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जेन-जी युवा की प्रत्यक्षतः अराजनैतिक रुझान

टिकेन्दर सिंह पँवार

केरलम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पुड्डुचेरी विधान-सभाओं के लिये सम्पन्न हालिया चुनावों में एक बात जो बहुत उभर कर सामने आयी है वह है, युवा-वर्ग विशेषतः जेन-जी की चुनाव प्रक्रिया से असम्पृक्ति। मुद्दों के प्रति अवस्थिति और भूत या भविष्य से बेपरवाह और वर्तमान में ही मगन जेन-जी की प्रवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में उन्हें सामान्यतः अराजनैतिक और कभी-कभी तो राजनिति-विरोधी भी समझा जाता है।

फिर भी अराजनैतिक होना, या ऐसा होने का दावा करना वास्तव में काल विशेष में हावी राजनीतिक विमर्श का शिकार हो जाना होता है। यहाँ मन्तव्य जेन-जी युवा को लेकर कोई फैसला देने का नहीं है बल्कि इस बात पर जोर दिया जाना है कि इस पीढ़ी का राजनीतिकरण केवल उनके लोकतंत्रीकरण के निमित्त नहीं वरन भारतीय संघ में उनके अधिकारों पर मजबूत दावेदारी स्थापित करने के लिये भी जरूरी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति की ओर उठाया जानेवाला पहला कदम है प्रत्येक शैक्षिणिक संस्थान में निर्वाचित छात्र-परिषदों का गठन सुनिश्चित करना।

क्रमिक अराजनीतीकरण

पिछले कई दशकों में, खासकर 1990 के दशक के बाद से, अराजनीतिकरण नव-उदारवादी पूँजीवाद के उभार का एक कारगर हथियार बन गया है। इसका पहला कारण यह है कि अराजनीतिकरण एक संरचनात्मक निर्मिति है; इसमें नागरिक एक उपभोक्ता बन कर रह जाता है। व्यक्तिवाद का सिद्धान्त प्रमुख हो जाता है और बेरोजगारी, आवास और आजीविका सम्बन्धी अन्य संकट निजी विफलताओं के दायरे में आ जाते हैं।

इसके बाद आती है एक ऐसी संस्कृति जिसे ‘‘अतिसूक्ष्म-आवेग’’ का नाम दिया जा सकता है। प्रत्येक पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी के सन्दर्भ में नई होती है, परन्तु यह नवीनता प्रायः विवादास्पद होती है। नवउदारवाद ने सिकुड़ते आसमान को और भी सिकोड़ दिया है, और तवज्जो की यह सिकुड़न व्यवसाय, मनोविज्ञान और दैनन्दिन व्यवहार में बहुत साफ दिखायी देती है। इससे स्वतःवृत्ति और आवेग का जन्म होता है। इस प्रकार अराजनीतिकृत जेन-जी व्यक्तित्व केन्द्रित सनक (पर्सनाल्टी कल्ट) और सोशल मीडिया-जनित सम्मति के लिये आदर्श सामग्री बन जाता है, जो केवल अपना चेहरा दिखाने के लिये या किसी दिखावे के तौर पर, मतदान करता है न कि किसी सोचे समझे निर्णय के आधार पर। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें, खासकर, छात्र-संगठन या मजदूर-संगठन जैसे किसी सांस्थानिक स्पेस के अभाव में, उग्र-राष्ट्रवाद और भावुकता से आवेशित सम्प्रेषण का शोषण बहुत आसानी से सम्भव हो जाता है।

शिक्षा कोई कारखाना नहीं हैः राजनीति-रहित कैम्पस आज्ञाकारी मजदूर पैदा करता है, लोकतांत्रिक नागरिक नहीं।

 

पुनर्जागरण

मगर, 2026 की गर्मियों ने जेन-जी के अराजनीतिक होने की अवधारणा को उलट-पलट कर रख दिया। नीट-यूजी परीक्षा में हुयी गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली के जन्तर-मन्तर प्रदर्शनों ने हजारों छात्रों का रुख राजधानी की तरफ मोड़ दिया। इसमें सबसे आश्चर्यजनक लामबन्दी का परिमाण नहीं बल्कि उसकी संरचना थी- सरकार द्वारा थोपी गयी नेटबन्दी को धता बताते हुये ब्ल्यूटूथ के जरिये एक-दूसरे के साथ संजाल का निर्माण करते हुये युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने दूसरे साथियों के लिये एक मोबाइल लाइब्रेरी चला दी और अपने से अग्रज पीढ़ी को मार्च में अपने साथ कर लिया, पीढ़ीगत विभेद विलुप्त हो गया और यह सब एकदम स्वाभाविक लगने लगा था। तब समझ में आया कि जेन-जी कभी अराजनीतिक था ही नहीं; उसे सिर्फ एक माकूल वक्त की तलाश थी, जैसे ही वह वक्त मिला, सभी एकजुट हो गये।

राजनैतिक दल, जिनमें से अनेक खुद छात्र आन्दोलनों की पैदावार हैं, ही छात्र-संघों को ही प्रतिबन्धित करते रहे हैं।

पश्चिम बंगाल ने एक दशक पहले छात्र-संघ के चुनाव पर पाबन्दी लगा दी। तमिलनाडु ने उससे भी दशकों पहले यह काम कर लिया था। भाजपा शासित कई राज्यों में छात्र-परिषदों के चुनाव नहीं होते।

केरलम इसका अपवाद है, वहाँ छात्र-संघों के चुनाव नियमित अन्तराल पर होते हैं। ये चुनाव मतदाताओं में राजनीतिक साक्षरता का पोषण करते हैं, उनमें लोकतांत्रिक-प्रतिबद्धता की अनवरत दक्षता का सृजन करते हैं और यही नव-उदारवादी पूँजीवाद के लिये स्वाभाविक अभिशाप बन जाता है। ऐसी प्रतिबद्धिता ही प्रायः नस्ली, धार्मिक, जातीय पहचान की गहरी जमी जड़ों में मट्ठा डालने और शिक्षा एवं रोजगार आधारित लोकतांत्रिक माँगों के गिर्द जड़ें जमाने की दिशा में पहला कदम बनती है।

अक्सर यह सुनने में आता है कि राजनीति अवरोध उत्पन्न करती है, इसी दलील का भरपूर इस्तेमाल खुद नवउदारवाद-विरोधी होने का ढिंढोरा पीटने वाले दल भी करते हैं। परन्तु शिक्षा कोई कारखाना नहीं हैः राजनीति-रहित कैम्पस आज्ञाकारी मजदूर पैदा करता है, लोकतांत्रिक नागरिक नहीं।

जेन-जी का अराजनीतीकरण उनकी अपनी विफलता नहीं बल्कि उसी संरचनात्मक निर्मिति की सफलता है जिसके चलते यह सम्भव हुआ है। यदि 1970 का दशक छात्रों और उनके संगठनों द्वारा सृजित लम्बे और अनवरत आन्दोलनों का गवाह रहा है तो जन्तर मन्तर के प्रदर्शनों ने बता दिया है कि उसी प्रकार की भागीदारी आज भी कारगर है। तो राजनीति में इस पीढ़ी की रुचि जागृति करना आज की जरूरत नहीं है; जन्तर मन्तर ने बता दिया है कि उसमें वह पहले से ही है, बस वे इसे सांस्थानिक स्वरूप दिये जाने की प्रतीक्षा में हैं।

अराजनीतीकरण का जवाब जेन-जी की असम्पृक्तता की मलामत करना नहीं है बल्कि ऐसी सांस्थानिक अवस्थाओं का पुनर्जीवन है जिनमें राजनीतिक चेतना- कैम्पस में लोकतंत्र, छात्र-संघ और सामूहिक-विमर्श के अधिकार- का निर्माण सदैव होता रहे।

‘द हिन्दू’ दिनांक 02.09.2026 से साभार​​​​​​ अनुवादः दिनेश अस्थाना ​​​​​​​​

फीचर फ़ोटो: अंकुर राय

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