समकालीन जनमत
कविता

सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की कविताएँ स्त्री जीवन की जटिल सच्चाइयों को सहजता से उद्घाटित करती हैं

प्रज्ञा गुप्ता


“तीस पार की नदियां” और ‘सीझते हुए सपने’ संग्रह की कवयित्री सत्या शर्मा कीर्ति की कविताओं में स्त्रियों का जीवन पूरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त है। सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ अपनी कविताओं में स्त्री को किसी एक प्रतीक या भूमिका में सीमित नहीं करतीं, बल्कि उसे प्रकृति, समय, मौसम, संस्कार, श्रम, विश्वास और परिवर्तनशील चेतना के व्यापक फलक पर रखकर देखती हैं। उनकी कविताएँ लोक-जीवन में रची-बसी, अनुभवजन्य और संवेदनात्मक स्त्री-चेतना का सृजन करती है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए स्त्री और प्रकृति का जैविक रिश्ता महसूस होता है। ‘स्त्री और नदी’, ‘मौसम और स्त्री’, ‘बरसात’, ‘सर्दी’, ‘वसंत’ जैसी उनकी कविताओं में स्त्री और प्रकृति का संबंध केवल रूपकीय नहीं, बल्कि जैविक और कर्मशील है। नदी, मौसम या ऋतु यहाँ बाहरी सत्ता नहीं हैं, बल्कि स्त्री के अंदर घटित होने वाली प्रक्रियाएँ हैं-
“नदी ने स्त्री का दुःख देखा
फिर नदी होना स्वीकार
कर लिया
पर , स्त्री नदी
बन कर भी स्त्री ही रही
अब स्त्री के अंदर ही
बहने लगी नदी”

उनकी कविता ‘स्त्री और नदी’ में नदी का स्त्री बनना और स्त्री का नदी होना यह द्वंद्व अंततः एक ऐसे बिंदु पर पहुँचता है जहाँ स्त्री के भीतर ही नदी बहने लगती है। यह बहाव-ठहराव, बंधन-मुक्ति का द्वैत स्त्री जीवन की जटिल सच्चाइयों को सहजता से उद्घाटित करता है। यहाँ समुद्र में विलीन न होना, बल्कि कई नदियों के मिलकर समुद्र बनाने का बिंब सामूहिक स्त्री-शक्ति और सहभागिता की ओर संकेत करता है। उनकी कविताओं में स्त्री का श्रम किसी घोषणापत्र की तरह नहीं आता, बल्कि दैनंदिन जीवन के छोटे-छोटे क्रियाकलापों जैसे सत्तू घोलना, पानी छिड़कना, स्वेटर बुनना, आम पकाना आदि के माध्यम से सामने आता है। ये कविताएँ स्त्री को घर की अदृश्य नायिका के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो मौसम के प्रतिकूल भी जीवन को उनकी कविताओं में धार्मिक आस्थाएँ किसी रूढ़िवादी बोझ की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता और सामूहिक स्मृति के रूप में आती हैं। तुलसी चौरा, छठ, जितिया, करवा चौथ—ये सब स्त्री के जीवन में कर्तव्य से अधिक सहभागिता के प्रतीक हैं। महत्वपूर्ण यह है कि कवयित्री स्त्री को “मैं” नहीं, “हम” मानने वाली चेतना के रूप में देखती हैं। यह सामूहिकता स्त्री को कमजोर नहीं, बल्कि संतुलनकारी शक्ति बनाती है।

‘स्त्रियाँ’, ‘बदलती हुई स्त्री’, ‘तीस पार की नदियाँ’ और ‘स्त्री तुम क्या होना चाहती हो’ जैसी कविताएँ उनकी सशक्त वैचारिक कविताएँ हैं।यहाँ स्त्री बाहरी शोषण से अधिक अंदरूनी द्वंद्वों से जूझती है। वह शर्म, संकोच, सामाजिक सीख, उम्र का दबाव, आत्मसम्मान और आत्म-खोज में लीन स्त्री है।‘बदलती हुई स्त्री’ में पीढ़ियों के बीच का अंतर बहुत सहजता से उभरता है,जहाँ माँ की झिझक के सामने बेटी का आत्मविश्वास खड़ा है-
“उसे स्त्री का
इस तरह बदलना
बहुत सुखद लगा
उसने खुद के अंदर
सृजन करने वाली
स्त्री को दुलारा
उसने खुद के
ऊपर पड़ी
शर्म की चादर को
उतारा और
स्त्रियों के बदलने की
दौर में
खुद भी शामिल हो गयी
जहाँ स्त्री के विशेष दिन
शर्म के नहीं
गर्व के होते हैं
स्त्री के सम्पूर्ण होने
के होते हैं।“

यह बदलाव किसी विद्रोह की भाषा में नहीं, बल्कि सहानुभूति और स्वीकार की भाषा में आता है।‘तीस पार की नदियाँ’ स्त्री जीवन के उस मोड़ को पकड़ती है जहाँ गति कम हो जाती है, पर चाह समाप्त नहीं होती। नदी का बाँध चाहना,यह बिंब सामाजिक सुरक्षा, स्थायित्व और स्वीकार्यता की गहरी आकांक्षा को उजागर करता है। ‘स्त्री तुम क्या होना चाहती हो’ कविता कवयित्री की मन की व्याकुलता को चित्रित करती है। यहाँ स्त्री स्वयं से प्रश्न करती है, लेकिन कोई अंतिम उत्तर नहीं मिलता। यह अधूरापन ही उनकी कविता की ताकत है-
“खुद को ढूंढती स्त्री
खुद ही नहीं जान पाती
वो सच में क्या होना चाहती है ?
और फिर उम्र भर
सारे रिश्ते में
खुद को ढूंढती
एक दिन यूँ ही
चली जाती है
बग़ैर यह जाने कि वो स्त्री क्या
होना चाहती थी” ?

कवयित्री यह स्वीकार करती हैं कि स्त्री की पहचान कोई स्थिर परिभाषा नहीं, बल्कि उम्र भर चलने वाली खोज है।

सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की भाषा सरल, लोक-संवेदी और चित्रात्मक है। उनकी कविताएँ कथ्य के बोझ से दबती नहीं, बल्कि अनुभवों के प्रवाह में बहती हैं। प्रतीक लोकजीवन से लिए गए हैं जिससे कविता की जड़ें ज़मीन में गहरी उतरती हैं।सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की कविताएँ स्त्री को देवी या पीड़िता के खांचे से बाहर निकालकर जीवन के संतुलन की केंद्रीय धुरी के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यह कविता किसी एक विचारधारा का प्रचार नहीं करती, बल्कि अनुभव, करुणा और विवेक के सहारे स्त्री जीवन की बहुस्तरीय सच्चाइयों को उजागर करती है।

सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की कविताएँ

1. स्त्री और नदी

स्त्री नदी होना चाहती थी
और नदी स्त्री
स्त्री के मन को नदी का
प्रवाह ,विस्तार और
स्वतंत्रता मोहती थी

और नदी स्त्री के
जैसे बन्धनों में
बंधना चाहती थी
बसाना चाहती थी
गृहस्थी को

दोनों ने बदल लिए
अपनी- अपनी जगह।
नदी  ने स्त्री का दुःख देख
फिर नदी होना स्वीकार
कर लिया
पर , स्त्री नदी
बन कर भी स्त्री ही रही
अब स्त्री के अंदर ही
बहने लगी नदी
जिसमें ठहराव भी है
और बहाव भी
बंधन भी है और मुक्ति भी
अब नदी बनी स्त्री
समुद्र में जाकर विलीन
नहीं होती / बल्कि
अब बहुत सारी नदियां
मिल बनाती हैं
एक समुंद्र
ताकि बचा रहे
धरती पर
जीवन और पानी का
वजूद

2. मौसम और स्त्री

गर्मी…
पिघलता हुआ
मौसम और
लू के गर्म थपेड़े
पपड़ी छोड़ते
घर – दुआर को
गोबर से लीप कर
स्त्री करती है
शुद्ध- शीतल
शाम होते ही
आँगन- छत पर
डाल देती है पानी
लू से बचाव में
बड़े- छोटे सभी के
कमर- डोर में
बांध देती है
सफेद  प्याज
निम्बू ,नमक ,
भुना जीरा डाल
घोलती है सत्तू
बतासे संग
घड़े का पानी
पिलाती है
खेत से लौटे
पति और बच्चों को
कच्चे आम को पका
मल देती है
गर्मी से मुरझाए शरीर पर
बना अमझोर पिलाती
घर के सभी
अपनों को
ताकि लू के प्रकोप से
बचे रहें उनके तन- मन
इस तरह स्त्री
खड़ी रहती मौसम के
गर्म थपेड़ों के खिलाफ
ताकि बना रहे अपनों में
गंगा जल सा
शीतल एहसास

3.बरसात

स्त्री बादल नहीं है
स्त्री समुद्र नहीं है
ना ही पहाड़ों से फूटता
कोई मीठे पानी की झील
फिर भी प्यास से
व्याकुल अपनों की
दुनिया बचाने के लिए
अपने आद्र मन और भींगे
नयन से
परदेश गए बादलों को
देती है न्योता
सूखी टहनियों पर बाँध
आती है लाल मौली धागा
नदी की सूखी देह
भरने की करती है मनौती,
और कोसों दूर से
अपने कमर – सर पर
रख  घड़े- देगची
वह लाती है राहत की बूँद
ताकि बचा रहे
अपनों के तन में
तीन भाग समुद्र
इस तरह प्यासे और सूखे
मौसम के विरुद्ध
अपनों के लिए
स्त्रियाँ बन जाती है
घूँट भर उम्मीद

4. सर्दी

स्त्रियां बुनती रहीं
स्वेटर और
उसमें काढ़ती रही
भावनाओं की गर्माहट

उन्होंने फंदों में
डाले गर्म मौसम की
तासीर
हर पल्ले पर
खिंचती रही
ऊष्मा भरी लक्षमण रेखा

गोले संग लपेटती रही
मौसम का ठंढापन
इस तरह स्त्रियाँ
अपनों के लिए
खड़ी रहती है
सर्द मौसम के खिलाफ
ताकि लोगों के
जीवन में बची रहे
जिंदगी की
गर्माहट

5.वसंत

स्त्री ने बोये
ज्वार
उगाए धरती के आँचल में
पलाश और टेसू
गेंदे और मालती की
लड़ियाँ टाँगी
मौसम के चौखट पर
धरती के पाँव में
पहनाये सरसों के पायल
पेड़ों से पुराने पत्ते उतार
उनमें खोंस आई
नव कोंपल
कोयल के साथ मिल गाई
जीवन राग
धूप से सिंदूरी रंग ले
मौसम के आकाश पर
लिख आई
वसन्त
ताकि उसके अपनों के
जीवन में बनी रहे
सुख , सौभाग्य और
खुशहाली
इस तरह स्त्रियाँ अपनों
के लिए सदियों से
बनाती रही हैं
एक खूबसूरत दुनिया

6. स्त्री

औरतों ने पूजा
तुलसी चौरे को,
शालिग्राम को

मंदिर में ढार आईं
महादेव पर
गङ्गा जल
औरतें
भिनसारे ही
पूज लेती है
अपने चूल्हे चौके को
बनाती है खाना
कहती है
ठाकुर जी का
भोग है
औरतें देवी स्थान में
चढ़ा आती हैं
ठेकुआ, बतासा
भिंगोया चना

गौरैया बाबा पास
साँझ पहर
जलाती है दिया
दिन भर
हाथ जोड़ ईश्वर से
अपनों के लिए
खूब- खूब मांगती है
करती है जितिया और तीज,
करवाचौथ और छठ व्रत
आज भी स्त्री
खुद को पूरा परिवार ही
मानती है
खुद को मैं नहीं,
हम जानती है
और इस तरह
बनाये रखती है
धरती और आकाश का
संतुलन।।

7. स्त्रियां

स्त्रियां
चाहती थीं
अपने जीवन से बुहार दें
बिखरे सारे अवाँछित
धूल – कण

फेंक आये किसी
चौराहे पर ,
जहाँ हफ़्ते भर
पुराने टोटके के
नींबू- मिर्ची फेंक
दिए जाते हैं

उड़ेल आये किसी कुँए के
मुंडेर पर ,
जहाँ घिसता रहे
रस्सी संग
पत्थर के पीठ पर

किसी नदी के
किनारे छोड़ आये ,
जैसे लोग
छोड़ आते हैं
पूजा के सूखे फूल

किसी शाम के
धुंधलके में
गली के मोड़ पर
उतार आये
सर से मनो बोझ

और एक शाम
अपनी सारी परेशानियों को
अपनी मुट्ठी में भर
चुपके से चल दी स्त्री

अचानक याद आया
माँ कहती थी
शाम ढले
घर से कूड़ा
बाहर नहीं निकालते

और फिर लौट आयी स्त्री
इस संकल्प के साथ की
कल सुबह ही
अपनी सारी परेशानियों को
सूरज से कह दूँगी

इस तरह
स्त्री का सूर्य संग
सुख- दुख के साझेदारी का रिश्ता बन गया

जिसे रोज सुबह वह
एक लोटे जल के साथ
सौंप आती है अपने
दिन भर का
हिसाब – किताब

8. बदलती हुई स्त्री

जब अपने
तेरहवें – चौदहवें
साल में डरते हुए उसने
स्त्री होने की ओर
कदम बढ़ाया था
तब माँ ने आहिस्ते से
बताए थे
कई राज
कई गुर कानों में
घोल दिए थे
उन दिनों में
संभल कर रहने
के लिए
वह सारी उम्र उन
सीखों पर
डरती – घबराती चलती रही,
उन विशेष दिनों
मंदिरों,रसोई घर जाने
से डरती रही ,
खुद के और घर की
बुजुर्ग महिलाओं की
नजर में उपेक्षित बनी रही
कई बार संकोच व शर्म से
आंखे नीची कर
खुद को कोसती रही
जबकि उसने भी
विज्ञान की किताबों में
पढ़ा था  कि
यह प्रकृति की सबसे
जरुरी क्रिया है
वंश को आगे बढ़ने के
लिए
संसार को जीवित
रखने के लिए
फिर भी
प्रकृति के उपहार पर
नजरें सदा
झुकी रहीं
पर !
जब वह
अपनी बिटिया के
हाथों थमाना चाही
शर्म की वही पैकेट
तब हँस कर बिटिया
ने माँ को
गले लगा कर कहा
क्या माँ ? यह तो
बहुत कॉमन है
यह तो सभी जानते हैं
किससे छिपाना ?
क्या शरमाना ?
उसे स्त्री का
इस तरह बदलना
बहुत सुखद लगा
उसने खुद के अंदर
सृजन करने वाली
स्त्री को दुलारा
उसने खुद के
ऊपर पड़ी
शर्म की चादर को
उतारा और
स्त्रियों के बदलने की
दौर में
खुद भी शामिल हो गयी
जहाँ स्त्री के विशेष दिन
शर्म के नहीं
गर्व के होते हैं
स्त्री के सम्पूर्ण होने
के होते हैं।

9.तीस पार की नदियां

उसके अंदर भी
बहने लगी है
इन दिनों वो नदी
जो अक्सर
तीस पार होती लड़कियों में
बहने लगती है।
डरती , घबराती , भयभीत सी
गतिहीन होती नदी की
धाराएं  भी अब होने लगी है मद्धम
वो बहती है बहुत
सम्भल कर
ढूँढ़ने लगती है
उन किनारों को जो उसकी गतिशीलता को
स्थिरता में बदल दे।
अब वो नहीं करती
अठखेलियां , लेती नहीं
हिचकोले
नहीं रखती मनमोहक
तरंगों की चाह ।
उसकी आतुर धाराएं
ताकती है किनारों को
एक उम्मीद से
हाँ , उसके अंदर की नदी
स्थिर होना चाहती है
किसी मजबूत बाँध संग
बंध जाना चाहती है
वह  चाहती है कोई मोड़ ले
अपनी ओर
उसकी धाराओं को
रोक दे
बन मजबूत चट्टान
उसके वेग को
अपने जीवन के समुंद्र में
विलीन हो  जाने से पहले
वो करती है इंतजार
उस अनाम तट का
जहाँ तीस पर होती
लड़कियों
के लिये होता हो
संगम का मोक्ष द्वार

10. स्त्री तुम क्या होना चाहती हो – ‘

क्या यही होता है
स्त्री होना कि
अपने लम्बे घने केशों को
जल्दी से बाँध
सुबह के अंधेरे में ही उठ जाना
और समेटना सारे कामों को
बगैर ही थके
सबकी जरूरतों में ढलते जाना
आंतरिक क्षणों में पूर्णतः
समर्पित हो जाना
क्या यही है स्त्री हो जाना ?
पर! वो क्या है ?
जो पनपता है अचानक
एक स्त्री के अंदर
कुछ अनसुलझा- सा प्रश्न
घने केशों के बीच नये रास्ते तलाश करता है
बेचैन मन
बड़ी -सी बिंदी के पीछे से
झांकता है
आत्मसम्मान की स्वप्न
आँखों में ढूंढता है स्व अस्तित्व की चमक
अक्सर  होंठो पर गुनगुनाता है
अपने लिए कोई गीत।
तभी जैसे पीछे से पुकारती है
अपनी ही  परछाईं
ओ स्त्री , सुनो!
उनके आने का वक्त हो चला है
शाम पसर चुकी है
तुम बाँध लो जूड़ा
पहन लो  धुली साड़ी
अब निखर भी जाओ
सँवार लो खुद को
फिर
अनगिनत प्रश्नों को
चाय के केतली में उबाल
स्वाद लेती है तुम्हारे साथ
कि पुनः बिस्कुटों के आवाज में
उभरता है एक कहकहा
ओ स्त्री !तुम बस यही
होना चाहती थी क्या?
पर! अनदेखा कर सारे प्रश्न
तुम्हारे सामीप्य को समेट लेना चाहती है खुद में
तुम्हारी प्रतीक्षारत आँखों में खुद को विलीन कर
निहाल हो जाना चाहती है।
पुनः तुम्हारे खर्राटे के
बीच  जागी उसकी सारी रात
पूछती ” ओ स्त्री
क्या तुम सच में यही होना
चाहती थी ?
तब आदमकद सीसे में
निहारती है वो
पूर्ण तृप्ति से भरी स्त्री को
पर ! शीशे से झांकती स्त्री की
आँखों में वही प्रश्न  बार – बार उठता है
वो स्त्री , क्या मात्र तुम यही
होना चाहती थी ?
पर , खुद को ढूंढती स्त्री
खुद ही नहीं जान पाती
वो सच में क्या होना चाहती है ?
और फिर उम्र भर
सारे रिश्ते में
खुद को ढूंढती
एक दिन यूँ ही
चली जाती है
बग़ैर यह जाने कि वो  स्त्री क्या
होना चाहती थी ?

11. संतुलन
स्त्री पतंग नहीं है
स्त्री डोर भी नहीं है
वह तो है गहन आकाश
जिसमें रहते हैं
सारे ग्रह-नक्षत्र
चांद-सूरज
तारे-सितारे
स्त्री चूल्हा नहीं है
स्त्री चौका नहीं है
वो तो है घर-दुआर
जिसमें बसते हैं
फल-फूल
जड़ी-बूटी
खेत-खलिहान
स्त्री  नदी नहीं है
स्त्री सागर नहीं है
वह तो है जलस्रोत
जिसमें समाए होते हैं
पाप-पुण्य
विष-अमृत
जीवन के गहरे राज।
यानी स्त्री
संतुलन है
धरती, आकाश और समुद्र का
जब तक स्त्री बनाए रखेगी
यह संतुलन
तब तक बची रहेगी
यह दुनिया।


कवयित्री सत्या शर्मा ‘ कीर्ति’, पेशे से वकालत के बाद पूर्णतः लेखन कार्य में समर्पित। पाँच किताबें प्रकाशित। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन।

सम्पर्क: ईमेल- satyaranchi732@gmail.com
मो-7717765690

 

टिप्पणीकार प्रज्ञा गुप्ता का जन्म सिमडेगा जिले के सुदूर गांव ‘केरसई’ में 4 फरवरी 1984 को हुआ। प्रज्ञा गुप्ता की आरंभिक शिक्षा – दीक्षा गांव से ही हुई। उच्च शिक्षा रांची में प्राप्त की । 2000 ई.में इंटर। रांची विमेंस कॉलेज ,रांची से 2003 ई. में हिंदी ‘ प्रतिष्ठा’ में स्नातक। 2005 ई. में रांची विश्वविद्यालय रांची से हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री। गोल्ड मेडलिस्ट। 2013 ई. में रांची विश्वविद्यालय से पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में रांची विमेंस कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति ।

संप्रति “ समय ,समाज एवं संस्कृति के संदर्भ में झारखंड का हिंदी कथा- साहित्य” विषय पर लेखन-कार्य।

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तक- “ नागार्जुन के काव्य में प्रेम और प्रकृति”
संप्रति स्नातकोत्तर हिंदी विभाग रांची विमेंस कॉलेज रांची में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।
पता- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,रांची विमेंस कॉलेज ,रांची 834001 झारखंड।
मोबाइल नं-8809405914, ईमेल:  prajnagupta2019@gmail.com

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