समकालीन जनमत
The Chief Election Commissioner (CEC) of India, Shri Gyanesh Kumar addressing a Press Conference by Election Commission of India at Vigyan Bhawan, in New Delhi on October 27, 2025.
ज़ेर-ए-बहस

जरूरत है एसआईआर 2.0 के सोशल ऑडिट की

( पूर्व-प्रशासनिक अधिकारी  और वर्तमान में ‘सिटिज़न्स कमीशन ऑन एलेक्शन्स’ के को-अर्डिनेटर एमजी देवसहयाम का यह लेख 18 नवम्बर 2025 को ‘ द हिन्दू ‘ में प्रकाशित हुआ था । समकालीन जनमत के पाठकों के लिए इस लेख का हिंदी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है। )

‘द हिन्दू’ ने भारत के 12 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में चुनाव-आयोग द्वारा विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर 2.0) कराये जाने को लेकर अपने सम्पादकीय में लिखा है कि, “बिहार के अनुभव से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में लोगों के नाम कट जाने का खतरा है। जब यह कवायद चल ही रही है तो नागरिक-समाज, मीडिया और दूसरे दलों का भी यह कर्तव्य हो जाता है कि वे इस पर कड़ी निगरानी रखें अन्यथा भारत के चुनावी गणतन्त्र की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में आ जाएगी।“

बिहार का प्रयोग

अभी-अभी बिहार में मतदाता-सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण किया गया है। इस प्रक्रिया में मतदाता की पात्रता पुनर्सत्यापित करने के लिये ढेर सारे कागजात की अपेक्षा की जा रही थी, जिसके चलते भारी संख्या में लोगों के ऊपर मताधिकार से वंचित हो जाने का खतरा मंडरा रहा था और लग रहा था कि यह तो लोगों के लिए पिछले दरवाजे से नागरिकता साबित कराने की चालबाजी जैसा है। इस प्रयोग द्वारा ‘संशोधित मतदाता-सूची’ में गहरी खामियां हैं जिनमें वयस्क-मतदाता अनुपात में तेज गिरावट, महिला एवं मुस्लिम मतदाताओं के नामों का असमानुपातिक विलोपन और दोहरे और नकली नामों की प्रविष्टियां भी शामिल हैं। इसके अलावा, जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही थी, बड़ी संख्या में लोगों के नाम पहले ही काटे जा चुके थे।

बिहार में एसआईआर के पूरे दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त के आचरण ने इस संस्था की निष्पक्षता एवं संस्थागत-विश्वसनीयता के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। इसके द्वारा न्यायालयों में प्रस्तुत दस्तावेज़ और सार्वजनिक बयानात से यही प्रतीत होता है कि यह संस्था लगातार अपनी जांच के प्रति अनुत्तरदायी और अपनी विश्वसनीयता के प्रति दुराग्रही होती जा रही है और मतदाता सूची में वैध मतदाताओं की समावेशिता और मतदाता सूची की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित कराने के स्थान पर यह संस्था अपने प्रभुत्व को सुनिश्चित किये जाने को लेकर ज्यादे चिंतित हैं।

खुद इस पूरी कवायद की वैधानिकता की निगरानी करनेवाले उच्चतम न्यायालय ने इसकी वैधता के मुख्य सवाल- क्या चुनाव-आयोग के पास एसआईआर करने का अधिकार है और यदि हाँ तो किस कानून के अंतर्गत – का जवाब देने से इंकार कर दिया है और बिना किसी रोक-टोक के इसे जारी रखने पर सहमति दे दी है। उसके हस्तक्षेप से कुछ प्रक्रियागत असमानताएं कमजोर जरूर हुई हैं लेकिन उनको घनीभूत होने से रोका नहीं जा सका है। किसी सार्थक सुधारात्मक व्यवस्था के अभाव में इस बात की पूरी-पूरी आशंका है कि न्यायालय किसी ऐसे अनचाहे फ्रेमवर्क को वैधता प्रदान कर दे जो अल्पसंख्यक एवं हाशिये के समूहों के लिए दुर्गम हो और विभेदकारी भी।

इसके अतिरिक्त, विशेषतः तमिलनाडु में एक मुद्दा आंतरिक-प्रवासियों के मताधिकार का भी है। जन-प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 19 के अनुसार मतदाता-सूची में किसी मतदाता का नाम शामिल करने के लिए उसे उस विधानसभा-क्षेत्र का ‘साधारणतः निवासी’ होना आवश्यक है। इसी कानून की धारा 20 ‘साधारणतः निवासी’ होने को परिभाषित करती है। यह एक प्राचीन अवधारणा है और वर्तमान में प्रवास के तीन स्पष्ट प्रवर्गों को संबोधित नहीं करती: दीर्घावधि के प्रवासी- जो प्रायः शिक्षा या स्थायी रोजगार के लिए एक लंबी अवधि का प्रवास करते हैं; अल्पावधिक/मौसमी प्रवासी- जो किसी विशेष मौसम में विशेष प्रकार के कार्य के लिए प्रवास करते हैं; और चक्रीय प्रवासी- जो अपने काम के सिलसिले में अपने घर और कार्यस्थल के बीच आवागमन करते ही रहते हैं।

सहभागी लोकतन्त्र

वर्तमान एसआईआर किसी समुचित नियम, जांच, समीक्षा या ऑडिट से परे है, जबकि मतदाता-सूची के संशोधन और सत्यापन का यह कार्य अनिवार्य रूप से सोशल-ऑडिट के दायरे में आता है। भारत में सोशल-ऑडिट सहभागी लोकतंत्र की एक सांस्थानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति या समुदाय को उन समस्त कार्यों/सेवाओं का ऑडिट करने का अधिकार प्राप्त है जो उनके हितों के नाम पर, या उन व्यक्तियों या समुदायों के नाम पर संपादित की जाती हैं। इसलिए एसआईआर का यह सम्पूर्ण चक्र भी खुद-ब-खुद जनता द्वारा किए जाने वाले ऑडिट के दायरे में आ जाता है।

अपने अनुच्छेद 243ए और 243जे द्वारा संविधान ऐसी ऑडिट और निगरानी की शक्ति प्रदान करता है। विधि द्वारा सोशल ऑडिट को एक सांस्थानिक-प्रक्रिया का दर्जा दिया गया है। भारत के नियंत्रक लेखा-परीक्षा एवं महालेखाकर ने भी किसी जनहित-कार्यक्रम की निगरानी और उसके सोशल ऑडिट किए जाने का अनुमोदन किया है और उसकी क्रियाविधि एवं समव्यवहारों का निर्धारण भी किया है।

भारत की चुनाव-पद्धति का आधार है सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार। इसका निश्चयन तभी संभव है जबकि समस्त अर्ह मतदाता का नाम मतदाता-सूची में शामिल हो। वर्तमान एसआईआर में जांच एवं संतुलन की कोई व्यवस्था नहीं है और इसीलिए यह बाहरी प्रभावों और हस्तक्षेपों के चलते संदेह से परे नहीं है। इसके अलावा ऐसे देश में, जहां 30% से 40% तक मतदाता मतदान के लिए आते ही नहीं, यह उम्मीद करना कि समस्त मतदाता मतदाता-सूची में अपना नाम सुनिश्चित कराने के लिए वास्तव में प्रार्थना और पुनर्प्रार्थना करेंगे, अनुचित एवं अव्यावहारिक है। उनसे कुछ तयशुदा कागजात के जरिये अपनी नागरिकता सिद्ध करने की मांग करना चुनाव-आयोग द्वारा मतदाता-सूची तैयार करने और उसमें ठीक-ठीक नाम जोड़ने-घटाने की अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड लेने जैसा है। यह कार्य एक खुले और अनिवार्य सोशल ऑडिट के माध्यम से जन-सहभागिता द्वारा ही सबसे अच्छे ढंग से किया जा सकता है।

सोशल ऑडिट, लोगों के विचारों का एक खुला, वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रयोग है जिसमें आधारभूत पत्रों और अभिलेखों का इस्तेमाल करके उनमें मौजूद सवालों और सूचनाओं के माध्यम से पुष्टिकारक दस्तावेज़ प्रस्तुत किए जाते हैं। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार हेतु मतदाता-सूचियों में गड़बड़ियों की संभावना को न्यूनतम रखने और अधिकतम समावेशन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन सूचियों का सघन पुनरीक्षण पंचायत/वार्ड/बूथ स्तर पर की जानेवाली सोशल ऑडिट द्वारा ही संभव है।

2003 में जब जे0एम0 लिंगदोह मुख्य चुनाव आयुक्त थे उस दौर में भारतीय चुनाव आयोग और नागरिक-समूह द्वारा परीक्षणोपरांत इस प्रकार का एक सोशल ऑडिट प्रयोग में लाया गया था। उस साल के आखिर में जो पाँच राज्य चुनाव में जा रहे थे उनमें नागरिक-समूहों  की सलाह के आधार पर ही भारतीय चुनाव आयोग ने आदेश दिया था कि प्रत्येक ग्राम सभा/वार्ड में विकेंद्रीकृत सोशल ऑडिट कराई जाय। उस समय बूथ-लेवेल अधिकारियों द्वारा आद्यावधि की गई मतदाता-सूचियों को ही आधार बनाया गया था। इस प्रक्रिया के आधार पर अकेले राजस्थान में मतदाता-सूचियों में 7 लाख से अधिक परिवर्तन किए गए थे। तो एक पूर्व-वर्तता मौजूद है।

एसआईआर 2.0 पर आगे बढ्ने से पहले भारतीय चुनाव आयोग को यह सलाह दिया जाना उचित होगा कि वह इसी राह पर आगे बढ़े और इस प्रकार के नियम बनाए जिसमें नागरिक समाज और राजनीतिक दलों के साथ मतैक्य स्थापित करते हुए अनिवार्य सोशल ऑडिट शामिल रहे। चुनावी लोकतन्त्र की शुचिता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है।

 

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