओं को अंज़ाम दिया जा रहा है। जहाँ पहुँचकर हम पाते हैं कि यह ‘भीड़ हत्या’ केवल धार्मिक उन्माद नहीं है, इसके पीछे ‘सामाजिक-आर्थिक’ कारण भी हैं।

इन सामाजिक-आर्थिक कारणों को पीछे रखकर धर्म और जाति की राजनीति करने वाले नेता हैं, जो हिन्दू-मुस्लिम की आग पर अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेंकने का खेल, खेल रहे हैं। इस खेल में जानबूझकर कुछ स्वार्थी तत्व शामिल हैं, तो कुछ अनजाने में मोहरे बने लोग, जो सहज ही धर्म और आस्था के नाम पर भड़काये जा सकते हैं। जिनको आसानी से समझाया जा सकता है कि तुम्हारे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और आवास जैसी समस्याओं के लिए सरकार नहीं, धर्म विशेष के लोग ज़िम्मेवार हैं। इनका समूल विनाश ही तुम्हारी सारी समस्याओं का अंत करेगा।

उपन्यास के माध्यम से चंदन भीड़ हत्या का सिंहावलोकन भर नहीं कराते, बल्कि अपनी कथा-बुनावट में पोस्टमार्टम के डॉक्टर सी सूक्ष्म और गहरी समझ का सहारा लेते हैं, यह समझ और सूझबूझ बेहद श्रम और साहस की माँग करती है, जो किसी यथार्थवादी कृति को टेबलवर्क से अलहदा कर उसे ज़मीनी अनुभव और सर्वेक्षण आधारित रचना का रूप देती है। इस रूप में चंदन का यथार्थ ज्ञान और उपरोक्त समस्या का सर्वे स्तुत्य है।

उपन्यास में मुख्य विषय मोबलिंचिंग के साथ-साथ, सुनंदा और सनोज की समानांतर सहयात्रा-कथा भी है। यह समानांतर कथा कॉरपोरेट मीडिया हाउस में काम कर रहे, विभिन्न समुदायों के बीच की हायरार्की और उनकी पहचान के आधार पर होने वाले, असमान व्यवहार को बख़ूबी दर्शाती है। वह व्यवहार जो आपको आपके कार्य स्थल पर केवल जाति और धर्म के आधार पर ही निशाना नहीं बनाता, बल्कि पहचान के इन मुख्य बिंदुओं से हटकर, अलग देश, राज्य और परिवेश (ग्रामीण) के आधार पर अपने सकर्मियों को निशाने पर लेता है।

इस रूप में यह उपन्यास कॉरपोरेट घरानों में ग्रामीण परिवेश से आये पत्रकार और सीए-एनआरसी के बाद बांग्लादेशीय पृष्ठभूमि के पत्रकारों के साथ किए जाने वाले भेदभाव को भी बहुत संजीदगी से व्यक्त करता है। इस भेदभाव का एक सूक्ष्म किन्तु महत्वपूर्ण पहलू जो नज़रअंदाज़ करने योग्य बिल्कुल नहीं, वो है उस भेदभाव का शिकार सहधर्मियों और सजातीयों का होना।

‘कीर्तिगान’ के दोनों कार्यकर्ता अपनी धार्मिक पहचान में सवर्ण हिन्दू हैं, लेकिन वे तब भी अपनी उपरोक्त पहचान के आधार पर बाक़ी कुलीग्स के बीच, सदैव निशाने पर रहते हैं। सुनन्दा’, जिसका परिवार कभी बांग्लादेश से उखड़कर भारत आया था। ‘सनोज’ जिसने गाँव से निकलकर अपनी मेहनत-लगन और बेवाकी के दम पर राजधानी के प्रसिद्ध मीडिया हाउस में, अपनी जगह बनाई है। दोनों ही उसके विक्टिम हैं।

सनोज जिसकी ग्रामीण पृष्ठभूमि है। संवेदनशील और कवि हृदय है। यद्धपि उसके अपने कुछ विचलन हैं। फिर भी उसे उसके बॉस और सहकर्मी, उसकी पृष्ठभूमि के आधार पर ही टार्गेट करते हैं-“सनोज की क़िस्मत को क्या कहिए कि नवनीत झा, एनसीआरसी के पूर्व निदेशक ने इस प्रश्न का जवाब देना यह कहकर शुरू किय-“नाइस क्वेश्चन जेंटलमैन!” जवाब के दरमियान शायद उन्हें भी लगा हो कि राजबली की बगल में बैठा आदमी यानी सानिध्य शायद ताक़तवर है इसलिए एक मामूली प्रश्न तक का श्रेय उसे दे दिया। सच कहूँ तो यह हरकत नागवार गुजरी। मुझे लगा कि जब मुझे यह बात इतनी बुरी लग रही है तब सनोज को कैसा लगा होगा? (कीर्तिगान,पृ.५९)

वहीं सुनन्दा जिसकी पिछली पीढ़ी बांग्लादेश के उत्तरी दिनाजपुर से आकर दिल्ली बस गई है। अब उनके पास भारतीय नागरिकता भी है, लेकिन उसके सहकर्मी और अन्य पहचान के लोग इस बात को बताना नहीं भूलते कि उसका कोई बांग्लादेशी जुड़ाव है- “मुझे तमाम लोगों की प्रतिक्रियाएँ याद थीं कि यह जानने के बाद लोग किस तरह पेश आते हैं। बहुत कम लोग वास्तविक प्रक्रिया की तरफ़ अपना ध्यान ले जाते हैं कि पिछली कोई पीढ़ी मीरपुर से यहाँ आई होगी। बस गई होगी। अब मैं भारत की नागरिक हूँ। …सनोज ही नहीं कॉलेज के जमाने के कुछ दूसरे दोस्तों ने भी यह जानने के बाद कहा था, कि उन्हें भी एक बार बांग्लादेश जाना है। सबकी वजूहात अलग थीं। ज्यादातर लोगों के उच्छ्वास से लगता था कि वे अपने मन में कँटीले तारों की बाड़ की कल्पना कर रहे हैं और इसकी भी कल्पना कर रहे हैं कि मैं उन तारों के नीचे से घिसटते हुए घुसपैठ कर रही हूँ।” (कीर्तिगान, पृ.४७)

उपन्यास में यह समस्या, मुख्य कथा में उपकथा के समान है। अन्योन्याश्रित। समझो जहाँ एक दूसरे के दुःख-संकट कथा प्रवाह में आपस में बाधा नहीं बनते, बल्कि मुख्य कथा और उपकथा का एक साथ विकास करते हैं। एक सीमा पर जाकर दुःख और भीड़ हत्या में मारे गये परिवारों की दारुण अंतर्कथाएँ, एक दूसरे को हृदयतल तक जाकर प्रभावित कर उठती हैं।

पत्रकार सनोज जो वर्षों से अपने परिवार से विलग रह रहा था। भीड़ हत्या में मारे गये बेहद ग़रीब-निर्धन परिवारों के सदस्यों द्वारा। अपने मरहूम पति-पुत्र अथवा भाई के लिए न्याय पाने को, जी-जान से भिड़ा देख। उसका अपने परिवार के प्रति मोह जाग्रत हो उठता है -“चौतरफा मची हत्याओं के इस बीच जो देखा वह यही कि परिवार एक धागा है और वह मृत व्यक्ति को उस धागे से अलग नहीं होने देता।

जिस परिवार के लिए मुझ मध्यवर्गीय बनावट वाले मनुष्य के मन में एक अजीब-सी घृणा थी, जो ज्ञानार्जित था कि परिवार शोषण की आदिम जगह है और जो ख़ुद पर बीता-देखा-भाला था उससे अलग दूसरी जगहों पर जहाँ-जहाँ मैं गया, पाया कि वही परिवार इकलौते संबल की तरह सँभालता दिख रहा है।” (कीर्तिगान : पृष्ठ.१७७)

इस रूप में यह उपन्यास समाज में एक ओर सामाजिक क्रूरता का चरम दिखाता है, तो दूसरी ओर उसी समाज में मनुष्य के अब तक बेहद संवेदनशील होने की पराकाष्ठा का दृश्य भी रचता है। इन दोनों ही भाव-भूमियों के समाज में अस्तित्व और अब तक बने होने की हामी भरता हैं, किंतु इसके साथ ही वर्तमान मनुष्य के उनसे टूटने-हारते जाने का करुण दृश्य भी उपस्थित करता है।

“भीड़, यह भीड़, ख़ुदा न करे किसी के घर पहुँचे और रात को सोते से जगा लाए, फिर मार डाले, लेकिन जिस किसी के घर पहुँचेगी वही इनकी ताक़त, इनकी तैयारियाँ जान सकता है। उनमें कई तो दुर्भाग्य से इस देश का बचा-खुचा भविष्य हैं।” (कीर्तिगान : पृष्ठ.१७८)

‘कीर्तिगान’ अपने अंत की बुनावट में हमारे आगे, कोई हल कोई उम्मीद छोड़कर समाप्त नहीं होता। यह उस जगह जाकर समाप्त होता है, जहाँ सत्ता, धर्म और उसके कठपुतली मनुष्य; सब मिलकर इस नरमेध में अपना हवि उड़ेल रहे हैं। जहाँ विरुद्ध विचार और विरूद्ध धर्म के मनुष्य, निरंतर उसका हविष्य बनते जा रहे हैं।

कथा रचना का यह रूप नया नहीं है; जहाँ समस्या की विकटता दिखाकर, उसका अनसुलझा अंत कर दिया जाये। एक लेखक जो अपने आप में अपने समाज का हित-चिंतक और अगुआ भी होता है, क्या उसका कोई फ़र्ज़ नहीं कि वो अपने आम पाठक के लिए, अपनी रचना में कोई हल कोई उम्मीद की एक किरण पीछे छोड़े?

इस दृष्टि से मुझे मन्नू भण्डारी जी का वह बात याद हो आती है, जिसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध राजनीतिक-सामाजिक उपन्यास ‘महाभोज’ के नाट्य रूपांतरण की भूमिका में कहा है-“नाटक की समाप्ति पर सूत्रधार का शब्दहीन संवाद इस बात को तो स्पष्ट कर देता है कि स्थितियाँ अब कहने-सुनने से परे चली गयी है, लेकिन इससे उपन्यास में विद्रोह और संघर्ष की जिस निरन्तरता की ओर संकेत है, वह कही-न- कही धुंधला होकर टूटता-सा लगता है। बेहतर तो यह होता कि महेश किसी प्रकार बिन्दा के संघर्ष को आगे बढ़ाने वाली कड़ी के रूप में उभरकर आता और इस विश्वास की पुष्टि करता कि विद्रोह की आग दबायी तो जा सकती है, पूरी तरह कुचली नहीं जा सकती!” (महाभोज (भूमिका): पृ.११)

यह उम्मीद हम ‘कीर्तिगान’ के लेखक से भी कर सकते थे। वह भी सनोज वृंदा या किसी अन्य पात्र के माध्यम से ऐसी उम्मीद जगा पाता, क्योंकि इस देश में अब भी विद्रोही विचार और संवैधानिक परम्पराएँ, पूरी तरह निस्तेज और निष्क्रिय नहीं हुई हैं। लोग अब भी लड़ रहे हैं। लेकिन वर्तमान परिवेश से लेखक इतना आतंकित है और स्वाभाविक ही आतंकित है कि उसके पास सच में ही निकट भविष्य में, इस ‘भीड़ हत्या’ का कोई स्थायी हल होता, दिखाई नहीं पड़ता। यह स्थिति सच में भयाभय और अकल्पनीय है!

यह तो अभी की ख़बर है कि इस उपन्यास में वर्णित भीड़ हत्या के शिकार ‘अख़लाक़’ के सभी हत्यारों को रिहा करने के लिए, स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थानीय अदालत को कार्यवाही करने को कहा है !! मानो अख़लाक़ की हत्या भीड़ ने नहीं की थी, बल्कि वो ख़ुद ही अपने आप मर गये हों, या उन्होंने स्वयं आत्महत्या कर ली थी!!!

… उपन्यास में एक जो खटकने वाली बात है, वो है समलैंगिकता का चित्रण। समलैंगिकता को लेकर देश और दुनिया में अलग-अलग मत हैं। कोई इसे सहज और प्राकृतिक मानता है, तो कोई अप्राकृतिक और विकृति। लेकिन जो इसके भुक्तभोगी हैं, उनके लिए उन्हें इस पहचान के साथ जीना, अब भी बेहद मुश्क़िलभरा और दूभर है। उनका किसी भी सोसाइटी में, अब तक सहज स्वीकार्य नहीं है। उन्हें आये दिन तमाम तरह की प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है। वे आत्महत्या तक कर ले रहे हैं।

चंदन ने इस उपन्यास में उसका आरोपण एक ऐसे व्यक्ति में किया है, जो रचना की दृष्टि से लगभग खल पात्र है। भाषा भले ही पात्रानुकूल या समाज में समलैंगिकों के प्रति बर्ताव को दर्शाती हो, लेकिन उस पर आपत्ति यह कि समलैंगिकता को बुराई के साथ जोड़ा गया है, मानो समलैंगिक और बुरा-लिजलिज़ा होना दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हों? …एक दूसरी जगह भी इसका ज़िक्र; मनोचिकित्सा में रोगी द्वारा अपने रक्षात्मक रूप में ही हुआ है, वहाँ भी आम सोच ही प्रतिबिम्बित है।

तब सवाल यह उठता कि ऐसे चित्रण से, उपरोक्त समुदाय को क्या लाभ? कोई रचनाकार, किसी एक पीड़ित समुदाय का नहीं होता। वह जब किसी एक वंचित समुदाय पर क़लम उठाये, तो उसे दूसरी अन्य अस्मिताओं का भी संवेदना पूर्वक चित्रण करना चाहिए, अन्यथा उनका यथास्थिति में रह जाना ही ठीक है। बिना किसी संकेतक के ऐसे चित्रण, अर्थ का अनर्थ कर देते हैं।

बाक़ी बिना दायें-बायें मुड़े यह उपन्यास; अपने समय का बेहद यथार्थ, कहें ख़ौफ़नाक चित्र प्रस्तुत करता है। यह बेहद साहस भरा रचनात्मक कार्य है, जिसे अक़्सर लेखक करने से अपने को बचा ले जाते हैं। उस स्थिति में और भी जहाँ धर्म और सत्ता का गठजोड़ मुक़म्मल होकर, ऐसी भयभाय स्थितियों को हवा दे रहा हो।

जहाँ पत्रकार-लेखक और अन्य बुद्धिजीवी, हमारी आँखों में उँगली डालकर इस सच को कहने से बचते; सत्ता पोषित मंचों और मीडियाघरों की शोभा बढ़ाने में जुटे हों। पद और पुरस्कार की लालसा ने, उन्हें उनका चारण बना दिया हो। वहाँ ‘कीर्तिगान’ का होना, एक आस्वस्ति है-रचना में सच और प्रतिरोध के बचे होने की।

‘कीर्तिगान’ अपने समय के की आँख में आँख डालकर लिखी गई औपन्यासिक कृति है, इसे वैसे ही आँख खोलकर पढ़े जाने की ज़रूरत है। फ़िलहाल निकट भविष्य में तो इसकी प्रासंगिकता, नहीं चुकने वाली।

 

पुस्तक : कीर्तिगान (उपन्यास)
लेखक : चंदन पाण्डेय
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन का पता 1-बी नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002।
प्रकाशन वर्ष : 2022
मूल्य : 241


समीक्षक जितेंद्र विसारिया
विभागाध्यक्ष – हिंदी विभाग
शासकीय एम.जे.एस. स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिण्ड-477001  (म.प्र.)
मोबाईल : 9893375309

 

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