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बाबा भीमराव अंबेडकर की स्मृति में जसम का दिल्ली के रोहिणी में ‘समता मेला’ का आयोजन

साक्षी/ सौरभ

नई दिल्ली. जन संस्कृति मंच की दिल्ली इकाई द्वारा दो दिसम्बर को रोहिणी सेक्टर बीस में बाबा साहब की स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रम और परिचर्चा का आयोजन किया गया। बाबा साहब के चित्र माल्यार्पण के बाद कार्यक्रम के पहले सत्र की शुरुआत विनय दिवाकर जी के स्वागत वक्तव्य के साथ हुई।  स्थानीय वक्ताओं में से मुखराम भारती, नरेंद्र, शीलप्रिय बौद्ध, ज्योति गौतम ने बाबा साहब पर अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन दिवाकर ने किया।

दूसरे सत्र की शुरुआत डॉ. रामायन राम के वक्तव्य से हुई। जिसमें उन्होंने बाबा  साहब के हवाले से अपनी बात रखते हुए देश निर्माण में उनके योगदान को याद करते हुए उनके द्वारा स्थापित मूल्यों और सिद्धांतों पर चलने की वकालत की।

उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने न सिर्फ दलितों के मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की बल्कि 1930 में बम्बई में कपड़ा मिल के कर्मचारियों की अभूतपूर्व हड़ताल के साथ ट्रेड यूनियन की राजनीति की एक समझ देश के सामने प्रस्तुत की। यही नही आज़ादी के आंदोलन के दौरान उन्होंने आज़ाद भारत में वर्ण व्यवस्था के निचले पायदान पर स्थित लोगों के भविष्य को लेकर न सिर्फ अपनी चिंताएं जाहिर की बल्कि उनके हक और अधिकार की लड़ाई तेज़ की। रामायन राम ने बाबा साहब के योगदानों को रेखांकित करते हुए देश के अंदर लोकतंत्र की स्थापना को उनका सबसे बड़ा योगदान माना। अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने कहा कि आज के भारत में लोकतंत्र, वैज्ञानिक चेतना और बराबरी का संघर्ष जहां भी है वहां अम्बेडकर का विचार है।

जसम उत्तर प्रदेश के सचिव रामायन राम

इस भाषण के बाद संगवारी थियेटर ग्रुप द्वारा हिंदी के प्रसिद्ध कवि अदम गोंडवी की कविता ‘चमारों की गली’ का भावपूर्ण नाट्य रूपान्तरण प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम के अगले वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक और आलोचक आशुतोष कुमार ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि आज के समय में  हर सरकार अपने को बाबा साहब अम्बेडकर का परम भक्त बताने की होड़ में लगी है। लेकिन उन सरकारों ने बाबा साहब के संविधान का क्या हश्र किया जगजाहिर है। पिछले कुछ दशकों में दलितों के प्रति अपराध के आंकड़े कम होने के बजाय और बढ़ गए हैं। ऊना में देश के नौजवानों के साथ जो हुआ उसके साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी गाय के नाम पर कभी कुछ और चीजों के नाम पर जिस तरह भीड़ द्वारा लोगों को घेर कर मारा गया, इतने बड़े पैमाने पर पहले ये घटनाएं नहीं घट रही थीं इसलिए जाहिर है कि हम समय में पीछे की तरफ धकेले जा रहे हैं।

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आशुतोष कुमार ने कहा कि एक तरफ तो प्रधानमंत्री यह कहते नहीं थकते कि उन्होंने जितना अम्बेडकर के लिए किया उतना आज तक किसी ने नहीं किया लेकिन जब वो अपने विदेशी दौरे पर जाते हैं तो अपने समकक्ष को वही गीता भेंट देते हैं जिसमें चतुर्वर्ण व्यवस्था का प्रावधान है। इससे यह पता चलता है कि ये नेता बाबा साहब की चेतना के साथ क्या करना चाहते हैं ।

आशुतोष कुमार ने सवाल उठाया कि आखिर क्या कारण है कि छः दिसम्बर जो बाबा साहब का परिनिर्वाण दिवस है उसी दिन बाबरी मस्जिद को तोड़कर भारतीय संविधान की बर्बर हत्या करने के लिए क्यों चुना गया ? आशुतोष कुमार ने कहा कि बाबा साहब ने बुद्ध का रास्ता इसलिए नही चुना कि उन्हें एक नए धर्म या पूजा पद्धति की जरूरत थी बल्कि इसलिए चुना क्योंकि केवल बुद्ध का रास्ता ही ऐसा रास्ता है जो अंधी आस्था के खिलाफ विवेक के पक्ष में है। बुद्ध ने सबसे पहले यह घोषित किया कि इंसान और इंसान के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।

अपनी बात समाप्त करते हुए आशुतोष कुमार ने बाबा साहब के हवाले से कहा कि बुद्ध और मार्क्स के रास्ते अलग नहीं हैं क्योंकि जैसा वर्गहीन, जातिविहीन और बराबरी का समाज मार्क्स बनाना चाहते है वैसा ही समाज बुद्ध भी बनाना चाहते थे। इसलिए आज के समय में जरूरत है बाबा साहब ने जो चेतना पैदा की है उसकी आग को गलियों गलियों तक पहुचाई जाए, तभी हम आज के समय में बाबा साहब के नाम पर की जा रही तमाम साजिशों को विफल कर पाएंगे।

दूसरे सत्र का समापन संगवारी थियेटर ग्रुप के साथियों द्वारा ‘कहब त लग ज्याई धक्क से’ गीत के साथ हुआ।
कार्यक्रम के तीसरे और आखिरी सत्र में कविता पाठ का आयोजन किया गया। इसमें सबसे पहले कहानीकार कवि और श्रद्धानन्द कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली डॉ टेकचंद ने अपनी कविताओं का पाठ किया।  उन्होंने अपनी लोकप्रिय कविता ‘ देर तलक’ के माध्यम से यह संदेश दिया कि कमजोर तबके के नौजवान देर से ही मगर कायदे से अपने इतिहास को समझेंगे और वर्तमान को बदलेंगे। अगले कवि के रूप में युवा कवि जगदीश सौरभ ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की। उन्होंने अपनी कविता ‘ राम लला हम आएंगे’ समेत कई कविताओं का पाठ करके श्रोताओं के दिल में जगह बना ली और इसके माध्यम से वर्तमान राजनीतिक सांस्कृतिक परिदृश्य पर कड़ा व्यंग्य किया।

तीसरे सत्र के अंत मे संगवारी थियेटर ग्रुप ने बाबा साहब अम्बेडकर और भगत सिंह के विचारों पर केंद्रित नाटक की प्रस्तुति दी। जिसमें बाबा साहब और भगत सिंह महत्वपूर्ण कथनों और विचारों का ऐसा ऐसा नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया कि उपस्थित लोगों के भीतर एक खास तरह की स्फूर्ति और जोश का एहसास हुआ। नाटक के बीच में ही लोग इंकलाब जिंदाबाद के नारे बुलन्द करने लगे। दोनों ही नाटकों के निर्देशन मशहूर नाट्य निर्देशक कपिल शर्मा ने किया।

दूसरे और तीसरे सत्र का संचालन जन संस्कृति मंच, दिल्ली के सचिव राम नरेश राम ने किया। इस आयोजन के मुख्य सूत्रधार, व्यस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता  सत्यप्रकाश बौद्ध जी ने उपस्थित लोगों  को धन्यवाद दिया।

जसम दिल्ली के सचिव रामनरेश राम

इस दौरान पोस्टर प्रदर्शनी और पुस्तक मेले का भी आयोजन भी किया गया। आयोजन स्थल को सजाने के लिए जिन पोस्टरों का प्रयोग किया गया था उसको मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक ने तैयार किया था।  पुस्तक मेंले में नवारुण प्रकाशन, गार्गी प्रकाशन और द मर्जिनलाइज्ड प्रकाशन ने अपने स्टॉल लगाए थे।

किताबें

इस कार्यक्रम में स्थानीय लोगों के अलावा बुद्धिजीवियों, छात्र-छात्राओं, महिलाओं और छोटे बच्चों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी। पूरे मेले का आयोजन आम लोगों के सहयोग से हुआ. समता मेले में शामिल लोगों में कहानीकार योगेंद्र आहूजा, संजय जोशी, वंदना सिंह, तूलिका, मृत्युंजय, शालू ,लक्ष्मण, शैलेंद्र, शालिनी, अनुपम, अवधेश, साक्षी, आशीष, श्रवण, शिवांगी, सौरभ, संजय सिंह आदि उपस्थित रहे।

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