पवन करण
●यह कास का फूल है इसके पत्ते हाथ चीर देते हैं
घाव भले ही भर जाये पर कसक रह जाती है
बड़ा खुद्दार प्रेमी होता है यह
●सलामी दो सलामी दो की एक मजबूत सरकार
मलबा बनाने का काम कितनी मुस्तैदी से करती है
●जब-जब वह खतरों की बात उठाता है, तब समझ लेना चाहिए
कि अब कोई नाव खतरे में नहीं पूरी नदी खतरे है
●ये वही प्रेमचंद वाला साहूकार है, जो सवा सेर गेहूं का ब्याज,
पांच मन मांगता था, अब कोट-पैंट पहनकर आया है
●बहुत डरती है वह हुकूमत एक हंसी और एक आंसू से
एक कलम और एक शहादत से, जिसके बने हो
हिमायती तुम, जिसके लिए बने हो दंगाई तुम
प्रतिरोधी-वैचारिक-विस्तार में रंगकर्मी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलनकारी, कवि उषा राय का न्यू बर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित होकर आया दूसरा कविता संग्रह ‘भीमा कोरेगाँव तथा अन्य कविताएँ’ एक हस्तक्षेप की तरह उपस्थित है।
निरंतर क्षरण का शिकार होते जाते समाज, सांप्रदायिक राजनीति के फैलाव, पूंजीवादी एकाधिकार तथा जातिवादी दंश के विरुद्ध कवि की चिंता संग्रह की पहली कविता से चलकर आखिरी कविता तक पहुँचती है। उषा राय अपने इस संग्रह में कतई व्यक्तिगत नहीं, वे हर जगह सार्वजनिक हैं।
कविताओं में कहीं प्रदर्शन को व्याकुल गुस्सा या आक्रोश नहीं फूटता, कोई तनी हुई मुट्ठी नहीं दिखाई देती। मगर प्रतिरोध का जो बहाव इस संग्रह की कविताओं में दिखाई देती है, वह प्रामाणिक और विश्वास दिलाने वाली रचनात्मक खासियत है।
अगर तुम भी स्त्रियों की तरह रोते होते
तो नदियां सूखती नहीं प्यार एक तरफा न होता
अप्रेल के कम पानी में यूं हम सबको डूबना न पड़ता
तुम रोते होते तो प्रेम लबालब रहता
उषा राय की कविताओं में प्रेम है, प्रेम में पीड़ा तिरस्कार सहती, धोखे से उबर जाती और धर्मान्धता के विषैले नाखूनों से नोची जाने के बावजूद फिर से खुद को खड़े कर लेने वाली स्त्री है। अगुआई करने की माद्दा रखने वाली ऐसी स्त्री के पीछे ही चला सकता है।
पुस्तक: भीमा कोरेगांव तथा अन्य कविताएँ
कवि: उषा राय
मूल्य 200 रूपये
प्रकाशक: न्यू बर्ल्ड पब्लिकेशन

