Friday, July 1, 2022
Homeग्राउन्ड रिपोर्टआजमगढ़ को आर्यमगढ़ बनाने के नारे के साथ सपा से जीतने की...

आजमगढ़ को आर्यमगढ़ बनाने के नारे के साथ सपा से जीतने की कोशिश में भाजपा

आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव के लिए आज शाम चुनाव प्रचार थम जाएगा. स्टार प्रचारकों के काफिले जो आजमगढ़ की उबड़- खाबड़ सड़कों पर दौड़ रहे थे अब अपने अपने समर्थकों को हिदायतें देते लौट पड़े हैं. 23 जून को अखिलेश यादव द्वारा खाली की गई आजमगढ़ में लोकसभा उपचुनाव के लिए वोटिंग होनी है.

सपा ने इस सीट से मुलायम परिवार के और बदायूं से पूर्व सांसद रहे धर्मेन्द्र यादव को प्रत्याशी बनाया है तो भाजपा ने भोजपुरी स्टार गायक दिनेश यादव निरहुआ पर फिर से दांव लगाया है. बसपा ने भी एक बार फिर से स्थानीय नेता गुड्डू जमाली को उतारकर 2014 की तरह चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबले में तब्दील करने की कोशिश की है. भाजपा की निगाह भी इस पर टिकी है कि जमाली मुसलमान वोटों में कितनी टूट करा पाते हैं.

आजमगढ़ की बात करें तो पार्टी नेताओं और सत्ताधारी पार्टी के मंत्रियों ने जितना भी माहौल गरमाने की कोशिश की हो लेकिन आम मतदाताओं में उत्साह नहीं दिख रहा इसलिए मतदान का प्रतिशत नीचे ही जाने की संभावना है. विकास विकास के खेल से शुरू हुआ चुनाव अपने प्रचार के अंत तक आते आते हिंदुत्ववादी राजनीति और जाति की गणित को साधने में खुलकर सामने आ गया है.

भाजपा सपा पर वंशवाद चलाने और आजमगढ़ को पिछड़ा बनाए रखने, लोक कलाकारों का अपमान करने का आरोप लगाते हुए पूर्वांचल एक्स्प्रेस वे, हवाई अड्डा और सुहेलदेव यूनिवर्सिटी के शिलान्यास को विकास के रूप में पेश कर रही है तो सपा आजमगढ़ को कमिश्नरी बनाने, मेडिकल कॉलेज खोलने, और भाजपा द्वारा सड़क और हवाई अड्डा को उनकी सरकार की योजना बताते हुए भाजपा द्वारा आजमगढ़ की लगातार उपेक्षा का आरोप लगा रही है. बसपा प्रत्याशी गुड्डू जमाली अपने स्थानीय और सौम्य मिलनसार छवि के साथ प्रचार में उतरे हैं. बाकी दोनों पर बाहरी होने के साथ साथ उनके समर्थकों का कहना है कि एक सीट से सरकार पर कोई असर तो पड़ना नहीं है लेकिन संसद में वह स्थानीय समस्याओं को बेहतर तरीके से उठाएंगे और अपने समुदाय की भी बेहतर रहनुमाई कर पाएंगे.

यह चुनाव ऐसे समय पर हो रहा है जब पैगंबर पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद 10 जून को कई शहरों में मुसलमानों का विरोध प्रदर्शन थोड़ा हिंसक हो गया था लेकिन उससे निपटने के लिए जैसे बर्बर तरीकों का इस्तेमाल हुआ और बिना नोटिस, सुनवाई आरोपियों के घरों को बुलडोजरों से ढहाया गया उसकी चीखें अभी थमीं भी नहीं थीं कि सेना में सरकार द्वारा लाई गई चार साला नियुक्ति की अग्निपथ योजना ने युवाओं के भीतर आजादी के बाद रिकॉर्ड बेरोजगारी के कारण पनपते आक्रोश की ज्वाला को धधका दिया और शहर दर शहर सड़कों पर आग फैल गई है. हिंसा शांत हुई है लेकिन अभी आक्रोश शांत नहीं हुआ है.

ऐसे में इस उपचुनाव को देखना दिलचस्प होगा. विकास विकास करते करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 19 जून को आजमगढ़ में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इस बार आजमगढ़ जो पिछली सरकारों के समय आतंक के गढ़ के रूप में जाना जाता था उसे आर्यमगढ़़ बनाने का मौका है इससे चूकिएगा मत. भाजपा यह सीट कभी जीत नहीं सकी है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा की स्थिति के कारण हर सीट पर वह नंबर दो की पार्टी बनकर उभरी है. इससे उसका हौसला बढ़ा हुआ है.

सपा ने यादव मुस्लिम गठजोड़ में कोई टूट न हो इसके लिए अपनी ताकत झोंक रखी है. क्योंकि इस सीट पर 45 प्रतिशत यादव मुस्लिम मतदाता हैं. इन्हीं के बल पर सपा जीतती रही है. 2014 और 19 में भाजपा की लहर के बावजूद उसने जीत हासिल की. बसपा की भी पुरानी स्थिति है. उसके जनाधार में पिछले विधानसभा चुनाव में जो बिखराव हुआ था प्रभावशाली, काफी धनी और स्थानीय प्रत्याशी देने के बावजूद वह संगठित नहीं दिखाई दे रहा. दलित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट भी इसे मान रहे हैं. ओमप्रकाश राजभर चुनाव प्रचार में हैं और उनकी जाति के वोटरों का बड़ा हिस्सा सपा को मिलने की उम्मीद है. बसपा उम्मीदवार जमाली को उलेमा कांउसिल ने सपोर्ट किया है. लेकिन यहाँ की राजनीति के जानकार कहते हैं कि उलेमा कांउसिल का अब पहले जैसा न कद है न उनकी राजनैतिक साख़ बची है. हाँ मुबारक़पुर विधानसभा से और दलित जातियों खासकर जाटव जाति का वोट उन्हें मिलेगा लेकिन मुस्लिम वोटों में भाजपा की इच्छा के अनुरूप वह टूट कराने में सफल नहीं हो पाएंगे.

जातियों की गणित में यादव, मुस्लिम समुदाय के बाद यहां करीब 20 प्रतिशत सवर्ण और इतने ही दलित हैं बाकी अन्य पिछड़ी जातियां हैं जो भाजपा के साथ बड़ी संख्या में हैं. इसलिए भाजपा ने इन जातियों के अपने मंत्रियों को पूरे चुनाव में लगाए रखा. सपा के लिए आजम खान ने भी आकर दो सभाएं की हैं. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अखिलेश यादव नहीं आए और बहन मायावती ने भी कोई चुनावी सभा नहीं की है.

इन सरकारों उन सरकारों के विकास के दावों के बीच आजमगढ़ पूर्वांचल के पिछड़े जिलों की तरह ही कुशासन की मार झेल रहा है. जिले में न कोई उद्योग है न ही उसके कोई आसार न आश्वासन. शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुविधाओं का जो हाल सब जगह है यहां भी स्थिति वही है. खाड़ी देशों में छोटे मोटे कामकाज के लिए जिले से हर समुदाय के लोग जाते हैं. यहां कृषि के अलवा यही सबसे ज्यादा रोजगार का जरिया है. हाल की स्थितियों ने हिंदू मुस्लिम दोनों समुदाय के ऐसे लोगों को चिंता में डाल दिया है. किसानी की हालत भी काफी खराब है. सारे सरकारी दावों और किसानों के खेत से फसल खरीदने के दावे की हालत यह है कि 15 जून तक गेंहू की अनुमानित खरीद के मुकाबले जिले में किसानों से उसका सिर्फ 19 प्रतिशत ही खरीदा जा सका है जबकि गेंहू खरीद में आजमगढ़ राज्य का पांचवे नंबर का जिला है.

फिलहाल आज प्रचार थमने के साथ सबने अपने अपने जीत के दावे किए हैं. राजनीति के गुणा गणित करने वाले परिणाम के आने के पहले तक अपने अपने पक्ष में समीकरण बताते चौक चौराहे पर नज़र आएंगे. लेकिन जैसी स्थितियां बनीं हैं उसमें चुनाव में मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के बीच ही होता दिख रहा है.

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments