ज़ेर-ए-बहस

एससी /एसटी एक्ट : दुरुपयोग की चिंता या कानून की जड़ ही खोदने की कोशिश

उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989  के संदर्भ में फैसला दिए जाने के बाद पूरे देश में इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में बहस-मुबाहिसे का माहौल गर्म है. फैसले का विरोध करने वाले मानते हैं कि यह फैसला,अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम को और कमजोर कर देगा. इससे इन जातियों को, जो थोड़ी बहुत कानूनी सुरक्षा हासिल है, उसका भी क्षरण हो जायेगा. इस फैसले का विरोध करने के लिए अनुसूचित जाति के संगठनों ने दो अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया, जिसका समर्थन वामपंथी पार्टियों समेत कई दलों व संगठनों ने किया.

इस फैसले का समर्थन करने वाले तो उच्चतम न्यायालय का ही तर्क दोहराते हैं कि उक्त कानून का बहुत दुरूपयोग होता है. इसलिए उच्चतम न्यायालय का फैसला, इस कानून को युक्तिसंगत बना देगा. फैसले के समर्थक तर्क दे रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय द्वारा मुकदमा दर्ज करने से पहले जांच कराने का प्रावधान किये जाने का विरोध क्यूँ किया जाना चाहिए ?

पर क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त कानून में मुकदमा दर्ज करने से पहले जांच का प्रवाधान मात्र ही किया गया है ? क्या अनुसूचित जाति के संगठन और उनके समर्थक, इस कानून को कमजोर किये जाने का बेजा डर देख और दिखा रहे हैं ?

आइये,उच्चतम न्यायालय द्वारा 20 मार्च 2018 को दिए गए फैसले के आलोक में इन सवालों का जवाब तलाश करने की कोशिश करते हैं.उच्चतम न्यायालय के  न्यायमूर्ति आदेश कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित की खंडपीठ ने डा.सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार एवं अन्य के मामले में उक्त बहुचार्चित फैसला दिया. मूल मामला महाराष्ट्र के राजकीय फार्मेसी कॉलेज,कराड से जुड़ा हुआ है. यहाँ काम करने वाले अनुसूचित जाति के एक कर्मचारी भास्कर करभारी गायद्वाद ने वर्ष 2009 में कॉलेज के प्राचार्य और एक प्रोफेसर के खिलाफ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण  अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करवाया.

इस मुकदमे की जांच कराड के पुलिस उपाधीक्षक द्वारा की गयी. मुकदमा दर्ज करवाने वाले कर्मचारी ने अपनी शिकायत में लिखा कि जांच अधिकारी द्वारा दोनों आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत एकत्र किये गए लेकिन चूँकि दोनों प्रथम श्रेणी के अधिकारी थे, अतः जांच अधिकारी ने उनके खिलाफ चार्जशीट दायर करने के लिए विभागीय अनुमति मांगी. शिकायतकर्ता के अनुसार उस समय राजकीय तकनीकि शिक्षा विभाग के निदेशक का प्रभार डा.सुभाष काशीनाथ महाजन के पास था. शिकायतकर्ता के अनुसार डा. महाजन ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए,चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया. महाजन की इस कार्यवाही के खिलाफ भी शिकायतकर्ता ने मुकदमा दर्ज करवाया.

डा.महाजन ने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे को खारिज करने की याचिका बम्बई हाई कोर्ट में दाखिल की. इस याचिका को बम्बई उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया. उक्त याचिका ख़ारिज के जाने के खिलाफ महाजन,उच्चतम न्यायालय आये और उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला सुनाया.

अपने 89 पृष्ठों के फैसले में तमाम दलीलों और उद्धरणों के जरिये उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के मुकदमें में अग्रिम जमानत,गिरफ्तारी और मुकदमा दर्ज किये जाने की प्रक्रिया के संदर्भ में फैसला सुनाया है. ऊपरी तौर पर देखें तो ऐसा लगता है कि विद्वान न्यायाधीशों को  अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार  निवारण अधिनियम का दुरूपयोग किये जाने की चिंता अत्याधिक सता रही थी. लेकिन इस चिंता का वे जैसा निवारण करते हैं, वह तो उक्त कानून की जड़ें ही खोद डालने जैसा है.

अग्रिम जमानत के संदर्भ में उक्त फैसले में कहा गया है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अग्रिम जमानत पर प्रतिबन्ध और नियमित जमानत दिए जाने पर कोई प्रतिबन्ध न होने के पीछे कोई तार्किकता नजर नहीं आती. हालांकि यह बात कहने से पहले स्वयं विद्वान न्यायाधीशों ने उच्चतम न्यायालय के ही बलोठिया  फैसले का उल्लेख किया है, जिसमें यह कहा गया था कि अग्रिम जमानत न देने के प्रावधान को वर्तमान सामाजिक स्थितियों के आलोक में देखा जाना चाहिए और यह आशंका है कि अगर अग्रिम जमानत मिल जाए तो ऐसे में उत्पीडन करने वाले, पीड़ितों को धमका सकते हैं या उन्हें मुकदमा आगे बढाने से रोक सकते हैं.

बहरहाल अग्रिम जमानत के मामले पर अपने निर्णय को प्रकट करते हुए इस फैसले में कहा गया है कि अग्रिम जमानत न दिए जाने सम्बन्धी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 18 का उपयोग वास्तविक मामलों में ही होना चाहिए और इसे वहां लागू नहीं करना चाहिए जहाँ प्रथम दृष्टिया कोई मामला नहीं बनता हो.

लेकिन फैसले के इससे आगे के अंश में जिस तरह से आरोपी को गिरफ्तार न होने देने का इंतजाम किया गया है,ऐसे में तो आरोपी को अग्रिम जमानत की जरूरत ही नहीं रह जायेगी.अनूसूचित जाति/अनूसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के दो न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में जितनी शर्ते लगा दी हैं,उनके चलते उक्त कानून के अंतर्गत उत्पीड़न के आरोपी की गिरफ्तारी होना ही लगभग असंभव हो जाएगा.

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के संदर्भ में समाचार माध्यमों से इतना ही प्रचारित हुआ कि मुकदमा दर्ज होने से पहले जांच होगी.इतना ही होता तो भी गनीमत थी. तब मुमकिन था कि अनूसूचित जाति/जनजाति के लोगों में इस फैसले के खिलाफ इस कदर आक्रोश न होता.लेकिन उक्त फैसले में मुकदमा दर्ज करने के लिए प्राथमिक जांच पर ही मामला नहीं ठहरता.बल्कि उक्त कानून के अंतर्गत न्याय चाहने वालों को उच्चतम न्यायालय द्वारा बनायी गयी और भी बाधाओं को पार करना होगा.इस फैसले में साफ़-साफ़ लिखा गया है कि यदि प्राथमिक जांच हो जाए और मुकदमा दर्ज भी कर लिया जाए तो आरोपी को गिरफ्तार किया जाना जरुरी नहीं है.

विद्वान् न्यायमूर्ति इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने अपने फैसले के बिंदु संख्या-81 में साफ़ लिखा है कि यदि अभियुक्त लोकसेवक है तो उसके नियोक्ता अधिकारी की अनुमति के बिना और यदि व्यक्ति लोकसेवक नहीं है तो जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुमति के बिना, अनूसूचित जाति/अनूसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तारी, नहीं हो सकेगी. गिरफ्तारी की यह अनुमति भी अभिलेखित कारणों के साथ देनी होगी और ये कारण, गिरफ्तार किये जाने वाले व्यक्ति और सम्बंधित अदालत को बताये जाने होंगे.

निर्देशों की यह श्रृंखला और आगे बढ़ती है. जिस अदालत में अनूसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न के आरोपी को पेश किया जाना है, उस अदालत के लिए भी, देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायमूर्तियों की पोटली में निर्देशों का पिटारा है.सम्बंधित अदालत को निर्देश जारी करते हुए, उक्त फैसले में कहा गया है कि “ जब गिरफ्तार व्यक्ति मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए, तो मजिस्ट्रेट को अभिलेखित कारणों पर अपना दिमाग लगाना चाहिए और आगे निरुद्धता तभी जारी रखनी चाहिए,जबकि अभिलेखित कारण वैध पाए जाएँ.”

इस तरह देखा जाए तो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा दर्ज होने के बाद भी आरोपी की गिरफ्तारी ही  लगभग नामुमकिन हो जायेगी. शीर्ष अदालत ने इस फैसले की तार्किकता को सिद्ध करने के लिए, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरूपयोग रोकने पर जोर दिया है. निश्चित ही किसी भी कानून का दुरूपयोग रोके जाने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए.लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए जो प्रक्रिया तजवीज की है, वह तो इस कानून के अंतर्गत किसी भी आरोपी को, हर हाल में जेल जाने से बचाने वाली प्रक्रिया मालूम पड़ती है.

उच्चतम न्यायालय ने उक्त कानून के दुरूपयोग रोकने के नाम पर नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के कुछ आंकड़ों का हवाला दिया है. ऐसा लगता है कि उक्त कानून के अंतर्गत फर्जी मुकदमा दर्ज किये जाने के अपने तर्क को पुष्ट करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने उन मुकदमों की संख्या को भी गिन लिया है,जिनमें आरोपियों का दोषसिद्ध नहीं हो पाया है.किसी भी मुकदमें में आरोप सिद्ध हो पाना, अपने आप में एक जटिल काम है. अनिवार्यतः ऐसा कैसे कहा जा सकता है कि जिन मामलों में आरोप सिद्ध नहीं हुए, वे सब मुकदमें फर्जी ही हैं ?

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से ही इस देश में दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखें तो एक भयावह तस्वीर उभरती है. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर पन्द्रह मिनट में दलित उत्पीड़न की एक घटना होती है. हर दिन 6 दलित महिलाऐं बलात्कार की शिकार होती हैं. पिछले दस सालों (2007-2017) में दलितों के विरुद्ध अपराधों में 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. दलित महिलाओं के बलात्कार की घटनाएँ पिछले दस साल में लगभग दोगुनी हो गयी हैं.

आश्चर्य यह है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने इस फैसले में कहा कि अनूसूचित जाति/अनूसूचित जनजाति अधिनियम को जातिवाद बढाने का सबब नहीं बनना चाहिए, जिसका समाज की एकता और संवैधानिक मूल्यों पर विपरीत असर पड़ेगा. इस तर्क के समर्थन में विद्वान न्यायाधीशों ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिए गये,डा.बी.आर.अम्बेडकर के भाषण को भी उद्धृत किया है. इस भाषण में डा.अम्बेडकर ने कहा था-

“भारत में जातियां हैं.जातियां राष्ट्र विरोधी हैं.प्रथमतः क्यूंकि वे सामाजिक जीवन में विभाजन पैदा करती हैं.वे राष्ट्र विरोधी हैं क्यूंकि वो जाति और जाति के बीच जलन और घृणा पैदा करती हैं. पर अगर हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हम इन कठिनाइयों से उबरना ही होगा. भ्रातृत्व तभी हकीकत बन सकता है, जबकि एक राष्ट्र हो. बिना भ्रातृत्व के, समानता और उदारता पेंट की उपरी परत से अधिक कुछ नहीं होंगे.”

भाषण तो यह एकदम सही है, आज भी प्रासंगिक है.लेकिन समझने की आवश्यकता यह है कि अनूसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति निवारण अधिनियम की वजह से जातियां का अस्तित्व नहीं हैं.बल्कि जातियां और जाति उत्पीड़न है, इसलिए यह कानून बनाना पड़ा.विद्वान न्यायाधीश कहते हैं कि इस अधिनियम को जातिवाद बढाने का कारक नहीं बनना चाहिए.तो क्या जातिवाद को बढ़ने से रोकने के लिए,उनका सुझाव यह है कि कोई कानूनी कार्यवाही करने के बजाय जातीय उत्पीड़न को चुपचाप बर्दाश्त कर लिया जाना चाहिए ?

अहम सवाल यह है कि अनूसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति निवारण अधिनियम के अंतर्गत प्राथमिक जांच में मुकदमा दर्ज करने के पर्याप्त आधार होने के बावजूद, आरोपियों की गिरफ्तारी न होने के लिए तमाम बाधक उपबंध करके, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश क्या जातिवाद को बढ़ने से रोकने का उपाय कर रहे हैं या यह जातीय उत्पीड़न के आरोपियों को जेल जाने से बचाने का प्रबंध है ? सवाल यह भी है कि यदि मुकदमा दर्ज होने के बाद भी आरोपी की गिरफ्तारी होने मात्र के लिए नाकों चने चबाने होंगे तो यह अधिनियम, अनुसूचित जाति और जनजाति पर होने वाले अत्याचार का निवारण कैसे करेगा?

 

 

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