प्रसिद्ध कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर जन संस्कृति मंच गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अपनी भाषा की रचनात्मकता, सौंदर्य मूलक दृष्टि, अपने आसपास की प्रकृति और परिवेश के प्रति गहरे लगाव तथा साधारण के पीछे छिपी असाधारणता को उद्घाटित करने वाली कला के कारण विनोद कुमार शुक्ल एक विलक्षण रचनाकार थे। उनकी दृष्टि की सूक्ष्मता, नवीनता ,छोटे-छोटे सूक्ष्म ब्योरों को दर्ज करने वाली गहरी सलंग्नता , रोजमर्रा के जीवन की स्थितियों और आसपास के चिर परिचित संसार को देखने का एक नया नजरिया प्रदान करती है। अभाव का ऐसा ऐश्वर्य और साधारण की ऐसी असाधारणता हिंदी में दुर्लभ है। भाषा और शिल्प की दृष्टि से वे अनूठे और अप्रतिम रचनाकार थे।
विनोद कुमार शुक्ला का साहित्य मानवीय संबंधों का एक सुंदर एल्बम है। संबंधों की गहरी आत्मीयता के कारण उनका साहित्य हमें आकर्षित करता है। घर परिवार, खासकर पति-पत्नी के बहुत ही आत्मीय चित्र उनके साहित्य में बिखरे पड़े हैं। विनोद कुमार शुक्ल को हमारे समाज में फैले ईर्ष्या- द्वेष , मार-काट ,छीना-झपटी, कलह – क्लेश तथा द्वंद्व और तनाव तनिक भी नहीं व्यापते। इन सबसे परे निर्लिप्त भाव से वे सुंदर, संजीव, संवेदनशील संबंधों का एक खुला आकाश रचते हैं; जहां वस्तुओं की भरमार और अश्लील उपभोग का उन्माद नहीं, सादगी और सरलता के ऐश्वर्य से दमकते अभावग्रस्त जीवन में रससिक्त संबंधों की अंतः सलिला प्रवाहित है।
हिंदी उपन्यास और कविता के क्षेत्र में विनोद कुमार शुक्ल का विशिष्ट योगदान भाषा और शिल्प के स्तर पर दिखाई पड़ता है। उन्होंने प्रेमचंद, जैनेंद्र, यशपाल , अज्ञेय और निर्मल वर्मा से अलग हटकर हिंदी गद्य की नई भाषा ईजाद की। उनकी भाषा सरल – सहज न होकर थोड़ी घुमावदार है। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों की भाषा और शिल्प पर विचार करते हुए स्वेटर बुनती हुई स्त्रियां याद आती हैं ,जो सलाइयों की सहायता से उनके धागों को एक दूसरे में फंसाती हुई आगे बढ़ती जाती हैं। वे वाक्य को एक दूसरे से फंसाते हुए इसी तरह आगे बढ़ते हैं। एक स्थितियों के भीतर से दूसरी स्थितियां निकलती चली जाती हैं। कथात्मक स्थितियों ,पात्रों और घटनाओं के सूत्र एक दूसरे से जुड़ते चले जाते हैं। उनके वाक्य अत्यंत छोटे-छोटे हैं। गद्य की लय अत्यंत मद्धिम है। बिल्कुल समरस। उसमें उतार-चढ़ाव, भावावेश , उग्रता और आक्रोश के लिए कोई जगह नहीं है। यह एक तरह का निस्पृह गद्य है।
उनके रचना संसार में हिंदुस्तान के हाशिए पर पड़े, पीछे छोड़ दिए गए गांव और कस्वों का दीन- हीन अभावग्रस्त इंसान है। इन आम इंसानों के बाहरी और आंतरिक जीवन के सौंदर्य को वे जितने लगाव और गहरे जुड़ाव के साथ अभिव्यक्त करते हैं, वैसा कोई अन्य रचनाकार नहीं करता। उनकी प्रारंभिक कविताओं में रुपवाद का असर होने के बावजूद हिंदुस्तान के आम आदमी ,श्रमिकों ,कामगारों के जीवन और संघर्ष के प्रति उनकी आस्था और विश्वास ज्यादा दृढ़ है। उनकी प्रारंभिक कविताओं में भी दुनिया भर के शोषितों ,उत्पीड़तों के प्रति पक्षधर्ता के चिन्ह मौजूद हैं। अपनी रचनात्मकता के प्रारंभिक दौर में ही उन्होंने ‘रायपुर बिलासपुर संभाग ‘ जैसी क्लासिक कविता लिखी। इसमें क्षेत्रीयता और राष्ट्रीयता के आपसी सामंजस्य के साथ-साथ उसके द्वंद्व और तनाव को भी पहचानने की सराहनीय कोशिश है । आज के दौर में विस्थापन की भयावह सच्चाई को उन्होंने आठवें दशक में ही जिस उत्कट लगाव, गहरी सलंग्नता और मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त किया, वह हिंदी कविता की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह कविता भारत के किसी भी पिछड़े इलाके का रूपक हो सकती है।
विनोद कुमार शुक्ल भारतीय सतह के जीवन के अद्भुत और अनुद्घाटित सौंदर्य के विलक्षण चितेरा हैं। विनोद कुमार शुक्ला के उपन्यास ठेठ भारतीय ही नहीं ठेठ छत्तीसगढ़ी भी हैं। उनके उपन्यासों की मद्धिम लय आज से तीस-चालीस वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ी गांव और कस्बों की लय से मेल खाती है। वह रचनाकार महान होता है जो अपने समाज, परिवेश और वातावरण की लय को अपनी रचनाओं में साध लेता है। उनकी समस्त रचनाएं चालीस -पचास साल पहले के छत्तीसगढ़ की सरलता, सहजता, सुंदरता और जीवंतता का आईना है।
विनोद कुमार शुक्ल मुख्य धारा के कवियों में अकेले कवि हैं, जिनके यहां आदिवासी जीवन के भय ,सौंदर्य और संघर्ष को सर्वाधिक अभिव्यक्ति मिली है। हाल के वर्षों में उन्होंने क्षेत्रीयता और सांप्रदायिक संकीर्णता पर मुखर कविताएं लिखी। आस- पड़ोस से लेकर विश्व मानवता से जुड़ाव की उनमें प्रबल आकांक्षा है।

