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“ हम ऐसा कॉलेज चाहते हैं जहां पढ़ाई हो, रचनात्मकता संभव हो सके ”

लखनऊ।  लखनऊ विश्वविद्यालय के आर्ट्स कॉलेज में बीते 19 अगस्त को ‘कलरव’ द्वारा “हमारे सपनों का कॉलेज” विषय पर अध्ययन गोष्ठी आयोजित की गई। यह चर्चा केवल छात्रों की आकांक्षाओं का बयान नहीं थी, बल्कि एशिया के सबसे बड़े ललित कला परिसर की दुर्दशा पर एक सटीक आईना भी थी। छात्रों ने जिस कॉलेज का सपना साझा किया और जिस वास्तविकता का सामना वे कर रहे हैं, उसके बीच गहरी खाई उजागर हुई।

छात्रों ने सबसे बुनियादी समस्याएँ रखीं। नियमित कक्षाएँ लगभग नहीं होतीं, जिसके चलते उन्हें निजी कोचिंग पर निर्भर होना पड़ता है। जीवन अध्ययन, एनाटॉमी और पोर्ट्रेट जैसी ललित कला की अनिवार्य पढ़ाई के लिए मॉडल उपलब्ध नहीं कराए जाते और छात्रों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। डिजिटल युग में जब कला और डिज़ाइन तकनीक से गहराई से जुड़ चुके हैं, तब भी कॉलेज में प्रोजेक्टर, कंप्यूटर लैब और डिजिटल क्लास की सुविधा नहीं है। ग्राफ़िक डिज़ाइन पढ़ने वाले छात्रों से उम्मीद की जाती है कि वे बिना कंप्यूटर के ही अपनी पढ़ाई पूरी करें। यहाँ तक कि पीने के पानी के लिए शुद्धिकरण की मशीनें तक नहीं हैं। समुचित स्टूडियो नहीं, कला प्रदर्शनी के लिए हॉल नहीं, और कला-सामग्री जुटाने के लिए दुकानें तक मौजूद नहीं। यह कॉलेज कलाकारों को गढ़ने की जगह उन्हें अपने हाल पर छोड़ देता है।

यह स्थिति उस आदर्श से बिलकुल विपरीत है जो किसी भी ललित कला संस्थान में होना चाहिए। एक सक्षम आर्ट्स कॉलेज में सुसज्जित स्टूडियो, डिजिटल संसाधन, प्रशिक्षित व नियमित अध्यापक, प्रदर्शनी स्थल और सृजनात्मक प्रयोग की आज़ादी होनी चाहिए। छात्रों को कला-जगत से जोड़ने के अवसर और रोज़गार की संभावनाएँ भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। मगर लखनऊ विश्वविद्यालय का आर्ट्स कॉलेज इन सबके उलट ढहते बुनियादी ढांचे और असुरक्षित भविष्य का प्रतीक बन चुका है।

 

यह सब महज़ संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नीतिगत ढाँचे का नतीजा है। उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (HEFA) के क़र्ज़ों ने विश्वविद्यालयों को कर्ज़दार संस्थाओं में बदल दिया है, जिसके कारण विकास की जगह कटौती हावी हो गई है। ठेके पर नियुक्त किए जाने वाले अध्यापक न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं बल्कि निरंतरता और जवाबदेही भी खत्म कर देते हैं। वहीं केंद्र से थोपी गई नई शिक्षा नीति (NEP) ने पाठ्यक्रम और ढाँचे पर ऐसी पकड़ बनाई है जिससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त हो रही है। इन तीनों कारकों का सीधा असर छात्रों पर पड़ रहा है: जर्जर ढाँचा, अधूरी पढ़ाई और टूटी हुई संभावनाएँ।

अध्ययन गोष्ठी में यह साफ़ हुआ कि छात्रों के सपने कोई असंभव माँग नहीं हैं। वे बस एक ऐसे कॉलेज की माँग कर रहे हैं जहाँ पढ़ाई हो, संसाधन हों और रचनात्मकता पनप सके। लेकिन इसके स्थान पर उन्हें एक ऐसी व्यवस्था मिल रही है जो सार्वजनिक शिक्षा को सुनियोजित ढंग से खोखला कर रही है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के आर्ट्स कॉलेज में कलरव का संकल्प है कि इन सवालों को उठाया जाएगा। छात्रों के सपनों और उनकी वर्तमान स्थिति के बीच जो खाई है, उसे पाटने के लिए संघर्ष होगा और उन नीतियों को चुनौती दी जाएगी जिन्होंने एक जीवंत परिसर को उपेक्षा और विघटन की स्थिति में पहुँचा दिया है।

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