महक शर्मा
( महक शर्मा का यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में 23 नवम्बर को प्रकाशित हुआ था। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए इस लेख का हिंदी अनुवाद उन्होंने खुद किया है )
मैं अक्सर सोचती हूँ कि असल में चिंतन होता कहाँ है। वह भव्य किस्म का चिंतन नहीं—जो बोर्डरूम और सेमिनार हॉल में होता है—बल्कि वह भीतर-भीतर चलने वाला चिंतन, जो दाल चलाते हुए, या कपड़े तह करते समय स्वतः घटित होता है।
काफी समय तक मैं यह मानती रही कि किसी भी समस्या की जड़ों को टटोलने के लिए गहन चिंतन सिर्फ एकांत में ही संभव है। एक मेज़ – एक दरवाज़ा जिसे बंद किया जा सके – एक ऐसा व्यक्ति जो कभी विचलित न हो – मुझे लगता था कि ये सब चिंतन की आवश्यक शर्तें हैं। वर्जीनिया वूल्फ का ये मत था कि यदि किसी स्त्री को उपन्यास लिखने हैं तो उसके पास पैसा और अपना एक कमरा होना चाहिए। मैं इस पंक्ति को लंबे समय तक एक प्रकार की कभी पूरी न हो सकने वाली, और संभवतः निराशाजनक माँग के रूप में समझती रही—उस एकांत की माँग, जो हम सब चाहते तो हैं लेकिन जो आसानी से मिलती नहीं। मगर समय बीतने के साथ यह धीरे-धीरे मुझे ये स्पष्ट हुआ कि विशेषतः स्त्रियों की रचनात्मकता आदर्श परिस्थितियों की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि वह टुकड़ों में जन्म लेती है— रोज़मर्रा के कामों के बीच, छोटे-छोटे विरामों में, उन जगहों में जो दी नहीं जातीं, बल्कि ली जाती हैं।
घर—जिसे अक्सर एक साधारण-सी जगह मान लिया जाता है—असल में नये विचारों के सतत प्रवाह का स्रोत होता है। घर संभालना अपने-आप में स्मृति, समय और भावनाओं का एक जटिल संयोजन है। यह एक ऐसी कला है जिसपर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो। आप योजना बनाते हैं, अनुमान लगाते हैं, एक साथ कई काम संभालते हैं और हर दिन को लगभग उसी ढंग से जीते हैं—बस हल्के-से बदले हुए दृष्टिकोण के साथ। इस परिवर्तन को एक कलाकृति की पूर्णता के रूप में कभी प्रतिष्ठित नहीं किया जाता।
साहित्य में घर की कल्पना हमेशा एक द्वंद्वात्मक स्थान के रूप में की गई है जो एक साथ आश्रय भी है और क़ैद भी। जेन ऑस्टेन के ड्राइंग रूम से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर के बरामदों तक, द येलो वॉलपेपर की भयावह एकाकीपन से लेकर सेवासदन की व्याकुल आकांक्षा तक—घर वह जगह रहा है जहाँ स्त्रियों की मानसिक अवस्थाएँ सबसे तीव्र रूप में उभरती हैं। यह एक “ मौन ” स्थान है, जहाँ विचार बिना किसी चमक-धमक या शोर-शराबे के जन्म लेते हैं।
और रसोई—जो घर का केंद्र होती है—कभी सबसे अधिक शोर से भरी होती है, और कभी सबसे शांत मंच।
मैं उन सुबहों के बारे में सोचती हूँ जब रसोई एक साथ प्रयोगशाला भी लगती है और ध्यान-स्थल भी। प्रेशर कुकर की पहली सीटी, तेल में सरसों के दानों की चटक, भाप के साथ उठती अदरक की तीखी खुशबू—इन सबके साठ आप हर पल सोच रहे होते हैं। चूल्हे की आँच को ठीक करना, नमक का अंदाज़ा लगाना, दूध को ठीक वक्त पर उफनने से बचाना – यह एक ऐसी सहज और व्यावहारिक बुद्धि है, जिसका कोई मैनुअल नहीं, कोई लिखित भाषा नहीं — जो सिर्फ़ अनुभवों और स्मृतियों पर आधारित है।
कभी-कभी किसी लय के साथ कोई विचार स्वतः जन्म लेता है। किसी लेख के लिए एक पंक्ति – कोई भूली हुई स्मृति – कोई ऐसा सवाल जो भोजन परोसे जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता। यह कितना अजीब है कि सोच गंध के साथ चलती है — प्याज को भूनते हुए कोई स्मृति जाग उठती है, और उबलता पानी चिंतन का समय दे देता है।
इस तरह खाना बनाना मात्र एक दैनिक क्रिया नहीं रह जाता, बल्कि एक जानने की प्रक्रिया बन जाता है। यह तात्कालिक बुद्धि सिखाता है: करी गाढ़ी हो जाए तो तुरंत कुछ करना पड़ता है, वरना दाल नहीं गलेगी। यह धैर्य सिखाता है: शून्य से एक पौष्टिक भोजन का निर्माण। यह करुणा सिखाता है: यह सुनिश्चित करना कि थके हुए लोग भूखे न रहें। ये बुद्धि के तुच्छ रूप नहीं हैं अपितु ये रचनात्मकता के सबसे ठोस रूप हैं।
घर बनाना एक ऐसी कहानी लिखना है जो बार-बार स्वयं को पुनः लिखती है। हम कमरों को वाक्यों की तरह सजाते हैं—क्या फिट बैठता है, क्या छोड़ना होगा, क्या अर्थपूर्ण है। हर तकिया, हर शेल्फ़, हर स्थिर सी क्रिया कुछ कहती है। और फिर भी, इस कथा को शायद ही कभी कला माना जाता है। जब कोई पुरुष निर्माण करता है, हम उसे वास्तुकार कहते हैं; जब कोई स्त्री आराम का सृजन करती है, तो हम उसे गृहिणी कहते हैं। भाषा स्वयं इस पदानुक्रम को उजागर कर देती है।
अब मुझे लगता है कि सोचना सिर्फ़ मस्तिष्क की क्रिया नहीं है—यह शारीरिक भी है। यह स्पर्श, दोहराव और उपस्थिति के ज़रिए होता है। जिस तरह हम चादर मोड़ लेते हैं, ये याद कर पाते हैं कि हमने चाभी कहाँ रखी है, या यह बिना कहे महसूस कर लेते हैं कि घर में किसी को चाय की ज़रूरत है—ये सब ऐसी बुद्धियाँ हैं जिन्हें कोई डिग्री नहीं माप सकती। ये ध्यान से जन्म लेती हैं, और जैसा कि सिमोन वेल ने कहा था, ध्यान उदारता का सबसे दुर्लभ और सबसे परिष्कृत रूप है।
फिर भी, यह सच है कि इस जगह को लैंगिकता लगातार घेरे रहती है। जो काम घर को चलाता है—सफ़ाई, खाना, देखभाल—वह अदृश्य है, और उसका कोई मूल्य नहीं आँका जाता। स्त्रियों को ‘मल्टीटास्कर’ कहा जाता है, जैसे यह कोई प्रशंसा हो। लेकिन मल्टीटास्किंग दरअसल विखंडन का ही दूसरा नाम है। जो मस्तिष्क सबको सँभालता है, उसे ख़ुद को सँभालने का समय शायद ही कभी मिलता है।
लेकिन फिर भी, उस विखंडन में भी एक मौन शक्ति है। टुकड़ों में सोचना वस्तुतः दुनिया को टुकड़ों में समेटना है – ये सोचना कि हर सुबह फिर से शुरू कैसे करना है – अलिखित में संभावनाएँ तलाशना है। इस तरह रचनात्मकता कोई एकांत में जन्म लेने वाली प्रतिभा नहीं, बल्कि लगातार कल्पना करते रहने की क्षमता है—उस दुनिया में जो बार-बार आपको बाधित करती है।
कोविड महामारी के दौरान मैंने इसे सबसे तीव्रता से महसूस किया। घर एक साथ शरण भी था और क़ैद भी। हर कोना काम से भरा हुआ, और फिर भी थकान के बीच कोई अजीब-सी कोमलता—कोई नई सजी हुई शेल्फ़, पौधे पर उगता एक नया पत्ता, खिड़की पर गिरती शाम की धूप। कैद के भीतर भी सृजन जारी रहा। तब मुझे एहसास हुआ कि घरेलूपन और कल्पना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं—वे आपस में गहराई से जुड़े हैं।
घर की देखभाल करना जीवन की देखभाल करने से बहुत अलग नहीं है। इसमें धैर्य चाहिए, लचीलापन चाहिए, और निरंतर तात्कालिकता के भीतर संतुलन। आप स्वयं को एक साथ डिज़ाइनर, अर्थशास्त्री, चिकित्सक और कलाकार पाते हैं, बिना कभी स्वयं को उस विशेषण से पुकारे। घर शायद कभी स्टूडियो या मंच न बने, लेकिन वह देखभाल और पुनर्रचना का एक जीवित संग्रहालय ज़रूर है।
शायद वूल्फ़ का आशय भी यही था—यह नहीं कि स्त्री की कल्पना को एक भौतिक कमरा चाहिए, बल्कि यह कि उसे मान्यता चाहिए। ‘अपना कमरा’ कहीं भी हो सकता है—सुबह-सवेरे की रसोई, रस्सियों पर लटकते हुए कपड़ों से भरी बालकनी, या सोते हुए बच्चे के पास रखी एक डायरी। महत्व ये रखता है कि आप उस ‘कमरे’ को कैसे बरतते हैं।
आख़िरकार, चिंतन जीवन के बाहर घटित नहीं होता —वह जीवन के भीतर ही जन्म लेती है। यही कोई ऐसा चिंतन होता है जो दुनिया को चुपचाप गतिमान रखता है। उसे पहचानने की कला ही असली कला है।
( महक शर्मा अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं। उन्होंने डिजिटल मार्केटिंग में चार वर्ष से अधिक समय तक कार्य किया है। फिलहाल वे एक बुक एडिटिंग प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं )

