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वेनेजुएला पर अमेरिकी आक्रमण

शांति दूत की खाल ओढ़े हुए साम्राज्यवादी  भेड़िया अंततोगत्वा अपने असली रूप में सामने आ गया है। तथाकथित सभ्य पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया की रहनुमाई करने वाला अमेरिका  खूंखार वित्तीय पूंजी की कोख में पाला-पोसा गया भेड़िया ट्रम्प ने एक देश का और शिकार कर लिया। आश्चर्य तो तब होता है जब दुनिया के लगभग 200 राष्ट्र एक आजाद मुल्क की हत्या होते हुए देख रहे हैं।अमेरिका फर्स्ट की उन्मादी नीति को आगे बढ़ाते हुए डोनाल्ड ट्रंप के हत्यारे दस्तों ने रात के अंधेरे में वेनेजुएला की राजधानी काराकस पर आक्रमण कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अपहरण कर लिया और उन्हें खूंखार मुजरिम की तरह जंजीरों से बांध अमेरिका ले जाया गया है । उन्हें न्यूयार्क  के फेडरल कोर्ट में पेश किया गया। जहां उनपर ड्रग टेररिज्म  के आरोप में  जेल में डाल दिया गया है । अमेरिका अपनी इस कार्रवाई को जायज ठहरने के लिए तीन मुख्य कारण बता रहा है। एक -मादुरो के नेतृत्व में वेनेजुएला नारकोटिक्स की सप्लाई यूएसए में कर रहा है।दो- 2024 के चुनाव में मादुरो ने चुनावी धांधली करके अमेरिकी एजेंट मारिया को हरा दिया था। इसे आधार बना कर मादुरो को तानाशाह कहा जा रहा है। तीसरा आरोप है कि वे मशीन गन जैसे हथियार अपने पास रखते हैं। अपने वर्ग विरोधियों पर ऐसे हास्यास्पद आरोप लगाना अमेरिका की  विश्व रणनीति का पुराना मॉडल  है।

ये सभी आरोप उस उद्दंड और हत्यारी सुपर पावर यूएसए के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हैं। जिसके गुंडों ने 2021 में ट्रंप के चुनाव हारने के बाद वॉशिंगगटन डीसी पर कब्जा कर लिया था और‌ वे सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे। आज वही  ट्रंप वैश्विक दरोगा बनने की कोशिश कर रहा है। जिस देश का इतिहास ही आग खून मांस बारूद और गोलियां से लिखा गया है। जिस देश की आधारशिला ही श्वेत यूरोपियनों ने अमेरिकी महाद्वीप  के करोड़ों मूलनिवासियों  को उनके मूल स्थान से नरसंहारों की अनंत श्रंखला द्वारा विनाश और विस्थापन पर रखी गई हो। जिन श्वेत आक्रमणकारियों ने अमेरिकी महाद्वीप के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध  के भूभागों पर  कब्जा कर लिया हो। वही आज  वेनेजुएला के नागरिकों को शांति, लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं। श्वेत नस्लवादियों द्वारा मूल अमेरिका वासियों के नरसंहार की मिसाल  मानव सभ्यता की किसी भी काल खंड में आप को नहीं मिलेगी। आज युद्ध पिपासु अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने खूनी इतिहास को नए सिरे से दुहराने की कोशिश कर रहा है । जबकि 21वीं सदी में मानव सभ्यता ने नई छलांग लगा दी है। इसलिए लोकशाही, आजादी, बराबरी और देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता के झंडे तले आगे बढ़ रही मानव सभ्यता के रथ के पहिए को दुनिया का कोई भी क्रूर शासक पीछे नहीं घुमा सकता।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूके की बादशाहत खत्म होने से साम्राज्यवादी विश्व का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में आया। इस दौर में दुनिया  भाप की उर्जा को पीछे छोड़ते हुए पेट्रोकेमिकल के युग में प्रवेश कर गई थी। तभी से यूएसए ने पेट्रोलियम भंडारों पर कब्जा बनाए रखने के लिए दुनिया में मानवता के खिलाफ इतने अपराध किए हैं, जिसकी अगर फेहरिस्त बनाई जाए तो हजारों पन्नों की पोथी लिखनी होगी। मोटे आंकड़ों के अनुसार अब तक 57  से ज्यादा देशों में अमेरिका ने बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन कराए हैं। चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ किया है और उनकी जगह खूंखार सैन्य तानाशाहो या कट्टरपंथी मजहबी ताकतों को सत्ता में बैठाया है।और  विशाल सैन्य शक्ति के बल पर इन अमेरिकी कठपुतलियों की रक्षा करता रहा है । जिसकी कीमत धूर्त व्यापारी की तरह उन देशों की प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का लाइसेंस अपने हाथ में सुरक्षित रखकर वसूलता रहाहै। जो अमेरिकी जनतंत्र के पाखंडी रिकॉर्ड को समझने के लिए काफी है।

इसकी लैटिन अमेरिका में अनेकों मिसालें हैं । चिली, पनामा, होंडूरास, ग्वाटेमाला, एलसाल्वाडोर, ग्रेनेडा से होते हुए अब यह लुटेरा गिरोह वेनेजुएला में भी वही इतिहास दोहराने जा रहा है। लेकिन अमेरिकी कंपनियों के मुनाफा कूटने की छिपी लिप्सा  लिए हुए आधुनिक उंदंड तानाशाह ट्रंप शायद इतिहास की गति को समझने में अक्षम है। पिछले 70 वर्षों के दौरान अमेजन में न जाने कितने करोड़ क्यूबिक बैरल पानी बह चुका होगा। हम जानते हैं कि इतिहास का हर लुटेरा  तानाशाह अपने अंत की कथा खुद अपने हाथों से ही लिखता रहा है। संभवतः वेनेजुएला की पहाड़ियों, खदानों, खेतों और मैदानों में  महान प्रतिरोध का इतिहास लिखा जाने वाला है।

लैटिन अमेरिका के लगभग दो दर्जन देशों के करोड़ों जनगण के दिलों दिमाग पर यूनाइटेड स्टेट द्वारा छोड़े गए दर्द और घाव के निशान अभी भी देखे जा सकते हैं। यही कारण है कि  अमेरिका से लेकर पनामा, अर्जेंटीना, ब्राजील, बोलबिया, कोलंबिया, पेरू, उरुग्वे, परागुवे  जैसे देशों से लेकर यूरोप, एशिया और अफ्रीका में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं । इस समय धरती वेनेजुएला के पक्ष में लाखों पदचापों की आवाजों से गूंज रही है। कौन नहीं जानता है कि 1973 में चिली में चुनी हुई अलेंदे की वामपंथी सरकार  का सैनिक तानाशाह पिनोटे द्वारा तख्ता पलट कराया गया था। जिसमें राष्ट्रपति अल साल्वाडोर अलेंदे सहित उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्री, सांसद और हजारों कम्युनिस्ट  कार्यकर्ता मारे गए थे। आल्पस पर्वत माला के प्रत्येक शिला पर अमेरिकी कठपुतली सरकारों की क्रूरता के निशान  आज भी मौजूद हैं। मुनाफाखोर  यूएसए के पूंजीपतियों के नियंत्रण वाली तांबे की कम्पनी का अलेंदे सरकार ने राष्ट्रीकरण करके अपने राष्ट्र की संपदा की रक्षा करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही वामपंथी सरकार ने भूमि सुधारों  द्वारा चिली के बुनियादी आर्थिक विकास की दिशा बदलने का प्रयास किया था। उस समय चिली सहित लैटिन अमेरिका के अधिकांश देशों में  हजारों एकड़ में फैली हुई अमेरिकी फार्मरों की जागीरें थी।
यही  ऐतिहासिक कदम 1999 में राष्ट्रपति बनने के बाद करिश्माई राष्ट्रवादी नेता हृयूगो शावेज ने उठाये थे। जब उन्होंने वेनेजुएलाई अमेरिकी पेट्रोल कंपनियों का राष्ट्रीय करण कर लिया था। उस समय भी उनका तख्ता पलट कर यूएस की कठपुतली सरकार बनाने की कोशिश हुई थी । जिसे वेनेजुएला के लाखों लोगों ने अपने साहसिक एकजुटता और जन गोलबंदी द्वारा विफल कर दिया था। राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की महान उपलब्धियों को आगे बढ़ाने का काम मजदूरों के नेता से राष्ट्रपति बने निकोलस मादुरो आगे बढ़ा रहे थे।

इसलिए ट़्प का तानाशाही मिटाकर लोकतंत्र की स्थापना तथा ड्रग के खिलाफ युद्ध जैसे झूठे नैरेटिव, जिसे कॉर्पोरेट पूंजी  नियंत्रित वैश्विक प्रचार तंत्र द्वारा विश्व जनगण के दिमाग में बैठाने का षडयंत्र रचा जा रहा है, जो लैटिन अमेरिकी देशों की जनता के गले नहीं उतरने वाला है। यह सर्वबिदित है कि अमेरिकी भीमकाय तेल कंपनियों ने भारी चंदा देकर डोनाल्ड ट्रंप को इस बार राष्ट्रपति बनने में मदद की थी। इन कम्पनियों का दबाव था कि वेनेजुएला पर आक्रमण करके वहाँ की सत्ता पर नियंत्रण हो। जिससे तेल का कारोबार अमेरिकी कम्पनियों के हाथों में पुनः वापस आ सके। 2018 में में भी मादुरो का तख्ता पलट का प्रयास हो चुका है ।लेकिन अमेरिका उसमें कामयाब नहीं हो सका था।

2023 के चुनाव में विपक्षी नेता  मारिया मचाओ ने तो खुलेआम अमेरिका से मदद मांगी थी कि वह मादुरो को हराने में उनको मदद करें। उस समय अमेरिका ने मारिया का खुला समर्थन किया था। चुनाव को प्रभावित करने और निकोलस मादुरो को हराने केलिए  करोड़ों डॉलर खर्च किए गए। उस समय मारिया ने एलान किया था कि जीतने के बाद वह अमेरिकी कंपनियों की पुनर्बहाली करेगी। इसलिए जब मारिया मचाओ को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, तभी स्पष्ट हो गया था कि अमेरिकी नेतृत्व वाला विश्व साम्राज्यवादी खेमा आगे कौन सा कदम उठाने जा रहा है। इनके लिए वैश्विक  शांति,  एकता और लोकतंत्र के दूत वही होते हैं जो  साम्राज्यवादी खेमे की चाकरी करने के लिए तैयार हो।

निकोलस मादुरो का प्रारंभिक जीवन काराकस में बस ड्राइवर के रूप में शुरू हुआ था। धीरे-धीरे में प्रगतिशील वामपंथी विचारों से जुड़ गए।उनकी सक्रियता को देखते हुए काराकस बस ड्राइवर एसोसिएशन  का अध्यक्ष चुना गया। संगठन का अध्यक्ष बनने के बाद ट्रेड यूनियन नेता के रूप में संघर्ष करते हुए वे मजदूरों में लोकप्रिय होते गए । उस समय वेनेजुएला में अमेरिकी दखलंदाजी के खिलाफ राष्ट्रवादी आंदोलन उभार पर था। मादुरो मजदूरो की रहनुमाई करते हुए आंदोलनों मैं सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। धीरे-धीरे वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होते गये। जब  वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज सत्ता में आए तो मादुरो ने उनका समर्थन किया और उनके साथ मिलकर काम करना शुरू किया। 2002 में अमेरिकी निर्देशन में शावेज का तख्तापलट किया गया । उस समय मदुरो ने साहस के साथ काराकस के नागरिकों का नेतृत्व किया। जिससे  अमेरिका शावेज को काराकास से बाहर नहीं ले जा सका। व्यापक जनगोलबंदी के दबाव में अमेरिका को पीछे हटना पड़ा और शावेज की सत्ता में वापसी हुई। इस संघर्ष में निकोलस मादुरो का व्यक्तित्व  उभरकर सामने आया । वे धीरे-धीरे यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी में महत्वपूर्ण होते गए। 2011 में वे वेनेजुएला के उपराष्ट्रपति बने।  राष्ट्रपति  शावेज की कैंसर से मृत्यु के बाद उन्हें 2013 में वेनेजुएला का राष्ट्रपति बनाया गया। संघर्षशील व्यक्तित्व और प्रखर साम्राज्यवाद विरोधी विचारों के कारण मादुरो हृयगो शावेज के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बने। तभी से अमेरिकी सरकार  उन्हें सत्ता से हटाने में जुटी रही। इसके लिए सीआईए, एफबीआई और लैटिन अमेरिका में मौजूद अमेरिकी एजेंट सभी दिन-रात काम कर रहे थे, जिसमें वे 3 जनवरी 2026 को कामयाब हुए।

संयुक्त राज्य अमेरिका अट्ठारहवीं सदी में आजादी हासिल करने के बाद से लैटिन अमेरिका को अपना संरक्षित क्षेत्र मानता है। 1823 में राष्ट्रपति मुनरो द्वारा प्रतिपादित मुनरो सिद्धांत इसी उद्देश्य को हासिल करने का साम्राज्यवादी हथियार है। इसलिए यूएसए मध्य और दक्षिण अमेकी देशों पर  नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाता रहा है।

सैमुअल बोलिबर के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से प्रेरणा लेकर शावेज़ के नेतृत्व में शुरू हुई वेनेजुएलाई क्रांति को अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से भारी धक्का लगा है। राष्ट्रपति मादुरो अमेरिकी हिरासत में है। उनके ऊपर अमेरिकी कानून के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। हो सकता है सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी और अन्य साम्राज्यवाद विरोधी नेताओं की तरह अमेरिका मादुरो को भी खत्म करने में कामयाब हो जाए । लेकिन यूएसए द्वारा वेनेजुएला की संप्रभुता पर किए गए हमले के खिलाफ लैटिन अमेरिका में  यूएसए और ट्रंप विरोधी तूफान उठ खड़ा हुआ है । वह शांत नहीं होने जा रहा है । लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद विरोधी  संघर्षों की महान परंपरा है । इस समय वेनेजुएला, पेरु, कोलंबिया, ब्राज़ील सहित दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों में साम्राज्यवाद विरोधी और आजाद सम्प्रभु राष्ट्र की आकांक्षा लिए लाखों लोग सड़कों पर हैं। लगता है एक बार फिर लैटिन अमेरिका क्रांतिकारी  युद्ध के रास्ते पर आगे बढ़ गया है।   महान क्रांतिकारी अर्नेस्टो चेग्वारा की क्रांति कारी परंपरा फिर लैटिन अमेरिका के पहाड़ों, जंगलों, खदानों में नई ताकत के साथ जी उठी है।

निकोलस मादुरो की जगह राष्ट्रपति की शपथ लेने वाली डेल्सी रोड्रीगेज  ने कहा कि निकोलस मादुरो ही वेनेजुएला के वैधानिक राष्ट्रपति हैं और रहेंगे । उन्होंने बोलबेरियाई क्रांति का हवाला देते हुए कहा की क्रांति अमर है । उसे दुनिया की कोई ताकत पीछे नहीं धकेल सकती। वेनेजुएला की जनता अपने देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता, अखंडता और राष्ट्र के आत्मसम्मान की रक्षा करने में सक्षम है। इसे अमेरिकी  साम्राज्यवादी जितना जल्दी समझ लेंगे उतना ही अच्छा होगा। पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक साम्राज्यवाद विरोधी जन गण और राष्ट्र वेनेजुएला के साथ खड़े हैं। अमेरिका के इस अपराध की सजा निश्चय ही मिलेगी। ऐसा वेनेजुएला की जनता का दृढ़ संकल्प है।

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