भारत ने पहलगाम हमले का जवाब देते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर ‘ के नाम से पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों पर हमले कर आतंकियों के नेटवर्क को भारी क्षति पहुंचाई थी। प्रधानमंत्री का दावा तो है कि उन्होंने आतंकवादियों की कमर तोड़ दी है। इससे आगे बढ़कर वे पाकिस्तान के सीने पर वार करने की भारतीय क्षमता का गुणगान कर रहे हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता-असफलता को लेकर भारत सहित विश्व में अनेक तरह की अंतर कथाएं चल रही हैं। सवाल यह है कि अगर पाकिस्तानी डीजीएमओ के एक फोन कॉल पर भारतीय सेना के डीजीएमओ सकारात्मक जवाब दे सकते हैं और 2 घंटे के अंदर ही युद्ध विराम पर सहमति बन सकती है, तो भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के पहले इस दिशा में क्या कोई कदम उठाये थे ? क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे? पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब करते हुए उसपर दबाव नहीं बनाया जा सकता था, कि वह अपनी धरती से आतंकवाद का निर्यात बंद करे, जिसकी उम्मीद 4 दिन के टकराव के बाद की गयी।
शायद, भाजपा के आंतरिक राजनीति की जरूरत रही होगी कि वह ऐसा इवेंट खड़ा करे! इस इवेंट बाजी से ही मोदी का आभामंडल खड़ा किया गया है।
युद्ध विराम के बाद मोदी जी प्रचार अभियान पर निकल गए हैं। इसलिए विपक्ष के नेताओं को भी समूचे घटना क्रम पर प्रश्न खड़ा करने का मौका मिल गया । कांग्रेस ने सरकार से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं। जिसका जवाब देने की जगह भाजपा के प्रवक्ता और समर्थक अपने पुराने रास्ते पर आ गए और राहुल गांधी तथा अन्य नागरिकों को देशद्रोही, पाकिस्तान परस्त कहने लगे हैं।
खैर, भारत की आन्तरिक राजनीति में यह होना ही था। लेकिन सवाल इससे बड़ा है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का भारतीय राजनीति, सामाजिक जीवन और उपमहाद्वीप की औद्योगिक, आर्थिक और सामरिक नीतियों पर किस तरह के प्रभाव पड़ने जा रहे हैं।
‘आपरेशन सिंदूर’ के शुरू होते ही विदेशी मीडिया से तरह-तरह की खबरें आने लगी। भारतीय और विदेशी मीडिया में सर्वथा भिन्न तरह की खबरें चल रही थी। हम इसे भारत विरोधी प्रचार कहकर खारिज नहीं कर सकते। आठ तारीख को विदेशी मीडिया कथित तौर पर राफैल के मार गिराये जाने की खबरें देने लगा। जिससे फ्रांस सहित यूरोप में सन्नाटा छा गया।
यूरोप के सदमे का मूल कारण था कि आधुनिक हथियार उद्योग में सर्वथा नये एशियाई देश का धमाकेदार प्रवेश। खबरों के अनुसार पहली बार पाक ने चीन निर्मित युद्धक विमान , मिसाइल रोधी सिस्टम तथा राडार प्रणाली का इस्तेमाल किया । एक खबर के अनुसार इस समय पाकिस्तान की सेना के पास 80% युद्ध सामग्री चीन निर्मित है । कहने का मतलब यह है कि इस युद्ध में पाकिस्तान ने यूरोप और अमेरिकी हथियारों पर विश्वास नहीं किया। पहली बार यूरोप और अमेरिका के एकाधिकार को उस क्षेत्र में चुनौती मिली है, जहां पिछले 300 वर्षों से उनका कब्जा था। यानी रक्षा उत्पादन उद्योग । पाक के अमेरिकी सैन्य संधि का सदस्य देश होने के कारण वह मुख्यतः अमेरिकी हथियारों और युद्ध सामग्री पर निर्भर रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से यह स्थिति पलट गई है।
22 अप्रैल के बाद विश्व समुदाय यह मान कर चल रहा था, कि भारत इस बार कोई न कोई बड़ी कार्रवाई करेगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के पहले ही दिन 7 मई को ट्रंप ने यह स्वीकार किया कि उन्हें पहले से उम्मीद थी कि भारत कुछ बड़ा करने वाला है।
रक्षा विशेषज्ञ यह बात कहने लगे कि भारत इस बार बालाकोट से ज्यादा विस्तारित और कड़ी कारवाई कर सकता है। इसलिए 22 अप्रैल के बाद से ही यह चर्चा शुरू होने लगी थी कि अगर भारत बालाकोट जैसी कोई कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान के पास बचाव के क्या रास्ते होंगे? सुरक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी का कहना था कि अगर भारत हमला करता है तो उसे पाकिस्तान से नहीं बल्कि चीन से लड़ना होगा। या आप यह कह सकते हैं कि पाक चीन के संयुक्त मोर्चे से लड़ना होगा।
यह भी बात आ रही थी कि चीन ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी छलांग लगाई है। हालांकि चीन की खासियत है कि वह अपनी तैयारियों, उपलब्धियों और योजनाओं के बारे में किसी भी प्रकार की कोई जानकारी दुनिया को नहीं देता है। जब तक कि वह पूर्णतया सफल नहीं हो जाता है। दुनिया को चीनी उपलब्धियों की जानकारी तब होती है, जब चीन परीक्षण कर चुका होता है। जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में चीन ने जब छलांग लगा ली, तब दुनिया इसे जान पायी बालाकोट में भारत द्वारा की गई ऐयर स्ट्राइक के 6 वर्ष बाद सिंधु में बहुत पानी बह चुका है।
गलवान के बाद चीन ने पश्चिमोत्तर इलाके के बारे में अपनी रणनीति बदल दी। पहले चरण में उसने पाकिस्तान को आधुनिक युद्धक सामग्रियों से सुसज्जित कर एक ठोस रक्षा प्रणाली का जाल खड़ा किया है। यह बातें रक्षा विशेषज्ञों द्वारा 22 तारीख के बाद से कही जाने लगी थी। इसलिए अगर भारत कोई बड़ी कार्रवाई करने की तैयारी कर रहा है तो उसे इन बदली हुई परिस्थितियों का अवश्य संज्ञान लेना होगा।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ जब शुरू हुआ तो प्रेक्षकों को पाकिस्तान के साथ परंपरागत सहयोगी अमेरिका दिखाई दे रहा था। चूंकि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध विकसित किया है। इसलिए अनुमान था कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ पहले की तरह से नहीं खड़ा होगा। यह अनुमान सही नहीं निकला। इसके अलावा चीन की भूमिका को लेकर भी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा थी कि चीन पाकिस्तान को प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से पूरी मदद करेगा । चीन ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता की रक्षा का ऐलान करके अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया था।
भारत के क्वॉड का सदस्य होने के बाद चीन पाकिस्तान की तरफ ज्यादा झुक गया। चीन ने हाल के वर्षों में पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को विकसित करने में भारी मदद की है। ऑपरेशन सिंदूर के दूसरे दिन 8 तारीख से ही यूरोप और अमेरिका में एक खबर चलने लगी। जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में राफेल के शेयर धड़ाम से गिर गए और चीनी फाइटर जेट जे 10सी के शेयरों में अचानक तेजी देखी गई । राजनीतिक विश्लेषक चाहे जितने भी स्मार्ट हों, वे बाजार का मुकाबला नहीं कर सकते। दुनिया में जो कुछ बड़ा होना था वह 7 मई को हो चुका था।उसकी तुलना भारत और पाकिस्तान में हुए नुकसान या लाभ से करने का कोई मतलब नहीं।
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जारी है और आतंकी घटना को ‘एक्ट आफ वार’ घोषित करके यह तो बता दिया कि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति की संभावना अभी बहुत दूर है। इसलिए भारत का युद्धरत न्यू नॉर्मल नये तरह की स्थिति खड़ा करने जा रहा है। अगर प्रत्यक्ष युद्ध नहीं भी चल रहा है तो युद्ध के बादल छाए रहेंगे। भारतीय प्रधानमंत्री के युद्ध विराम के बाद दिए जा रहे बयानों और उन्मादी भाषणों से आतंकवादियों के जन समर्थन के बढ़ने का यह सुनहरा अवसर होगा।
9/11 के बाद अमेरिका ने राष्ट्र संघ सहित यूरोपीय यूनियन को अपने पक्ष में करते हुए आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध की घोषणा की थी । उसमें उसने कहा था कि लोकतांत्रिक विश्व का प्रधान विरोध इस्लामी आतंकवाद बनाम लोकतंत्र और विश्व से है। इसी क्रम में उसने अफगानिस्तान के तालिबानी सरकार पर हमला किया और वहां के सत्ता संस्थान को तहस-नहस करके कठपुतली सरकार बना दी । इसके अलावा इराक में रासायनिक हथियारों का जखीरा होने का झूठा आख्यान गढ़कर सद्दाम हुसैन की सरकार गिराई और उनका कत्ल कर दिया।
लेकिन सद्दाम हुसैन को मार गिराने के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का चरित्र बदल गया। वस्तुत: अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के युग का अंत स्वीकार कर लिया है। यही कारण है कि 20 वर्ष तक युद्ध चलाने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में उन्ही तालिबानियों को सत्ता सौंप दी, जिनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी वैश्विक युद्ध अमेरिका की अगुवाई में चल रहा था। अमेरिका के लिए इस्लामी आतंकवाद विरोधी युद्ध का चैप्टर बंद हो चुका है।
भारत को यह गलतफहमी निकाल देना चाहिए कि अमेरिका के एजेंडे में कहीं भी इस्लामिक आतंकवाद का मुद्दा शेष नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के हिंदू अंधराष्ट्रवादी अभी भी इस एजेंडे के साथ चिपके हैं। जब अमेरिका अपने सबसे धुर विरोधी तालिबानियों से समझौता कर सकता है, तो हम भारतीय उपमहाद्वीप में शांति के लिए प्रयास क्यों नहीं कर सकते? लेकिन पिछले दो दिनों से भारतीय प्रधानमंत्री की भाषा में जिस तरह की सतही बयानबाजी दिखाई दे रही है, वह इस उपमहाद्वीप के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इससे लगता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध की तैयारी जारी रहेगी । शेख हसीना के साथ मोहब्बत और बड़े भाई जैसे दंभ भरे व्यवहार के चलते अब इसमें बांग्लादेश में भी शामिल होने के लिए कट्टरपंथी आवाज़ें तेज हो रही है। इसलिए स्थिति थोड़ा और बिगड़ती जा रही है। भारत को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि अमेरिका और चीन जैसे देश इस जटिल स्थिति का फायदा उठाने से परहेज करेंगे। वस्तुतः संघ और भाजपा ने जिस तरह का माहौल पिछले लंबे समय से भारत में बना रखा है। अब वही उसके गले की फांस बनने जा रहा है।
मल्टीनेशनल कंपनियां परिस्थितियों में आए परिवर्तन का पूर्वानुमान बेहतर ढ़ंग से कर लेती हैं। ऑपरेशन सिंदूर की निरंतरता की घोषणा के बाद हथियार कंपनियों ने समझ लिया कि उनके लिए भारतीय उपमहाद्वीप में विश्व का सबसे बड़ा बाजार खुलने जा रहा है। वे इस मौके का फायदा उठाने के लिए लाॅबिंग में जुट गई है। विश्व मीडिया में जिस तरह से अमेरिकन एफ -35, फ्रांस के राफेल और चीनी जे10 सी को लेकर कथाएं गढ़ी जा रही हैं, उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि हमारा खित्ता हथियारों का बड़ा बाजार बनने जा रहा है और भारतीय उपमहाद्वीप वैश्विक हथियार कंपनियों के आखेट स्थल में बदलने जा रहा है।
क्या इस खित्ते के रहनुमा इस खतरे से अंजान है? नहीं। लगता है, वे इसमें सहभागीदार बन गये हैं। हथियार का धंधा दुनिया में सबसे ज्यादा मुनाफे और कमीशन खोरी का धंधा है। भारत के नागरिक बोफोर्स तोप और राफेल खरीद के दौरान भ्रष्टाचार को लेकर खड़े हुए विवाद को अवश्य याद रखे होंगे।
वर्तमान समय में दुनिया में दो पॉइंट ऐसे हैं, जहां प्रत्यक्ष युद्ध चल रहा है ।
एक इजरायल फिलिस्तीन के बीच का गैर बराबरी वाला युद्ध । जहां फिलिस्तीन गोला-बारूद, हथियार, मिसाइल, एयर क्राफ्ट यहां तक ड्रोन भी खरीदने की स्थिति में नहीं है। इसलिए हथियार कंपनियों में उनको लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं है। वहां गाजा में तो वैसे ही एकतरफा बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों, की मौत का तांडव चल रहा है। इसराइल का हथियार उद्योग बहुत विकसित व समृद्ध है और उसके पीछे अमेरिका के साथ ईयू के देश खड़े है। जो मुंह मांगे युद्ध सामग्री देने के लिए तैयार बैठे हैं । सच कहा जाए तो इजरायल वह शिकारी बाज है जो साम्राज्यवादी अमेरिका के हथेली पर बैठकर फिलिस्तीनियों और अरब नागरिकों का शिकार कर रहा है। हालांकि इसराइली हमले का शिकार कभी-कभी आसपास के देश लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, तुर्की, मिस्र, और ईरान तक होते रहें हैं। फिर भी इस क्षेत्र में रूस फ्रांस अमेरिका के हथियार कंपनियों के लिए कुछ बाजार तो है । लेकिन उसके और ज्यादा बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है।
दूसरा यूक्रेन-रूस युद्ध है। जो पिछले ढाई-तीन वर्षों से चल रहा है। जिसने अमेरिकी और यूरोपीय हथियार उद्योग को जीवित रखा है । रूस एक बड़ी सैन्य आणविक शक्ति है। इस कारण अमेरिका और यूरोपीय यूनियन इस युद्ध को अन्य देशों तक नहीं फैलने देना चाहते हैं। जिससे पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की हथियार कंपनियों के लिए बड़ा बाजार नहीं मिल पा रहा है । आमतौर पर लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में शांति है। इस कारण अमेरिका के हथियार उद्योग में भारी मंदी छाई है। उसके फाइटर गोला बारूद कबाड़खाने में पड़े हैं ।जिनके ग्राहक नहीं मिल रहे।
दुनिया में सैकड़ों अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं। जो महाबली अमेरिका के सैन्य औद्योगिक कांप्लेक्स के सुरक्षा कवच रहे हैं। लेकिन शीत युद्ध के खत्म हो जाने और साम्यवादी खतरे के शिथिल पड़ जाने से अब ये अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। अमेरिका की ताकत उसका सैन्य उद्योग और पेंटागन रहा है। जैसे-जैसे दुनिया में शांति का विस्तार हुआ अमेरिका की शक्ति कमजोर होती गई। इस दौर में अरब जगत की डरी हुई राजशाहियां ही अमेरिकी सरकार और हथियार कंपनियों के दबाव में युद्धक विमान और हथियारों की बड़ी ग्राहक है चूंकि उन्होंने अरब बसंत का झंझावात देखा है, इसलिए वे अमेरिका की गोद में जहालत झेलते हुए भी बैठे रहना चाहते हैं। इसी हफ्ते ट्रंप की सऊदी अरब, यूएई, दुबई और कतर जैसे देशों की यात्रा के दौरान हुए भारी भरकम हथियारों के सौदे से भला और क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है!
रूस पहले से ही एक बड़ा हथियार निर्माता देश है। भारत, सीरिया, लीबिया, मिस्र जैसे अनेक विकासशील देश सोवियत रूस के हथियारों और लड़ाकू विमानों के ग्राहक रहे हैं। भारत में मिग 21 व 25 विमानों का बड़ा क्रेज रहा है। जिन्होंने 1971 के भारत- पाक युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब न तो वह सोवियत संघ रहा न उसकी अंतरराष्ट्रीय शक्ति और साख।
पुतिन एक जड़ तानाशाह के रूप में सोवियत काल में निर्मित ढांचे पर पलथी मार के बैठे हैं । पुतिन कालीन रूस के पास दुनिया को देने के लिए कुछ नहीं है, अलावा ओलार्गी टाइप तानाशाही। रूस किसी नई खोज, इनोवेशन या विकास के किसी नए रास्ते को इजाद करने की क्षमता खो बैठा है। इसलिए अभी भी एक बड़ी ताकत होते हुए भी उसकी अंतरराष्ट्रीय साख लगातार घटती जा रही है।
21वीं सदी के शुरुआत से ही यह संकेत मिलने लगा था कि चीन विश्व मंच पर एक नई शक्ति के रूप में दस्तक देने जा रहा है। आमतौर पर शांति के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति और संगठित उत्पादक शक्तियों के सही समायोजन तथा पूंजी के उचित एलोकेशन के साथ चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया है । आज विश्व उपभोक्ता बाजार का एक तिहाई चीन के हाथ में है ।
लेकिन अभी दुनिया को चीन के उन्नत तकनीकी, सैन्य शक्ति का सही आभास नहीं था। रक्षा विशेषज्ञों और अन्य प्रेक्षकों के अनुसार चीन को एक ऐसा मौका चाहिए था।जहां, वह अपनी सामरिक शक्ति की ताकत दुनिया को दिखा सके। भारत सरकार द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने चीन की सामरिक और शक्तिशाली लड़ाकू विमानों और अन्य युद्ध तकनीक का अहसास दुनिया को करा दिया है। जिसको लेकर यूरोप, अमेरिका भौचक हैं।
दुनिया को यह जानकारी है कि चीन को घेरने के लिए अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, थाईलैंड, फिलीपीन, मलेशिया, न्यूजीलैंड सहित उत्तर अटलांटिक सागर के देशों में 365 से ज्यादा सैन्य अड्डे बना रखे हैं, जो किसी भी समय चीन के लिए बड़ी चुनौती बन सकते थे। अमेरिका ने कभी अपना उद्देश्य छिपाया भी नहीं था। चीन को इस खतरे का गहराई से अहसास था और उसने इस स्थिति का सामना करने की रणनीति पर धीरे-धीरे अमल किया। अब जब वह बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है और ट्रंप के टैरिफ वार में उसने अमेरिका को शिकस्त दे दी है, तो उसके लिए स्वाभाविक था कि कोई ऐसा अवसर मिले जहां वह अपनी सामरिक शक्ति का दुनिया को अहसास करा सके।
यह सुनहरा अवसर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय चीन को मिल गया। भारत के सैन्य अभियान के बाद जहां चीन में जश्न मनाया जा रहा है ।चीनी मीडिया चीन की हवाई क्षमता मिसाइल व मिसाइल रोधी सिस्टम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेटेलाइट के संयुक्त क्षमता को लेकर नई-नई कहानियां प्रचारित कर रहा है। वहीं अमेरिका में भी खुशी का माहौल है । विश्व बाजार में अमेरिका के एफ-35 जेट के ग्राहक नहीं मिल रहे थे । भारत जैसे देश फ्रांसीसी राफेल को ज्यादातर तरजीह देने लगे थे। अमेरिका समर्थक इंडोनेशिया भी 30 राफेल विमान की डील कर रहा था।( जो शायद जब खतरे में पड़ चुकी है)।
पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए थे, तो यह खबर प्रमुखता से आई थी कि ट्रंप ने मोदी पर एफ-35 जेट विमान खरीदने के लिए दबाव डाला था। उस समय एलन मस्क ने f-35 को कबाड़ा कहा था। लोगों का कहना है कि एलन मस्क ने चीन के हवाई विमान के बाजार के विस्तार के लिए इस तरह की बात कही थी। क्योंकि चीन में उनके व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं।
ताजा खबरों के अनुसार चीन 5th जेनरेशन के जे-35सी विमान पाकिस्तान को देने के लिए राजी हो गया है। अभी दुनिया के बाजार में साढ़े चार जनरेशन के लड़ाकू विमान ही उपलब्ध हैं। हमारा राफैल भी 4.5 जेनेरेशन का ही विमान है। थोड़े दिन पहले ही खबर आई थी कि भारत 30 और राफेल खरीदने वाला है। स्पष्ट है कि इससे प्रतिद्वंदिता बढ़ेगी। स्विट्जरलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड सभी भारतीय उपमहाद्वीप में बदल रहे सैन्य संतुलन पर नजर लगाए हुए हैं।
बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध पिछले 55 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। बांग्लादेश की सरकार भी भारत से बिगड़ते संबंधों की रोशनी में इस होड़ में शामिल हो सकती है। बांग्लादेश के कार्यवाहक राष्ट्रपति जब चीन गए थे, तो उनके एक बयान पर भारत में तूफान खड़ा हो गया था। उन्होंने कहा था कि भारत के सात राज्य सामुद्रिक सीमाओं से दूर हैं। उनकी भू-सीमा बांग्लादेश से घिरी है। इस राजनीतिक कूटनीतिक बयान के अनेक अर्थ निकाले जाने लगे थे।
स्पष्ट है कि भारतीय उपमहाद्वीप में उथल-पुथल मची है। भारत के साथ उसके पड़ोसी देशों के रिश्ते लगातार बिगड़ते गए हैं। अभी तक नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश भारत के साथ किसी तरह के टकराव से बहुत दूर थे, लेकिन स्थितियां बदल रही हैं। नेपाल में राजशाही के पुनर्वापसी की मांग के सवाल पर नेपाल में जो राष्ट्रवादी उभार है, वह अंतर्वस्तु में भारत विरोधी है। फिलहाल श्रीलंका अभी तटस्थ बना हुआ है।
भारत में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार है। जो अंध राष्ट्रवाद को हवा दे रही है। इसके अनेकों मंत्री, मुख्यमंत्री और स्वयं प्रधानमंत्री तक इस तरह के बयान देते रहते हैं, जिससे पड़ोस के छोटे मुल्कों में अनेक तरह की शंकाएं पैदा होती हैं। संघ का अखंड भारत का पाखंड अब नकारात्मक प्रभाव दिखाने लगा है । पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों में उतार-चढ़ाव, झड़प और युद्ध तक होता रहा है। लेकिन शेष उपमहाद्वीप के देशों में अभी तक शांति और सद्भाव का संबंध था। लेकिन पिछले 11 सालों के मोदी शासन ने हालात को जटिल बना दिया है।
लगभग 200 करोड़ आबादी वाले भारतीय उपमहाद्वीप में अगर अशांति फैलती है, तो यह दुनिया का एक ऐसा विशाल भूक्षेत्र होगा, जहां बड़े पैमानों पर हथियारों की खपत बढ़ जाएगी। और ये सभी पड़ोसी विकासशील देश आत्मघाती होड़ में उलझ जायेगे, जिसका खामियाजा हमें अपनी जनकल्याणकारी और विकास परक योजनाओं की बलि देकर चुकाना पड़ेगा। यह उपमहाद्वीप शेष विश्व के मुकाबले और पीछे चला जाएगा। यहां दुनिया के सबसे गरीब, बेरोजगार, अशिक्षित और कुपोषित लोग रहते हैं। वैसे ही हमारी प्रति व्यक्ति आय यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी-दक्षिणी एशिया के मुकाबले बहुत नीचे है। मानव विकास सूचकांक में हम दुनिया के सबसे निचले पायदान पर पहले से ही विराजमान हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जारी रहने की घोषणा करके हमारे प्रधानमंत्री ने युद्ध के स्थायित्व की घोषणा कर दी है । वह घूम-घूम कर देश में जिस तरह का अभियान चला रहे हैं, इसकी आवाज निश्चय ही भारतीय सीमा के पार पहुंच रही होगी। इसका परिणाम यह होगा कि हम अंतहीन टकराव में फंस जायेंगे । 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत खो देने के बाद भाजपा और संघ परिवार युद्धोन्माद से ग्रसित हैं। वे एक बार फिर अंधराष्ट्रवादी आंधी खड़ा कर अपने खोये जनाधार को अपने पाले में खींच लाना चाहते हैं। चाहे इसके लिए भारतीय जनगण को कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के जन गण यहां के शासको के अंध राष्ट्रवाद के झांसे में न फंसकर युद्ध विरोधी तहरीक चलाने के लिए कमर कस के खड़े होंगे। तभी शायद दुनिया के सबसे खूबसूरत विस्तारित सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, पद्मा के मैदान को हथियार और गोला-बारूद बनाने वाली कंपनियों के डंपिंग ग्राउंड बनने से रोका जा सकता है। उम्मीद सिर्फ 200 करोड़ जन-गण वाले भारतीय उपमहाद्वीप के बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुसंस्कृत वाले नागरिकों से है।
वैसे इन सभी सातों देशों में शांति की आवाज बहुत तेजी से उठ रही है, जिसे दबाने का हर संभव प्रयास शासकों द्वारा हो रहा है। लेकिन इसके खिलाफ चल रहे प्रतिरोध से ही इन मुल्कों में लोकतंत्र का जो कुछ भी बचा खुचा ढांचा है, उसे बचा पाएंगे और अमन चैन कायम रख सकेंगे!

