समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

निर्यात-अर्थव्यवस्था के ढाँचे में हाशिये पर उत्तर-पूर्व

( शोधकर्ता सैंगमुआन हैंगसिंग का यह लेख  ‘ द हिन्दू ’ में 26 सितंबर को प्रकाशित हुआ है। लेखक कौटिल्य स्कूल ऑफ  पब्लिक पाॅलिसी के पुरा-छात्र रहे हैं। समकालीन जनमत के लिए इस लेख का अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है )

जब अगस्त 2025 में व्यापार-घाटे और रूसी तेल-खरीद के नाम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात किये जा रहे सामानों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ थोपने के आदेश पर दस्तखत किये तो यह उम्मीद की जा रही थी कि नई दिल्ली उनके इस कदम का माकूल जवाब देगी। पर नई दिल्ली की प्रतिक्रिया एकदम ठंडी ही रही- नपी-तुली भाषा, बन्द दरवाजों के पीछे की कूटनीति और साफ-साफ कुछ भी नहीं। हम इसके अभ्यस्त भी हैं, वाशिंगटन का वार और शाॅक-एब्जाॅर्बर जैसी हमारी सहनशीलता।

आधिकारिक बयानों में इसे हमारे लरजते द्विपक्षीय-विक्षोभ की ही अगली कड़ी बताया गया। लेकिन टैरिफ की यह मार केवल दो देशों की आपसी रजिश का संकेत नहीं है, बल्कि इसका गहरा असर हमारे पूरे देश पर भी पड़ने जा रहा है। इससे केवल व्यापार असंतुलन ही नहीं जाहिर होता बल्कि यह और अधिक बड़े दायरे के असन्तुलन को भी उजागर करता है जिसकी नई दिल्ली एक लम्बे अर्से से अनदेखी करती आ रही है।

उत्तर-पूर्व के सात राज्यों- असम, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश को मिलाकर परम्परागत से ‘सेविन सिस्टर्स’ कहा जाता रहा है। 16 मई 1976 को सिक्किम के भारतीय-संघ में विलय के पश्चात अब इन्हें ‘आठ बहनें’ कहा जा सकता है।

भारत की निर्यात-अर्थव्यवस्था बुरी तरह केन्द्रित है। समस्त निर्यात का 70 प्रतिशत हिस्सा केवल चार राज्यों- गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक से आता है। इसमें भी अकेले गुजरात का हिस्सा 33 प्रतिशत है। निर्यात का यह संकेन्द्रण कोई इत्तिफाक नहीं है। इस भूभाग को दशकों से अधिसंरचना, प्रोत्साहन और सतत राजनीतिक-संरक्षण मिलता रहा है। जबकि भारत की सर्वाधिक आबादी वाले राज्य- उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य-प्रदेश केवल 5 प्रतिशत हिस्से के साथ हाशिये पर हैं।

और उत्तर-पूर्व कहाँ है ?

हमारी निर्यात-अर्थव्यवस्था के ढाँचे में उत्तर-पूर्व तो हाशियों के भी हाशिये पर है। 5400 किमी से अधिक की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा वाले आठ राज्यो का निर्यात में कुल हिस्सा केवल 0.13 प्रतिशत है। विदेशी बाजारों में पैठ पाने के लिये कोई सक्रिय ट्रेड-काॅरीडोर नहीं है और न ही माल-ढुलाई की नीति-निर्धारण के लिये कोई आधारभूत ढाँचा है। बजाय इसके, है क्या- घुसपैठ रोकने और निगरानी रखने के लिये एक खास तौर पर बनाया गया सुरक्षा-तंत्र। इस हिस्से में व्यापार किसी जनादेश में था ही नहीं।

भारत के आर्थिक भविष्य को आकार देनेवाली संस्थाओ में उत्तर-पूर्व का प्रतिनिधित्व शून्य रहा है। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद का कोई सदस्य उत्तर-पूर्व से नहीं है। भारत की निर्यात-रणनीति तय करने के लिये अधिकृत व्यापार परिषद में असरदार ढंग से मिजोरम, त्रिपुरा या अरुणाचल प्रदेश की आवाज उठानेवाला कोई नहीं है।

निर्यात किये जाने वाले सामानों पर लगनेवाले करों और ड्यूटी में छूट दिये जाने की योजना- रेमिशन ऑफ  ड्यूटीज़ एंड टैक्सेज़ ऑन एक्सपोर्ट गुड्स (आरओडीटीईपी) और उत्पाद-सम्बद्ध प्रोत्साहन या प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (पीएलआई) जैसी योजनायें गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक की औद्योगिक पट्टी में पूरे ताम-झाम के साथ शुरू की जाती हैं। परन्तु उत्तर-पूर्व को बिना किसी ढांँचागत संरचना, बिना किसी यातायात की सुविधा या बिना किसी सांस्थानिक समर्थन के दुनिया के बाजार में डूबने-उतराने के लिये लावारिस छोड़ दिया जाता है।

यह सिर्फ नौकरशाही द्वारा की जा रही अनदेखी नहीं है। यह पूरी तरह से सोची समझी चाल है कि सामने से ऐसा लगे कि इस क्षेत्र को गले लगाया जा रहा है पर आर्थिक रूप से उसे अनाथ छोड़ दिया जाय। सबसे ताजा उदाहरण है विदेश व्यापार के महानिदेशक द्वारा 2024 की निर्यात-रणनीति पर जारी की गयी 87 पन्नों की रिपोर्ट जिसमें उत्तर-पूर्वी काॅरीडोर को लेकर एक भी पन्ना नहीं है। इस चूक पर कोई विरोध दर्ज नहीं किया गया। बस, इसे ज्यों का त्यों मान लिया गया।

असम में चाय का अर्थशास्त्र छीज रहा है। दाम स्थिर हो गये हैं, मजदूरों की कमी है, बागान की हालत खराब है। अमेरिकी बाजार में टैरिफ में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी मुनाफे पर करारा प्रहार है, इतने कम मुनाफे के चलते इस उद्योग पर अस्तित्व का संकट आ गया है। डिब्रूगढ़ में 500 से अधिक कर्मचारियों के एक मेठ का कहना है कि, ‘‘ हम बड़े असमंजस में हैं। यदि अमेरिकी और यूरोपीय-संघ के क्रेता अपनी माँग घटा देंगे तो हमें तुरंत अपना काम समेटना पड़ जायेगा।’’

भारत के समस्त चाय उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है, परन्तु यहाँ पर न तो कोई स्तरीय पैकिंग होती है और न ही ब्रांडिंग। अधिकांश उत्पाद सीटीसी (क्रश, टियर एंड कर्ल यानी खुली चाय) ग्रेड का होता है, इसकी बिक्री नीलामी के जरिये होती है और बाजार के हर उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती है। खरीददार भाव-ताव करने लगे हैं और ऊपरी असम और डुआर्स क्षेत्र में दाम घटने लगे हैं। मजदूरी स्थिर हो गयी है, निवेश घटने लगा है। आगे अब रोजगार पर खतरा मँडरा रहा है।

नुमालीगढ़ में रिफाइनरी-उद्योग असम का तंत्रिका तंत्र है। इस रिफाइनरी के लिये कच्चा तेल आज भी आस-पास के ऑयल इंडिया और भारतीय तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के क्षेत्रों से आता है, पर यह स्थिति अब बदल रही है। इसकी वार्षिक क्षमता 30 लाख मैट्रिक टन से बढ़ा कर 90 लाख मैट्रिक टन कर दिया जाना प्रस्तावित है तो इसके लिये उसे बाहर पैरादीप बंदरगाह और कम दर पर तेल मुहैया करानेवाले रूसी जहाजों का रुख करना पड़ेगा।

और सारा खतरा यहीं पनप रहा है। वाशिंगटन का टैरिफ-खेल का कुछ कारण तो भारत-रूस सम्बन्ध ही है जिसकी छाया यहाँ घनीभूत हो रही है। यदि अमेरिकी पाबंदियों का अगला दौर कुछ और कठोर हो जाय या रूसी जहाजों का आवागमन किसी प्रकार प्रभावित हो जाय तो इसका असर मुम्बई की अर्थव्यवस्था पर तो कुछ खास नहीं पड़ेगा परन्तु यह गोलाघाट के रोंगटे खड़े कर देगा।

म्याँमार और आसियान मुल्कों के साथ ख़ामोश सरहदें

म्याँमार की राजधानी नेपीडाॅ में 2021 के तख्तापलट के बाद से ही भारत-म्याँमार सीमांत का व्यापार बहुत घट गया है। जिन हाइवेज़ को किसी समय क्षेत्रीय-संलयन की धमनी माना गया था अब वही चेकप्वाइंट, चोकप्वाइंट और नौकरशाही के धुँधलकों में गुम हो गयी हैं। वही सीमाये जो किसी समय आपसी लेन-देन की खुली खिड़कियों से गुलज़ार रहती थीं, आज खामोशी की सख्त चादर लपेटे पड़ी हैं।

म्याँमार की ओर खुलनेवाले दो खास दरवाजे़- मिजोरम में जोखावथर और मणिपुर में मोरेह- अब सीमा-चैकी के कंकाल में तब्दील हो गये हैं। किसी समय ‘ एक्ट ईस्ट’ के सपने का केन्द्रविन्दु रहे ये दरवाजे़ जिन्हें ट्रेड हब्स होना था वे अब सुरक्षा-जाँच चौकी के नाम पर गले की फाँस बन कर रह गये हैं। आधार-भूत ढाँचा बस नाम का रह गया है- सड़कें सिर्फ कागजों पर हैं, कस्टम दफ्तर में कर्मचारी नाम-मात्र को हैं और कोल्ड-चेन सुविधा कहीं है ही नहीं। आपसी रिश्तों की ताबूत में आखिरी कील बना 2024 का स्वतंत्र आवागमन निरोधक आदेश जिसने न केवल व्यापार का सत्यानाश किया वरन आपसी भाईचारा, रोजमर्रा की जिन्दगी और पहाड़ों की एक-दूसरे में गहरे-गुँथी अर्थव्यवस्था का भी बंटाधार कर दिया।

व्यापार की जगह निगरानी ने ले ली। ट्रेड काॅरीडोर खत्म हो गया और बाजार की माॅग को नज़रअंदाज़ करते हुये घुसपैठ रोकने के नाम पर कंटेनमेंट ग्रिड बन गये। इन जगहों से सामान नहीं आ-जा सकते पर सेनायें आ-जा सकती हैं। और जब आधारभूत ढाँचा क्षीण होता है तो इन शहरों की आर्थिक प्रासंगिकता भी दरकने लगती है और ऐसी सामरिक रिक्तता उत्पन्न हो जाती है जिसका उद्देश्य सम्बद्धता नहीं बल्कि केवल नियंत्रण होता है। खुली सीमायें भी व्यावहारिक रूप से बन्द ही प्रतीत होती हैं।

किसी जमाने में उत्तर-पूर्व को सामरिक महत्व के क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, वह आसियान देशों से भारत को जोड़ने के लिये एक पुल का काम करता था, एक ऐसा पुल जो कभी भी अप्रासंगिक नहीं रहा। नीतिगत मामलों में आजकल व्यापार में लचीलेपन का मतलब होता है एक उत्पाद विशेष से दूसरे उत्पाद पर चले जाना जैसे इलेक्ट्राॅनिक्स की जगह सेमीकन्डक्टर, वस्त्र-उद्योग की जगह दवा-उद्योग पर विचलन आदि।

भूगोल कोई समीकरण का हिस्सा नहीं है। मान्यताएं सुनिश्चित हैं- व्यापार हमेशा उसी मार्ग से होता है जो औपनिवेशिक काल में था और आजादी के बाद भी आद्योगिक-समूहों ने जिसका अनुसरण किया था। उत्तर-पूर्व इस ढाँचे से हमेशा बाहर ही रहा, यह अनदेखापन नहीं था बल्कि सोच-समझ कर ही ऐसा किया गया था।

भारत सम्पूर्ण विश्व के साथ व्यापारिक-वार्तायें कर रहा है परन्तु उत्तर -पूर्व जैसी अपनी भौगोलिक अर्थव्यवस्था को नज़रअंदाज कर रहा है, जबकि वही ससंजक-अर्थव्यवस्था को आधार प्रदान कर सकता है।

गतिशील एशिया, गतिहीन भारत

एक ओर चीन ढाँचागत निवेश, सैन्य-संधियों और लगातार प्रबल होते सूचना-तंत्र के माध्यम से उत्तरी म्याँमार पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर भारत अपना पक्ष बहुत तेजी से कमजोर करता जा रहा है। भारत-म्याँमार-थाईलैंड त्रिपाश्र्वीय राजमार्ग मोरेह से शुरू तो होता है पर पता नहीं किस जंगल में जा कर खत्म हो जाता है। भारत की सीमांत नीति व्यापार से नहीं, निगरानी से परिभाषित होती है। जिस स्थान से सामान नहीं गुजर सकते वहाँ से सेनायें गुजर सकती हैं। और जब आवागमन संकुचित होकर सिर्फ गश्त रह जाती है तो सीमावर्ती क्षेत्र भी स्थिर नहीं रह पाते, वे अव्यवस्था के गर्त में चले जाते हैं।

जरूरत कुछ नया करने की नहीं है, बल्कि सिर्फ इतनी है कि राज्य को अपना मूल कार्य करने दिया जाय। व्यापार सड़कों पर होता है, जुमलों पर नहीं। इसके रास्ते गोदामों से होकर गुजरते हैं, श्वेत-पत्रों से नहीं। उत्तर -पूर्व में यही धमनी गायब है। आधारभूत ढाँचा छितराया हुआ है, नीतिगत उपस्थिति भी क्षीण है।

नई दिल्ली चाहे लंदन के साथ स्वतंत्र-व्यापार सौदे करे या वाशिंगटन में साझा-बयान जारी करे पर उनके नतीजे सिलीगुड़ी काॅरीडोर से आगे नहीं बढ़ पाते। उनके संकल्प एवं क्रियान्वन दोनों से उत्तर-पूर्व अछूता ही रहता है। वैश्विक व्यापार के लिये भारत प्रभावी ढंग से सौदेबाजी तो करता है पर जो भू-भाग उसे धरातल से सम्बद्ध कर सकते हैं उनकी अनदेखी ही होती है।

ट्रम्प द्वारा लगायी गयी टैरिफ को कोस कर भारत एक और बड़ी संरचनागत भूल कर रहा है- उसकी व्यापार-अर्थव्यवस्था का क्षरण आसमान छू रहा है। पूरे देश के व्यापार प्रवाह को रोक देने के लिये केवल गुजरात की एक बाढ़ या तमिलनाडु की एक मजदूर हड़़ताल ही काफी है। यह बिखराव नहीं है, यह निर्भरता है।

वैश्विक बिसात पलट चुकी है। आपूर्ति-श्रृंखलाऐं (सप्लाई चेन्स) गतिशील हैं। चीन अपने पूँजीनिवेश का आयाम बदल रहा है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश वैकल्पिक काॅरीडोर का निर्माण कर रहे हैं।  इंडो-पैसिफिक समीकरण में भारत अपनी भूमिका होने का दावा तो करता है परन्तु इसकी निर्यात-संरचना कुछ छिटपुट तटवर्ती देशों तक सीमित है। यदि वाणिज्य मानचित्र से पूर्वी-सीमांत ही नदारद है तो व्यापारिक-रणनीति की बात एकदम खोखली है।

यदि किसी राज्य का पूर्वी किनारा आर्थिक रूप से भंगुर है तो वह अपनी क्षेत्रीय महत्ता का दावा नहीं कर सकता। उत्तर-पूर्व को कभी नारों की चाह नहीं रही। उसे राज्य की आधारभूत संरचना के न्यूनतम मानकों की जरूरत हैः ऐसी सड़कों की जिनकी पहुँच बाजारों तक हो, ऐसी नीतियों की जो स्थानीय भूगोल के अनुरूप हों और ऐसी शासन-प्रणाली की जो चुनावी गुणा-गणित से आगे बढ़कर कुछ हो। यह क्षेत्र दशकों से बगावत, युद्धविराम और नीतिगत खोखले-शब्दजाल की आड़ में विकास की बाट जोह रहा है। लेकिन दुनिया आगे बढ़ रही है। व्यापार में अवरोध रोजमर्रा की बात हो गयी है। काॅरीडोर बार-बार पैंतरे बदल रहे हैं। और अब तो टाल-मटोल ही नियम बन गया है।

कोई एक टैरिफ भारत को नहीं तोड़ सकती पर बार-बार आनेवाले क्षेत्रीय व्यवधान ससंजक-अर्थव्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। यह बदले की कार्रचाई करने का आह्वान नहीं है। यह नीतियों में लचीलापन लाने की गुहार है, शक्तियों के केन्द्रीकरण की नहीं वरन देश के हर हिस्से से आनेवाले दबावों को आत्मसात करने के पक्ष में। जबतक ऐसा नहीं होगा तबतक ये अन्धविन्दु जीवित रहेंगे ही।

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