कुणाल पुरोहित
बिहार के नवादा शहर में अपने घर में बैठा अभिषेक कुमार पिछले पूरे हफ्ते अपने फोन से ही चिपका रहा। टाॅयफाइड के बुखार ने उसको इतना कमजोर कर दिया था कि उसका चलना-फिरना मुश्किल हो गया था, पर बाहर जो कुछ भी घट रहा था उससे वह अनजान तो नहीं रह सकता था। उसके फोन के पर्दे पर भी जन्तर-मन्तर का प्रदर्शन खुल रहा था, एकदम अप्रत्याशित, अभूतपूर्व।
प्रदर्शनकारियों के गुस्से को वह बखूबी समझ रहा था। उस 28 वर्षीय युवा ने भी बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के पेपर-लीक के दोषियों पर कार्रवाई किये जाने की माँग को लेकर अभ्यर्थियों द्वारा तीन महीने तक चले प्रदर्शन के दौरान 2024 के दिसम्बर महीने की कड़कड़ाती ठंडी रातें पटना के प्रतिष्ठित गाँधी मैदान में खुले आसमान के नीचे गुजारी थी।
कुमार बताता है कि पिछले 9 सालों में जिन 150 प्रतियोगी-परीक्षाओं में वह शामिल हुआ था उनमें से यह सिर्फ एक परीक्षा थी।
प्रदर्शन उसके लिये कुछ भी नहीं था। राजनीति-विज्ञान में परास्नातक की डिग्री लेकर वह लगातार रोजगार पाने के प्रयास करता रहा है। वह कहता है कि बार-बार कोशिश करने के बावजूद उसे कोई नौकरी नहीं मिली। अब वह टूट चुका है। वह याद करता है ‘‘हम लोगों ने एक मामूली सी माँग के लिये तीन महीने प्रदर्शन किये; बिहार के मुख्यमंत्री से केवल एकबार मिलने के लिये। पर उन्होेंने एक न सुनी। लगता है कि हमारी बात सुननेवाला यहाँ कोई नहीं है।’’
इसीलिये राजधानी को दहला देनेवाले काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन का वह समर्थन करता है। उसका कहना है ‘‘हम अब टूट चुके हैं। हमारी सारी उम्मीदें धूल धूसरित हो गयी हैं। यह प्रदर्शन इसीलिये जरूरी था।’’
संकट पर एक नज़र
भारत के कुल बेरोजगारों का 80 प्रतिशत 15-24 आयु-वर्ग के युवा हैं।
स्नातकों में बेरोजगारी की दर 29.1 प्रतिशत है।
भारत के कुल कार्यबल में प्रतिवर्ष 70 से 80 लाख युवा और जुड़ जाते हैं।
भारत के कुल कार्यबल का 82 प्रतिशत अनौपचारिक क्षेत्र में योजित है।
2030 तक विस्थापन दर के 40 प्रतिशत तक पहुँच जाने की सम्भावना है जिसका बड़ा हिस्सा रोजगार से जु़ड़ा रहेगा।
(स्रोतः अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और भारतीय मानव संसाधन विकास संस्थान द्वारा निर्गत इंडिया एम्प्लाॅयमेंट रिपोर्ट, 2024)
एक मंच जो अपना है
कुमार की ही तरह लाखों भारतीय युवा नाराज़ हैं और अब वे अपनी हताशा पचा नहीं पा रहे हैं। चौपट परीक्षाओं और मई माह में नीट पेपर-लीक के चलते 20 लाख से अधिक अभ्यर्थियों को पुनर्परीक्षा के लिये विवश करने का दायित्व निर्धारित करने को लेकर केन्द्रीय दिल्ली के जन्तर-मन्तर क्षेत्र में काकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन जून के प्रारम्भ में शुरू हुआ। इस प्रदर्शन के ही एक पक्ष, अनशनरत शिक्षक-पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को 18 जुलाई को जबरदस्ती वहाँ से उठाकर सफदरजंग हस्पताल में दाखिल कर दिया गया। उसी समय से यह प्रदर्शन मुम्बई से लेकर कोलकाता तक, बंगलूरु से लेकर पंजिम तक और देहरादून तक पूरे भारत में फैल गया।
प्रदर्शनकारियों ने पार्टी की हदें तोड़ दी थीं- जहाँ एक ओर वामपंथी छात्रधड़े अपनी पूरी ऊर्जा से इस प्रदर्शन में शामिल थे वहीं ऐसे लोग भी थे जो दावा कर रहे थे कि उन्होंने पिछले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में मतदान किया था। उन सबके लिये यह प्रदर्शन उनके दिलों में एक लम्बे अर्से से पल रही हताशा को आवाज़ देने का एक मंच बना।
शिकायतें अनन्त हैंः शिक्षा की खराब गुणवत्ता और परीक्षा-व्यवस्था से छेड़छाड़ से लेकर नौकरी के गायब हो जाने तक। परन्तु इन सबसे परे उनका साझा गुस्सा इस बात पर है कि उनके इन जरूरी मसलों को कोई तवज्जो नहीं मिल रही है।
संस्थागत साक्षरता विकसित करने की दिशा में कार्यरत गैर-सरकारी संस्था ‘वी द पीपुल’ की संस्थापक ट्रस्टी विनीता सिंह कहती हैं, ‘‘अधिकतर युवाओं को लगता है कि पिछले कुछ सालों में एक साथ आने, संगठन बनाने और अपने अधिकारों की माँग करने की स्वतंत्रता गायब हो गयी है। जन्तर-मन्तर के प्रदर्शन ने लोगों को साझा स्वर दिया है। इसीलिये यह प्रदर्शन किसी उत्सव की तरह दिख रहा है।’’
उनका सन्दर्भ उन दृश्यों से है जिनमें लोग गा-बजा रहे हैं और सरकार का मज़ाक़ बनाने के लिये मीम्स और मारक नारे गढ़ रहे हैं। वह कहती हैं कि ‘‘वे जानते हैं कि समस्यायें इतनी जल्दी हल होनेवाली नहीं हैं। परन्तु कम से कम उनको अपनी बात कहने के लिये कोई मंच तो उपलब्ध हुआ है।’’
असंवेदनशीलता से मुठभेड़
इंडिया एम्प्लाॅयमेंट रिपोर्ट, 2024 के अनुसार भारत के कुल बेरोजगारों का 80 प्रतिशत युवा हैं। ऐसा इसलिये नहीं है कि वे अच्छे रोजगारों के लिये दक्ष नहीं हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार के बहुप्रचारित प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षत युवाओं में से पिछले 10 सालों में रोजगार पाने वाले युवाओं का प्रतिशत केवल 15 है।
16 से 25 साल के युवाओं के बीच डाउन टु अर्थ पत्रिका द्वारा पिछले साल कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार नौकरियों की कमी और शिक्षा की गुणवत्ता के क्षरण से आगे बढ़कर अधिकांश युवाओं की चिन्ता पर्यावरण एवं जलवायु को लेकर भी है।
पूरी दुनिया में-सर्बिया से लेकर मोरक्को तक, केन्या से लेकर इंडोनेशिया तक और हमारे पड़ोस के श्रीलंका, बांगलादेश और नेपाल में परिवर्तन और जवाबदेही की माँग को लेकर युवा अपनी सरकारों के खिलाफ उठ खड़े हुये। इनमें से कुछ आन्दोलनों की अन्तिम परिणति, खासतौर पर दक्षिण एशिया में सत्ता परिवर्तन में हुयी, और इंडोनेशिया और मोरक्को में नीतियाँ बदली गयीं और व्यवस्था में अपेक्षित सुधार भी लाये गये।
भारत में भी काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के सुर अधिकांश युवा धड़कनों के तार से मिल गये, कारण केवल उनकी माँगें नहीं थीं बल्कि उनके प्रति सरकार की प्रतिक्रिया के प्रतिबिम्बन का भारतीय राज्य में उनके दैनन्दिन के अनुभवों से एकाकार हो जाना भी था।
उन युवाओं में से एक 30 साल के भूषण अंकल भी हैं जो जन्तर-मन्तर से 1200 किमी दूर महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के रावेड़ी गाँव से इन प्रदर्शनों पर नज़रें जमाये हुये हैं।
इन अंकल के माता-पिता किसान हैं, गाँव-जवार के लिये दुर्लभ, एम. एस. सी. की डिग्री हासिल करने के लिये उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की हैै। फिर भी किसी तरह उन्होंने एक ऐसी संविदा की नौकरी का जुगाड़ कर ही लिया जिसके लिये बहुत मामूली साक्षरता से अधिक और कुछ की जरूरत नहीं थी- उनका पिछला रोजगार था डेली एंट्री ऑपरेटर का। उनके इलाके में किसानी से आय दिन-ब-दिन घट रही है और इसके बरअक्स दैनिक जीवन की मँहगाई लगातार छलाँगे लगा रही है। पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया के हालिया संकट के चलते अंकल के लिये डीज़ल और फर्टिलाइज़र की व्यवस्था करना मुश्किल होता गया है। और एथेनाॅल मिश्रित पेट्रोल भराने के चलते उनकी मोटर साइकिल को भी मरम्मत की जरूरत आन पड़ी है।
इन सब हालात के बीच अंकल कहते हैं कि मैंने एक चीज़ की लगातार कमी नोटिस की है- सरकार नदारद है। उनका कहना है कि, ‘‘लगता है कि सरकार को हमारी जरूरतों से कोई सरोकार नहीं है। चाहे वे रोजगार-संकट जैसे बड़े मुद्दे हों या एथेनाॅल जैसे छोटे मुद्दे, आपको कहीं ऐसा नहीं दिखाई देगा कि सरकार को हमारे कष्टों से कोई मतलब है।’’
अंकल मानते हैं कि काकरोच जनता पार्टी का यह प्रदर्शन इन सारे मुद्दों का चरमोत्कर्ष है। सोशल मीडिया पोस्ट्स पर बढ़ती सेंसरशिप की ओर संकेत करते हुये वह कहते हैं कि, ‘‘पिछले कुछ समय से लग रहा है कि सरकार ने हमारे गले घोंट दिये हैं और हमारे कानों में रुई ठूँस दी है।
वर्ष 2024 में सरकार ने ऑनलाइन कंटेन्ट्स को वापस लेने के लिये 12,000 से अधिक आदेश जारी किये थे। वर्ष 2025 में यह संख्या दुगुनी बढ़कर 24,000 हो गयी। पिछले कुछ महीनों में ही मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करनेवाले कई वीडियोज़ को वापस लिया गया है।
अंकल कहते हैं, ‘‘लोगों ने बहुत लम्बे अर्से तक अपनी साँसें थामी रखीं। अब उनके फट पड़ने का समय आ गया है।’’
उम्मीदों का तूफ़ान
मुम्बई की रहनेवाली संध्या पनस्कर अपना सन्दर्भ ‘विस्फोट’ से लेती हैं। पिछले हफ्ते इस 43 वर्षीय महिला ने जन्तर-मन्तर से सोनम वांगचुक के जबरिया उठाये जाने वाले और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के लाठीचार्ज के वीडियो देखकर गुस्से से भर गयीं। सोमवार की दोपहर उन्होंने अपने पति और 11 वर्षीय बेटे अनहद के साथ मुम्बई में ही प्रदर्शन-स्थल पर प्रदर्शनकारियों के प्रति एकजुटता जाहिर करने का मन बना लिया।
जैसे ही वे लोग दादर स्थित शिवाजी पार्क पहुँचे, पुलिस ने उनको बाहर भगाना, उन्हें हिरासत में लेना और अपनी गाड़ियों में बिठाना शुरू कर दिया। उनका दबा हुआ गुस्सा फट पड़ा। एक दो मिनट का वीडियो वायरल है जिसमें पनस्कर अपने बेटे का हाथ थामे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करती पुलिस पर चिल्ला रही हैं। पुलिस द्वारा उन्हें और उनके परिवार को हिरासत में लिये जाने के ठीक पहले उन्होंने सवाल किया था,‘‘हम न तो नारे लगा रहे हैं, न गाने गा रहे हैं, फिर भी आपलोग हमें क्यों भगा रहे हैं? फिर वह अभिव्यक्ति की आजादी कहाँ गयी जिसकी शेखी आपलोग हमेशा बघाड़ते रहते हैं?’’
वह बताती हैं कि उन लोगों ने वर्ली पुलिस-थाना में लगभग पाँच घंटे गुजारे और इन हादसों के चलते उनका बेटा अभी भी सदमे में है, फिर भी उन्हें कोई पछतावा नहीं है। वह कहती हैं, ‘‘सालों से मेरे मन में अपने देश के हालात पर गुस्सा आ रहा था। ऐसा लगता है कि इस सरकार की चमड़ी इतनी मोटी हो गयी है कि उसे हमलोगों की कोई परवाह ही नहीं रही। लोगों ने अब किसी परिवर्तन की आस ही छोड़ दी है।’’
लन्दन स्कूल ऑफ इकोनाॅमिक्स में मीडिया, संस्कृति एवं सामाजिक परिवर्तन की प्रोफसर शकुन्तला बानाजी के अनुसार यह प्रदर्शन दैनन्दिन के उन अन्यायों की प्रतिक्रिया है जो युवाओं के साथ होते हैं। उनका कहना है, ‘‘पिछले सालों में जिन युवाओं से मेरी बातें हुयी हैं, उन्होंने जो कुछ भी कहा वह उनके शर्म और निराशा और उनके आस-पास हुये अन्यायों और पूर्वाग्रहों को व्यक्त करने में उनकी अक्षमता की मिली-जुली अभिव्यक्ति है।’’ बानाजी इन दिनों भारत, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, नाइजीरिया, चीन और कोलम्बिया के युवाओं पर एक किताब लिख रही हैं।
वह आगे कहती हैं, ‘‘युवाओं के एक वर्ग में यह भावना बढ़ती जा रही है कि वे नहीं चाहते कि उनके साथ कोई चालाकी बरती जाय, कोई धोखाधड़ी की जाय या उनके ऊपर कोई कृपा की जाय। वे चाहते हैं कुछ उम्मीदें बची रहें।’’
हर कोई यह उम्मीद नहीं करता कि इस आन्दोलन का हासिल कोई स्थायी राजनीतिक परिवर्तन होगा। लेखक एवं वयोवृद्ध राजनीतिक विश्लेषक सुभाष गाताडे़ कहते हैं कि, ‘‘यह एक बहुत ही सकारात्मक संकेत है कि इतनी बड़ी संख्या में युवा बाहर निकले हैं। फिर भी यह नहीं लगता कि इससे किसी बड़े पैमाने पर बदलाव होने जा रहा है। इस प्रदर्शन की माँगें कोई बहुत तार्किक नहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा ये माँगें सांकेतिक हैं जिनसे कोई दीर्घकालीन परिवर्तन नहीं होगा। यहाँ तक कि यदि शिक्षामंत्री का इस्तीफा हो जाय तो भी हालात वही रहने हैं, क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने व्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की माँग रखी ही नहीं है।’’ गाताड़े कहते हैं कि एहतियात बरतने की हिदायत हमें तारीख से ही मिलती है। ‘‘जे.पी. आन्दोलन से लेकर वी. पी. सिंह के भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन से होते हुये अन्ना हजारे के आन्दोलन तक- किसी का भी हासिल व्यवस्थागत परिवर्तन नहीं रहा।’’
और इसके बावजूद अधिकांश प्रदर्शनकारी किसी उम्मीद की तलाश में हैं। मसलन, हैदराबाद के बिलाल (उसके अनुरोध पर ही उसका पूरा नाम नहीं दिया जा रहा है) देश में ‘‘रोजाना के मानवाधिकार-हनन’’ से खिन्न है। 19 साला बिलाल एक अलाभकारी समूह से जुड़ा है, सीजेपी की गतिविधियों में सक्रिय है और तेलंगाना की राजधानी में इस समूह के लिये समर्थन जुटा रहा है। पिछले हफ्ते अपने कुछ दोस्तों के साथ वह प्रदर्शन मैं भाग लेने के लिये दिल्ली आया। वह बताता है कि,‘‘यह जगह उम्मीदों से लबरेज़ है क्योंकि हमने इसी उम्मीद से जिम्मेदारी तय करने की बात कही है कि हमारे प्रदर्शनों से व्यवस्था में सुधार होगा।’’
इस उम्मीद में थोड़ा सा क्षरण हुआ है। पिछले सोमवार को जब सीजेपी ने संसद मार्च का एलान किया तो बिलाल भी उन प्रदर्शनकारियों में था जो पुलिस की बर्बरता के शिकार हुये थे। वह बताता है कि उसके कपड़े फट गये थे और उसकी ग्रोइन पर दो पुलिस अधिकारियों ने बार-बार वार किया था। जब उसके पेशाब से खून आने लगा तो वह हैदराबाद वापस भाग आया। अब उसने कुछ दिन बाद प्रदर्शन में फिर शामिल होने का मन बनाया है। ‘‘सरकार ने हमारे लिये उम्मीद की कोई जगह छोड़ी ही नहीं। लेकिन मैं वापस जाऊँगा क्योंकि किसी न किसी को तो यह करना ही होगा।’’
24 साला आफ़ाक वानी जैसे लोगों के लिये यह प्रदर्शन न तो कोई उम्मीद जगानेवाला था और न ही किसी मंत्री की बरखास्तगी को लेकर। यह केवल किसी ऐसी चीज़ को फिर से हासिल करने को लेकर था जो कहीं खो गयी हैः आत्मगौरव का बोध।
वानी श्रीनगर में रहते हैं और घाटी में ही कोई सार्थक रोजगार पाने के लिये जद्दाजहद कर रहे थे। उन्हें ऐसा ही एक रोजगार दिल्ली में दिखायी पड़ा जिसमें कश्मीरी मालिकों की तुलना में तीन गुना वेतन दिये जाने का प्रस्ताव था। पर उन्होंने मना कर दिया, कारण? कारण था उस हमले का भय जो उनपर कश्मीरी मुसलमान होने की वजह से कभी भी किया जा सकता था। 2019 के पुलवामा हमले और पिछले साल के पहलगाम हमले के बाद उनके समुदाय के खिलाफ चारों ओर फैली हिंसा का हवाला देते हुये वह कहते हैं, ‘‘जब कभी भी आतंकी हमले होते हैं, हर बार पूरे देश में कश्मीरी मुसलमानों को निशाने पर ले लिया जाता है। इस समय देश की राजनीति लगातार एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने में ही मुब्तिला है।’’ यह प्रदर्शन उम्मीद की एक किरण मुहैय्या करा रही है। वह आगाह करते हैंः सिर्फ एक किरण।
उनका कहना है ‘‘मुझे बहुत ज्यादा की उम्मीद नहीं है। भारत एक विशाल देश है और चीजे़ं रातोंरात नहीं बदलतीं। फिर भी हो सकता है कि हमें कुछ साँसें और नसीब हो जाएं।’’
(लेखक मुम्बई से एक स्वतंत्र पत्रकार एवं ‘एच-पाॅपः द सीक्रेटिव वल्र्ड ऑफ हिन्दुत्वा पाॅप स्टार्स’ के लेखक हैं.)
‘द हिन्दू’ दिनांक 26.07.2026 से साभार
अनुवादः दिनेश अस्थाना
फीचर फोटो: अंकुर राय

