Monday, October 2, 2023
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अशोक भौमिक जसम की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष और राम नरेश राम सचिव चुने गए

अनुपम सिंह

नई दिल्ली. जन संस्कृति मंच का तीसरा राज्य सम्मलेन 7 अप्रैल को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में हुआ. सम्मेलन का आरंभ ‘संगवारी थियेटर ग्रुप’ द्वारा “ये क्या हो रहा है, जो न होना था हमारे दौर में’’ गीत से हुआ.

सांगठनिक सत्र की शुरुआत करते हुए अशोक भौमिक ने ‘जसम’ का परिचय दिया और कहा कि -‘भारत में सांस्कृतिक संगठन कोई एकदम नई बात नहीं है, इसके पहले प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ ,इप्टा आदि थे. जनसंस्कृति मंच का निर्माण उन परिस्थितियों में हुआ जब सांस्कृतिक मंचों के लिए सरकारों की तिजोरियां खुली थीं. पुरस्कारों आदि की राजनीति से निकलकर हाशिये पर पड़े लोगों की सम्पूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रस्तुत करने के लिए ,एक कवि की भूमिका में भी एक नागरिक को पहचान देने के लिए ‘जसम’ का गठन हुआ था.  यह केवल लेखक संगठन नहीं है न ही केवल हिंदी भाषी राज्यों का ही संगठन है.

जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह

इसके बाद राम नरेश राम ने जन संस्कृति मंच की सांगठनिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें जसम द्वारा किये गए हस्तक्षेप और काम का क्रमिक ब्यौरा दिया गया था. उन्होंने पर्चे के माध्यम से देशव्यापी सांस्कृतिक परिस्थितियों पर संक्षेप में अपनी बात रखी. जिस पर पर सदन में उपस्थिति साथियों ने बहस की. इसमें कई बातें निकलकर आयीं . जैसे -जसम में युवाओं को अधिक नेतृत्व दिया जाय, संगठन को सांस्कृतिक हस्तक्षेप के साथ-साथ जनसरोकारी मुद्दों पर भी सड़क पर संघर्ष करना चाहिए. यह भी कि हमें अपने परिचित और सहमति के दायरे से निकलकर अपरिचित दायरे में और असहमत लोगों के बीच जाकर संवाद स्थापित करना चाहिए. सदन में उपस्थित लगभग सभी लोगों ने बहस में हिस्सा लिया. नए लोगों की भागीदारी ने सम्मेलन को और भी जीवंत बना दिया.

सम्मेलन के इसी सत्र में विभिन्न कला माध्यमों में सांस्कृतिक कर्म की चुनौतियों पर अशोक भौमिक, मदन कश्यप, आशुतोष कुमार, संजय जोशी और कपिल शर्मा ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अनुभवों और समस्याओं पर बात रखी. आशुतोष कुमार ने कहा कि –सांस्कृतिक वर्चस्व सौन्दर्यबोध के माध्यम से कायम होता है. हमारा काम उन सभी सौन्दर्यबोधों को अपनी कार्यवाई से तोड़ना और चुनौती देना है. कपिल शर्मा ने कहा कि- आज के समय में हमारे जैसे नाटककार के लिए जो जनसरोकारों को नाटक के माध्यम से उठाते हैं, चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. क्योंकि कहीं भी पुलिस द्वारा पकड़ लिए जाने और सामंती गुंडों द्वारा मारे जाने का खतरा बना रहता है. हमें अपने कार्य-क्षेत्रों और तरीकों को अब बदल देना चाहिए और सीधे जनता के बीच जाना चाहिए.

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल

दस्तावेजी सिनेमा को लोगों के बीच एक अभियान की तरह दिखाने वाले प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि, आज के समय में जब नई-नई तकनीक का विकास हुआ है, सिनेमा बनाना और दिखाना दोनों आसन हुआ है .परन्तु लोगों का रुझान सिर्फ बनाने की तरफ ही ज्यादा है. सिनेमा को कैसे लोगों तक पहुँचाया जाय इस पर लोगों का कम ध्यान है. लेकिन आने वाले समय में सिनेमा से सम्बंधित नियमों में बदलाव होगा और परदे पर सिनेमा दिखाना कठिन हो जायेगा.

राम नरेश राम, सचिव, जसम दिल्ली

वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने अपनी बात रखते हुए कहा कि, हमें यह देखना होगा की अतिवादों के भीतर से लोकतंत्र को कैसे विकसित किया जाय. हमें विवेक को बनाये रखना है और दुष्प्रचार से भी बचना है.

अशोक भौमिक ने चित्रकला की चुनौतियों पर अपनी बात रखी. उनका कहना था कि आज चित्रकला एक नए किस्म के झूठ के साथ जी रही है .चित्रकला को समझने के लिए कथाओं को जोड़ दिया जाता है, जबकि चित्रकला एक ठहरी हुआ विधा (कला) है. वह एक मूमेंट है कथा नहीं. चित्रकला आज बाजार की विधा बन गई है.

सत्र के अंत में सांगठनिक निकाय का चुनाव हुआ जिसमें परिषद् और कार्यकारिणी चुनी गयी तथा अशोक भौमिक अध्यक्ष, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, कपिल शर्मा और कहानीकार योगेन्द्र आहूजा को उपाध्यक्ष चुना गया. राम नरेश राम सचिव और अनुपम सिंह , साक्षी सिंह तथा रघुनन्दन को सहसचिव चुना गया. इसके बाद नवनियुक्त सचिव राम नरेश राम ने सदन को संबोधित किया और कहा कि दिल्ली और देश की सांस्कृतिक चुनौतियों के बीच जिन सवालों को केंद्र में रखकर यह सम्मेलन किया जा रहा है. नयी टीम के नेतृत्व में सांस्कृतिक माहौल को बदलने की कोशिश की जाएगी.

सम्मेलन के दूसरे सत्र की शुरुवात भी संगवारी थियेटर ग्रुप के द्वारा जनगीतों की सांगीतिक प्रस्तुति से हुई. इस सत्र में समाज परिवर्तन और वाम बहुजन सांस्कृतिक आन्दोलन विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी. पहले वक्ता के रूप में लक्ष्मण यादव ने कहा – ‘जिन संगठनों को जिम्मेदारी दी गयी थी वे जनसरोकारों को मजबूती से उठायें. उन्होंने उस काम को उतनी मजबूती से नहीं किया. इसके लिए संगठनों को अपना मूल्यांकन करना चाहिए. धर्म सत्ता ने शास्त्रों के जरिये जो घोर अवैज्ञानिक, घोर अमानवीय था उसको पुष्ट किया. राजनीति के क्षेत्र में तो उनको चुनौती मिलती रही लेकिन सांस्कृतिक रूप से उनको कोई चुनौती नहीं मिली. वाम का जो नैरेटिव है वह तब पूरा होता है जब उसमें जाति और जेंडर का सवाल जुड़ता है ’.

प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने रामविलास शर्मा के हवाले से कहा -‘जैसे जैसे वर्ग संघर्ष बढ़ेगा जाति की संरचना टूटती जायेगी ’. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वाम बहुजन एकता जरुरी है लेकिन ऐसा हो नहीं पाया .जिसका कारण इतिहास के अँधेरे में कहीं छुपा हुआ है. जब वाम अपने उभार पर था तो अम्बेडकर पर यह आरोप लगाया कि अम्बेडकर ने आन्दोलन को कमजोर किया. क्योंकि अम्बेडकर का मानना था की जाति भी एक इकाई है जो श्रम का विभाजन ही नहीं श्रमिकों का भी विभाजन करती है. आज समाज परिवर्तन के लिए वाम-बहुजन एकता बहुत जरुरी है. दरवाजे न भी खुले तो खिड़कियाँ खुल सकती हैं. क्योंकि यह समय इतना हिंसक है कि आज कोई कानून नहीं है. युवा आलोचक कवितेंदु इंदु ने कहा कि –आज वामपंथी आन्दोलन अवसाद में है , यह बात शिद्दत से महसूस की जा रही है कि नीतियों और रणनीतियों में बदलाव हो. आज के समय में संस्कृति का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. अब सिर्फ मंदिर और मस्जिद का सवाल नहीं रह गया है, बात यहाँ तक पहुँच गयी है कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, क्या पहनना है. आज जाति के सवाल पर सब बात कर रहे हैं. मार्क्सवादी भी और दक्षिणपंथी भी. जाति आधार का हिस्सा है कि अधिरचना का हिस्सा है, इस बात को स्पष्ट किये जाने की जरुरत है? जाति की उत्पादन संबंधों में कोई हिस्सेदारी है कि नहीं है ? जिस तरह जाति के सवाल को मार्क्सवादियों ने नहीं उठाया उसी तरह जेंडर के सवाल को भी उपेक्षित किया. फ़ैज़ के एक शेर से उन्होंने अपनी बात समाप्त की–

दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है |

जनवादी लेखक संघ के राज्य सचिव प्रेम तिवारी ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में अरुण कमल की कविता की कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात रखी –

एक ही तो हैं हमारे लक्ष्य ,

एक ही तो है हमारी मुक्ति .

और कहा कि वाम और बहुजन के लक्ष्य एक ही हैं, भले ही साधन अलग-अलग हों. दलित लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी ने भारत के वर्तमान परिदृश्य में घट रही घटनाओं पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि अम्बेडकर और मार्क्स दोनों शोषण और शोषित की बात करते हैं, बस दोनों के नजरिये में अंतर है. हम वर्तमान दौर में इस अन्तर को अपनी गतिविधियों से कम करेंगे .

राधिका मेनन ने उच्च शिक्षा में हो रहे परिवर्तनों पर अपनी बात केन्द्रित रखी और कहा -आज उदार विचार और नवउदार विचार में बहुत अंतर नहीं रह गया है. उदार मूल्यों को बचाना आज सबसे जरुरी हो गया है. जन सस्कृति मंच के महासचिव मनोज सिंह ने कहा कि हम जैसा समाज बनान चाहते हैं उसकी रूपरेखा बुद्ध ,मार्क्स, अम्बेडकर और भगत सिंह ने पहले ही रख दिया है.वाम बहुजन आन्दोलन को जोड़ने वाले सूत्र बहुत अधिक हैं और असहमति के सूत्र कम हैं. यह कोई चीन की दीवार नहीं जिसे गिराया नहीं जा सकता है, बल्कि एक काल्पनिक और दार्शनिक रेखा है जिसे हम अपनी कार्यवाईयों से मिटा सकते हैं. इसलिए इस दिशा में हमें ठोस कार्यभार लेने की जरुरत है. अम्बेडकर ने संविधान को सौपते हुए ये बात कही थी कि, भले हम एक लोकतान्त्रिक देश की ओर आगे बढ़ रहे हैं लेकिन भारतीय समाज की जमीन गैरबराबरी की है. इसलिए संविधान कभी भी खतरे में पड़ सकता है. आज उस खतरे को हम अधिक देख पा रहे हैं. आज के फासीवादी समय में ‘भाजपा’ और ‘आर.एस.एस’ इसी सामाजिक विषमता और आर्थिक विषमता से ताकत लेकर और मजबूत हुआ है. अम्बेडकर का कहना था कि यह जो हिन्दू सामाजिक व्यवस्था है उसका विनाश किये बिना, जातियों का खात्मा किये बिना एक लोकतान्त्रिक देश की नींव मजबूत नहीं हो सकती. सम्मेलन के अंत में राम नरेश राम ने सभी का आभार व्यक्त किया.

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