आर्थिक मंच की दावोस में हुई हालिया बैठक ने वैश्विक संबंधों में हो रहे गुणात्मक परिवर्तन की घोषणा कर दी है। इस समय विश्व शक्ति संतुलन संक्रमण के दौर में है। जिससे स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर में पहुंच गई है। जब फासीवाद की पराजय के बाद यूएसए पश्चिमी देशों का एकछत्र नेता बना और वैश्विक नीति निर्धारण की शक्ति उसके हाथ में आ गई। लेकिन 2026 के विश्व आर्थिक मंच की 56वीं मीटिंग तक स्थितियां बदल चुकी हैं। आज पश्चिमी जगत में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपने मेगा अभियान के कारण खलनायक बन गए हैं। मार्क्स ने कहा था इतिहास दोहराता तो है लेकिन जहां पहली बार वह नायक बनकर आता है, वहीं दूसरी बार बिदूषक में बदल जाता है। संभवत ट्रंप अमेरिकी इतिहास में वही भूमिका निभाने जा रहे हैं।
जब दूसरी बार ट्रंप ह्वाइट हाऊस पहुचे, तो ‘मेकअमेरिका ग्रेट अगेन'(मेगा) की आक्रामक नीतियों के साथ वैश्विक व्यवस्था पर टूट पड़े। कनाडा को 51वां अमेरिकी राज्य कहते हुए ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने का ऐलान कर दिया। साथ ही अमेरिका के विनिर्माण क्षेत्र के पुनर्जीवन के लिए व्यापारिक सहयोगी देश पर मनमाने टैरिफ थोपने लगे।जिससे पूरी दुनिया हिलने लगी और अमेरिकी नेतृत्व में चल रहा विश्व शक्ति संतुलन टूट की कगार पर पहुंच गया। जिसका ऐलान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस के 56वें सम्मेलन में किया है।
दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप दुनिया को अमेरिकी योजना के तहत पुनर्गठित करने की मंशा लेकर आए हैं। आते ही उन्होंने ऐसा करना भी शुरू कर दिया।
नये साल की शुरुआत में ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए रात के अंधेरे में वेनेजुएला पर आक्रमण करके राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया को गिरफ्तार कर अमेरिका ले आया गया। पहले भी अमेरिका विश्विभर में अपने इन्हीं खूंखार कारनामों के लिए बदनाम रहा है। एक सामान्य रिपोर्ट के अनुसार पिछले 80 वर्षों में 200 से ज्यादा देशों में अमेरिका ने गैरकानूनी सैनिक हस्तक्षेप किया है। 21वीं सदी में ही अब तक 80 से ज्यादा ऐसे हमले अमेरिका और नाटो मिलकर कर चुके हैं। वेनेजुएला आपरेशन के बाद आक्रामक ट्रंप ने कनाडा और ग्रीनलैंड की तरफ रुख किया। वह सीधे डेनमार्क और यूरोप को धमकी देने लगे कि ग्रीनलैंड पर हमला करके कब्जा कर लेंगे। साथ ही ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा । यही नहीं कनाडा को धमकाते डराते हुए अमेरिका में शामिल होने के लिए दबाव बनाने लगे। इसके पहले वे कनाडा व यूरोप पर एक तरफा टैरिफ लगा चुके थे।
यही वह निर्णायक मुकाम था, जहां से अमेरिका नियंत्रित विश्व व्यवस्था में अंदर से भूकंपीय तरंगें उठने लगीं। जिससे अमेरिकी नेतृत्व में चल रही विश्व-व्यवस्था बिखरने की कगार पर पहुंच गई।
दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है चीन का आर्थिक शक्ति के बतौर अभ्युदय। इस वर्ष चीन के आयात निर्यात ने अब तक के सभी वैश्विक रिकार्ड को तोड़ दिया है। जो 3. 5-6 ट्रिलियन डॉलर के करीब है । जिसमें उसे 1.2 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार फायदा हुआ। ट्रंप के टैरिफ युद्ध के बाद चीन के व्यापार में हुई ऐतिहासिक वृद्धि अमेरिका तथा उसके सहयोगी देशों के लिए अस्थिर करने वाला था। पश्चिमी दुनिया को भी यह दिखाई देने लगा है कि चीन भावी वैश्विक अर्थव्यवस्था है। जिसके विकास की गति को किसी भी धमकी अवरोध या पुरानी रणनीति से नहीं रोका जा सकता। इसके पहले जब ट्रंप ने चीन पर टैरिफ लगाया था, तो चीन ने जवाबी कारवाई करके ट्रंप को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया और ट्रंप को चीन के साथ समझौते में जाना पड़ा।
2025 विश्व इतिहास में एआई युग के धमाकेदार आगमन का वर्ष है। जहां आने वाले समय में मानव जीवन के सभी क्रियाकलाप जैसे उत्पादन, व्यापार, सूचना, सर्जरी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जगह लेने जा रहा है। एआई सेक्टर में चीन की उपलब्धियों ने दुनिया को चकित और हतप्रभ कर दिया है । अमेरिकी तकनीक वैज्ञानिक शोध नवाचार तथा अन्वेषण के साथ मैनुफैक्चरिंग एआई ईवी वेहृकिल जैसे क्षेत्र को चुनौती देते हुए चीन ने अपनी ताकत का विश्वपटल पर लोहा मनवा लिया । जिससे लग रहा है कि कई क्षेत्रों में अमेरिका पिछड़ने लगा है। सेमी कंडक्टर इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी चिप्स और मैन्युफैक्चरिंग का चीन हब बन चुका है । अब वह आधुनिक नवाचार और अन्वेषण में जिस तेजी से प्रगति कर रहा है। वह भविष्य में नये विश्व ऑर्डर के जन्म का संकेत है।
चीन के विश्वविद्यालय तेजी से प्रगति कर रहे हैं। ज्ञान अनुसंधान नवाचार और आईटी जैसे क्षेत्रों में चीनी संस्थान वैश्विक मानदंडों में जगह बनाने लगे हैं । इस वर्ष विश्व विश्वविद्यालयों की विश्व रैंकिंग में 25 संस्थानों में चीन के 19 संस्थाओं ने कब्जा करके अमेरिका के ज्ञान अन्वेषण और नवाचार में बने एकाधिकार को तोड़ दिया । विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी विश्वविद्यालय हार्वर्ड को चीनी विश्व विद्यालयों ने तीसरे स्थान पर धकेल दिया। जिससे ज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक संतुलन बदल रहा है। चीन की प्रगति से विश्व स्तर पर अमेरिकी एकाधिकार और दादागिरी के खिलाफ पल रहे असंतोष को अभिव्यक्ति के लिए जगह मिल गई है। विकासशील देशों से लेकर यूरोप और अमेरिका तक के छात्र युवा आधुनिक ज्ञान अनुसंधान और नवाचार के लिए चीनी विश्व विद्यालयों की तरफ दौड़ पड़े हैं।
यही कारण है कि कनाडा सहित अधिकांश यूरोपीय देश चीन के साथ व्यापार व कूटनीतिक संबंध को नया आयाम देने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी दबाव के बावजूद दिसम्बर में कनाडा के पीएम मार्क कार्नी चीन की यात्रा पर गए। जहां उन्होंने अरबों डॉलर के व्यापारिक सामरिक क्षेत्र में समझौते किए। जिससे कुपित ट्रंप ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से मार्क कार्नी को चेतावनी दे डाली कि चीन कनाडा को निगल जाएगा।
इसी ऐतिहासिक मोड़ पर दावोस में विश्व इकानॉमिक फ़ोरम का 56वां सम्मेलन हुआ। इस बैठक की विशेषता थी कि अमेरिकी ब्लॉक के देशों में अचानक विचारोत्तेजक बहस छिड़ गई । जिसकी शुरुआत कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने की। उन्होंने दो महत्व पूर्ण निष्कर्ष दुनिया के सामने रखे। एक अमेरिकी एकाधिकार का खात्मा। दूसरा- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आकार ली व्यवस्था का ध्वंस। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1944/45 में ही अमेरिका पश्चिमी दुनिया का नेता बना और आज के वैश्विक संस्थान संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक, आईएमएफ और डब्लूटोओ इसी समय अस्तित्व में आए। जिनपर अभी तक अमेरिकी ब्लॉक का नियंत्रण रहा है।
विगत 80 वर्ष से पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया के साथ विकासशील और पिछड़ी मुल्कों पर अमेरिका का एकछत्र प्रभुत्व रहा है। इसका मूल कारण था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका पश्चिमी दुनिया का नेता बनकर उभरा था। उस समय ब्रितानी साम्राज्य का सूरज अस्त हो चुका था। जिससे ब्रिटेन अमेरिका के सहायक देश में बदल गया। ब्रिटेन के साथ-साथ अन्य यूरोपीय देशों को उपनिवेशों को खाली करना पड़ा। इस खाली जगह को अमेरिका ने सामरिक और आर्थिक ताकत के बल पर तेजी से भर दिया । उपनिवेशों के हाथ से निकल जाने के बाद पश्चिमी पूंजीवादी दुनिया में अमेरिका के नेतृत्व को चुनौती देने की ताकत नहीं रही। वह अमेरिकी विश्व रणनीति के दुमछल्ले बन गए। जिसे दवोस के अपने भाषण में मार्क कार्नी ने स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि हम अमेरिकी छतरी के नीचे सुरक्षित महसूस करने लगे थे। यह एक आभासी सुरक्षा थी। फिर भी उन्होंने अमेरिकी संरक्षण को कई अर्थों में यूरोप के लिए लाभदायक कहा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया गुणात्मक रुप से बदल चुकी थी। भाप की ताकत के युग का अंत हो गया और उसकी जगह पेट्रोकेमिकल ऊर्जा का बुनियादी स्रोत बन गया । जिस कारण तकनीक में तेज विकास और परिवर्तन हुआ। बीसवीं सदी के प्रारंभ काल में पूंजीवाद के युद्धोन्मादी साम्राज्यवाद में बदल जाने के कारण विश्व शान्ति एक परिकल्पना भर रह गई। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दुनिया प्रत्यक्ष उपनिवेशों की जगह वित्तीय पूंजी के महीन जालों से बुनी नव उपनिवेशवादी थी। जिसकी कमान अमेरिकी महाशक्ति के सैन्य औद्योगिक काम्प्लेक्स के हाथ में थी। मोटे अर्थों में कहा जाए तो यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड से लेकर जापान, दक्षिणी पूर्वी एशिया, खाड़ी के देश और दक्षिण अमेरिका यूएसए के विश्व रणनीति के अंग बन गए। जिनको अमेरिकी पेंटागन के छतरी के नीचे ही सुरक्षा प्राप्त थी। औद्योगिक सभ्यता के दूसरे चरण के शक्ति शाली औपनिवेशिक देश आज दोयम दर्जे के देशों में बदल गए हैं। जिन्हें कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में सेकंड वर्ल्ड के देश कहकर संबोधित कहा है। जिसे माओ के प्रसिद्ध तीन दुनिया के सिद्धांत के पैरामीटर से समझा जा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार विश्व में दो ही महाशक्तियां हैं। जी -7 को नकारते हुए हाल ही में ट्रंप ने कहा था कि अब विश्व में सिर्फ जी-2 है। सोवियत ब्लॉक के बिखरने के बाद एलपीजी के दौर में चीन की तेज विकास गति से विश्व साम्राज्यवाद को मिल रही कड़ी चुनौती के कारण ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी विश्व रणनीति चीन केन्द्रित होती गई है। इस दौर में अमेरिका की मनमानी और प्रभुत्व के खिलाफ विगत कुछ वर्षों से आवाजें उठ रही हैं। सवाल सिर्फ यह था कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। यह ऐतिहासिक दायित्व कनाडाई पीएम मार्क कार्नी के कंधे पर आया। कार्नी ने अपने हिस्से का दायित्व निभाकर इतिहास में जगह बना ली है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद औपनिवेशिक कड़ी के एक-एक कर टूटते जाने के क्रम में समाजवादी क्रांतियां वैश्विक यथार्थ बन गई थी। चीन में नवजनवादी क्रांति की सफलता से विश्व साम्राज्य वाद को धक्का लगा था। इसके साथ ही एक मजबूत समाजवादी ब्लॉक अस्तित्व में आया। उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनो की लहरों के साथ मिलकर समाजवादी क्रांति का वेग इतना तीव्र होता गया कि विश्व पूंजीवाद को उपनिवेशों को खाली करना पड़ा। पूंजीवाद के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। इसलिए पूंजीवाद को खुद को बचाए रखने के लिए नई रणनीतियों पर अमल करना पड़ा। पूंजीवाद के अस्तित्व रक्षा के ऐतिहासिक अनिवार्यता को देखते हुए विश्व साम्राज्यवादी खेमे को संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं के निर्माण के साथ-साथ सैन्य संधियों की श्रृंखला खड़ी करनी पड़ी। जिसे हम नाटो, सीटो, सेंटो आदि के नाम से जानते हैं । द्वितीय विश्व युद्ध में न्यूनतम नुकसान और अधिकतम लाभ उठाने वाला अमेरिका सहज ही इस खेमे का सर्वेसर्वा बन गया था। यही वह दौर है जब अमेरिकी नेतृत्व में विश्व साम्राज्यवाद आक्रामक शक्ति के बतौर उभरा। विश्व पूंजीवाद का नेतृत्वकारी केंद्र यूरोप यानी यूके से खिसककर वाशिंगटन चला गया।
दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप और एशिया में समाजवादी ब्लॉक के अभ्युदय से विश्व जन गण में नए तरह का उल्लास और उत्साह का वातावरण था। दुनिया की श्रेष्ठतम मानव मेधा समाजवाद के पक्ष में खड़ी हो गई । एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोप तक में समाजवादी आंदोलन का विस्तार होने लगा। कई देशों में क्रांति अवश्यंभावी दिखने लगी। जिससे पूंजीवादी साम्राज्यवादी दुनिया भयभीत थी। इस परिवर्तन ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद नए तरह के वैश्विक टकराव को जन्म दिया। और शीत युद्ध का दौर शुरू हुआ। उपनिवेशों के खत्म होने और जगह-जगह समाजवादी क्रांतियों के उठ रहे तूफान ने विश्व साम्राज्यवाद को रक्षात्मक स्थिति में पहुंचा दिया था। इसलिए समाजवादी क्रांतियों के डर से दुनिया भर के पूंजीवादी साम्राज्यवादी मुल्क, तानाशाह, राजे-रजवाड़े भीम काय औद्योगिक कांप्लेक्स के साथ एक अपवित्र गठबंधन में बंध गई। वर्तमान दौर की सभी नकारात्मक ताकतें अमेरिकी छतरी के नीचे इकट्ठा हो गई। राजशाहियों से लेकर धर्मगुरु, पादरी,मौलवी, साधू-संत व लुटेरे कारपोरेट घराने सभी अमेरिकी साम्राज्यवाद की छतरी के नीचे आ गये। सबका मालिक एक था और उद्देश्य मानव समाज के विकास की गति को रोक देना।
20वीं सदी के आखिरी चौथाई तक आते-आते समाजवादी क्रांतियों का वेग धीमा पड़ गया। पूंजीवाद ने तकनीकी क्रांति और नीतिगत लचीलेपन द्वारा अपनी खोई प्रतिष्ठा को पुनः बहाल कर लिया। इसके साथ ही अपनी नीतियों और प्राथमिकताओं के बोझ तले दब कर सोवियत समाजवादी गणतंत्र बिखर गया। जिससे दुनिया में एकछत्र साम्राज्यवादी प्रभुत्व कायम हो जाने से अमेरिकी ताकत इतनी बढ़ गई कि वह विश्व भर के देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर अपनी प्राथमिकताएं और नीतियां थोपने लगा। राष्ट्रसंघ को बंधक बना लिया गया तथा आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और डब्ल्यूटीओ को अमेरिकी हथियार में बदल दिया। यूरोपीय देश अमेरिकी ब्लॉक का अभिन्न अंग रहते हुए यूएसए के सभी अपराधों में सहभागी रहे। सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका ने विश्व पर साम्राज्यवादी व्यवस्था का एक सुचिंतित मॉडल पेश किया। जिसकी कमान प्रत्यक्ष रूप से विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और आईएमएफ के हाथ में थी। इसको खूबसूरत नाम दिया गया उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण।( एलपीजी)।
पूजीवाद सिद्धांतकार उन्मत्त हो गए। उन्होंने इतिहास के अंत की घोषणा कर दी। कहा जाने लगा कि मानव सभ्यता अपने सर्वोच्च सर्वोत्तम मंजिल में पहुंच गई है और यह मंजिल है लिबरल डेमोक्रेसी का। लेकिन दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक में इस सिद्धांत पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया गया है।
1991 में एलपीजीं शुरू हुआ। जिसके द्वारा अमेरिकी औद्योगिक मिलीटरी काम्प्लेक्स हितों के अनुरूप दुनिया को व्यवस्थित किया जाने लगा। जिन देशों ने अपने दरवाजे खोलने और विश्व वैश्विक वित्तीय पूंजी के हितों के अनुरूप अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित करने से इनकार कर दिया, उनके ऊपर दो तरीके के युद्ध थोपे गए। एक आर्थिक प्रतिबंध लगाना ।दूसरा- प्रत्यक्ष आक्रमण। वेनेजुएला, क्यूबा, ईरान, सीरिया, रुस जैसे देश प्रथम हथियार के शिकार हुए । वहीं झूठे आरोपों के तहत अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और सीरिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया के कई देशों को शिकार बनाया गया। जिसकी ताजा मिसाल वेनेजुएला है। अमेरिकी विश्व रणनीति से असहमत देशों की घेरेबंदी की गई। डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाएं इसका मुख्य हथियार बनी। यही नई सुरक्षा परिषद अमेरिकी युद्ध रणनीति का हथियार बन गई और संयुक्त राष्ट्र संघ कठपुतली बनकर रह गया।
आज भारत अमेरिकी रणनीति का शिकार है।उसे चाबहार के निर्माण से पीछे हटना पड़ा है और रुस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकने के लिए मजबर किया जा रहा है।
आर्थिक सैनिक और तकनीकी ताकत के बल पर नई विश्व व्यवस्था या वर्ल्ड ऑर्डर के निर्माण, संचालन और नीति निर्धारण की लगाम अमेरिका के हाथ में थी। लेकिन 21वीं सदी की पहली चौथाई गुजरते गुजरते पश्चिमी जगत से ही अमेरिकी प्रभुत्व पर हमला शुरू हो चुका है और अमेरिका के बेलगाम होते जाने की लानत माननत हो रही है।
पिछले 35-36 वर्षों से दुनिया एक ध्रुवीय थी।अब ग्लोबल साउथ और चीन के अभ्युदय से परिस्थितियां बदल रही हैं । दूसरी तरफ अमेरिका गंभीर आर्थिक संकट में है। मंदी जाने का नाम नहीं ले रही है। मैन्युफैक्चरिंग तेजी से घट रही है और अमेरिकी कंपनियां तीसरी दुनिया के देशों की तरफ रुख किए हुए हैं। जिस कारण से अमेरिका का वर्चस्व खतरे में पड़ गया है। ट्रंप इस संकट से अमेरिका को बाहर निकालने के लिए आक्रामक हो गए हैं। जिसका नकारात्मक प्रभाव यूरोप सहित शेष विश्व में दिखाई दे रहा है। 50 वर्षों के बाद पश्चिम यानी साम्राज्यवादी दुनिया गंभीर संकट में फंसी है और अमेरिका के नेतृत्व में बना गठजोड़ टूटने की कगार पर पहुंच गया है।
दावोस से अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ प्रतिरोध की एक हल्की सी अंनुगूज सुनाई दी है । यह आवाज कनाडा और यूरोप की तरफ से आ रही है। यह वही पश्चिमी दुनियां है, जो अभी तक अमेरिका के हर अपराध में सहभागी रही है। जिसने फिलिस्तीनियों के जनसंहार से लेकर यूक्रेन और हाल में वेनेजुएला पर हुए हमले तक अमेरिकी-इजरायली गठजोड़ को खुला समर्थन दिया था। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने पश्चिमी दुनिया के अपराध को स्वीकार करते हुए पश्चाताप किया है। यह संभव हो सका है विश्व में हो रहे तकनीकी और आर्थिक विकास के कारण। वर्तमान साम्राज्यवादी पूंजी के नियंत्रण वाली दुनिया के गर्भ में विकसित हो रही नई आर्थिक सामाजिक शक्तियों ने नये विश्व आर्डर के लिए परिस्थितियां तैयार कर दिया है। यह विश्व ऑर्डर अभी कौन सा रूप लेगा, इसके बारे में भविष्य वाणी नहीं की जा सकती। लेकिन वैश्विक संबंध नए रास्ते पर जाने के लिए कटिबद्ध हैं।
अमेरिका के सभी अपराधों के सहभागी रहे तथाकथित खुले विश्व के देश अब अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो गए हैं । यह सिर्फ एक सद्विचार नहीं है। वस्तुतः पूंजीवाद का संकट अब अमेरिका के 12 सौ से ज्यादा सैनिकों अड्डों और सुरक्षात्मक सैनिक संधियों तथा यूएनओ सहित विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक संयुक्त प्रयासों द्वारा भी संभाल नहीं रहा है। इसलिए वैश्विक परिस्थितियां नए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मांग कर रही हैं।

