मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश ) | भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) लिबरेशन ने 28 जनवरी को मिर्ज़ापुर में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। यह जनसभा ज़िले में चल रहे आदिवासी वनाधिकार और भूमि अधिकार संघर्ष की पृष्ठभूमि में आयोजित की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से हज़ारों लोग शामिल हुए। जनसभा का उद्देश्य वनाधिकार क़ानून, 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन की माँग को मज़बूती से उठाना और इस संघर्ष का नेतृत्व कर रहे आदिवासी नेतृत्व तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाइयों के विरोध को सार्वजनिक रूप से दर्ज कराना था।
जनसभा की तात्कालिक पृष्ठभूमि मिर्ज़ापुर ज़िले के तेंदुआ खुर्द गाँव में चल रहे संघर्ष है, जहाँ आदिवासी समुदाय वनाधिकार क़ानून के तहत अपने वैधानिक व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों की माँग कर रहा है। गाँव में यह संघर्ष भाकपा (माले) लिबरेशन की ज़िला सचिव कामरेड जीरा भारती के नेतृत्व में आगे बढ़ा। जिसके बाद पुलिसिया दमन करते हुए भाकपा माले के राज्य सचिव कॉमरेड सुधाकर यादव तथा मिर्जापुर सचिव जीरा भारती समेत दलित आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।
जनसभा को संबोधित करते हुए भाकपा (माले) लिबरेशन के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये गिरफ़्तारियाँ किसी क़ानून के उल्लंघन के कारण नहीं, बल्कि वनाधिकार आंदोलन को कमज़ोर करने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने कहा कि हमारे नेताओं को इसलिए गिरफ़्तार नहीं किया गया क्योंकि उन्होंने कोई ग़लत काम किया, बल्कि इसलिए किया गया क्योंकि वे उन आदिवासी समुदायों की आवाज़ बनकर खड़े हैं, जिन्हें संसद द्वारा बनाए गए वनाधिकार क़ानून के तहत अधिकार प्राप्त हैं।
दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि जिस बुलडोज़र को राजनीतिक रूप से भू-माफ़िया के ख़िलाफ़ कार्रवाई का प्रतीक बताया जाता है, वही वास्तव में ग़रीबों, भूमिहीनों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रहा है। वनाधिकार की माँग करने वाले आदिवासियों को अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है, जबकि बड़े पैमाने पर हो रहे वन विनाश और कॉर्पोरेट हितों की अनदेखी की जा रही है। यह वनाधिकार क़ानून की सीधी अवहेलना है। मिर्ज़ापुर की यह जनसभा लोकतांत्रिक प्रतिरोध की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है।
उन्होंने कहा कि चाहे जंगल हों, रोज़गार हों या मतदान का अधिकार—आज लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों की माँग करने पर दंडित किया जा रहा है। मिर्ज़ापुर की यह एकजुटता दिखाती है कि डर और दमन के ज़रिए इन संघर्षों को चुप नहीं कराया जा सकता।
सभा को संबोधित करते हुए राज्य सचिव कॉमरेड सुधाकर यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बुलडोजर संविधान के ऊपर चलाया जा रहा है और इसके खिलाफ आवाज उठाने पर पुलिसिया दमन किया जाना दिखाता है कि प्रदेश में कानून का नहीं बल्कि तानाशाही का शासन कायम है जिसके खिलाफ भाकपा माले संघर्ष कर रही और बुलडोज राज को ध्वस्त करेगी।
मिर्जापुर की सचिव जीरा भारती ने कहा कि बुलडोजर राज और दमन के बल पर गरीब और आदिवासियों की आवाज दबायी नहीं जा सकती है। भाजपा की सरकार पुलिसिया दमन के बावजूद भाकपा माले के जुझारू संघर्ष के कारण सुधाकर यादव समेत तमाम साथियों को रिहा करना पड़ा है। पार्टी ने बिना डरे लड़ करके बुलडोजर को पीछे धकेला। यह लड़ाई इस देश के संविधान और स्वाभिमान को बचाने की है जिसको लड़कर जीता जाएगा।
जनसभा में विभिन्न लोकतांत्रिक और राजनीतिक धाराओं से जुड़े लोगों ने भी भाग लिया और समर्थन व्यक्त किया। इनमें पूर्व विधायक एवं पूर्व ज़िला पंचायत अध्यक्ष तथा वर्तमान में कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय समन्वयक भगौती चौधरी, वरिष्ठ गांधीवादी और सिटिज़न्स फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण मिश्रा, कांग्रेस से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता राम सिंह तथा मज़दूर यूनियनों से लंबे समय तक जुड़े रहे अधिवक्ता मोहम्मद अशफ़ाक़ ख़ान शामिल थे।
जनसभा का मुख्य केंद्र वनाधिकार संघर्ष रहा, लेकिन भाकपा (माले) लिबरेशन ने इसे मज़दूरों और ग़रीबों के अधिकारों पर हो रहे व्यापक हमलों के संदर्भ में भी रखा। दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि हाल के वर्षों में श्रम क़ानूनों और ग्रामीण रोज़गार से जुड़े ढाँचों में किए गए बदलाव एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं, जहाँ सामूहिक अधिकारों को कमज़ोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोविड काल में बड़े पैमाने पर हुए पलायन के दौरान मनरेगा ने ग्रामीण ग़रीबों को सहारा दिया था और ज़रूरत इस क़ानून को मज़बूत करने की थी, न कि उसे कमज़ोर करने की।
पार्टी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के ज़रिए मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे जाने पर भी चिंता व्यक्त की। दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि सत्यापन के नाम पर ग़रीब और हाशिए पर खड़े नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है और इस प्रक्रिया को सांप्रदायिक रंग देकर ख़तरनाक माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें विशेष रूप से बंगाली भाषी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
सभा में 12 फरवरी को होने वाले देशव्यापी हड़ताल का समर्थन करते हुए 23 फरवरी को लखनऊ में विधानसभा घेरने का आवाहन किया गया।
सभा की अध्यक्षता मंच पर भाकपा माले के राज्य स्थाई समिति के सदस्य और आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राज्य संयोजक सुरेश कोल ने किया। सभा का संचालन किसान महासभा के राज्य सचिव ईश्वरी प्रसाद कुशवाहा ने किया। जनसभा में केंद्रीय कमेटी सदस्य कृष्णा अधिकारी, भाकपा (माले) लिबरेशन के पोलित ब्यूरो सदस्य रामजी राय, राज्य समिति सदस्य जयप्रकाश नारायण, ऐपवा की राज्य अध्यक्ष कुसुम वर्मा, आइसा राज्य अध्यक्ष मनीष कुमार, आरवाइए राज्य सचिव सुनील मौर्य , रामप्यारे राम, रामकृत बियार, चिंता बियार उपस्थित थे। सभा में पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों से हजारों की संख्या में छात्र, युवा, नौजवान, मजदूर, किसान और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल रही।

