विधान गुंजन
सहजता कवि का आभूषण है। जो बात जिस तरह से कही जानी चाहिए, उसे उसी तरह कहना ही कवि को विशिष्ट बनाता है। हाल के दिनों में कविता जिस हाशिए पर है, उसे नकारा नहीं जा सकता। न ही इस बात से इंकार किया जा सकता है कि कविता हमेशा से एक उम्मीद रही है और अच्छे कवि अपनी नई अभिव्यक्ति के साथ भाषा में उतरते रहे हैं। अच्छी कविताएँ लिखना जितना कठिन है, उतना ही कठिन कवि के लिए सहज और मारक कविताएँ लिखना।
जैसा कि हमारे प्रिय कवि धूमिल कहते हैं—
मैं साहस नहीं चाहता
मैं सहज होना चाहता हूँ
ताकि आम को आम
और चाकू को चाकू कह सकूँ।
परिपक्व कवि उतावलेपन और बेख़ुदी का शिकार नहीं होता, बल्कि वह इंतज़ार और ठहराव के महत्व को जानता है। वह विरह की सुलगती आग से उठते धुएँ से अपने बिंब गढ़ता है और समय की राख से नज़्में लिखता है। अपनी कविता ‘कुछ सवाल’ में वे कहते हैं—
तुम कहाँ जाओगे अपनी गर्दिश लिए?
कौन कहेगा तुमसे कि अब छोड़ दो अपना अकेलापन
और मेरे पास बैठो?
चुप्पी आदत बन गई है
दुनिया में रंगीनियाँ हैं फ़कत
जो तुम इस्तेमाल करना नहीं जानते।
हाल के दिनों में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित अंचित का काव्य-संग्रह ‘आधी पंक्ति’ काफ़ी चर्चा में रहा है। ख़ासतौर पर पटना में इस संग्रह को पाठकों का शानदार स्वागत मिला। वे पटना के कवि हैं—पटना की गलियों में जन्मे, यहीं पढ़े और अब पटना विश्वविद्यालय के पीजी विभाग में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा रहे हैं। इस संग्रह में मूलतः वे कविताएँ हैं, जिनमें पटना की मिट्टी की सुगंध है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि पटना की कविता को अब उसका नया उत्तराधिकारी मिल गया है।
अंचित अनेक छोटे-बड़े विषयों पर कविताएँ लिखने वाले कवि हैं। उनके यहाँ सामाजिक विसंगतियों के ख़िलाफ़, असहिष्णुता, स्त्री अस्मिता से लेकर सत्ता से टकराने वाली कविताएँ मौजूद हैं। इन कविताओं में कवि की मानवता से प्रेम के अनेक रूप दिखाई देते हैं। इन कविताओं का स्वर ही कवि का मूल स्वर है।
अपनी एक कविता ‘मीर-शिकार टोली’ में वे कहते हैं—
हमें सर्वहारा का राज चाहिए था
और बिना टैक्स की धरती।
हमें ख़ुद के लिए नहीं, ख़ुद से भागना था।
हमें सूरजमुखी चाहिए था
और पुराने कवियों की तारीफ़।
कवि की दृष्टि केवल सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समय की सांस्कृतिक स्थितियों और अंतर्विरोधों को भी संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करती है। इन कविताओं में एक ऐसी उम्मीद है, जो आदमी के विचलित मन को इंसानियत की राह दिखाती है। आज के समय में जब असामाजिकता और रूढ़िवादिता के विरुद्ध गहरा आक्रोश व्याप्त है और उसे बदलने का स्वप्न हर संवेदनशील मन में पल रहा है, तब अंचित की कविताएँ उसी बेचैनी और प्रतिरोध को अपने स्वरों में आत्मसात करती दिखती हैं।
ये कविताएँ केवल मनुष्य द्वारा रची गई उसकी दुनिया और उसके जटिल पेचोख़म को समझने में ही सहायक नहीं हैं, बल्कि संबंधों, मनःस्थितियों और भावनात्मक संरचनाओं की गहन पड़ताल भी करती हैं, जो वर्तमान में ठहरकर संतुष्ट नहीं होतीं, बल्कि अतीत की परतों को खोलते हुए मनुष्य की मानसिक बनावट को समझने का प्रयास करती हैं। अपनी कविता ‘सोनागाछी’ के माध्यम से वे एक गहन मानवीय चित्र उपस्थित करते हैं। वे लिखते हैं—
वह अपनी साड़ी की लंबी लाल पाड़ पर रोज़ थोड़ा लहू
पोंछती थी,
उसके गीले बाल रोज़ अलग चेहरे पखारते थे—बिना किसी शिकायत।
उसके पलंग पर नक्काशी बनी थी—उसमें कहीं-कहीं मोम फँसा हुआ।
एक आईना था, जिसमें पलंग दिखता था एकटक सब।
उसके वक्ष जब रौशन होते, कमरे में बाकी सब मलिन हो जाता था।
प्रेम कविताएँ संवेदनशील कवियों की पूँजी रही हैं। बड़े से बड़े क्रांतिकारी कवियों की श्रेष्ठतम कविता का विषय भी प्रेम ही रहा है। पाश, शमशेर, फ़ैज़ और नेरुदा जैसे महान कवियों ने दुनिया को प्रेम की नज़र से चूमने का सलीक़ा सिखाया है। हालाँकि इसके रूप और अभिव्यक्ति के तरीके विविध हो सकते हैं, मगर इनका उद्देश्य दुनिया को रहने योग्य बनाना ही है। इसी कड़ी में समकालीन कवियों में अंचित एक महत्वपूर्ण नाम हैं।
अपनी कविता ‘आकांक्षा’ में वे लिखते हैं—
मैं तुम्हारी बहादुरी से रश्क करता हूँ
मेरी कायरता तुमसे मिलकर और लघु हो जाती है
हम ग़लत दुनिया में मिले
हम ग़लत समय में मिले
मेरी कविताओं में तुम्हारी हँसी को होना था
मेरी स्मृति में तुम्हारे अकेलेपन को हार जाना था
कितना ग़लत है कि
तुम सिर्फ़ प्रेम के लिए बनी थीं
और तुम्हें सिर्फ़ वहीं ठगा गया।
इस संग्रह की कविताएँ मनुष्य और शहर के बीच संवाद का एक सेतु निर्मित करती हैं, जिसके माध्यम से जीवन के वे पहलू भी उजागर होते हैं, जिन्हें सामान्यतः हम अनदेखा कर देते हैं। यह संग्रह मानवीय चेतना से जुड़ा हुआ है, जिसके केंद्र में मनुष्य उपस्थित है। कवि संवेदना के विभिन्न आयामों तक पहुँचने का प्रयास करता है। इस संग्रह की कविता ‘जीवन का पक्ष’ में वे लिखते हैं—
पीपल के वृक्ष किसी भी मिट्टी में उग जाते हैं
पराग उड़ता चला जाता है किसी भी देश।
समय में भी छूट सकता है कोई संगी,
जीवन स्थापित करता है—भूख से हर शोक छोटा होता है।
आधी पी गई सिगरेट, जली हुई राख झड़ती हुई,
देह पर किसी के काटे के निशान—जलते हुए सालों-साल।
वरदान है जो भी, श्राप भी है—अब मिलेगा एक साथ।
रहना है फिर भी यहीं, चुनना है जीवन का पक्ष।
अंचित को जानने वाले यह ज़रूर जानते हैं कि उनमें कोई आडंबर नहीं है—अर्थात वे कविता के बाहर भी कवि ही हैं। वे प्रेम कविताएँ रचते ही नहीं, प्रेम उनमें बसता भी है। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएँ बिना क्रांति का हिस्सा हुए भी लिखी जा सकती हैं, मगर प्रेम कविताएँ कवि की सहभागिता माँगती हैं—जहाँ कवि को स्वयं टूटना और बिखरना होता है। प्रेम चाहे निजी हो या सांसारिक, दोनों ही महज़ मनःस्थिति का चित्रण नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची अनुभूति हैं, जिन्हें हम अंचित की कविताओं में देख सकते हैं।
जीता होगा,
वह जानता होगा ज़िंदगी के जोड़-तोड़।
जो नहीं हारा हिसाब में,
वह कवि कैसा होगा।
फिर भी सोचो—
अगर तुम्हारे नाम के साथ ही
अगर मेरा नाम भी लिखा होता,
क्या तब ही कह सकता था
तुमसे प्यार करता हूँ?
आंचलिक होना ही वैश्विक होने की पहली शर्त है। कोई व्यक्ति अपनी मिट्टी से अलग होकर वह राग पैदा नहीं कर सकता, जो उसे वैश्विक बनाता हो। अतः अंचित द्वारा अपनी भाषा में आंचलिक स्थलों और शब्दों—जैसे ‘मीर-शिकार टोली’ और ‘कोहबर’—का प्रयोग यह दर्शाता है कि वे अपनी जड़ों की महत्ता को न केवल जानते हैं, बल्कि उनका सम्मान भी करते हैं।
अतः अंचित के पास एक सजग और संवेदनशील कवि की दृष्टि है। उनकी कविताएँ कल्पना और यथार्थ का सधा हुआ मेल हैं, जहाँ वर्तमान की बेचैनी से मुक्त होने की आकांक्षा के साथ एक मानवीय और बेहतर भविष्य का स्वप्न आकार लेता है। जटिल और दुर्लभ अनुभवों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करने की क्षमता ही इन कविताओं को विशिष्ट बनाती है। यह विश्वास किया जा सकता है कि ‘आधी पंक्ति’ (काव्य-संग्रह) की कविताएँ पाठक को ठहरकर सोचने, आत्ममंथन करने और समय से संवाद करने के लिए प्रेरित करेंगी।
कवि: अंचित
काव्य-संग्रह ‘आधी पंक्ति’
राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य: 250 रुपये
कवि परिचय : अंचित
केदारनाथ सिंह कविता सम्मान २०२१ से सम्मानित।
‘साथ-असाथ’
‘शहर पढ़ते हुए’
जयराम रमेश की लिखी इंदिरा ग़ाँधी की जीवनी का हिंदी में अनुवाद। ( ‘प्रकृति में एक जीवन’)।
टी.एस. एलीयट की कविता ‘द वेस्टलैंड’ का हिंदी में अनुवाद।
मुक्तिबोध, स्वामिनाथन, रामकृष्ण पांडेय, अरुण कमल, अनामिका, राजेश जोशी, मदन कश्यप, संजय कुंदन, मनोज झा आदि की कविताओं का हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद । पाब्लो नेरुदा, चार्ल्ज़ बकाउस्की, आर्थर रिंबौ, यहूदा आमिखाई, सी कवाफ़ी, महमूद दरवेश आदि कवियों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद।
कई पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ, गद्य और अनुवाद प्रकाशित।
वर्तमान में पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अंग्रेज़ी विभाग में अतिथि शिक्षक
समीक्षक: विधान गुंजन
जन्मतिथि-24 मार्च 1995
पटना(बिहार)
स्नातक- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
फ़ोन- 8130730527
MA-राजनीति विज्ञान
मेल- Vidhan2403@gmail.com
कई ब्लॉग्स, अख़बारों और पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित

