समकालीन जनमत
जनमत

‘ लेखक को सत्ता समर्थित व्याख्याओं के महीन, घने जाल को काटने की कोशिश करनी है ’

 

( जन संस्कृति मंच के आठवें राज्य सम्मेलन के अवसर पर बाँदा में आयोजित समारोह में प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान वरिष्ठ कथाकर योगेंद्र आहूजा को दिया गया। इस मौके पर योगेंद्र आहूजा ने बहुत महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया जिसे हम समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं) 

मैं ‘प्रेमचंद स्मृति कथा पुरस्कार’ के नियामकों, चयनकर्ताओं और आयोजकों का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ । मेरे लिए यह एक खास क्षण है और एक मूल्यवान स्मृति के रूप में हमेशा मेरे साथ रहेगा। लिखना अपने आप में एक एकाकी कर्म भले ही हो, यह सन्नाटे में की जाने वाली कोई निजी कार्रवाई नहीं है। लेखक अपने लिखने के एकांत में भी कितने ही अदृश्य दोस्तों के, असंख्य जनों के साथ और उनसे एकताबद्ध होता है, ‘solitary’ हो तो भी ‘solidary’ होता है। सबसे तन्हा, सबसे एकांत क्षणों में भी लेखन सिर्फ अपने से नहीं, अपने से परे जाकर, या कहें अपने ‘आत्म’ की घेरेबंदी के परे, ‘अन्य’ से संवाद है, अन्य तक पहुँच कर ही सम्पूर्ति पाता है। या इसे इस तरह कहना ठीक होगा कि यह एक साथ ‘अन्य’ से और ‘अपने’ से संवाद है । दुनिया के बारे में होते हुए भी लेखक के लिए लिखना अपने को खोजने-जानने की, आत्म-अन्वेषण की प्रक्रिया है, उसका हिस्सा है।

लिखना ‘व्यक्तिगत’ नहीं हो सकता जैसे दुनिया में कुछ भी व्यक्तिगत, या सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होता। जो व्यक्तिगत होता है, वह समाज में चल रही तमाम कार्य-कारण श्रंखलाओं का ही एक हिस्सा होता है और इस तरह हर व्यक्तिगत उसी समय सामाजिक भी होता है। लेखक अपने पाठक से जो कहता या कहना चाहता है, उसी समय अपने आप से भी कहता है। बाहरी दुनिया से उसकी जो बहस होती है, वह उसके भीतर भी चलती है, खुद अपने आप से। लिखते हुए, लिखने के दौरान कहीं आकर लेखक और पाठक के बीच की दीवार गिर जाती है। वह पहचान पाता है कि पाठक कोई अन्य नहीं, उसका ही विस्तार है, उसके ‘आत्म’ का ही दूसरा छोर है। आपसे जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह दरअसल वह कुछ है जो मुझे अपने आप से भी कहना है।

हर लेखक की यह सहज इच्छा होती है … कि उसके लिखे को देखा, पहचाना जाए, उसे पाठकों के अन्तरंग में जगह मिले और कभी कभी आत्मीयों की, सुधीजनों या समानधर्मा साथी लेखकों की तवज्जह भी। इसे महत्वाकांक्षा के, यश-लिप्सा के खाते में डालना बेइंसाफी होगी। यह स्वाभाविक है कि कोई लेखक ऐसा नहीं चाहता कि उसका लिखा अँधेरे में गुम हो जाए …  लेकिन वह धधकती हुई, सर्चलाइट जैसी, पलकें जला देने वाली तेज रोशनियाँ भी नहीं चाह सकता जिनकी चमक दमक के बीच वह खुद गुम हो जाए। इन दोनों के बीच जो एक ज़रा सी रोशनी होती है … एक लालटेन या ढिबरी जैसी, एक नन्ही शमा या खामोश दिए जैसी … उतनी ही उसके लिए काफी है, उसके परावर्तित आलोक में खुद को पहचान सकने के लिए । दरअसल … जब कोई बात अपने शब्दों में न कही जा रही हो तो अग्रजों से, महाकवियों से शब्द उधार लेने में हर्ज़ नहीं। मुक्तिबोध की कविता ‘एक अंतःकथा’ से कुछ लाइनें हैं, जहाँ वे ख़ुद को ही सम्बोधित हैं  :

जीवन कर्तव्यों का पालन न हो सके

इसीलिए निज को बहकाया करता है

चल इधर,

बीन रूखी टहनी,

सूखी डालें

भूरे डंठल

पहचान अग्नि के अधिष्ठान

जा पहुँच स्वयम के मित्रों में

कर ग्रहण अग्नि-भिक्षा

लोगों से, पड़ोसियों से मिल

मित्रो, मेरे लिए यह आप सबसे, साथी और सीनियर लेखकों से, आत्मीयों से मिलने और मुक्तिबोध के शब्दों में, अग्नि-भिक्षा या अग्नि-उधार लेने का अवसर है । बहुत पहले हमारे बचपन में गांवों में और छोटे कस्बों में, जब माचिस एक दुर्लभ चीज़ थी, चूल्हा जलाने के लिए पड़ोस या आसपास के घरों से आग मांगने का रिवाज था। साहित्य में हमें अब भी एक दूसरे से अग्नि लेनी होती है, इसके बिना काम नहीं चलता। तो दोस्तो, क्या मुझे मिलेगी … अग्नि नहीं तो एक अंगारा, एक चिंगारी या एक माचिस की तीली ही, उधार या उपहार ? उसकी मुझे ज़रूरत होगी उन पलों में – जब लगेगा कि दिल का दिया बुझने लगा है …  जैसा शायद सबके साथ कभी न कभी होता ही है। उसी के आलोक में मेरे लिए आगे का रास्ता दृश्यमान होगा।

अग्रज और मित्र लेखकों की बिरादरी के द्वारा मेरे लिखे को रेखांकित किये जाने पर मुझे बेहद ख़ुशी है। लेकिन … मैं आपसे ईमानदारी बरतते हुए बताना चाहता हूँ कि मेरी इस समय की मनःस्थिति का यही एक रंग नहीं है। इस ख़ुशी में एक विषाद भी घुला हुआ है। मेरे भीतर कुछ तूफ़ान सरीखा भी है, पछाड़ खाती हुई वेगवान लहरें। उसे ठीक से कह पाना, सही सही शब्द देना बहुत मुश्किल है। सबसे पहले, उन दोस्तों की याद मुझे कुचल रही है जो जीवन में सौभाग्य की तरह आये और कितनी ही यात्राओं में – बाहरी और अंदरूनी दोनों – हमसफ़र और मददगार रहे। जिनके संसर्ग में, संसर्ग से ही थोडा बहुत सीख सका … जीवन पर झपट्टा मारना, हर स्थिति में प्रकट या प्रतीतिगत सच्चाई का पर्दा हटा कर असली, प्रच्छन्न सच्चाई तक पहुंचना या इसकी कोशिश करना, उन्हें शब्द देना, लफ़्ज़ों में मायने भरना और घोरतम अन्धकार में भी उम्मीद न छोड़ना, सपने देखना … लेकिन जो अब नहीं हैं । किसी निर्दयी बीमारी या हत्यारे कोरोना ने उन्हें हमेशा के लिए दूर कर दिया है । हम एक ऐसे समय में रहते हैं जब नकारवाद या निषेधवाद की,  विनाशवाद की चपेट में आ जाना बहुत आसान है। “सब नष्ट हो चुका है, हर मानवीय कोशिश निष्फल, निस्सार है, मनुष्य एक बुराई का नाम है”  ऐसे ख्यालों से उन दोस्तों ने मुझे बचाए रखा इसके लिए मेरी कृतज्ञता का कोई ओर छोर नहीं है। उन दोस्तों की, खास तौर पर वीरेन जी और मंगलेश जी की, याद मुझे बेतरह बेचैन कर रही है।

इस मौके पर अपनी भाषा के उन अग्रज, पूर्वज लेखकों को भी याद करने से बच नहीं सकता, त्रिलोचन के शब्दों में, जिनकी साँसों को आराम नहीं था । ऐसे समय में जबकि हम देखते हैं कि हमें चारों ओर से घेरे मुसीबतों से गाफिल या बेपरवाह, साहित्य की दुनिया में एक खास तरह की उत्तेजना, उत्सवधर्मिता, रोमांच रोज-ब-रोज बढ़ते जाते हैं, साहित्य को सिर्फ एक लुत्फ़ या मज़े में, ‘वाचा के स्वाद’ में या ‘लफ़्ज़ों के खेल’ में reduce करने की कोशिशें जारी हैं, सरोकारों, पक्षधरता या प्रतिबद्धता को गुज़रे ज़मानों के मूल्य माना जाने लगा है, – ऐसे में वे पूर्वज लेखक और भी याद आते हैं जिन्होंने खुद के उदाहरण से बताया कि लिखना क्या होता है, सृजन और कर्म का रिश्ता क्या होता है, लेखक की जिम्मेदारी क्या होती है और लिखित शब्द की गरिमा के क्या मानी होते हैं । उनमें केवल हमारे देश के नहीं, तमाम देशों के लेखक, कवि, चिन्तक और मनीषी शामिल हैं । उनमें प्रेमचंद, निराला, प्रसाद जी, मंटो, बेदी, इस्मत चुग्ताई, अमरकांत, रेणु जी और मुक्तिबोध आदि तो हैं ही, ऐसे भी हैं तमाम जिन्हें जीवन भर रो्शनियाँ नसीब नहीं हुई – फिर भी उनका काम कभी रुका नहीं । अपना रक्त जलाकर, दुखों के दागों को तमगे की तरह पहने हुए, धरती जैसे धैर्य के साथ, वे तपती एस्बेस्टस छतों के नीचे या भूसे की कोठरी जैसी जगहों में लगातार काम करते रहे। उन्हें कठोर पहाड़ तोड़ने थे, विश्राम का वक्त कहाँ था ?

 

जब मैं उन पूर्वजों का स्मरण करता हूँ तब मुझे इस विरासत की विराटता का, उसकी enormity का एक कंपाने वाला एहसास होता है । खुद को इस विरासत का थोडा बहुत काबिल बना पाना … यह जीवन भर चलने वाली कोशिश है। उनका स्मरण करते हुए मैं इस पुरस्कार को एक गहरी विनय के साथ ही ले सकता हूँ।

आभारी हूँ लेकिन यह अवसर सिर्फ आभार व्यक्त करने का नहीं। इसे एक उत्सव की तरह मनाना इस मौके को गँवा देना, बरबाद करना होगा। हम जहाँ और जैसे समय में हैं क्या वहां उत्सव या जश्न का कोई कारण, कोई मौका है ? यह कैसा समय आन पड़ा है ? क्या हमने कल्पना की थी कि हमें इस तरह साक्षात करना होगा नष्ट मनुष्यता और विभोर हिंसा और मूल्यध्वंस का, जो हम चारों ओर देखते हैं ? एक राजनीतिक, अर्थनीतिक, सांस्कृतिक दुश्चक्र में फंसे, हम एक अनकहे डर और उदासी के बीच हैं । रोज कुछ न कुछ टूटता बिखरता है। रोज कुछ ऐसा घटता है जो हमारे डर और उदासी को गहरा करता है। पिछले दो बरसों में जिस तरह करोना ने हमारी तमाम व्याधियों को उभार कर सतह पर ला दिया, जो त्राहि त्राहि मची, वह भी इस संकट का ही लक्षण था, उसी की अभिव्यक्ति थी।

ऐसे में क्या हम इतने से संतुष्ट हो सकते हैं कि अब भी इतनी संख्या में किताबें छपती हैं, उन पर चर्चाएँ होती हैं, साहित्य के आयोजन होते हैं ? इस आपाधापी, रेलपेल, ध्वंस के बीच हमने किसी तरह साहित्य का यह छोटा सा कुनबा, अपनी नन्ही सी हिंदी बचा ली है, यह तसल्ली क्या काफी है ? हमारा कितना कुछ दांव पर लगा है – नवजागरण के मूल्य जिन्हें एक लम्बी एतिहासिक प्रक्रिया में मुश्किल से हासिल किया गया, मूलभूत नागरिक अधिकार, लोकतंत्र का अस्तित्व, इजहार की आजादी। मुझे लगता है कि इस समय लेखक का काम और जिम्मेदारी पिछले किसी भी समय से ज्यादा मुश्किल, ज़्यादा बड़ी है। यह कहना कतई काफी नही कि लेखक की सच से एक अटूट प्रतिबद्धता होनी चाहिये – यह तो बुनियादी बात है ही । हमारे वक्त में जब सच, झूठ और सही गलत की पहचान भी धुंधली कर दी गयी है, लेखक की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी, ज्यादा मु्श्किल है। इस पहचान को साफ करने के लिये उसे सत्ता समर्थित व्याख्याओं के महीन, घने जाल को काटने की कोशिश भी करनी है। उसे हर सवाल पर एक साफ पोजीशन लेनी है हवाई किस्म की उस गोल मोल मानवीयता से बचते हुए जो आततायियों के पक्ष में जाती है। और हाँ, अब जब आलोकधन्वा के शब्दों में – “भूलना” भी बिकता है, उसकी भी कीमत मिलती है – उसे ‘भूलने’ के, विस्मरण के प्रतिवाद की कोशिशों में भी शामिल रहना है ।

मित्रो, मैं यही चिंता, बेचैनी … आपसे शेयर करना चाहता हूँ, और जैसा पहले कहा, अपने आप से भी। इस समय देखता हूँ कि हमारी बौद्धिक दुनिया, जिससे मेरा आशय सिर्फ साहित्यिक दुनिया से नहीं है – इसके एक छोर पर सर्वानुमति है और दूसरे पर trolling । एक छोर पर सब कुछ की अनुमति, सब कुछ की वाह-वाह, दूसरे पर सब कुछ पर कालिख पोतने की कोशिश । इन दोनों छोरों के बीच हम कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं, हमारे क्या कार्यभार हैं – ये ख्याल अक्सर आते हैं। यह स्थिति क्यों आई और इस समय जो नियंत्रक शक्तियां हैं, वे कैसी बिसात बिछा रही हैं और उनकी इच्छाएं और इरादे क्या हैं – ऐसा नहीं कि हम यह सब नहीं समझते । यह सब समझने, विश्लेषित करने के औजार, वैचारिक उपकरण हमारे पास हैं। हम समझदार लोग हैं, सब जानते समझते हैं । लेकिन कहीं धीरे धीरे हम उस तरह के समझदार तो नहीं हो रहे जिनके बारे में गोरख पाण्डेय ने ‘समझदारों का गीत’ लिखा था – ‘हम सब कुछ समझते हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते हैं और क्यों नहीं कर सकते, यह भी हम समझते हैं’

समझदार होने का क्या अर्थ है अगर समझदारी मारी मारी फिरे ? समझ लेने से क्या होता है अगर वह किसी कर्म से, लक्ष्यप्रेरित कार्रवाई से जुडी न हो ? इसका अर्थ प्लीज यह न समझें कि इसी समय में जो कुछ सकारात्मक है, जो सकर्मक कार्रवाइयां, प्रतिरोध जारी हैं, कभी नहीं रुके, मैं उसकी अवहेलना या अवमूल्यन कर रहा हूँ । नहीं, मेरा ऐसा इरादा बिलकुल नहीं है । मैं कहना चाहता हूँ कि इस समय राष्ट्र, प्रगति, तर्कवाद और अतीत और भविष्य के नए मिथक, नयी परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं । समूचे मानवीय अनुभवों का इतिहास दुबारा लिखा जा रहा है। वर्तमान पर काबिज़ होने के बाद अब कोशिश अतीत पर कब्ज़ा करने की है । एक मनचाहा अतीत गढ़ा जा रहा है। अतीत ही नहीं, वे इंसान के मनोवेग, उसका डीएनए, उसका ‘मन’ ही नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं । आलोकधन्वा की ये लाइनें बार बार याद आती हैं जो उनकी कविता ‘सफ़ेद रात’ से हैं :

भारत में जन्म लेने का

मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था

अब वह भारत भी नहीं रहा

जिसमें जन्म लिया |

इन लाइनों में आलोक जी ने क्या हम सबकी बात नहीं कही है ? हम सब की जो भी बौद्धिक, संवेदनात्मक सक्रियता है, उसका लक्ष्य अंततः क्या यही नहीं है – जान सकना कि इस महादेश का, और उसमें हमारे होने का हमारे लिए क्या अर्थ है । हमारे लिए ‘भारत’ के जो भी मायने रहे हैं, वे छीने जा रहे हैं। हमारा देश ही हमसे छीन लिया जा रहा है। देश बिराना जान पड़ता है। उस समय जब आप अपनी चेतना की समूची ताकत से लफ़्ज़ों में मायने भरने के प्रयत्न करते हैं, उसी समय दूसरी ओर से कोई उन्हें मायनों से खाली कर देता है। क्या इस स्थिति की विकटता का, गंभीरता का और ऐसे में अपने कार्यभार का सही अवबोध हमें है ? क्या यही इस समय एकमात्र सवाल नहीं है – कि खो चुके देश को किस तरह वापस पाना है, कैसे इसके लिए वैचारिक, बौद्धिक , अवधारणापरक लड़ाइयों को जिन्दा और तेज़ करना है ।

यही कुछ बातें मुझे आपसे कहनी थीं । इनके साथ मैं आप सब को दुबारा शुक्रिया कहते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ ।

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