वीरेंद्र यादव हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना को इक्कीसवीं सदी में ले जाने वाले प्रमुख आलोचक थे। उनके आकस्मिक निधन से ऐसा लग रहा है कि ऐन लड़ाई के बीच फासीवाद-विरोधी सांस्कृतिक आंदोलन का एक प्रमुख सेनानी चला गया।
वीरेंद्र यादव महज साहित्यिक आलोचक नहीं थे; वे हिंदी-उर्दू पट्टी के सबसे सक्रिय, तेजस्वी और अंतर्दृष्टिसंपन्न सामाजिक-सांस्कृतिक योद्धा थे।
वे मार्क्सवाद की समझ का भारतीय समाज के संदर्भ में रचनात्मक उपयोग करने वाले जन-बुद्धिजीवी की भूमिका में सामने आए।
उनका महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना में वर्ग-संघर्ष की दृष्टि के साथ सामाजिक वर्चस्व और उसके प्रतिरोध के परिप्रेक्ष्य को जोड़ा।
उन्होंने बहुधा एकायामी दिखने वाली मार्क्सवादी आलोचना को चार आयामों में विकसित किया—आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक।
उनकी पुस्तक उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता में इस आलोचना-शैली को ‘गोदान’, ‘झूठा सच’, ‘आधा गाँव’, ‘राग दरबारी’, ‘आग का दरिया’ व ‘उदास नस्लें’ जैसे प्रतिष्ठित उपन्यासों का विश्लेषण करते हुए स्थापित किया गया।
इन उपन्यासों में वंचित श्रेणियों—किसानों, मजदूरों, दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों—की भूमिकाओं को परखते हुए उन्होंने इनमें निहित प्रतिरोध के आख्यान को उद्घाटित किया।
इस आलोचना में इन उपन्यासों को केवल उनके समय के साहित्यिक दस्तावेजों के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इतिहास की धारा में एक सचेत हस्तक्षेप की तरह देखा गया।
वीरेंद्र यादव की दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण रचनाएँ वे थीं, जिन्होंने समय को केवल दर्ज नहीं किया, बल्कि उसे बदलने में भूमिका निभाई।
प्रेमचंद के जीवंत विश्वकोश थे वीरेंद्र यादव!
कितना ही उलझा हुआ सवाल हो और कितना ही समकालीन, वीरेंद्र यादव हमेशा प्रेमचंद साहित्य में उसका सटीक हल ढूंढ लेते।
मसला भारत की आजादी की वास्तविकता का हो, ब्राह्मणवाद का हो, स्त्री-मुक्ति का हो, सांप्रदायिकता का हो या ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चल रही बहस का—वीरेंद्र यादव हर बार दिखा देते थे कि इन सभी के सबसे तर्कसंगत और जनहितैषी हल प्रेमचंद के साहित्य में आसानी से मिल जाते हैं।
एक आलोचक के रूप में वीरेंद्र यादव के बौद्धिक साहस का मूल्यांकन करना हो तो दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए।
पहली, सामाजिक आरक्षण और दलित साहित्य जैसे नाजुक मुद्दों पर प्रतिक्रियावादी नजरिया रखने वाले कुछ स्थापित मार्क्सवादी आलोचकों से उनकी प्रचंड बहस।
दूसरी, प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ को दलित-विरोधी ठहराने वाली दलित आलोचना का तार्किक खंडन।
वीरेंद्र यादव अपनी इस समझदारी से कभी नहीं डिगे कि ‘कफन’ कहानी दलित का अमानवीकरण नहीं करती, बल्कि उस अमानवीय व्यवस्था पर चोट करती है, जो दलित को दलित बनाए रखती है।
आप वीरेंद्र यादव के निष्कर्ष से सहमत हों या असहमत, आपको उनकी उस बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक साहस की सराहना करनी ही पड़ेगी, जो न मुख्यधारा की आलोचना के शिखर को चुनौती देते हुए घबराई, न बहुजन आलोचना की मुख्य धारा को प्रश्नांकित करते हुए।
1857 के विद्रोह पर वीरेंद्र यादव के नजरिए ने भी काफी बौद्धिक ध्रुवीकरण किया। बिरजिस क़दर और बहादुर शाह ज़फ़र के फरमानों के ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर वीरेंद्र यादव ने स्थापित किया कि भारत में जमींदारों और उच्च वर्गों के विशेष अधिकारों को पुनर्स्थापित करना इस विद्रोह का एक मुख्य एजेंडा था। उनकी यह दृष्टि हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा की मुकम्मल एंटी-थीसिस थी।
हिंदी के उच्चभ्रू-प्रगतिशील आलोचकों ने इसे कभी मंजूर नहीं किया, लेकिन अंग्रेजी में लिखने वाली चारू गुप्ता जैसी सामाजिक इतिहासकारों ने इसके महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
1857 के मुद्दे पर साहित्यकारों और इतिहासकारों के बीच गहन बहस अभी भी जारी है, लेकिन हिंदी आलोचना को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उसने 21वीं सदी में एक ऐसा आलोचक पैदा किया, जो सभी तरह की मुख्य धाराओं के विरुद्ध तैर सकता था!
उनके साथ कई दशकों से एक जीवंत संवाद जारी था, जिसमें असहमति के मुद्दे बहुत कम मिलते थे। मिलते भी तो वे एक ऐसे लोकतांत्रिक व्यक्ति थे, जिनसे कितनी ही तीखी बहस हो जाए, संवाद और गाढ़ा हो जाता था।
ऐसे जुझारू साथी को अलविदा कैसे कहें? वे साथ हैं और साथ रहेंगे।

