समकालीन जनमत
कविता

रौशन कुमार की कविताएँ जेएनयू से अर्जित सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद से निर्मित हैं

नीलम


युवा कवि रौशन कुमार की कविताएँ ‘ भूख हड़ताल ‘, ‘ नजीब तुम ज़िंदा हो ‘…,  ‘ क्या है जे एन यू ‘, ‘ जे एन यू की आज़ाद सड़क है ‘, ‘ क्या चाहता हूँ मैं ‘, ‘ गंगा ढाबा चला जाता हूँ ‘, ‘ जागो जे एन यू प्रेमियों ‘ अपने समय की प्रतिरोध की आवाज़ को बुलंद करते हुए नज़र आती हैं । हालाँकि उनकी क़लम नई है परंतु ये कविताएँ कवि सम्भावनाशीलता की परिचायक हैं।

ये रचनाएँ जे एन यू पर केंद्रित हैं फिर भी JNU के बाहर जो एक बड़ी दुनिया है उसके संघर्ष, अन्तर्विरोध और ख़ास तौर पर सामाजिक न्याय की चेतना इन कविताओं में भरपूर है।

जे एन यू सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय ही नहीं है बल्कि वह सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन का आधार भी है जहाँ व्यक्ति ज्ञान हासिल करते हुए सामाजिकता से जुड़ कर सर्व कल्याण की भावना से जुड़ जाता है । जेएनयू की यही जन चेतना की संस्कृति उसे अन्य शिक्षा संस्थानों से न सिर्फ़ विशिष्ट बनाती है बल्कि उसकी महत्ता को भी रेखांकित करती है । व्यक्तिवाद से निकलकर समाजवाद या लोक मंगल को आत्मसात् करना ही रौशन कुमार की कविताओं का अभीष्ट है । वास्तव में जे एन यू की प्रतिध्वनि उपरोक्त सभी कविताओं में व्यक्त हुई हैं । प्रत्येक कविता परिवर्तन की उम्मीद से बँधी हुई है जो इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है । अच्छी और सम्भवनाशील कविताओं के लिए युवा कवि रौशन कुमार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !

 

रौशन कुमार की कविताएँ

1. भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल !!

हर ज़ुल्मों-सितम का
आख़िरी ज़वाब
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

हर दमन व दबाव का
आख़िरी ज़वाब
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

हर भेदभाव और असमानता का
आख़िरी ज़वाब
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

छात्रों के संग अन्याय का,
निरंतर होते अपमान का
आख़िरी ज़वाब
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

तुम्हारे घमंड और अहंकार का
आख़िरी हिसाब
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

चाहते तो तोड़ सकते थे
तुम्हारी अहंकार का हर दीवार
चाहते तो झुका सकते थे
घमंड का तुम्हारी हर मीनार…
पर हमारे संघर्ष और सब्र का
आख़िरी ज़वाब…
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल…

फिर भी गर तुम ना माने
तो हमारी मौत पर
संघर्ष के फिर नये फूल खिलेंगे
और तुमसे निरंतर कहेंगे
हमें हमारा हक़ दो
वरना फिर करेंगे
भूख-हड़ताल, भूख-हड़ताल!!

 

2. नजीब तुम ज़िन्दा हो…

हमारे ख़यालों में, ख़्वाबों में
दिलों में, दिमाग में,
गीतों में, राग में,
नारों में, गूंजों में, इंकलाब में
नजीब तुम ज़िन्दा हो…

प्रशासन चाहे भुला दे तुम्हें
सत्ता चाहे मिटा दे तुम्हें
CBI अपने निकम्मेपन की सज़ा दे तुम्हे
Delhi Police दमन की दीवार में चुनवा दे तुम्हे
पर आज भी
JNU की आज़ाद सड़क पर
उस पर जलती
प्रतिरोध की मशाल में
और हमारे लबों पर
नजीब तुम ज़िंदा हो,
नजीब तुम ज़िंदा हो।

जिन लोगों ने तुम्हे मारा था
नकली शेर बन
बेशर्मी से धमकाया था
तुम्हें गायब करके
जिन लोगों ने अपनी औकात दिखाया था
वो भूल गए हैं की
वक्त उनका भी आएगा
इक रोज़ उन्हें भी
फासीवाद की
दोजख आग में जलाया जाएगा।

3. जागो जेएनयू प्रेमियों..!!

ज्ञान का मंदिर ढह रहा,
सिसक सिसक कर कह रहा
बचा लो मुझे
नालंदा का खंडहर बन जाने से
बचा लो मुझे
मेरा वजूद मिट जाने से
बचा लो मेरी हर वाटिका,
हर फूल मुरझा जाने से
बचा लो PSR को
धूल हो जाने से,
बचा लो Ring Road को
तंग गली हो जाने से
बचा लो गंगा ढाबा की चाय
को
Starbucks की Coffee हो जाने से!!

बचा लो मेरी आज़ाद फिज़ा को
सत्ता के गुलाम हो जाने से
बचा लो मुझे पूंजीवादियों के हाथों
नीलाम हो जाने से!!

बचा लो घास चरती नीलगायों को,
बचा लो नृत्य करते मोरों को,
बचा लो जेएनयू के वसंत को
बचा लो जेएनयू की बरसात को…
बचा लो जेएनयू की खुशनुमा शामों को,
बचा लो इसकी क्रांतिकारी रात को!!

तुम मुझे बचाओ मेरे प्रेमियों
मैं तुम्हारा देश, तुम्हारी दुनिया बचाऊंगा
मानवता के खिलाफ हो रहे हर साज़िश को
जड़ से मिटाऊंगा, जड़ से मिटाऊंगा!!

 

4. क्या है जेएनयू…???

बेजुबानों की ज़ुबान है जेएनयू
कमजोरों की मुखर आवाज़ है जेएनयू
सत्ता के दमन के ख़िलाफ़
संघर्ष का आगाज़ है जेएनयू।

गरीबों की भूख पर सवाल है जेएनयू
युवाओं के रोज़गार पर बवाल है जेएनयू
सड़क से संसद तक
सचमुच बेमिसाल है जेएनयू।

वैचारिक मतभेद हो भले
पर बात जब मानवता के वजूद की आती है
तो एकजुटता से…
निरंतर संघर्ष का नाम है जेएनयू।

सब कुछ बेच दिया है
अब शिक्षा बेचने चले हो
पर याद रहे वो दमनकारी सत्ता
इंदिरा गांधी तक को जिसने झुका दिया
उस सामूहिक शक्ति का नाम है जेएनयू।

अपने मंसूबों में कामयाब ना हो पाओगे
जलती मशाल की लौ ना बुझा पाओगे
सनद रहे…
सत्ता बदलकर सत्ता निर्माण का नाम है जेएनयू।

5. वो ‘JNU’ की आज़ाद सड़क है…

कई बंदिशों को पीछे छोड़
रूढ़िवादी हर चट्टान को तोड़
बेख़ौफ़ घूमती है लड़कियां जहां
वो ‘JNU’ की आजाद सड़क है।

जब सत्ता का अभिमान बढ़े
प्रशासन का कुशासन सर चढ़े
तब जलती है प्रतिरोध की मशाल जहां
वो ‘JNU’ की आज़ाद सड़क है।

जो प्रेम की मिसाल है
सत्ता पर उठता इक सवाल है
वैचारिक विरोधी भी साथ चलते हैं जहां
वो ‘JNU’ की आज़ाद सड़क है।

6. क्या चाहता हूं मैं ?

‘JNU’ की पगडंडियों पर
तेरे साथ चलना चाहता हूं मैं
गर बरसात हो कभी
संग तेरे फिसलना चाहता हूं मैं।

‘PSR’ पर तेरी आंखों में आंखें डाल
उनमें डूब जाना चाहता हूं मैं
वहां बैठकर सुबह तक चांद
फिर सूरज निहारना चाहता हूं मैं।

‘Ring Road’ के प्रेम पथ पर
प्रेम के गीत गाना चाहता हूं मैं
कदम से कदम मिलाकर
हमकदम हो जाना चाहता हूं मैं।

‘KC’ पर सामान खरीदने के बहाने
तुमसे मिलना चाहता हूं मैं
‘Notes’ मांगने के बहाने
प्रेम राग छेड़ना चाहता हूं मैं।

‘गंगा ढाबा’ की चौपाल में
मधुर संवाद करना चाहता हूं मैं
तू बन जाए जीवनसंगिनी मेरी
ऐसी फरियाद करना चाहता हूं।

तेरे प्रेम की पिपासा में
समंदर पार करना चाहता हूं मैं

7. गंगा ढाबा चला जाता हूं…

जब जीवन के दुःखों से
परेशान हो जाता हूं
सफलता और असफलता का ख़याल कर
मृत्यु का मसान हो जाता हूं
फिर गंगा ढाबा चला जाता हूं!!

जब भोजन कर लेने से भी
भूख ना मिटे
लगातार पानी पी लेने से भी
प्यास ना मिटे
चाय की चुस्कियों से फिर
ग़म का सागर सूखाने चला जाता हूं
हां, मैं अक्सर गंगा ढाबा चला जाता हूं!!

कभी दोस्तों के संग
तो कभी दोस्तों के बिना
पेड़ की पत्तियों और चांद के नीचे
पत्थर पर बैठ जाता हूं
फिर किसी की याद में Mr. India बन जाता हूं…
हां, मैं गंगा ढाबा चला जाता हूं, गंगा ढाबा चला जाता हूं!!

 

 


 

कवि रौशन कुमार, जन्म: 10/3/2001, अंगार घाट, समस्तीपुर, बिहार. शिक्षा: परास्नातक, राजनीति विज्ञान, जेएनयू
सम्पर्क: ईमेल: raushangope@gmail.com मोबाइल: 7481887348

 

टिप्पणीकार प्रो. नीलम, जन्म : 05 मई 1980, शिक्षा : एम. ए. हिन्दी, एम.फिल., पी. एच. डी., जवाहरलाल नेहरू, विश्वविद्यालय, दिल्ली।

प्रकाशित रचनाएँ :
पुस्तकें :

1- हिन्दी कविता : मध्यकाल
और आधुनिक काल
2- हिन्दी भाषा और साहित्य :
मध्यकाल और आधुनिक
काल – क
3- हिन्दी भाषा और साहित्य :
मध्यकाल और आधुनिक
कविता – ख
4- आधुनिक भारतीय भाषा :
हिन्दी गद्य उदभव और
विकास – क
5- आधुनिक भारतीय भाषा :
हिन्दी गद्य उदभव और
विकास – ख
6- हिन्दी कहानी
7- हिन्दी नाटक और एकांकी
8- हिन्दी कविता : आधुनिक
काल – छायावाद तक
9- हिन्दी कविता : छायावाद
के बाद
10- स्त्री स्वर : अतीत और
वर्तमान
11- ‘छप्पर’ की दुनिया : मूल्यांकन और अवदान (हिन्दी का पहला दलित उपन्यास)
12- सबसे बुरी लड़की ( कविता संग्रह)
13-स्त्री अस्मिता का प्रश्न :यशपाल का कथा साहित्य
14- किराए का मकान
(कहानी) प्रकाशित
कई पत्र -पत्रिकाओं सहित विभिन्न किताबों में शोध – पत्र, आलेख, साक्षात्कार एवं कविताएँ प्रकाशित।

. उप संपादक : रिदम पत्रिका  (2019-20)

. सहयोगी संपादक : हंस पत्रिका(दलित विशेषांक 2019)
. संस्थापक एवं अध्यक्ष :दलित लेखिका परिषद
. सदस्य : अकादमिक परिषद
दिल्ली विश्वविद्यालय, महासचिव : इंटेक, उपाध्यक्ष : दलित लेखक संघ। रुचि : स्त्री, दलित और मुसलमान, संदर्भित सामाजिक मुद्दों एवं कविता, नाटक तथा कथा साहित्य में विशेष रुचि।

संप्रति :
हिन्दी विभाग, लक्ष्मीबाई
काॅलेज, दिल्ली
विश्वविद्यालय, दिल्ली – 52
में प्रोफेसर

मोबाइल नंबर- 7042232176

ईमेल : drneelamlb@gmail.com

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