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“  शिवकुमार पराग की पराग जी की गजलें अंधेरे के खिलाफ रोशनी लेकर आती हैं ”

वाराणसी।  कवि  शिवकुमार पराग की की गजलों के नए संग्रह ‘ देख सको तो देखो ‘ का लोकार्पण 29 दिसम्बर को बनारस के जिला राजकीय पुस्तकालय के सभागार में हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वयोवृद्ध साहित्यकार तथा ‘सोच विचार’ पत्रिका के प्रधान संपादक जितेंद्र नाथ मिश्रा ने की। अस्वस्थता के बावजूद वह आए और तीन घंटे तक बैठे रहे। यह साहित्य के प्रति उनका समर्पण और अनुराग था। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में पराग की गजलों के अंदर के भाव को व्यक्त करते हुए कहा कि इनमें सच और साहस भरपूर है। साहित्य यही काम करता है। ठंड हो तो गर्मी पैदा करे। अंधेरा हो तो रोशनी का काम करे।

इस मौके पर शिवकुमार पराग  पराग ने आत्मकथ्य के रूप में अपनी ग़ज़लों से चंद शेर सुनाए जो उनकी ग़ज़लों के मिजाज को व्यक्त करते थे। वे कहते हैं – ‘इतना ख़तरा चलो उठाएं हम/अपने भीतर तो सुगबुगाएं हम।/बर्फ़ दिल में उतर न जाय कहीं /सोच में आग तो जलाएं हम।’ और आगे कहते हैं ‘ ऐसी कविता प्यारे लिख/जो मन को झंकारे लिख/सिर पर है बाज़ार चढ़ा/जो यह ज्वार उतारे लिख/ समझौतों की रुत में भी/ख़ुद्दारी ललकारे लिख/हार-जीत जो हो, सो हो/लेकिन मन ना हारे लिख।’

मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध गजलकार तथा बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ वशिष्ठ अनूप ने कहा कि पराग जी की गजलों में जन पक्षधरता है। यह मेहनतकश बहुतसंख्यक के पक्ष की हैं। इनकी भाषा और अभिव्यक्त में सहजता है जो दूर तक पहुंचती है। इनके कथ्य और कहन की शैली में एकरूपता है। वस्तु और रूप में सुंदर सामंजस्य मिलता है।

कवि और समीक्षक कौशल किशोर (लखनऊ) कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। उनका कहना था कि दुष्यंत कुमार से गजलों की जो यथार्थवादी परंपरा हिंदी में शुरू हुई, पराग जी की गजलें उससे जुड़ती हैं। हिंदी काव्य की मुख्यधारा अंधेरे के खिलाफ है जो निराला, मुक्तिबोध, राजेश जोशी आदि से होते हुए बढ़ती है। पराग जी की गजलें इस अंधेरे के खिलाफ हैं तथा उजाले के रूप में जो चकाचौंध है, उसके विरुद्ध भी हैं। ये न सिर्फ परिस्थितियों का वर्णन करते हैं बल्कि इन्हें बदलने का भरोसा है। सार रूप में कहा जा सकता है कि ये उम्मीद की गजलें हैं।

मऊ से आए ‘अभिनव कदम’ पत्रिका के संपादक डॉ जयप्रकाश धूमकेतु ने भवानी प्रसाद मिश्र की कविता से अपनी बात की शुरुआत की तथा कहा कि पराग के यहां जीवन और साहित्य में कोई फांक नहीं है। जो जीते हैं, वही रचते हैं। उनकी ग़ज़लें तो ऐसी हैं जो लोकगीतों की तरह लोगों के बीच पहुंच गई हैं। जन आंदोलन का हथियार बनी हैं। इस संदर्भ में उन्होंने एक ग़ज़ल की विशेष चर्चा की। ये है ‘गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइए /इस दौरे सियासत का अंधेरा मिटाइए’।

जाने माने आलोचक डॉक्टर कमलेश वर्मा ने शिवकुमार पराग की गजलों की कला, शिल्प और विचार पर बात रखते हुए कहा कि इनके यहां छोटी बहर की गजलें भी हैं। इनकी गजलें 13 मात्राओं से लेकर 33 मात्राओं वाली हैं। वे बखूबी निर्वाह भी करते हैं। इनमें अपने समय से मुठभेड़ है और उन स्थितियों को लाते हैं जो व्यवस्था की देन है। मूल रूप से पराग राजनीतिक कवि हैं । उनके पास जनवादी दृष्टि है जिससे समय और समाज को देखते हैं और व्यक्त करते हैं।

प्रोफेसर श्रद्धानंद का मत था कि पराग की ग़ज़लें जनवादी तेवर की हैं। यह आमजन के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ी हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु वाजपेई का कहना था कि पराग आज के दौर के समर्थ गजलकार हैं जिनकी गजलों में समाज की सच्चाई दिखती है। शहर के अनेक वरिष्ठ रचनाकारों ने पराग जी को ग़ज़ल की नयी किताब तथा उनके साहित्यिक व सामाजिक योगदान के लिए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ रामसुधार सिंह ने किया। साहित्यिक संघ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन ‘सोच विचार ‘ पत्रिका के संपादक नरेंद्रनाथ मिश्र ने किया।

इसी क्रम में दूसरे दिन शिवकुमार पराग के आवास पर काव्यगोष्ठी का कार्यक्रम हुआ जिसमें लखनऊ से पधारे कवि, संपादक और समीक्षक कौशल किशोर जी मुख्य अतिथि थे। इसकी अध्यक्षता ओम धीरज जी ने की। इस अवसर पर सुरेन्द्र वाजपेई, केशव शरण, धर्मेन्द्र गुप्त ’साहिल’, प्रीति जायसवाल, कंचन सिंह परिहार, पुष्पेन्द्र अस्थाना, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ‘अनघ’ आदि कई रचनाकारों ने काव्यपाठ किया। इसके साथ पुस्तकों का आदान–प्रदान भी हुआ। शिवकुमार पराग जी के धन्यवाद ज्ञापन से दो दिनों का यह साहित्य समागम का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

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