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कारवाँ के पत्रकारों पर हमला गम्भीर अपराध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात है : द नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया

 द नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया ने कारवाँ पत्रिका के तीन पत्रकारों – शाहिद तांत्रे, प्रभजीत सिंह और एक महिला पत्रकार (पहचान गुप्त रखी गयी है) पर किये गये हमले की भर्त्सना करते हुए कहा है कि  समाचार देने के दौरान तीनों पत्रकारों पर किये गये शारीरिक हमले और महिला पत्रकार का यौन उत्पीड़न गम्भीर अपराध हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात हैं। यह घटना वास्तविक स्थल से समाचार देने के भयंकर जोखिम का डरावना संकेत है जिससे राष्ट्रीय राजधानी में भी भारत के पत्रकारों को दो-चार होना ही पड़ता है।

11 अगस्त को ये तीनों पत्रकार पाँच माह पूर्व फरवरी में घटी दिल्ली-हिंसा के सन्दर्भ में कुछ महत्वपूर्ण जाँच करने के लिये उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सुभाष मोहल्ला में गये थे। इन तीनों पत्रकारों को समाचार देने से रोकने के प्रयास में एक भीड़ ने उनपर हमला कर दिया, उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उन्हें जातिसूचक गालियाँ दी। कारवाँ द्वारा पुष्ट की गयी सूचना के अनुसार उस भीड़ का एक प्रमुख सदस्य सत्ताधारी दल भाजपा का एक पदाधिकारी है। भीड़ ने इस टीम के सदस्यों पर अपने सूत्रों की जानकारी देने और समाचार देने के दौरान लिये गये फोटो और वीडियो फुटेज डिलीट करने के लिये दबाव भी डाला।

द नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया को पता चला है कि एक पत्रकार शाहिद तांत्रे को उनकी मुस्लिम पहचान के चलते निशाना बनाया गया और उन्हें किसी तरह से हिंसक भीड़ से बचाना पड़ा। दूसरे पत्रकार प्रभजीत सिंह ने अपने शिकायती पत्र में कहा है कि यदि वह नहीं होते तो ‘‘एक भगवाधारी की अगुवाई वाली भीड़ ने शाहिद को उनकी मुस्लिम पहचान के चलते मार ही डाला होता।’’ इस ख़ौफ़नाक़ और निन्दनीय हमले में तीसरी पत्रकार पर शारीरिक हमला और यौन उत्पीड़न भी किया गया। जब भीड़ ने उनपर हमला किया तो वह किसी तरह अपने को छुड़ाकर पास की गली में भाग गयीं। भीड़ ने उन्हें घेर लिया और बिना पूछे उनकी फोटो लेने लगी, वीडियो बनाने लगी और गालियाँ बकने लगी। उसी भीड़ में से एक आदमी अपना शिश्न निकालकर उसे उनके सामने हिलाने लगा और कामुक इशारे करने लगा। जब वह महिला पत्रकार पुलिस थाने की ओर भागने का प्रयास करने लगीं तो भीड़ ने एक बार फिर उनपर हमला किया। हमलावरों ने उनके सिर, हाथों, कूल्हों और छाती पर वार किये।

इसके बाद किसी तरह से स्थानीय पुलिस उन पत्रकारों को भजनपुरा थाने ले आयी। पत्रकारों ने लिखित शिकायत की पर भजनपुरा पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की।

इन तीन पत्रकारों पर हुये हमलों ने एक बार फिर भारत में पत्रकारों की सुरक्षा के मुद्दे पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं। बावजूद इसके कि संविधान में प्रेस की आजादी को भाषा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तौर पर मान्यता प्राप्त है, भारत में पत्रकारों पर लगातार शारीरिक हमले जारी हैं। राइट्स एण्ड रिस्क एनालिसिस ग्रुप द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च एवं मई के बीच अपना काम करने के एवज़ में 55 पत्रकारों को निशाने पर लिया गया है।

आक्रामक भीड़ द्वारा धर्म एवं लिंग के आधार पर पत्रकारों को निशाना बनाये जाने के उदाहरण हालिया फरवरी की दिल्ली-हिंसा के दौरान भी दिखायी दिये थे। यह भारतीय मीडिया और देश के लोकतांत्रिक चरित्र के लिये गहन और गम्भीर ख़तरा है। इस तथ्य से कि ऐसी घटनायें लगातार जारी हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं प्रेस की आजादी के लिये उपयुक्त माहौल पैदा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी का ही प्रदर्शन होता है।

यह घटना यह भी प्रदर्शित करती है कि राजनीतिक समूहों को अभयदान प्राप्त है। ये शारीरिक हमलावर सेल्फ-सेंसरशिप को प्रोत्साहित करने की जारी प्रवृत्ति का ही हिस्सा हैं, क्योंकि इससे तथ्यों की खोज करने, घटनास्थल से समाचार देने और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से पत्रकारों को विरत किया जा सकता है।

द नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया ने मांग की है कि दिल्ली पुलिस तुरंत शारीरिक हमलों और यौन उत्पीड़न की समस्त संगत धाराओं में एक प्राथमिकी दर्ज करे, घटना की विश्वसनीय जाँच हो और हमलावर भीड़ के खिलाफ़ तुरंत कार्यवाही हो।

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