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महाबोधि विहार आंदोलन पर मीडिया और बुद्धिजीवी चुप क्यों ?

केतन यादव

12 फरवरी 2025 से महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन आमरण अनशन के रूप में चालू है। तमाम बौद्ध‌ भिक्षु अन्न‌ आदि त्याग कर बैठे हुए हैं और सत्ता प्रशासन की कानों पर जू नहीं रेंग रहा। यह बात अधिक अखरने वाली है कि केवल‌ दलित और बहुजन चैनलों और सोशल मीडिया के पेजों वेबसाइटों ने इस न्यूज़ को कवर किया बाकि मुख्यधारा की सभी इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया इसपर चुप हैं और साथ में इस देश का बुद्धिजीवी समाज।

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन पहले भी हुआ है पर इस बार यह अपेक्षाकृत अलग है। इस जन आंदोलन को विदेशों के बौद्ध‌ अनुयाइयों का समर्थन मिल रहा है। नागपुर, भोपाल, बिहार, यूपी सहित पूरे देश में बुद्ध धर्म को मानने वाले लोग अब इकट्ठा हो रहे और अपनी-अपनी तरह इस मुक्ति आंदोलन को समर्थन दे रहे। यह आंदोलन बीटी एक्ट 1949 की संवैधानिकता पर सवाल उठाता है और उसे खत्म करने की माँग करता है । इसे संविधान की मूल भावना के विरोधी बताया जा रहा। जब राम मंदिर या अन्य किसी हिंदू मंदिरों के प्रबंधन कमेटी में कोई अन्य धर्म का व्यक्ति नहीं होता है तो फिर बौद्धों व अल्पसंख्यकों के धार्मिक केंद्रों के प्रबंधन समिति में हिंदू ब्राह्मण क्यों हों ?

अभी कुछ दिन पहले का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें संजय दूबे नामक पुजारी पर्यटकों को बुद्ध का परिचय पांडव बता कर दे रहा। डॉ. विसाल खरात ने बताया संजय मिश्रा बौद्ध विहार में कब्जा जमा रहे हैं। महा बोधि मंदिर में शिवलिंग,  राम सहित कई देवताओं की मूर्तियों को रख दिया गया है और पूजा पाठ किया जा रहा जो कि सरासर ग़लत है। पूरी दुनिया की आस्था बौद्ध‌ गया से इसी रूप में है कि तथागत बुद्ध को वहाँ पर ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस स्थान पर हिंदुत्व का कब्ज़ा एक निंदनीय कृत्य है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में जगह जगह बुद्ध का अपमान है। वाल्मीकि रामायण में भी संदर्भ आता है कि बौद्धों, चार्वाकों को देखते ही मार देना चाहिए। महाभारत में भी बुद्ध की निंदा है । बौद्ध भिक्षु सवाल कर रहे हैं कि जब ब्राह्मण धर्म ग्रंथों में बुद्ध का चेहरा देखना पाप था, तो आज वे बोधगया में क्या कर रहे हैं ? उसे छोड़ क्यों नहीं देते ?  बुद्ध को बार-बार विष्णु का अवतार बताकर घालमेल करके हिंदू धर्म की वर्णाश्रमी व्यवस्था का संरक्षण किया जा रहा है जबकि बुद्ध ने वेदों का विरोध किया, ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार किया और हिंदू धर्म की बुनियाद वर्ण व्यवस्था का प्रतिकार किया। विपश्यना आचार्य सत्यनारायण गोयंका ने इसका खूब विरोध किया था। और बाद में हिंदू धर्म के कई शंकराचार्यों ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि तथागत गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं हैं।

द जनता लाइव चैनल पर प्रो रतनलाल ने कहा कि यह मुद्दा आजादी से पहले भी ऐसे ज्वलंत था तब महात्मा गांधी द्वारा बौद्धों को यह आश्वासन दिया गया कि आजादी के बाद उनके धार्मिक स्थल उन्हें सौंप दिए जाएंगे। भारत, बर्मा और लंका के बौद्ध स्थानों पर बौद्धों का अधिकार हो इसको लेकर 1924 में आंदोलन हुआ। गांधी के कहने पर डॉ राजेंद्र प्रसाद और राहुल सांकृत्यायन वाली कमेटी भी बैठी थी। देश भर के तमाम बौद्ध मंदिरों और मूर्तियों को लगातार क्षति पहुँचाई गई है। अयोध्या में भी बुद्ध से संबंधित साक्ष्म रहे पर वहा भी अब बौद्धों के पास नहीं जा सका।

सवाल है कि क्या बौद्धों को न्याय ? मथुरा , अयोध्या सहित कई स्थानों पर बौद्ध मूर्तियाँ पाई गई हैं पर वहाँ मंदिर हिंदू धर्म के हैं। बौद्धों ने तमाम हिंदू मंदिरों पर अपना अधिकार और लड़ाई छोड़ दिया पर बौद्ध गया वे नहीं छोड़ना चाहते।

बौद्धों का कहना है कि संघ  बाहरी लोगों को बौद्ध बनाकर लाया है। वह वास्तविक बौद्ध अनुयायियों के सामने अपने नकली बौद्ध संघ खड़ा कर चुके हैं जो कुंभ में नहा रहे और हिंदुवादी व्यवस्था को समर्थन दे रहे जिसके बुद्ध विरोधी रहे हैं। बुद्ध विहार के कई प्रशासनिक अधिकारियों ने भी पूर्व में ये कहा था कि बुद्ध , विष्णु के अवतार हैं। बौद्ध मंदिर में पिंडदान शुरू हो गया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यापक डॉ विक्रम हरिजन ने दलित दस्तक के एक साक्षात्कार में कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था जब किसी को मिटा नहीं पाती तो खुद में मिला लेती। उनको गौतम बुद्ध या अंबेडकर डर है। बुद्ध सबसे पहले ऑगर्निक इंटलेक्चुअल हैं जिन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों, वर्ण व्यवस्था, अंध विश्वास, पाखंड का सबसे पहला तार्किक प्रतिकार किया।

दिल्ली के पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि न्यायपालिका के न्याय पर भरोसा नहीं है। राम मंदिर निर्माण में न्यायपालिका ने तथ्यों के आधार पर नहीं आस्था के आधार पर लिया। अयोध्या के साकेतनगरी में बौद्धों के अवशेष मिले थे जिन साक्ष्यों की अनदेखी की गई। भारतीय राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष आरपी मौर्य , राजद विधायक सतीश दास और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया है। गोरखनाथ परंपरा के योगी सूरज नाथ ने भी समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि भारत बौद्धों, सिद्धों, नाथों की भूमि है जिनका वैदिक परंपरा से कोई लेना देना नहीं है।

अब इस आंदोलन के कई चरण बना दिए गये हैं जिसमें धरना प्रदर्शन, ज्ञापन सौंपने के अलावा एक राष्ट्र व्यापी अनशन के स्वरूप को निर्धारित किया गया है जिसे देश-विदेश के तमाम बौद्ध एवं‌ दलित- बहुजन संगठनों ने अपना समर्थन दिया है।

( कवि केतन यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में साहित्य के शोधार्थी हैं। संपर्क -ईमेल – yadavketan61@gmail.com)

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