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सामाजिक सरोकारों, संवेदनाओं और काव्य-रसों से सराबोर उपन्यासिका ‘माई रे’  

आलोक कुमार श्रीवास्तव

 

उपन्यास को जीवन का महाकाव्य कहा गया है। काव्यशास्त्र कहता है कि जीवन के रस ही कविता में आकर पाठक या श्रोता या दर्शक को वह अनुभव, वह आस्वाद देते हैं जो अन्यथा वैसी परिस्थिति में उपस्थित होकर ही मिल सकता है।

श्रेष्ठ साहित्य विधाओं की हदबंदी से ऊपर अपने समग्र प्रभाव के कारण समादृत होता है। जब काव्य कहा जाय तो उसका मतलब सिर्फ कविता विधा की सीमा में बँधा साहित्य नहीं है बल्कि गद्य या पद्य कुछ भी हो सकता है। ऐसी ही बात साहित्यिक कृतियों के आकार के संबंध में कही जा सकती है। किसी कृति का दीर्घकाय होना ही उसकी श्रेष्ठता की पहचान नहीं है बल्कि मानव जीवन के उदात्त पहलुओं, संबंधों, भावनाओं आदि की प्रभावपूर्ण उपस्थिति से कृतियाँ अविस्मरणीय बनती हैं।

ये सब बातें प्रेम रंजन अनिमेष की उपन्यासिका ‘माई रे’ पढ़ने के बाद मस्तिष्क में सूत्रबद्ध होती हैं। सौ पृष्ठों से कम आकार वाली यह कथाकृति दो-तीन सौ पृष्ठों के पूर्ण आकार वाले उपन्यासों के सभी गुणों से सम्पन्न, और अपने प्रभाव में काव्यात्मक है। जब कोई कवि उपन्यास लिखेगा तो उसमें काव्यात्मकता तो होगी ही।

‘माई रे’ के लेखक प्रेम रंजन अनिमेष न केवल कवि-हृदय कथाकार हैं बल्कि गीत-संगीत की भी उन्हें अच्छी जानकारी है। ‘माई रे’ में उन्होंने इन सबका अच्छा रासायनिक मिश्रण करते हुए कथानक का ऐसा व्यंजन तैयार किया है जो काव्य रसों से सराबोर है। इस सरसता के बावजूद लेखक सामाजिक सरोकार के विषयों पर विमर्श खड़ा करने में भी सफल रहे हैं जो ज्ञान और संवेदना के समन्वय से ही संभव हो पाता है। संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन की संतुलित अन्विति इस उपन्यासिका को अपने प्रभाव में बेजोड़ बनाती है।

 

इस उपन्यासिका की जमीन हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘दातापीर’ की ज़मीन से मिलती-जुलती है। मौसिकी इन दोनों ही उपन्यासों का प्राण है, लेकिन ‘माई रे’ ‘दातापीर’ से इस मामले में अलग है कि आकार में छोटा होने के बावजूद यह कथा-प्रवाह में किसी बाधा के बगैर अपेक्षाकृत अधिक मुद्दों को विमर्श के दायरे में लाने में कामयाब रहा है। हाँ, भारतीय समाज के सेक्युलर ताने-बाने की फ़िक्र के मसले पर ये दोनों ही उपन्यास एक साथ हैं। चौदह परिच्छेदों में बँटे कथानक के केंद्र में गायिका शीबा उर्फ शिबू का संघर्षपूर्ण जीवन है।

एक स्त्री कलाकार के जीवन-संघर्ष की दास्तान होने के बावजूद ‘माई रे’ में जगह-जगह एक तरह का चुलबुलापन है जो इसके कथानक को ख़ालिस ट्रेजडी होने से बचाने की कोशिश लगता है। यह इस उपन्यासिका की ख़ासियत होने के साथ-साथ कमजोरी भी हो सकती है, जिसका निर्णय पाठक ही करेंगे।

बहरहाल, शीबा उर्फ शिबू और अबुल सलाम बेदाद उर्फ अबू के नव-दाम्पत्य से लेकर उनके पुत्र रबू उर्फ प्रभु आजाद की संगीत-साधना के शिखर तक की यात्रा के विभिन्न दुनियावी पड़ावों को दर्ज़ करते हुए जिन प्रमुख विमर्श-बिंदुओं को कथाकार ने उभारा है उनमें पूँजीवादी समाज की विडंबनाएं और उस समाज के भीतर के मानवीय संबंध, स्त्री-पुरुष संबंध, कला और व्यावसायिकता, भाषा-विमर्श आदि प्रमुख हैं।

सरकारी तंत्र की कार्यशैली, शिक्षा-प्रणाली और स्वास्थ्य-सुविधाओं आदि जीवन के ज़रूरी सवालों पर भी लेखक का स्पष्ट पक्ष सामने आया है जिसे लेखकीय जनपक्षधरता कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा। यह कहने के लिए बड़ी वैचारिक स्पष्टता की ज़रूरत होती है कि जो लोगों की लाचारियों का भरसक फायदा उठाये आज के दौर में वही तो व्यवस्था है! सरकारी तंत्र की आलोचना की यह हिम्मत जनपक्षधरता के बगैर नहीं आती।

 

शिबू और उसके बेटे रबू की संगीत-साधना के संघर्ष-पथ का साथी, अबू का दोस्त बादा मनुष्यता का आदर्श हमारे सामने रखता है। बादा का अपना परिवार साम्प्रदायिक दंगे की भेंट चढ़ जाता है, उसके बाद बिल्कुल किसी सूफी संत की तरह बादा मित्रता और मित्रता से भी ज्यादा मानवता के रिश्ते की हिफाज़त में अपनी बची हुई ज़िंदगी लगा देता है। मानवीय संबंधों को स्त्री-पुरुष संबंध के संदर्भ के बगैर देखना और समझना अधूरा ही रहता है, इसलिए बादा और शिबू के संबंधों की बारीक-अनुशासित उदात्तता इन दोनों ही किरदारों को एक ख़ास ऊँचाई प्रदान करती है – आधुनिक विमर्श में जिस डेमोक्रेटिक स्पेस की माँग स्त्री करती है, वह यहाँ सहज ही सुलभ है और इस सहज-सुलभता के मूल में हैं वे जीवन-मूल्य जो इंसान ने जानवर से ऊपर उठते हुए अर्जित किए थे।

पूँजीवादी समाज में कला और कलाकार की स्थिति पर ‘माई रे’ में बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सीधी टिप्पणी देखने को मिलती है। दुखी दानव उर्फ दुदा जैसे गीतकारों से लेकर ‘सुर समर’ नामक म्यूज़िकल रियलिटी शो के निर्माताओं-निर्णायकों आदि किरदारों के जरिए पूँजी और कला के द्वंद्व में पूँजी के तमाम स्याह पहलू तो दिखे ही हैं, लेकिन उपन्यासिका के अंत में कला की ऊँचाई के आगे पूँजी का बौनापन प्रकट होना इस द्वंद्व की ख़ास उपलब्धि है।

 

‘माई रे’ के मार्फत कथाकार ने भाषा-विमर्श में भी सक्रिय हस्तक्षेप किया है। साहित्य, कला, गीत-संगीत, शिक्षा आदि में लोकभाषाओं की प्रतिष्ठा की लेखक की मंशा लोकतंत्र की भावना के अनुरूप, और अनुकरणीय है। बादा और रबू इस नीति के मुखर पैरोकार हैं। रबू अपनी सांगीतिक प्रस्तुतियों में हिंदी के लोकप्रिय गीतों, उर्दू ग़ज़लों के भोजपुरी अनुवाद को शामिल करता है और उसकी सम्प्रेषणीयता, लोकप्रियता कहीं अधिक बढ़ जाती है। सच्चा कलाकार किसी ख़ास भाषा का मोहताज़ नहीं होता। लेखक ने इस दर्शन को अपने एक ही वाक्य में यह कहते हुए सूत्रबद्ध कर दिया है कि फ़न की जुबान तो आलमी होती है।

जीवन के अनुभवों से अर्जित बातें जब किसी साहित्यिक कृति में सूत्रबद्ध होती हैं तब ऐसी सूक्तियां जन्म लेती हैं। ‘माई रे’ में ऐसे अनेक वाक्य हैं जिन्हें सूक्ति की तरह पढ़ा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यहाँ सिर्फ दो और वाक्य उद्धृत करना पर्याप्त है – 1. सहमति में यदि सन्मति न हो तो उससे ज्यादा खतरनाक कुछ नहीं होता। 2. अंदर हुनर हो तो उभर कर आता है चाहे कलाकार किन्हीं परिस्थितियों में अपनी प्रस्तुति कर रहा हो।

 

इस आलेख के आरम्भ में जिस सरसता की चर्चा की गई है, उसके संदर्भ में भी एकाध बात की जानी आवश्यक है। शृंगार और हास्य जैसे प्रमुख रसों के साथ-साथ करुण, वीभत्स, वात्सल्य आदि गौण कहे जाने वाले रसों की उपस्थिति ने इस उपन्यासिका को एक सरस काव्य-धारा में तब्दील कर दिया है। संयोग शृंगार की एक बानगी देखें जहाँ अबू और शिबू साथ हैं ‌-

 

अबू ने होंठ होंठों पर रखे फिर हटा कर कहने दिया उसे।

पहला-पहला है मिलन पहली-पहली रात।

छेड़ न पहली रात में और किसी की बात॥

बादा और रबू के मार्फत लोकजीवन को सिंचित करने वाले हास्य रस के कई प्रसंग हमें मिलते हैं, जिनमें से एक बानगी यहाँ प्रस्तुत है। संस्कृत श्लोकों का हिंदी अर्थ करने में यह हास्य सृजित हुआ है – त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्य: अर्थात – औरत का किरदार और आदमी की तकदीर फरिश्ते भी नहीं जानते… फिर इनसान तो कुत्ता है!  कुतो का अर्थ कुत्ता कर देने से एक नया ही मजेदार अर्थ सामने आ गया है। इसी प्रकार संस्कृत के बहुना का अर्थ बहुओं से लगाने पर क्या हुआ है, देखें – एको सत्य… विप्रा: बहुना वदंति! सच एक ही है…लेकिन जो नहीं समझते बेकार बेचारी बहुओं को बोलते रहते हैं!

 

शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की दुर्दशा पर लेखक की पैनी नज़र है। अबू और शिबू के पुत्र रबू की पढ़ाई, और शिबू की बीमारी के इलाज के सिलसिले में इन दोनों मुद्दों पर लेखक ने अपनी चिंता और नाराज़गी खुल कर व्यक्त की है और अपनी ओर से कुछ विकल्प भी प्रस्तावित किए हैं। मिसाल के तौर पर अंग्रेजी माध्यम स्कूली शिक्षा की जगह देशीय भाषाओं में शिक्षा की व्यवस्था और एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की जगह वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों, जैसे नेचुरोपैथी, होमिओपैथी, आयुर्वेद आदि के जरिए इलाज की व्यवस्था। अंग्रेजी स्कूलों को उचित ही कसाईबाड़ा कहा गया है जो अंग्रेजी और अंग्रेजों की बात करते हैं और गली के गुंडों की तरह मासूम बच्चों को पीटते हैं। स्कूल के नाम पर चल रहे ऐसे कसाईबाड़ों में बच्चों को भेजने का भला क्या फायदा? शिबू के मार्फत कथाकार ने इस मसले पर एक सुचिंतित निष्कर्ष सामने रख दिया है – बच्चों का भविष्य और जीवन बनाने का दावा करने वाले ऐसे तथाकथित शिक्षाकेंद्र उन्हें बेहतर इनसान तो कतई नहीं बना सकते थे। काम करने वाली मशीन भले बनायें।

 

एजुकेशन सिस्टम की ही तरह मेडिकल सिस्टम की लूट और संवेदनहीनता को कथाकार ने किताब में बखूबी दर्ज़ किया है। ‘आदमी कैंसर से नहीं… अक्सर कैंसर के इलाज से मर जाता है!’ और ‘जैसे पूरी व्यवस्था बीमारी ठीक करने के लिए नहीं बल्कि बीमार को शिकार बनाने के लिए हो!’ ये दो पंक्तियां ही हमारे समाज के मेडिकल सिस्टम की हकीकत बताने के लिए काफी हैं। शिबू को हुई कैंसर की बीमारी के इलाज के सिलसिले में एलोपैथी चिकित्सा पद्धति पर संवेदनहीन बाजार के कब्जे को देखकर पाठक को इस वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति पर ही अविश्वास हो सकता है लेकिन वहीं हमें एक सहृदय डॉक्टर भी मिलता है जो बादा को सच्चाई बताता है। यह केवल एक डॉक्टर का किरदार नहीं, बल्कि लेखक की वैज्ञानिक चेतना है जो वैज्ञानिक दृष्टि-सम्पन्न यथार्थ को पाठकों तक पहुँचाने की अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। गायिका शीबा उर्फ शिबू के कैंसर के प्रसंग को पढ़ते हुए किसी को भगवानदास मोरवाल के उपन्यास ‘सुर बंजारन’ की भी याद आ सकती है।

 

‘माई रे’ की आध्यात्मिकता और दार्शनिकता भी उतनी ही आकर्षक है जितनी उसकी भौतिकता और नाटकीयता। न केवल टी.वी. रियलिटी शो की नाटकीयता के यथार्थ को किसी बैक-स्टेज वीडिओ की तरह कथा-सूत्र में पिरो दिया गया है बल्कि अध्यात्म और दर्शन की गहरी बातें भी जगह-जगह पाठक के मस्तिष्क को आलोकित करती चलती हैं। किताब की कीमत भी वाजिब और आकर्षक है – सिर्फ 150 रुपये। कागज़ और छपाई समेत किताब की प्रस्तुति यूँ तो अच्छी है, लेकिन आवरण पृष्ठ पर परिश्रम नहीं किया गया है। इस बेहद मार्मिक किताब को इससे बेहतर आवरण से सजाया जाना चाहिए था।

 

पुस्तक : माई रे… (उपन्यासिका), लेखक : प्रेम रंजन अनिमेष, प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2025, पृष्ठ : 96, मूल्य : 150 रुपये

 

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