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नीलकांत: एक औघड़ लेखक

(हिन्दी के चर्चित साहित्यकार, मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्री नीलकांत का 14 जून 2025 को दिल्ली के रोहिणी स्थित एक अस्पताल  में निधन हो गया। वे इलाहाबाद में रहते थे। जन संस्कृति मंच की इलाहाबाद इकाई  ‘लेखक के घर चलो’ अभियान के अंतर्गत 28 दिसम्बर 2024 को नीलकांत के घर  पर पहुंची थी और उनसे बातचीत का आयोजन किया था। इसकी रपट समकालीन जनमत प्रिंट संस्करण में छपी थी। समकालीन जनमत पोर्टल के साथियों के लिए इस रपट के साथ नीलकांत को जन संस्कृति मंच और समकालीन जनमत की तरफ से श्रद्धांजलि।)

जन संस्कृति मंच, इलाहाबाद इकाई ने ‘लेखक के घर चलो’ अभियान के तहत नीलकांत के घर पहुंच कर उनके साथ मूल्यवान समय बिताया।

नीलकांत का घर झूंसी के देवनगर में सिक्स लेन पर स्थित है। यह इलाहाबाद शहर से करीब आठ-दस किमी. दूर पड़ता है।

28 दिसम्बर 2024 को यह आयोजन रखा गया। उस दिन भोर से ही बारिश होने लगी थी।पूस का महीना और उसमें हुई बारिश ने ठण्ड बढ़ा दिया था। इसके बावजूद जसम के साथी नीलकांत के यहाँ पहुंचने लगे। नीलकांत अपने घर पर अकेले रहते हैं। एक युवक  सुबह-शाम उनकी देखभाल करता है। इनका नाम विजय है। विजय ने अलाव जला दिया था। इसके बाद लेखक के साथ बैठकी और बातचीत शुरू हुई।

नीलकांत ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए किया। इसके बाद प्रोफेसर एस.एस. नरवणे के निर्देशन में पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र पर शोध में नामांकित हुए। लेकिन, नीलकांत ने शोध पूरा नहीं किया।

इसी बीच नीलकांत अपने गाँव के पास रतनूपुर स्थित जनता इण्टर काॅलेज में अध्यापक नियुक्त हुए। यह काॅलेज नीलकांत के चाचा फौजदार सिंह के प्रयासों से 1949 ई. में खुला था। फौजदार सिंह इस काॅलेज के प्रबन्धक थे। लेकिन नीलकांत को एक वर्ष बाद ही काॅलेज से निष्कासित कर दिया गया।

इसी सन्दर्भ में दुर्गा सिंह ने प्रश्न किया कि आपने अपने ही परिवार की जमीन पर मुसहरों को कैसे कब्जा दिलवाया और  ऐसी कौन सी वजह थी, कि अपने ही घर के काॅलेज से आपको निष्कासित कर दिया गया?

नीलकांत जी ने बताया, कि उनके मझले चाचा जो थे, फौजदार सिंह, उस क्षेत्र के सबसे प्रभावी व्यक्ति थे। कई साल तक गाँव के निर्विरोध प्रधान रहे। काॅलेज खुलवाया। उसके प्रबंधक थे।  उनकी दिनचर्या थी, कि प्रतिदिन वे टिकुलिया पीपल के नीचे अपनी चारपाई लगवाते और दोपहर ढलने तक सोते। फिर कोई जाकर कहता कि दादा दोपहर ढल गयी है, फिर वे वहाँ से आते। टिकुलिया पीपल तक जाने के रास्ते में ताल पड़ता था। लगभग पचास बीघे का अपना चक था। घर से निकलने के बाद बावली थी। उसके बाद एक बाहा पड़ता था। बाहा समझते हैं न, बड़ा नाला। उसमें पानी बहता रहता था। वहां पहुंच कर हमारे चाचा जोर की आवाज लगाते, होऽऽऽ। चार-पांच मुसहर आते और उन्हें कन्हइयां  लादकर बाहे के उस  पार डका देते थे। सामने टिकुलिया  पीपल पड़ता था। टिकुलिया भूत था, प्रेत था। यह भुतहा पीपल कहा जाता था। उसमें लोग चिथड़े टांगते थे।

रामजी राय बीच में बोले,  कि हाँ बर-पीपर दोनों पर लोग यही धन्धा करते थे। इस पर नीलकांत ने कहा कि अब भी लोग यही करते हैं, आगे भी यही धन्धा  करते रहेंगे वे लोग, देखियेगा!

फिर नीलकांत ने बताया कि लौटते समय चाचा ताल में  करेम होता था। चार-पांच किलो लाते थे। उसकी जूड़ी  बनवाते थे। जूड़ी समझते हैं न, पकौड़ी। सब लोगको खाते थे। वह पकौड़ी अब कहाँ मिलेगी! शहर में नहीं मिलेगी। इलाहाबाद में  यह पकौड़ी बनाते थे कभी,  एक हकीमुल्ला चाचा थे कर्नलगंज में, पीपुल्स बुक हाउस के सामने गोरू-चौवा पाले हुए थे। वे भी करेम की पकौड़ी  बनाते थे।

इसके बाद नीलकांत विषयांतर कर देते हैं। जैसे स्मृतियाँ आपस में उलझ गयीं हों। वे बोलते रहे, सब सुनते रहे। खाने-पीने की चीजें अजीब हैं हम लोगों की। चिड़ियों और जानवरों की तरह। जमीन पर खाइये, आकाश पर खाइये। जहां धरती और आसमान मिलते हैं, वहाँ जाकर खाइये। क्षितिज उसको बोलते हैं, जहां एक नन्हीं सी  तरई उगी होती है।  आपको उसके पास नहीं जाना है, वह खुद चलकर आपके पास आती है, फिर वह एक औरत में बदल जाती है, और उछलकर आसमान में वह औरत चली जाती है। ऐसी चीजें मैं देखता हूँ कभी-कभी। रामजी भाई कुछ चीजें मेरे साथ ऐसी होती हैं, जो मुझे असहज करती हैं। असामान्यता पैदा करती हैं।

जैसे मैं बताऊँ कि जब मैं अकेले होता हूँ, चार-पांच झबरीले छोटे-छोटे जानवर मेरे पैरों से लिपट जाते हैं, और मेरे कंधे पर चढ़ते हैं। कंधे पर पहुंच कर वे बन्दर बन जाते है। यह सब होता रहता है। जब कोई आ जाता है, तब मेरी जान बचती है।

फिर वे श्याम सूरत उपाध्याय, जो एमएलए थे, दीक्षित प्रेस, और शंकरगढ़ के दलबहादुर सिंह के बारे में बताने लगे। फिर वे गायों के भैंस से ज्यादा समझदार होने का प्रसंग सुनाने लगे-

श्याम सूरत के घर से मैं निकला, तो सामने दीक्षित प्रेस की तरफ से गायों का झुंड आ रहा था। एक छोटा लड़का आंख मींचते उन गायों के सामने आ गया। एकदम से किंकर्तव्यविमूढ़।

अच्छा, रामजी भाई, किंकर्तव्यविमूढ़ का पर्यायवाची क्या उल्लू नहीं होगा! रामजी राय ने कहा, नहीं। नीलकांत हँसते हुए बोले होगा यार! अरे उल्लू बेकार होता है, और किंकर्तव्यविमूढ़ भी बेकार होता है। रामजी राय बोले कि किसी औचक घटना पर कुछ सोच-समझ न पाना। नीलकांत ने कहा, कि ट्रांसफाॅर्मेशन जो होता है, काफ्का का उपन्यास है न! रामजी राय ने बताया, मेटामार्फोसिस। उसमें क्लर्क  तिलचट्टे में बदल जाता है। लेकिन आपकी कहानी में तिलचट्टे आदमी में बदल जाते हैं। रामजी राय ने आगे जोड़ा।

नीलकांत ने कहा, कि नहीं उतनी पावर नहीं है मेरे पास। रामजी राय बोले, कि आप मेटाफर ही बदल देते हैं। जैसे अजगर और बूढ़ा बढ़ई। फिर नीलकांत फैंटेसी पर आ गये। बोले, कि फैंटेसी और यथार्थवाद में बहुत करीब का सम्बन्ध होता है। गहरा सम्बन्ध होता है। बिना यथार्थ के वर्णन के आप फैंटेसी नहीं रच सकते। जो वर्णन किया है, काफ्का ने वह बहुत सरल शब्दों में है। लेकिन यथार्थ भाषा में है। इसीलिए सरल है। इसको कहते हैं अन्योक्ति पद्धति।

फिर दुर्गा सिंह ने नीलकांत की कहानी ‘मटखन्ना’ का ज़िक्र किया, जिस पर नीलकांत ने कहा, कि हाँ, हमारे यहाँ भी ट्रांसफाॅर्मेशन है, अच्छा याद दिलाया दुर्गा। फिर रामजी राय ने कहा, कि वहाँ क्लर्क तिलचट्टे में बदलता है, आपके यहाँ गधा प्रतिवाद में बदल जाता है। फिर शिवानी ने बताया कि नीलकांत ने लिखा है, कि वह जानवर नहीं है। फिर शिवानी छूटी हुई बात पर आती है, कि आपने जो घर में विद्रोह किया, उसके बारे में बताइये नीतू उन्हें याद दिलाती हैं कि आपने बात बदल दी। आपने अपने चाचा का पुतला दहन करवाया, आन्दोलन करवाया, वह बताइये।

फिर नीलकांत विषय पर आये। उन्होंने बताना शुरू किया। उस समय राशन कोटे से मिलता था। उसके लिए राशन कार्ड होता था। हमारे चाचा प्रधान थे। वे कोटेदार से मिलकर सारा राशन  बेच देते थे। जब कोई गरीब-गुरबा जाता तो कोटेदार भगा देता। मैंने राशन कार्ड के लिए छल से काम लिया। राशन कार्ड के लिए केराकत तहसील चलने के लिए जगह-जगह गाँव में पोस्टर लगाया। यह अकेले नहीं किया। एक मेरे अजीज मित्र थे श्री बिरजू महराज, वे भी साथ थे। पोस्टर में था, कि राशन कार्ड केराकत तहसील पर मिलेगा। कहा, लेकिन कोई बतायेगा नहीं कि किसलिए जा रहे हैं। अगले दिन गाँव से बाहर नहर पर एक औरत दिखी। वह  नहर सीधे जाती है केराकत। एक सूप-दलिद्दर खेदा जाता है दिवाली पर, आप लोग जानते हैं? जवाब में सबने कहा, हाँ। तो वह गाँव के बाहर छोड़ा जाता है, सूप दलिद्दर।  उस औरत ने एक सूप पाया और उसे बजाया और कुछ ही देर में सैकड़ों औरतें इकट्ठा हो गयीं। हमारे चाचा को शक हो गया। उनके मातहत जो जमींदार थे, उन्होंने उनको लगा दिया। उन जमींदारों के आदमी ऊंट पर बैठकर बगल में चलने लगे और अपने डंडे से कोंचकर पूछते कि कहाँ जा रहे हो, क्या करने जा रहे हो? लेकिन, किसी ने बताया नहीं और लोग केराकत पहुँच गये।

तहसीलदार थे एक पाठक करके। मेरे चाचा के तहसील स्तर के सारे अधिकारियों से सम्बन्ध थे। चाचा ने एक गाय पाठक को दी हुई थी। उसकी बछिया बड़ी हो गयी थी। तो मैं जब माइक से पाठक बाहर आओ का नारा लगा रहा था, तो वह बछिया उस आवाज को पहचान ली। मैं उसके पास गया, तो वह अपनी गर्दन  मेरे कंधे पर रख दी। पाठक ने देखा। उसने नायब तहसीलदार से कहा, कि गाँव में जाकर सबका राशन कार्ड बनाओ। और कार्ड न हो, तो सादे कागज पर मुहर मारकर दो, वही राशनकार्ड माना जायेगा। इस तरह लोगों को राशनकार्ड मिला।

फिर नीतू ने पूछा, कि आपने अपने चाचा का पुतला दहन क्यों करवाया, शिवानी ने पूछा, कि अपनी जमीन पर जो कब्जा दिलवाया, उसके बारे में बताइये। केके ने भी पूछा, कि जमीन का क्या मसला था?

नीलकांत ने फिर बताना आरंभ किया। गाँव के बाहर मुसहर हमारी जमीन पर बसाये गये थे। लेकिन चाचा जब मन होता उन्हें बसाते, जब मन करे, हटा देते। उनके लिए आवासीय पट्टा हो, यह उन मुसहरों से मैंने कहा। चाचा प्रभावशील व्यक्ति थे। वे भगा दिये। इसी में वह पुतला दहन हुआ। फिर उस जमीन पर मुसहरों से मैंने आग लगवा दी। मेरे चाचा को जब यह लगने लगता, कि किसी काम से उनकी बेइज्जती  हो रही है, या उन पर कोई दोष आयेगा, या उनकी सुनी नहीं जायेगी, वे चुपचाप हट जाते वहाँ से। मुसहरों को फिर आवासीय पट्टा मिल गया। आज उस मुसहर बस्ती से कई अध्यापक, डाक्टर, वकील हैं।

फिर नीलकांत के सामने  सवाल आया, ढैया-सेर की अर्थी निकालने का। रामजी राय ने बताया कि उसे बन्धइया प्रथा बोलते थे। नीलकांत ने बताया, कि जो जमींदार होते थे, वे मजदूरी के लिए ढैया और सेर का इश्तेमाल करते। आधा किलो या पौन किलो को पांच किलो बताते। उससे मजदूरी कम दी जाती थी। तो ढैया-सेर की टिक्थी या अर्थी निकली। फिर वह प्रथा बन्द हो गयी।

शिवानी ने पूछा कि आप अपने ही परिवार के खिलाफ, चाचा के खिलाफ यह सब कर रहे थे। दुर्गा सिंह ने पूछा, कि क्या वहाँ लोग इस बात से वाकिफ थे, कि आप कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हैं। नीलकांत ने कहा, कि जी, हाँ। फिर उन्होंने दो प्रसंग सुनाये।

उन्होंने बताया, कि मैं नहर की पुलिया पर बैठा था, तो एक सरजू मास्टर थे सोहनी के। वे आ रहे थे। दूसरी तरफ से गाँव के ही बुझारत सिंह आ रहे थे। बुझारत सिंह ने सरजू  मास्टर से कुछ बात की और आगे बढ़ गये। मैंने सरजू  मास्टर से पूछा, कि क्या बात कर रहे थे बुझारत सिंह। वे बोले कि बइठल हउवन, इनसे पूछा कि इनहूं त रहलन उहां, रोकलन नाहीं, ढइया सेर जलावल जात रहल त! मैंने कहा, कि हाँ रहली तौ, उन्होंने कहा, कि त रोकला ना, बाप-दादा क बनावल चीज। मैं बोला,  कि ठीक त कइलन, ओम्मन बेजांय का रहल। ‘बाप-दादा क बनावल चीज’, तो जिबह कर देंगे, काट देंगे।  तो मास्टर साहब बोले, तू पक्का हो गयल हउवा!

फिर दूसरा वाकया उन्होंने सुनाया, कि एक बार प्रधानी का चुनाव था। चाचा ने मीटिंग बुलायी थी। मैं भी जाकर जमीन पर बैठ गया। जैसे ही मैं बैठा, चाचा उठे और बोले कि अब हमारा काम यहाँ नहीं है, चलते हैं और चले गये।

फिर नीलकांत ने काॅलेज से निकाले जाने के बारे में बताया। जनता इण्टर काॅलेज के प्रिंसिपल थे बैजनाथ सिंह, कैथौलिया, दोहरीघाट के। बड़ी घनिष्ठता थी, हमारे चाचा और प्रिंसिपल में। तो, चाचा ने कहा, कि इसको निकालो, काफी आगे बढ़ चुका है। फिर हमको निकाल दिया गया।

नीतू ने पूछा, कि आप रिक्शे वाले को रिक्शे पर बैठाकर खुद चलाते थे। नीलकांत हँसने लगे और बोले कि वह कहता, कि राउर केतना दूर बा। मैं कहता, बस अइले हौ।

इसके बाद नीलकांत जी के सम्पादन पर बातचीत हुई। जिसमें ‘हाथ’, ‘कलम’ की चर्चा हुई। राहुल सांकृत्यायन पर सम्पादित पुस्तक पर बातचीत हुई। जिसका लोकार्पण इलाहाबाद विश्वविद्यालय के यूनियन हाॅल में हुआ। फिर रामचंद्र शुक्ल पर लिखी किताब पर बातचीत होने लगी।

इस पर नीलकांत ने बताया, कि रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजन हुआ, जिसके लिए एक लेख लिखा, रामचंद्र शुक्ल की भूतनाथी आलोचना।  उस समय शिव कुमार मिश्र जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष थे। उन्होंने तीन पन्ने का पत्र लिखा, कि यह लेख पढ़ा नहीं जायेगा। मुझे रोक दिया गया वह लेख पढ़ने से। हम लोगों ने उस लेख का फोटोस्टेट कराकर बांट दिया छात्रों में। बहुत हंगामा हुआ।

रामजी राय ने बताया, कि उस समय यह घटना बहुत चर्चित हुई। और उस लेख का महत्व यह है, कि उसने रामचंद्र शुक्ल पर सोचने, समझने को बदल दिया। विवाद जो लोग करें,  लेकिन उसका यह महत्व तो रहा।

नीलकांत ने बताया कि नामवर सिंह ने पत्र लिखा। इस पर रामजी राय ने कहा, कि वे तो हजारी प्रसाद द्विवेदी वाले हैं तो खुश होंगे ही, लेकिन वह खुश होना भी गलत कारणों से नहीं है। वह लेख जो बात उठाता है, जिस कोण से उठाता है, वह तो महत्वपूर्ण है, यह है कि उसकी मार तगड़ी है।

दुर्गा सिंह ने कहा, कि भाषा का जो मनोविज्ञान है, समाजशास्त्र है, सौन्दर्यशास्त्र है, उससे जो पकड़ते हैं, वह तो सही है।

रामजी राय ने कहा, कि वह ठीक है, लेकिन एक बात मुझे लगती है, कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अंत में आकर छूटता हुआ लगता है। जैसे हेगेल भाववादी था। इस पर मार्क्स कहते हैं, कि ऑब्जेक्टिव आइडियलिज्म है। वह व्यक्तिनिष्ठ नहीं है, वस्तुनिष्ठ है। मेरा आपसे एक सवाल है, कि क्या आप कभी इस पर सोचे कि रामचंद्र शुक्ल भाववादी हैं, लेकिन वस्तुनिष्ठ हैं। वह दूसरे व्यक्तिनिष्ठों की तरह नहीं हैं। यह आपके दिमाग में नहीं आया।

इस पर नीलकांत ने कहा, कि आया। उस समय आया, जब मैंने हेगेल को पढ़ा। हेगेल भी ऑब्जेक्टिव है, वस्तुपरक है, क्योंकि आइडिया को बाहर देखता है, अन्दर नहीं देखता। जो अंदर देखेगा, वह आत्मनिष्ठ होगा।

फिर अनुवाद पर बात होने लगी। नीलकांत ने कहा, कि अनुवाद वह अच्छा है, जिसमें मूल भाषा की लय, उसका रिदम अनूदित भाषा में आ जाय। रामजी राय ने कहा, कि अनुवाद वह अच्छा है जो मौलिक लगे।  नीलकांत ने इस पर लखनऊ के देवी प्रसाद शर्मा का नाम लिया, जो बहुत अच्छा अनुवाद करते थे। जार्ज लुकाच की जो किताब लोकभारती से छपी थी, उसका अनुवाद उन्होंने ही किया था।

दुर्गा सिंह ने पुनः बातचीत को रामचंद्र शुक्ल पर मोड़ा। नीलकांत ने कहा, कि उन्होंने अंग्रेजों की तारीफ की है। इस पर रामजी राय ने कहा, कि दिक्कत उनमें बहुत है, क्षात्र धर्म से लेकर एलीट पोजिशन लेना यह सब है, लेकिन उनके भाववाद में वस्तुनिष्ठता है।

एक सवाल और है आपसे कि गालिब पर लिखते हुए आपने गालिब के कशमकश को तो पकड़ा, वह कशमकश रामचंद्र शुक्ल में भी दिखी कि नहीं।

इसके बाद दुर्गा सिंह ने नीलकांत के मुक्तिबोध पर लिखे लेख पर बातचीत करते हुए पूछा, कि एक लेख आपने 1969-70 में ‘कथा’ में लिखा, फिर कुछ साल पहले ‘लहक’ में लिखते हुए अपनी बात को खण्डित किया। नीलकांत ने कहा कि ‘अंधेरे में’ लम्बी कविता है, जिसमें अंत में है परम अभिव्यक्ति। यही उनका भाववाद है। अन्योक्ति पद्धति है।

रामजी राय ने कहा, कि मैं एक अलग बात कह रहा हूँ, दृष्टि अलग हो सकती है, लेकिन लहक वाले लेख में इन्होंने लिखा, कि इसके पहले मैं मुक्तिबोध को भिन्न दृष्टिकोण से देखता था, लेकिन इस प्रक्रिया में पढ़ते हुए मुझे अब यह लगने लगा है। तो यह इनकी लेखकीय इमानदारी है। मैं इसका स्वागत करता हूँ। क्योंकि बहुत लेखक चुपके से राह बदल लेते हैं। यह बेईमानी है। केके पाण्डेय  ने इसमें जोड़ा कि स्वार्थवश भी बहुत सारा बदल लेते हैं।

दुर्गा सिंह  ने सवाल   किया कि आपने सौन्दर्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण काम किया। राहुल सांकृत्यायन पर मूल्यवान पुस्तक सम्पादित की। लघु पत्रिकाओं के माध्यम से अपने समय में हस्तक्षेप किया, लेकिन क्या कारण रहा कि आपने इसे प्रचारित नहीं किया, अपने काम को उपलब्धि के रूप में नहीं देखा! इस पर रामजी राय ने चुटकी ली कि यह परित्याग की भावना है, जो भाववाद है।

नीलकांत ने इस पर सीधे न बोलकर रूपक के माध्यम से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, कि चींटी  रेत या मिट्टी  के भीतर से रास्ता बनाते हुए दूर दूसरी तरफ निकलती है, तो उसके रास्ते की मिट्टी जाती कहाँ है! चींटी उस मिट्टी को खुद खाते हुए आगे बढ़ती है, या मजदूर है, मजदूर अपने को खाते हुए उत्पादन करता है!

रामजी राय ने कहा कि इसके बावजूद इनकी सौन्दर्यशास्त्र की किताब पढ़ी जाती है। रामचंद्र शुक्ल वाली किताब ने तो हंगामा ही कर दिया था। उसके बाद इनको यज्ञ विध्वंशक ही कहने लगे कुछ लोग। नीलकांत ने जोड़ा, राक्षस!

बातचीत आगे बढ़ती रही और रामजी राय ने मुक्तिबोध के लेख के प्रसंग से बात निकाली शब्दों के प्रयोग और उस पर प्रतिक्रिया को लेकर। जैसे मुक्तिबोध के यहाँ है, परम अभिव्यक्ति। इसे भाववाद मान लेंगे, लेकिन है नहीं। या पूर्णता। इससे भी कुछ लोग भड़कते हैं, कि पूर्ण ज्ञान हो ही नहीं सकता। यह भी भाववाद है। इसे लेकर दो बात याद आती है, अक्सर। लेनिन कहते हैं कि पूर्ण ज्ञान कभी प्राप्त नहीं की जा सकती, लेकिन पूर्ण ज्ञान की अभिलाषा, हमारे ज्ञान को पथराये जाने से रोकती है। इस अर्थ में भी प्रयोग हो सकता है। नीलकांत ने इस पर हामी भरी।

रामजी राय ने आगे बोलना जारी रखा। परम अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है, लेकिन उसके बगैर लेखक बढ़ नहीं सकता आगे। उसमें आता क्या है, कि मैं खोजता फिरता हूँ पहाड़, पठार, हर देश की राजनैतिक परिस्थिति, हर आत्मा का इतिहास … यह क्या है! यह तो भाववाद नहीं है।

दूसरा, मार्क्स इस सम्बन्ध में कहते हैं, कि पूंजीवाद ने उत्पादन और वितरण का पूरा संजाल बिछा दिया और प्राकृतिक स्थिति को ही उलट दिया उसने, जब यह सीधा होगा, मतलब मनुष्य और उत्पादन के बीच में जब यह संजाल हट जायेगा, तब इसमें अनंत सम्भावनाएँ खुल जायेंगी!

नीलकांत ने बीच में पूछा, कि अंधेरे में कविता में उल्लू भी कोई पात्र है क्या, इस पर आया कि हाँ, घुग्घू आता है। कवि ने कहा चमगादड़ तो रामजी राय और केके पाण्डेय ने बताया कि घुग्घू उल्लू की एक छोटी प्रजाति होती है, जो कभी-कभी दिन में भी दिख जाते हैं।

इसके बाद नीलकांत की कहानी ‘एक रात का मेहमान’ पर चर्चा हुई। यह कहानी इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिक्खों के कत्ले-आम पर है। इसके बाद शिवानी ने ‘मटखन्ना’ में निराशाजनक अंत पर सवाल किया।

इस पर नीलकांत ने कहा, कि निराशा भी ऑब्जेक्टिव है, क्योंकि उसके बारे में हम भाषा का इश्तेमाल करते हैं, उसके बारे में बात करते हैं। निराशा कोई अपर या आकाशीय चीज नहीं है। आन्द्रे ज़ीद आदि विचारक संत्रास को लेखक के लिए खतरनाक चीज मानते हैं। काफ्का भी संत्रास को अवरोध मानता है। संत्रास वस्तुगतता को खत्म कर देता है। रामजी राय ने गोदान के सन्दर्भ से निराशा पर बात की और कहा कि गोदान में अंत में होरी पछाड़ खाकर गिर जाता है और धनिया भी बीस आना देकर पछाड़ खाकर गिर जाती है एक तरह से। लेकिन यहां निराशा नहीं उत्पन्न होती, बल्कि उसने पूरी परिस्थिति को ऑब्जेक्टिवली खोल दिया है।

इस बातचीत को विराम देते हुए केके पाण्डेय ने नीलकांत के जीवन से जुड़े पहलू की तरफ रुख किया और पूछा, कि नौकरी नहीं करने की स्थिति में आजीविका कैसे चलती थी? नीलकांत ने बताया कि वे बढ़ई का भी काम करते थे। दरवाजे, खिड़की, पलंग, टेबल, ड्रेसिंग टेबल आदि मैं बनाता था। इस घर में बढ़ई से सम्बन्धित सारे काम मैंने किया है। जिस पलंग पर मैं सोता हूँ, उसका पाया देखो! फिर लोगों ने जाकर नीलकांत की बनायी चीजें देखीं।

नीलकांत ने आगे बताया कि चमड़े का भी काम वे करते थे। एक चप्पल बनाकर भाभी जी को दिया और जब वे उसे पहनकर एक उत्सव में गयीं, तो लोग उनका चप्पल ही देखते रह गये।

केके ने पूछा, कि भाभी मतलब मार्कण्डेय जी की पत्नी तो नीलकांत ने कहा, हाँ! फिर केके ने पूछा कि यह तो शौक हुआ, आजीविका कैसे चलती थी?

इस पर नीलकांत ने बताया, कि जब वे झूंसी में आये तो यहाँ लगभग सभी घरों से मेरे लिए रोज का खाना भिजवाते थे लोग। फिर मैंने वह सब बन्द करवा दिया। मना कर दिया। एक गाँव के हमारे हैं बिन्दू महराज, वे अनाज भिजवा देते हैं। केके ने पूछा बाकी चीजों के लिए पैसा कहां से आता है, तो नीलकांत ने बताया, कि लोग दे देते हैं।

फिर शिवानी ने सवाल किया, कि उच्च वर्ण और मध्यवर्ग  से आने के बाद आप एक अच्छा जीवन जी सकते थे, लेकिन आपने यह जीवन क्यों चुना?

नीलकांत ने बताया, कि इससे उन्हें कई बातों से छुट्टी मिली। जैसे, जाति-पांति से। मैं बौद्ध हो गया। आप ताज्जुब करेंगे, यह जो औघड़ आते हैं, नीचे तक, वे भी बौद्ध होते हैं। औघड़ परम्परा बौद्धों से है। और यह हुआ, कि कहीं भी रह सकते हैं, कहीं भी खा-पी सकते हैं, कुछ भी पहन सकते हैं।

केके ने पूछा, कि आपकी जो बड़ी जमीन थी, तो उसमें आपका हिस्सा तो मिला होगा, तो नीलकांत ने कहा, कि अभी तक मिलता जा रहा है। इसके बाद नीलकांत ने अपने गाँव के मित्रों, गंगा सिंह, दुद्धन सिंह, अवध नारायण आदि को याद किया। कहानी में आयी जगहों मसलन मनेरा बाबा का पोखरा, बेलवरिया अर्थात बेल की झाड़ी आदि को याद किया। इसी सन्दर्भ से दुर्गा सिंह ने नीलकांत उपन्यास ‘बंधुआ रामदास’ की चर्चा की, जिसमें आता है, कि जमीन ने हमारे पुरखों को खाया, हम जमीन को खायेंगे। दुर्गा सिंह ने पूछा, कि क्या आपने खुद भी यही काम किया, तो नीलकांत ने जवाब दिया, हाँ। फिर सवाल हुआ, कि जमीन ने पुरखों को खाया, इससे आशय क्या है, उन्होंने बताया, कि मनुष्य नहीं रहने दिया उन्हें। रामजी राय ने कहा, कि प्रारम्भिक समाजवादियों का तो यही था, कि सम्पत्ति की होड़ मनुष्य नहीं रहने देती, तो सम्पत्ति को ही नष्ट कर दो।

नीलकांत ने कहा कि बदला लेना एक ऑब्जेक्टिव बात है, कि हम बदला लेंगे। हम जमीन को खत्म करेंगे। जैसे, उस पर किसी को बसा देना। मुसहरों को बसाने के लिए जो आन्दोलन हुआ, तो यह एक तरीका हुआ। रामजी राय ने इसे ऐसे स्पष्ट किया।

नीलकांत से बातचीत करते हुए दो घंटे होने को आये, विजय चाय-समोसा लेकर आ गये। बीच में लोग अलाव भी सेंक ले रहे थे। नीलकांत के बगिया में टहल आते थे। बारिश बन्द हो चुकी थी। हल्की सी गलन होने लगी थी। बुलबुल, दर्जिन, मुनिया, मैंना, महोख, पेंढकी, तोता के साथ टिटिहिरी लगातार परिवेश को अपनी आवाज से भर रहे थे।

चाय पीते हुए रामजी राय ने बात को पुनः रामचंद्र शुक्ल जन्मशताब्दी वर्ष के कार्यक्रम की तरफ मोड़ा और पूछा, कि उस समय आप जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष थे, तो नीलकांत ने जोड़ा कि कार्यकारी अध्यक्ष। रामजी राय ने पूछा, कि हंगामें के बाद आपसे लोगों ने निकाला कि आपने खुद छोड़ दिया। नीलकांत ने कहा, कि जब चंद्रबली सिंह ठीक हो गये, तो मैंने जाकर उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया, कि लीजिए अपना राज-पाट।

दुर्गा सिंह ने पूछा, कि क्या उस मामले में बीटी रणदिवे ने भी हस्तक्षेप किया था, तो नीलकांत ने बताया, कि हाँ। उन्होंने कहा, कि आप क्या सोचते हैं, कि बहस रोकने से रुक जायेगी! फिर प्रश्न हुआ, कि क्या संगठन ने कभी स्वीकार किया आपकी उस आलोचना को, तो नीलकांत ने बताया, कि नहीं, संगठन ने स्वीकार नहीं किया। इसी सन्दर्भ से दुर्गा सिंह ने पूछा, कि रामचंद्र शुक्ल को लेकर हिन्दी की अकादमिक दुनिया में इतना पूज्य-पवित्र भाव क्यों है!

रामजी राय ने जवाब दिया कि अकादमिक क्षेत्र का बहुत सारी चीजों को लेकर इसी तरह का पूज्य भाव है। देखियेगा कि जहाँ आकर नीलकांत ने हैमरिंग की है, उस पर, उसके सैद्धांतिक पहलुओं पर जाइयेगा, तो उससे बाहर अकादमिक क्षेत्र जायेगा नहीं अभी, उसका स्वार्थ है, कि नहीं जा सकता, क्योंकि सत्ता का यही समन्वय है। आप गलत-सही सबका समन्वय कर दीजिए। अब तो यह अवसरवाद में भी पतित हो गया। उसी तरीके से विरुद्धों का सामंजस्य। बहुत सारे लोगों को लगता है, अरे क्या बड़ी बात कर दी। जबकि, विरुद्धों के बीच सामंजस्य नहीं होता। कोई एकता या सामंजस्य जैसा दिखता भी है, तो अस्थायी होता है। फिर उसको टूटना ही होता है। समझौता, समन्वय, सामंजस्य, उसके प्रति जितना दृढ़ विरोध मुक्तिबोध के यहाँ मिलेगा, उसकी छाया रामचंद्र शुक्ल वाली नीलकांत की किताब की भाषा में है। कि, समन्वय झूठ है, सब केन्द्र टूटेंगे…यह पाॅवर है उसमें। रामचंद्र शुक्ल वाली किताब इसी पाॅवर के साथ छाया पड़ती है। तो, रणदिवे उसके निपटाये नहीं, लेकिन यह कहना, कि बहस चलती रहेगी, एक तरह का समन्वय ही है। हालांकि, उन्होंने पोलिटिकल पोजिशन ठीक ली।

नीलकांत ने मुक्तिबोध के निबन्धों को याद किया और रचना प्रक्रिया की वैज्ञानिकता पर बात की तो रामजी राय ने कहा, कि आपमें भी है रामचन्द्र शुक्ल वाली किताब या सौन्दर्यशास्त्र वाली किताब तो नीलकांत ने कहा, कि है, लेकिन मुक्तिबोध वाली नहीं है।

दुर्गा सिंह ने सवाल किया कि आप बी एस नरवणे जैसे प्रोफेसर के साथ डी.फिल कर रहे थे, तो उसे पूरा क्यों नहीं किया, आप चाहते तो किसी विश्वविद्यालय में अध्यापक हो सकते थे, तो वह रास्ता क्यों नहीं चुना?

नीलकांत ने कहा, कि वह रास्ता मैं चुनता ही नहीं। फिर नीलकांत ने जोगियों की बात की, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों होते थे, औघड़ परम्परा की बात की। इसी सन्दर्भ से दुर्गा सिंह ने पूछा, कि अब तो वैष्णव संस्कृति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा रहा है, तो आप क्या मानते हैं?

नीलकांत ने कहा, कि भारत की संस्कृति खिचड़ी संस्कृति है, मिली-जुली है। नीलकांत ने फिर भुवनेश्वर को याद करते हुए कहा, कि वे असली औघड़ थे।

इसके बाद केके पाण्डेय ने दूधनाथ सिंह की पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ की एक बात का जिक्र किया, कि उसमें वे कहते हैं, कि इलाहाबाद का अपना कोई लेखक नहीं हुआ। इस पर नीलकांत ने कहा, कि जो जिस शहर में लम्बे समय तक रह जाता है, तो उस शहर का ही माना जाता है।

फिर केके पाण्डेय ने एक और बात पूछी, कि दूधनाथ सिंह ने लिखा है, कि इस शहर में  लेखकों को फलते-फूलते कोई नहीं देखना चाहता। जैसे ही कोई दिखा, उसकी जड़ों में मट्ठा डालने लगते हैं। इस पर नीलकांत ने चुटकी ली कि सिर्फ वही हरियाये। फिर उन्होंने कहा, कि यह सब उक्ति-वैचित्र्य है।

शिवानी ने पूछा, कि महादेवी वर्मा का लेखन आपको कैसा लगता है, तो नीलकांत ने कहा कि उसमें बहुत शक्ति और उर्जा नहीं है। फिर रामजी राय ने कहा, कि मैं नीर भरी दुःख की गगरी, यह लाइन तो बहुत मारक है। विस्तृत नभ का कोई कोना/मेरा न कभी अपना होना/परिचय इतना इतिहास यही/उमड़ी कल थी, मिट आज चली। या पन्थ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला… नीलकांत जी ने जोड़ा, प्राण तुम लघु-लघु गात। इसके बाद पंत, निराला, प्रेमचंद पर बात हुई। दुर्गा सिंह ने सवाल किया, कि क्या कारण है, कि लेखक, साहित्यकार अब समाज में पहले जैसे सम्मानित नहीं रहे, न ही शासक वर्ग के भीतर उनकी वह स्थिति रही।

इस पर नीलकांत ने कहा, कि अब लेखक बदले में कुछ चाहता है। अब वह ज्यादा धनापेक्षी हुआ है।

केके पाण्डेय ने कहा, कि सत्ता ने भी अपना चरित्र बदला है। अब उसे साहित्यकार की जरूरत नहीं। अब उसे चारण चाहिए।

नीलकांत ने कहा, कि सत्ता को अब प्रचारक चाहिए। रामजी राय ने पूछा, कि मार्कण्डेय जी को आप क्या कहते थे, तो नीलकांत ने कहा कि कुछ नहीं। फिर एक घटना बताते हुए बोले कि एक बार उन्होंने मुझे किसी बात पर एक झापड़ मार दिया। फिर मैंने उनके सारे कापी-किताब पर स्याही डालकर लीप दिया। आये तो देखते ही रुआंसे हो गये और अपना होलडाल समेटने लगे और बोले कि हम यहाँ नहीं रुकेंगे। माई आयी, रोकने लगी, लेकिन रुके नहीं।

फिर रामजी राय ने कहा कि लेकिन आप भाई बोलते थे उन्हें। नीलकांत ने कहा, कभी-कभी। दुर्गा सिंह ने इसी सन्दर्भ से मार्कण्डेय की कहानी ‘माई’ की चर्चा की और बताया, कि उसमें नीलकांत एक चरित्र हैं कहानी के। अंत में दुर्गा सिंह ने पूछा, कि आप किस रूप में अपने को याद किया जाना पसन्द करेंगे, एक लेखक या एक औघड़! नीलकांत ने कहा, औघड़! शिवानी ने जोड़ा एक औघड़ लेखक!

नीलकांत: एक परिचय

मूल नाम- राजेन्द्र प्रताप सिंह

माता- मोहरा देवी

पिता- तालुकदार सिंह

गाँव- बराईं

जिला- जौनपुर

रचनाएँ- अजगर और बूढ़ा बढ़ई, मटखन्ना  (कहानी-संग्रह)

बंधुआ रामदास, एक बीघा खेत(उपन्यास)

रामचंद्र शुक्ल, सौन्दर्यशास्त्र की पाश्चात्य परम्परा, मुक्तिबोध की लम्बी कविताएँ (आलोचना)

राहुल: शब्द और कर्म(सम्पादन)

लघु पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन

 

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