सुजीत कुमार
ज्योति कलश : ज्योति बा फुले और सावित्रीबाई फुले की क्रांतिकारी जीवन गाथा
(संजीव कृत उपन्यास ‘ज्योति कलश’ की पुस्तक समीक्षा)
‘ज्योति कलश’ क्रांतिकारी समाज सुधारक जोतिबा फुले के जीवन पर आधारित उपन्यास है, जिसे मूर्धन्य कथाकार संजीव ने लिखा है। इस उपन्यास में संजीव ने ज्योतिराव फुले के जीवन की घटनाओं को औपन्यासिक स्वरूप में चित्रित किया है और जाति-वर्ण आधारित व्यवस्था- विशेषकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मुख़ालफ़त करनेवाले फुले दंपति की ऐतिहासिक/ सामाजिक भूमिका की उत्प्रेरक परिस्थितियों को कुछ इस तरह लिपिबद्ध किया है- ‘‘बीतते बसंत की एक शाम। कटी-फटी पहाड़ियों पर चांद फिसलता जा रहा है। आधा उजला, आधा कजला, धूसर चांदनी। पहाड़ी के नीचे एक खाट पड़ी है। उस पर लेटा है गांव का कुलकर्णी। सिरहाने रखी है गुड़ की डली और ‘मनुस्मृति’। सामने हाथ जोड़े खड़ा है गोन्हे, परिवार का मुखिया। जो आखिरी बार पूछता है कुलकर्णी से, ‘‘तो महाराज, खेत…! ’’
कुलकर्णी कहता है- ‘‘कह दिया न गोन्हे, इस खेत का मोह छोड़ दो…य़ह हमारा हुआ…मेहनती आदमी हो तुम फिर से नया खेत बना लोगे। मैं कोई अन्याय नहीं कर रहा हूँ। यह देखो, शास्त्र क्या कहता है- ‘‘शूद्र द्वारा उपार्जित धन को ब्राह्मण निर्भीक होकर ले सकता है, उसका धन उसके स्वामी के अधीन होता है।’’ सहसा लहरों में उछाल आता है। गोन्हे के निहोरा करते दोनों हाथ पलटकर ब्राह्मण कुलकर्णी के गले के गिर्द जा कसते हैं। (पृष्ठ 9)
संजीव प्रकृति, इतिहास, समाज और अपनी कल्पनाओं को विश्वसनीय अंदाज में ढालनेवाले कथाकार हैं। उपरोक्त प्रसंग में वह ज्योतिराव फुले के एक पुरखे के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने गाँव के ब्राह्मण कुलकर्णी के जुल्मों का विरोध करते हुए हत्या कर दी थी और भागकर पुणे आ गए थे। संजीव फुले की जीवनी बताते समय इतिहास और काल का पूरा ख़याल रखते हैं- ‘‘11 अप्रैल, 1827 को उस परिवार में एक शिशु का जन्म होता है। कोल्हापुर की पहाड़ी पर स्थित ज्योति के नाम पर शिशु का नाम रखा जाता है जोती। नौ वर्ष पूर्व ही पेशवाशाही खत्म हो चुकी है और जोतिबा नौ माह के थे कि माता चिमनाबाई का भी देहांत हो चुका है।’’ (पृष्ठ 10)
संजीव को हिंदी साहित्य खासकर गद्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। उन्हें प्रयोगधर्मी कथाकार के रूप में भी जाना जाता है। विशेषकर उन उपन्यासों के लिए, जिन्हें उन्होंने ऐतिहासिक नायकों को केंद्र में रखकर रचा है। संजीव ने ज्योतिबा फुले को केंद्र में रखकर ‘ज्योति कलश’ की रचना की है, जिसमें उन्होंने इतिहास और साहित्य को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की है। हालांकि यह फुले की जीवनगाथा तो है ही, सावित्रीबाई फुले, सत्यशोधक समाज और बड़ोदरा के महाराज की महाराष्ट्र के नवजागरण में क्या भूमिका रही उसकी भी गाथा है। इन लोगों ने अछूतों को सामाजिक बराबरी दिलाने के लिए संघर्ष किया, वर्णगत श्रेष्ठता और उत्पीड़न का विरोध किया, दलितों के साथ स्त्रियों की शिक्षा के लिए के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। सावित्रीबाई ने जब बच्चियों के लिए स्कूल खोला, तो उन पर गोबर और मैला फेंके गये। लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा। जोतिबा और सावित्रीबाई ने औरतों को भोग की वस्तु समझे जाने की मानसिकता का प्रबल विरोध किया और उन पर लादी गयी तमाम अमानवीय प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ींं। पितृसत्तात्मक वर्णवादी समाज में जबरन यौन संबंध बनाकर गर्भवती की गयी स्त्रियों के लिए प्रसूति गृह और शिशु हत्या प्रतिबंधक गृह बनवाये। धार्मिक कर्मकांड के जरिए होने वाली लूट का पर्दाफाश किया। ज्योतिबा ने किसानों के उत्पीड़न और गुलामी की प्रथाओं का विरोध किया। इस पुस्तक में हंटर कमीशन के सामने ज्योतिबा फुले की रिपोर्ट के बिंदुओं को भी दिया गया है, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य जाति प्रथा का विरोध, किसानों के कल्याण, निःशुल्क प्राइमरी शिक्षा, हर वर्ग और जाति के शिक्षकों की नियुक्ति की जरूरत आदि पर जोर है। रमाबाई की रिपोर्ट स्त्रियों पर केंद्रित थी। सावित्रीबाई के अनुसार ज्योतिबा की रिपोर्ट रमाबाई के प्रतिवेदन को मिलाकर ही पूर्ण हुई। ज्योतिराव फुले और उनके विचार भारत के हिंदी प्रदेश में धीरे-धीरे विस्तार पा रहे हैं। आज के दौर में फूले दंपति के विचार कुछ ज़्यादा ही प्रासंगिक है।
कुछ जगहों पर संजीव अपनी कल्पनाशीलता का भी सुंदर इस्तेमाल करते हैं। एक जगह वे लिखते हैं- ‘‘कहते हैं, जिस दिन बालक का जन्म हुआ, उसी दिन ब्राह्मण पेशवाशाही के गढ़ माने जानेवाले ‘शनिवार वाड़े’ में आग लगी, वह जलकर राख हो गया। इस संकेत को क्या मानेंगे- ‘‘क्रूर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के भस्मसात होने का सूत्रपात।’’
ज्योतिराव फुले के साथ सावित्रीबाई फुले के जीवन संघर्ष को भी अलग से नहीं देखा जा सकता है। इसकी वजह यह कि दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे। लेकिन दोनों का अपना-अपना अस्तित्व भी कायम है, जिसका ख्याल संजीव ने रखा है, एक बानगी देखी जा सकती है। वे सावित्री बाई फूले से कहते है- ‘‘मैंने तो एक लीक पकड़ा दी थी। चलकर तो तुमने दिखलाया। आज दबे-छिपे ही सही, लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं। रानाडे, चिपलूणकर और पंडिता रमाबाई जैसी प्रसिद्ध हस्तियां भी। याद हैं वे दिन, जब स्कूल में पढ़ाने के लिए जाते समय लोग तुम पर गोबर, कीचड़ और मैला फेंकते। क्या-क्या मुसीबतें नहीं झेलीं तुमने। घर तक से निकाल दी गई।” (पृष्ठ 35)
फ़ातिमा शेख़ का उल्लेख सावित्रीबाई फुले द्वारा 10 अक्टूबर, 1856 को ज्योतिराव फुले को लिखे पत्र में मिलता है, संजीव ने इस पत्र के एक वाक्य को सूत्र बनाकर सावित्रीबाई फुले की सहयोगी फ़ातिमा शेख़ को पर्याप्त स्थान दिया है। वह इस उपन्यास में कई जगहों पर सामने आती हैं। कभी सहयोगी के रूप में तो कभी सहेली के रूप में।
संजीव इस उपन्यास में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करते दिखते हैं, जो नहीं भी रहता तो उपन्यास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
संजीव ने फुले दंपत्ति के जीवन का सरल शब्दों में वर्णन किया है। उपन्यास में रोचकता की कमी नहीं है जो कि उपन्यास का एक प्रमुख गुण माना जाता है। संजीव ने विभिन्न घटनाओं से जुड़े संदर्भों को टिप्पणियों के ज़रिए बताने की कोशिश की है। साथ ही, उपन्यास के अंत में ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को कालक्रम के जरिए बताया है, ताकि अध्येताओं/पाठकों को उनके जीवन और उनके कृतित्व को समझने में आसानी हो। इसके अलावा उपन्यास के अंत में कई तस्वीरें हैं, जिनमें ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, उनके पुत्र यशवंत, ज्योतिबा का घर, सावित्रीबाई के मायके का घर, फ़ातिमा शेख़, ज्योतिराव फुले की पालक माता सगुणाबाई, पंडिता रमाबाई, कृष्णराव पांडुरंग भालेकर, लहूजी मांग, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और थॉमस पेन आदि की तस्वीरें शामिल हैं। इससे नई पीढ़ी इन व्यक्तित्वों से परिचित हो सकेगी। यह पुस्तक महान भक्त कवि और क्रांतिकारी कबीर को समर्पित है। उनके वैचारिक संघर्ष की परंपरा को ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने अपने समय में क्रांतिकारी तरीके से आगे बढ़ाया।
समीक्षित पुस्तक : ज्योति कलश (उपन्यास)
लेखक : संजीव, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 127,
मूल्य- 250 पेपर बैक संस्करण

