महाशिवरात्रि पर स्नान के साथ कुंभ मेला सम्पन्न हो रहा है। कुंभ मेला के एक महीने के दौरान तमाम अखाड़ों के साधु संत मीडिया और सोशल–मीडिया के चश्म-ए-नूर बने रहे। बीच बीच में उनके विवादित वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे। कुंभ के दौरान अखाड़ों की भूमिका, लोगों के साथ संपर्क, विवादित माँगों और विषयों को लेकर धर्म संसद जैसे आयोजन और समाज व राजनीति पर भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों पर कोई ठोस रिपोर्ट नहीं दिखी।
समाजविज्ञानी रमाशंकर सिंह बताते हैं कि इस कुंभ में अखाड़ों ने बहुत अव्यवस्थाएँ फैलायी। लेकिन उनकी ओर न तो मीडिया का ध्यान गया न मेला प्रशासन का। दरअसल आम लोगों को मेला क्षेत्र में गाड़ी लाने की मनाही थी लेकिन राजनीति और कार्पोरेट के वीआईपी, प्रशासनिक अधिकारियों और अखाड़ों की गाड़ियों को मेलाक्षेत्र में आवाजाही की परमिशन थी। अधिकारियों ने ज़्यादा से ज़्यादा अपने परिवार को वो गाड़ियाँ मुहैया करवाई। लेकिन अखाड़ो ने अपनी गाड़ियों से तमाम लोगों को मेलाक्षेत्र में ढोया और अच्छा पैसा कमाया। उनकी गाड़ियों पर चढ़कर लोग संगम तक आये-गये। ये वो लोग थे जो वीआईपी नहीं थे लेकिन सुविधासंपन्न थे, इनमें छोटे-मोटे कारोबारी से लेकर, मोटी तनख्वाह वाले टेक और सेल्स क्षेत्र के लोग थे। अखाड़ों और बाबाओं ने न सिर्फ़ इन लोगों को अपने टेंटों में आश्रय दिया, बल्कि संगम नहाने और मेला क्षेत्र घूमने के लिए अपनी गाड़ियाँ मुहैया करवायीं। इससे भी मेलाक्षेत्र और संगम घाट पर दबाव बढ़ा। अखाड़े के लोगों पर अवैध टेंट सिटी चलाने के आरोप भी लगे। जैसे कि झूँसी छतनाग क्षेत्र में स्थित जुस्ता शिविर के संचालन में जूना अखाड़ा के महंत अविमुक्तानंद गिरी का नाम आया।
अखाड़ा परिषद अध्यक्ष की ग़ैरज़िम्मेदाराना भूमिका
अखाड़ा परिषद अध्यक्ष रवीन्द्र पुरी पर सभी अखाड़ों के बीच समन्वय स्थापित करने और सरकार प्रशासन और अखाड़ों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की ज़िम्मेदारी होती है। लेकिन वे न सिर्फ़ कई मौकों पर अपनी भूमिका निभाने में फेल हुए बल्कि उन्होंने कई मामलों को बेवजह राजनीतिक रंग देने की भी कोशिश की। जैसे कि 29 जनवरी को भगदड़ की घटना के तुरंत बाद उन्होंने अपने बयान में कहा कि- भगदड़ की घटना कहीं विपक्ष की साजिश तो नहीं। उन्होंने ही सबसे पहले घटना की साजिश के एंगल से जाँच की माँग उठायी। जिसके बाद राज्य सरकार द्वारा इस मामले की एसटीएफ जाँच शुरु हुई। उन्होंने यह भी कहा था कि छोटी सी घटना को बहुत बड़ी घटना बताकर दुष्प्रचार फैलाया गया।
इसके अलावा कुंभ मेला शुरु होने से पहले मुख्यमंत्री संग बैठक के दौरान एक अखाड़े के महंत संग हाथापाई करने का मामला सुर्खियों में रहा। सिर्फ़ इतना ही नहीं शाही स्नानों पर अखाड़ों के नहाने के क्रम की सदियों पुरानी परंपरा को बदलकर संख्या बल के आधार पर जूना अखाड़े को सबसे पहले नहाने का अधिकार देने जैसे विवादों को उन्होंने बढ़ाकर अखाड़ों के बीच वैमनस्यता को बढ़ाया और जूना अखाड़ा को अतिरिक्त महत्त्व देकर अखाड़ों के बीच में संख्याबल की राजनीति को बढ़ावा दिया। दरअसल एक परंपरा चली आ रही है कि सबसे पहले महानिर्वाणी अखाड़ा, फिर अटल अखाड़ा, फिर निरंजनी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा स्नान करता है। इसके बाद जूना अखाड़ा, आह्वान अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा का नंबर आता है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र हरि गिरि ने कहा कि अंग्रेज़ों के समय की नियम कि पहले संन्यासी, फिर वैरागी फिर उदासीन अखाड़े स्नान करेंगे उसे बदला जाए। संख्या बल के आधार पर जूना अखड़ा सबसे बड़ा है इसलिए उऩ्हें स्नानक्रम में वरीयता दी जाए।
गौरतलब है कि महंत रवीन्द्र पुरी अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष हैं। वो मनसा देवी ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। वो निरंजनी अखाड़ा से जुड़े हुए हैं। RSS के बाल सेवक के रूप में 1989-90 में राम जन्मभूमि आंदोलन और 1992 में बाबरी ढांचा गिराने में अनेक महंत संन्यासियों और कारसेवकों का सहयोग किया था।
5.3 लाख सदस्यों वाले जूना अखाड़ा पर यति नरसिंहानंद की मज़बूत होती पकड़ के मायने
कुंभ मेले की शुरुआत में 11 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ यति नरसिंहानंद के चलने का वीडियो तमाम समाचारों की सुर्खियों में था। इसके अलग-अलग मायने निकाले गए लोगों ने कहा कि योगी सरकार में उसकी बढ़ती हैसिअत को दर्शाता है ये।
हेट स्पीच और मुस्लिमों के जनसंहार के लिए युवकों को शस्त्र और ट्रेनिंग मुहैया करवाने का आरोपित यति नरसिंहानंद जूना अखाड़े का महामंडलेश्वर है। 5.3 लाख सदस्यों के दावे करने वाला जूना अखाड़ा में यति नरसिंहानंद की मज़बूत होती पकड़ और प्रभाव का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने अखाड़े के अंदर दो-दिवसीय (25-26 जनवरी) ‘धर्म-संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया। साथ ही कथावाचक ठाकुर देवकीनंदन द्वारा आयोजित धर्म संसद में जूना अखाड़े के प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा लिया और नफ़रती बयानबाज़ी किया।
जूना अखाड़ा में यति नरसिंहानंद को एक तरह से फ्री-हैंड दे दिया गया है इसका अंदज़ा जूना अखाड़े के मुख्य संरक्षक महंत हरि गिरि के इस बयान से लगाया जा सकता है – ‘सनातन धर्म पर लगातार हो रहे आक्रमणों और आघातों से जूना अखाड़ा आहत और विचलित है और सनातन धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष को भी तैयार हो रहा है। अखाड़े के वरिष्ठ संत अब युवा संन्यासियों को धर्म की रक्षा के काम में लगाने की तैयारी में जुट गए हैं।’
पंचदशनाम जूना अखाड़े के धर्म-संवाद आयोजन से यति नरसिंहानंद गिरि ने कुम्भ क्षेत्र से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर माँग की कि बंग्लादेश और पाकिस्तान पर सैन्य कार्र्वाई करके वहाँ के हिंदुओँ के लिए अलग राष्ट्र बनाएँ। उन्होंने कुम्भ में कहा कि मुस्लिम आबादी से हिंदुओं को ख़तरा है इसलिए हर हिंदू परिवार 4-5 बच्चे पैदा करें।
साम्प्रदायिक राजनीति और सत्ता को समर्थन देने के लिए जूना अखाड़ा जाना जाता है। यूँ तो महामंडलेश्वरों की नियुक्ति कुम्भ मेले के दौरान की जाती है, यही नियम और यही परंपरा रही है। लेकिन 2019 और 2024 लोकसभा चुनावों से ठीक पहले जूना अखाड़ा ने दलित और आदिवासी समाज के लोगों को महामंडलेश्वर बनाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी। जूना अखाड़ा दलितों को महामंडलेशवर बनाने को धर्मांतरण के ख़िलाफ़ अभियान बताता है।
मौनी अमावस्या पर 500 युवक और 150 से अधिक युवतियों ने अपना पिंडदान करके जूना अखाड़े में शामिल हुए। दीक्षा के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमें एक युवक बताता है कि वो बेरोज़गार था। उसने अग्नवीर में भी आवेदन किया था। बेरोज़ागर रहकर 10 लोगों को मारने से अच्छा है कि ख़ुद को मार दो, इसलिए नागा संन्यासी बन गया।
काशी के हनुमान घाट पर स्थित मुख्यालय से संचालित होने वाला जूना अखाड़ा की लगभग हर राज्य में एक शाखा है। उनके साथ अहमद शाह अब्दाली और जूनागढ़ के निजाम के साथ नागाओं के युद्ध करने और उन्हें हराने के किस्से जोड़े जाते हैं।
जूना अखाड़े से अलग यति नरसिंहानंद ने ख़ुद अपनी ‘ धर्म सेना ’ का भी गठन किया है। डासना मंदिर में शस्त्र ट्रेनिंग दिए जाने की भी बात आयी। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सुनियोजित साम्प्रदायिक हिंसा में भी यति नरसिंहानंद का नाम आया था। यह पहले ऐसा केस था जिसमें साप्रंदायिक हिंसा में बड़े पैमाने पर असलहों का इस्तेमाल किया गया था। उस वक़्त मैं रिपोर्टिंग के लिए वहाँ ग्राउंड पर था और प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि हिंसा को अंजाम देने वाले लड़के दिल्ली से सटे बाग़पत और लोनी इलाके से लाये गए थे उनकी ज़बान इसी इलाक़े की थी।
कुम्भ शुरु होने से पहले सितंबर 2024 में कुख्यात गैंगस्टर और छोटा राजन गिरोह के ओहदेदार बदमाश रहे प्रकाश पांडेय को जूना अखाड़े का महामंडलेश्वर बना दिया गया। श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़े के थानापति महंत राजेंद्र गिरि ने संतमंडली के साथ अलमोड़ा जेल जाकर उसे गुरुदीक्षा दिया और आधा दर्जन प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिरों की गद्दी सौंपी थी।
इसी अखाड़े में एक 13 साल की लड़की को अगवा करने का मामला उठा था। जिसे बाद में डीआईजी कुम्भ क्षेत्र वैभव कृष्णा द्वारा यह कहकर फर्ज़ी घटना करार दे दिया गया था कि लड़की अपने परिजनों को बिना बताए ही मेला क्षेत्र में चली आई थी।
इसी तरह 12 जनवरी को 13 साल की एक लड़की राखी सिंह को दीक्षा देकर जूना अखाड़ा चर्चा के केंद्र में रहा। गुरु महंत कौशल गिरि ने लड़की को दीक्षा दिया। मीडिया ने इस मामले को ग्लोरीफाई किया।
धर्म संसद ने राजनीति से बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की
इस कुम्भ मेले में दो धर्म संसद बैठाये गए। एक धर्म संसद ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के सेक्टर 12 स्थित शिविर में 10 जनवरी से शुरु हुई। इस धर्म संसद को संसद की तर्ज़ पर डिज़ाइन किया गया था। गोलाकार मंडप और संसद की ही तरह धर्म-सांसदों की बैठक की जगह बनाई गई। इस संसद में सर्वोच्च स्थान पर शंकराचार्य बैठते हैं जबकि संसदीय सचिव का पद भी बनाया गया है जो संचालन की ज़िम्मेदारी संभालता था।
मनु स्मृति के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी के लिए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के खिलाफ़ धर्म संसद में निंदा प्रस्ताव पास किया गया। एक महीने के भीतर माफ़ी माँगने या हिंदू धर्म से बाहर निकालने का प्रस्ताव रखकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राजनीति की सत्ता पर धार्मिक सत्ता का वर्चस्व सथापित करने की दिशा में क़दम बढ़ाया।
अपने सत्ता विरोधी बयानों के लिए लगातार कांग्रेसी खेमे के बताए जा रहे उत्तरपीठ (ज्योतिष) के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपने एक स्टैंड के चलते अचानक भाजपाई खेमे में नज़र आने लगे। धर्म संसद की इस क़ार्रवाई से हिंदुत्ववादी राजनीति को न सिर्फ़ मज़बूती मिलेगी बल्कि भाजपा इसे कांग्रेस के हिंदू विरोधी क़दम बताकर प्रचारित करेगी। ज़ाहिर है कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी की धार्मिक और जातीय पहचान को लेकर सत्ताधारी भाजपा हमेशा इनके ख़िलाफ़ अश्लीलता की हद तक आक्रामक रही है।
वहीं दूसरी धर्म संसद मेला क्षेत्र के सेक्टर 18 में शांति सेवा शिविर में 27 जनवरी को कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर द्वारा बुलाई गई थी। इस धर्म संसद का मुख्य उद्देश्य वक्फ़ बोर्ड की तर्ज़ पर सनातन बोर्ड का गठन करना था। ख़ुद अखाड़ा परिषद ने घोषणा किया था कि वह 27 जनवरी को महाकुंभ में धर्म संसद में सनातन बोर्ड की घोषणा करेंगे। लेकिन 25 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान के बाद अखाड़ा परिषद ने इस आयोजन से किनारा कर लिया था। इस आयोजन में लोगों से शामिल होने के लिए फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी द्वारा अपील किया गया था। भाजपा सांसद हेमा मालिनी भी इसमें शामिल हुई थी।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 जनवरी को अपने बयान में हिंदू धर्म को बरगद और मुस्लिम धर्म को झाड़ी बताते हुए कहा था कि – सनातन धर्म एक बरगद का पेड़ है और इसकी झाड़ी से तुलना नहीं की जा सकती। सनातन धर्म को किसी संकीर्ण सीमा में न बाँधें। इसे उन छोटे-छोटे बोर्डों से तुलना न करें।
वहीं धर्म संसद में जगद्गुरु विद्या भास्कर ने “संभल, मथुरा, विश्वनाथ, तीनों लेंगे एक साथ” नारा देते हुए प्रधानमंत्री मोदी से वर्शिप एक्ट को खत्म करने की माँग की। अयोध्या के संत वल्लभदास महाराज ने नारा दिया- रामलला हम आएंगे, मंदिर हर जगह बनाएंगे। देवकीनंदन ठाकुर ने कहा- बहुत सह लिया अब न सहेंगे, अपना हक़ हम लेकर रहेंगे। पाकिस्तान छोड़कर हिंदू आए, उनकी जगह कहाँ गई। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू बोर्ड नहीं है तो हिंदुस्तान में वक्फ बोर्ड क्या कर रहा है? देवकीनंदन ठाकुर ने आगे कहा- सबसे पहले वक्फ बोर्ड ने कुंभ वाली जगह को अपनी ज़मीन बताई। हमको डर है कि कहीं वक्फ बोर्ड ऐसा न कह दे कि पूरा भारत ही हमारा है। बताओ फिर हिंदू कहाँ जाओगे? उस दिन हमारा क्या होगा? कौन सा ऐसा देश है जो हमें शरण देगा। सिर्फ भारत है, जहाँ हिंदू जा सकते हैं। अब पूरे भारत को वक्फ बोर्ड को देने की कोशिशें हो रही हैं। हिंदुस्तान में वक्फ बोर्ड क्या कर रहा है। उनहोंने आगे कहा कि इस बार पूरी कैबिनेट ने संगम में डुबकी लगाई, ऐसा इससे पहले नहीं हुआ। 2013 में आजम खान को कुंभ की कमान दे दी थी, जो हमको 15 मिनट का वक्त देते हैं। हम कहते हैं कि तुम 15 मिनट ही देकर देख लो। हमारे नागा साधु ही काफी हैं। आपके अरमान हमारे नागा साधु ठंडा कर देंगे। इस धर्म संसद में भाजपा सांसद हेमामालिनी, जगद्गुरु श्रीजी महाराज, जगद्गुरु विद्या भास्कर, जगद्गुरु वल्लभाचार्य, चिन्मयानंद बापू, साध्वी प्राची, महंत राजू दास, साध्वी सरस्वती, जगद्गुरु सूर्याचार्य आदि मौजूद थे। फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी ने वीडियो बयान ज़ारी करके लोगों से इस धर्म संसद में भागीदारी करने के लिए अपील किया था।
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ कमल उसरी कहते हैं- कुम्भ के दौरान जूना अखाड़ा द्वारा आईआईटीएन बाबा अभय सिंह को लांच करना एक योजना का हिस्सा था। जिसके तहत टेक पीढ़ी को जूना अखाड़े से जोड़ना था। इसी क्रम में 13 साल की लड़की को भी जूना अखाड़ा द्वारा दीक्षा दिया गया और यह प्रचारित किया गया कि माता-पिता ने बच्ची को अखाड़े को दान कर दिया है। इस तरह हर्षा रिछारिया और आईआईटीएन बाबा अभय सिंह के ज़रिए यूथ वर्ग को साधने की उन्हें अध्यात्म और हिंदुत्ववादी राजनीति से जोड़ने की कवायद शुरु की गई थी। सब कुछ ठीक चल रहा था वो तो किसी चैनल के सामने आईआईटीएन अभय सिंह ने अपने निजी जीवन और माता-पिता और पिता से बदले लेने की बात कहकर और गुरु को गाली देकर सारा खेल बिगाड़ दिया।
कुंभ से पहले जूना अखाड़ा द्वारा 350 दलितों को महामंडलेश्वर बनाने की ख़बर नवंबर 2024 में तमाम अख़बारों में प्रमुखता से छपी थी। इसी ख़बर के सिलसिले में मैं 18 जनवरी को जूना अखाड़े के टेंट में था। जूना अखाड़ा में मीडिया संस्थानों के पत्रकार और मैनेज़र बाबाओं और महामंडलेश्वरों के चरणों में नतमस्तक होकर बता रहे थे कि फला पेज पर आपके लिए स्पेस छोड़ रखा है, या प्राइम टाइम का स्पेस आपके लिए फिक्स कर दिया है। मध्यप्रदेश के एक बड़े मीडिया संस्थान के पत्रकारों की पूरी टीम ने पहुँचकर कहा महंत जी मामला उलटा हो गया है, तमाम चैनलों पर उसने (आईआईटीएन बाबा अभय सिंह ने) गंध मचा रखी है। आपको एक इंटरव्यू करना चाहिए इस मुद्दे पर हम एक पूरे पेज में तीन भाषाओं में इसे छापेंगे। इसके ठीक अगले ही दिन अख़बारों ने छापा कि गुरु सोमेश्वर पुरी की निंदा करने वाले आईआईटीएन बाबा को जूना अखाड़ा ने अपने कैम्प से निष्कासित कर दिया है। ज़ाहिर है अखाड़ों की चीज़ें बिल्कुल फिक्स होकर एक एजेंडे के साथ अख़बारों टीवी चैनलों और यूट्यूब पर चल रही थी। तब तक जब तक कि मौनी अमावस्या की त्रासद घटना से रंग में भंग नहीं पड़ गया।